अंकिता जैन. जशपुर छतीसगढ़ की रहने वाली हैं. पढ़ाई की इंजीनियरिंग की. विप्रोइंफोटेक में छह महीने काम किया. सीडैक, पुणे में बतौर रिसर्च एसोसिएट एक साल रहीं.साल 2012 में भोपाल के एक इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर रहीं.मगर दिलचस्पी रही क्रिएटिव राइटिंग में. जबर लिखती हैं. इंजीनियरिंग वाली नौकरीछोड़ी. 2015 में एक नॉवेल लिखा. ‘द लास्ट कर्मा.’ रेडियो, एफएम के लिए भी लिखती हैं.शादी हुई और अब वो प्रेग्नेंट हैं. ‘द लल्लनटॉप’ के साथ वो शेयर कर रही हैंप्रेग्नेंसी का दौर. वो बता रही हैं, क्या होता है जब एक लड़की मां बनती है. पढ़िएबारहवीं किश्त.--------------------------------------------------------------------------------कल रात मैं दो घंटे तक रोती रही. क्यों? मैं भी नहीं जानती. अपने पति से मैं उनबातों की शिकायतें कर रही थी जो गलतियां उन्होंने की ही नहीं थीं. शायद उन शिकायतोंको करते वक़्त मैं वो वजह ढूंढने की कोशिश कर रही थी जिसकी वजह से मुझे रोना आया.लेकिन बहुत सारी शिकायतों के बाद भी जब मुझे वजह नहीं मिली तो मेरा रोना धीरे-धीरेशांत हो गया. तब तक रात के 12 बज चुके थे और तेज़ भूख लगने लगी थी. मैंने रसोईखंगाली. कुछ खाने के सामान से प्लेट भरी. ढेर सारा खाया, पानी गटका और सो गई. अगलीसुबह इंटरनेट पर अपनी तरह की उन बनती माओं को ढूंढने लगी जिन्हें इस दौरान बिनाकिसी वजह के रोना आ रहा है और तब मुझे मिला इस अजीब सी सिचुएशन का एक नाम“प्रेगनेंसी डिप्रेशन”. हां, वाक़ई. मुझे भी आश्चर्य हुआ था ये जानकर कि जब आप अपनेआने वाली बच्चे के लिए ख़ुशी से भरे होते हैं. जब रोज़ पेट में लात-घूसे मारकर वोआपको रोमांचित कर रहा होता है. जब उसकी हलचल के सहारे आप बिना कुछ किए मुस्कुरा रहेहोते हैं. तब भी आप डिप्रेशन की एक सिचुएशन में हो सकते हैं. ऐसी सिचुएशन जिसमेंदिन में कई बार आपको अपने पेट से गले तक कोई तकलीफ खिंचती हुई महसूस होती है और गलेमें आकर वो रुआंसी हो जाती है. फिर आपको रोना आता है. लेकिन आंसू नहीं आते. आंसूक्यों नहीं आते? शायद इसलिए कि आपको पता ही नहीं कि आपको रोना क्यों आया. या शायदइसलिए कि आपको रोना अच्छा नहीं लगता. कभी बैठे-बैठे अचानक कोई ख़याल, आपको रोना दिलादेता है. लेकिन वो ख़याल था क्या? ये खोजना बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे ऑक्सफ़ोर्डकी डिक्शनरी में किसी ऐसे शब्द को ढूंढना जिसके बारे में कुछ भी नहीं पता. ये भीनहीं कि उसमें कितने अक्षर हैं. बस फिर भी ढूंढना है ताकि आपको तसल्ली मिल सके किहां, इसी की वजह से तो रोना आया था. लेकिन थक-हारकर आप अपने ख़यालों की डिक्शनरी बंदकर देते हैं. क्योंकि आपको वो ख़याल कैसे मिलेगा जो है ही नहीं. तो फिर क्या है ये?क्यों आ रहा है ऐसे अचानक बेबात रोना? तब आप अपने आप से सवाल करते हैं. जैसे, क्यामैं इस प्रेगनेंसी से ख़ुश नहीं हूं? नहीं. मैं बेहद, बेइंतहा ख़ुश हूं. बल्कि मैं तोसातवें आसमान के भी ऊपर उड़ रही हूं. तो फिर क्या मेरे पति से मुझे कोई शिकायत है?नहीं. वे भी पिता बनने के इस दौर में पूरी तरह मेरे साथ हैं. तो क्या मैं उसकेभविष्य को लेकर चिंतित हूं? पता नहीं. अगर हूं भी तो ये बहुत सामान्य सी बात है.अपने बच्चे के भविष्य के बारे में सोचना रोने की वजह तो नहीं. फिर क्या? उफ़ कितनाकठिन है ये पता लगाना. है न? चलिए फिर मैं कुछ मदद करती हूं अपनी और आपकी दोनों की.अगर प्रेगनेंसी के दौरान आपको रोने या गुस्सा करने के दौरे पड़ने लगे हैं, तो इसअचानक से पैदा हुई आफत के लिए आप सबसे पहले अपने हॉर्मोन्स को ही ज़िम्मेदार ठहराइए.क्योंकि वही है जो बदलते रहने के चक्कर में आपको तंग करते हैं. प्रोजेस्टेरोन,एस्ट्रोजन, और रिलैक्सिन जैसे हॉर्मोन जिन्होंने अपने लेवल को बदल-बदलकर आपके शरीरके अन्दर हड़कंप मचाया हुआ है सबसे बड़े गुनाहगार हैं, आपके इस डिप्रेशन के. ये दूसरीतिमाही में परेशान करना शुरू करते हैं और तीसरी तिमाही के आते तक तो बहुत ही जीनादुश्वार कर देते हैं. रिसर्च करने वालों का मानना है कि लगभग 23 प्रतिशत महिलाएंप्रेगनेंसी डिप्रेशन से गुज़रती हैं. और अधिकतर शर्म या झिझक की वजह से इस डिप्रेशनका इलाज़ नहीं कराती. इलाज़ से मतलब यही नहीं है कि आप दवाइयां ही खाएं. और भी कईतरीके हैं ग़ालिब गम मिटाने के. तो चलो जानते हैं कारण और निवारण दोनों को. वैसेकारण में पूरी तरह हॉर्मोन को ही ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है. कुछ बाहरी कारण भीहैं जो इसमें अपना रोल प्ले करते हैं. जैसे “प्रेगनेंसी ग्लो” जैसे मिथ. हमने अक्सरसुना होगा कि प्रेगनेंसी ग्लो के बारे में. मतलब कि प्रेगनेंसी के दौरान लड़कियांबेहद खूबसूरत हो जाती हैं. चेहरा दमकने लगता है. गाल लाली से भर जाते हैंवगैरह-वगैरह. लेकिन ये कथन सभी के मामले में सच नहीं हैं. मेरे मामले में भी नहीं.मेरी रंगत इन दिनों पहले से गहरी हो गई हैं. शरीर स्ट्रेच मार्क्स से भर गया है.गर्दन पर कालेपन की एक परत जम गई है जो रगड़ने से भी साफ़ नहीं होती. नाक फूलकरटेबल-टेनिस की बॉल हो गई है. गर्दन और पीठ दानों से भर गए हैं और चेहरा पहचान मेंआना बंद हो गया है. अब ऐसे में कई बार मुझे लगता है कि मैं कितनी बदसूरत दिखने लगीहूं. कहां गईं वो प्रेगनेंसी ग्लो की बातें? तो समझे. जिन्हें अपनी सुन्दरता सेबेहद मोहब्बत हो उन्हें कुछ इस तरह के कारणों से भी डिप्रेशन हो जाता है. कुछ कोलगता है कि अब उन्हें एक परफेक्ट बेटी, बहू और पत्नी का रोल अदा करने के बाद एकपरफेक्ट मां का भी रोल अदा करना पड़ेगा. जिसके लिए उन्हें अपनी बची-कुची ख्वाहिशोंको भी मारना होगा. क्योंकि अब नन्हे से बच्चे को छोड़कर तो आप यार-दोस्तों के साथट्रैकिंग पर जाने का प्लान नहीं बना सकते न. अभी तक आपने मूवी हॉल में दूसरे केरोते बच्चों पर ताने कसे. अब आपकी बारी आने वाली है. क्या करेंगे? बच्चे को घरछोड़कर मूवी देखने जाएंगे तो गिल्ट महसूस होगा और लेकर जाएंगे तो शांति से देख नहींपाएंगे. इसी तरह के कई बदलाव हैं जो आपने बच्चा प्लान करते वक़्त शायद ना सोचे हों.लेकिन बढ़ते बेबी बंप के साथ वो आपके दिमाग पर हावी होने लगते हैं जो डिप्रेशन कादूसरा कारण बनते हैं. हम हिन्दुस्तानी पत्नियां कुछ इस वजह से भी डिप्रेशन में आजाती हैं क्योंकि हमें पतियों से सपोर्ट की बहुत बड़ी शिकायत होती है. अभी तक उसकागीला तौलिया, गंदे मोज़े, जूठी प्लेट और उल्टा जींस ही समेटना पड़ता था. अब एक हाथ सेबच्चे को संभालते हुए ये सब भी करना पड़ेगा ये सोच-सोचकर दिमाग की बैंड बजने लगतीहै. ये सब ऐसे कारण हैं जिनके बारे में खुलकर कह पाना या अपने आप में भी खुलकरसोचकर हमें गंवारा नहीं होता. और तब हमें रोना, गुस्सा करना, दुखी रहना, लोगों सेकट जाना, बिस्तर में ही घुसे रहना एक उपाय लगता है. जिससे डिप्रेशन बढ़ने लगता है.इसके अलावा कुछ-एक कारण और भी हैं. जैसे यदि आपकी या आपके परिवार में किसी कीडिप्रेशन हिस्ट्री रही हो. ज़िन्दगी में कुछ समस्याएं चल रही हों. प्रेगनेंसी केदौरान कुछ बड़ी मेडिकल प्रॉब्लम्स हों. थाईराइड की समस्या हो या आपको दिन-रात किसीतरह की पारिवारिक मानसिक यातना झेलनी पड़ रही हो. ये सभी कारण आपकी प्रेगनेंसीडिप्रेशन का कारण हो सकते हैं. लेकिन सिर्फ कारण जानने से कुछ नहीं होगा. ना ही येसोचने से कि वक़्त के साथ ये अपने आप चला जाएगा. अगर आपने इसका समय पर इलाज़ नहींकिया तो यह प्री-टर्म डिलीवरी, कम वजन का बच्चा होना, मिस्केरिज, जेस्टेशनलडायबिटीज, डिलीवरी के बाद डिप्रेशन जैसी बड़ी समस्याओं को जन्म दे सकता है. तो क्याकरें? कैसे सॉल्व करें इसे? हम्म. समस्या तो है लेकिन हल उतना मुश्किल नहीं. 1.सबसे पहले हमें ज़रुरत है अपनी झिझक मिटाकर इसके बारे में खुलकर बात करने की. जिसकेलिए सही और परफेक्ट श्रोता आपके पति से बेहतर और कोई नहीं हो सकता. आप अपने पति कोपास में बैठाएं और उसे बताएं कि आप आजकल किस दौर से गुज़र रही हैं. आपको बात-बात पररोना या गुस्सा अगर आ रहा है आपको उसके क्या कारण लगते हैं. आपके रोने या गुस्से कोसिर्फ प्रेगनेंसी चेंजेस मानकर हवा में ना उड़ाने दें. बल्कि उनके बारे में बातकरें. अपनी भावनाओं को, अपनी सोच को अपने पार्टनर के साथ बाटें. 2. अगर आप हर वक़्तघर घुस्सू बनकर रहे हैं तो घर से बाहर निकलें. कुछ वक़्त दोस्तों या उन करीबियों केसाथ बाटें जिनके साथ समय बिताना आपको अच्छा लगता है. 3. जितना हो सके अपने शरीर कोआराम दें. उसे बेवजह थकने मत दें. ना कहना सीखें. अच्छी बहू/पत्नी का ठीकरा अपने सरपर मत फोड़ें. इससे आपको कुछ हासिल नहीं होने वाला. यदि कोई काम आपसे नहीं हो सकताया आपका मन उसे करने को साफ़ मना कर रहा है तो कहें. भूलें ना कि आपके मन की घुटनआपके होने वाले बच्चे पर बहुत ज्यादा बुरा असर डाल सकती है. 4. आने वाले बच्चे केलिए सारी परफेक्ट तैयारियों का बोझ अभी से अपने कन्धों पर मत उठाएं. उसके आने केबाद भी बहुत कुछ हो सकता है. अभी ज़रूरी है कि आप अपने आपको जितना शांत और ख़ुश रखसकती हों रखें. यही सबसे पहली ज़रूरी तैयारी है. 5. खाने का बेहद ध्यान रखें.क्रेविंग के चक्कर में कुछ भी, कैसा भी, कभी भी खाने के पीछे ना पड़ें. सोच समझकर,ज़रूरी और अच्छा खाएं. 6. ध्यान में बैठें. अपना एक हाथ अपने पेट यानी बच्चे के पासरखें और दूसरा हाथ अपने दिल पर और कुछ समय के लिए दीन-दुनिया को भुलाकर सिर्फ अपनेबच्चे से बात करें. महसूस करें कि वो आपकी गोद में खेल रहा है. उससे जितना करीब होसके होने की कोशिश करें. यह एक जादू की तरह काम करेगा. 7. व्यायाम, योगा या वॉककरें. रेगुलर. (अगर आपकी मेडिकल कंडीशन अलाऊ करती हो तो. कोई भी व्यायाम शुरू करनेसे पहले अपने डॉक्टर से बात ज़रूर करें) प्रेगनेंसी योगा और इवनिंग वाक से मैंनेअपने डिप्रेशन में कुछ फर्क महसूस किया है. ऐसा नहीं है कि मुझे अब रोना नहीं आ रहाहै लेकिन अब मैं ख़ुद को कुछ हद तक संभाल पाती हूं. मेरी कोशिश जारी है आप भी कोशिशकरके देखिए. यह ज़रूरी है. क्योंकि प्रेगनेंसी डिप्रेशन आपके बच्चे को चिड़चिड़ाऔररोतलू भी बना सकता है. और मुझे यकीन है कि आप कतई नहीं चाहेंगे कि आपका बच्चा ऐसाहो. एक हंसमुख बच्चे के लिए आज से ही काम पर लग जाइए. उसके कपड़े-लत्ते-स्कूल कीचिंता छोड़िए. उसकी हंसती मुस्कुराती ज़िन्दगी की परवाह पहले कीजिए. मेरी शुभकामनाएं.--------------------------------------------------------------------------------मां इन मेकिंग की पुरानी किश्तें- 'बढ़ता हुए पेट ऊपर चढ़ा है तो लड़की होगी, अगर नीचेलटका है तो लड़का होगा' ‘प्रेगनेंसी के दौरान मन करता है, सारे साड़ी ब्लाउज को आगलगा दूं’ गर्भावस्था की तकलीफें आधी हो जाती हैं, जब होने वाला पिता बेटी की चाहतरखता हैडॉक्टर के दरवाज़े तक पहुंचने में हालत ये थी कि अब मरी या तब मरी