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कांग्रेस बुरी तरह हार गई, राहुल गांधी सपोर्टर खुश हैं, ये रहीं वजहें

बूढ़े पुराने लोगों की होगी विदाई. राहुल भइया का युवा जोश आएगा और आगे. ले जाएगा पार्टी को नई बुलंदियों पर.

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19 मई 2016 (अपडेटेड: 19 मई 2016, 01:36 PM IST)
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Source- PTI
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लोग ना इंडिया के. दिन भर पॉलिटिक्स बतिया सकते हैं. और समझ मिथौरी भर भी नहीं होती. बमचक काटे हैं. कि असम-केरल में हार गए. तमिलनाडु में भी साफ भए. बंगाल में भी लेफ्ट से ईलू-ईलू काम न आया. अब कांग्रेस में जो है, राहुल गांधी की स्थिति कमजोर हो जाएगी. और असल में क्या है. सबसे पहले तो वो शर्त है. जो सभी बड़े जर्नलिस्ट लगाते हैं. क्योंकि नेताजी लगवाते हैं. फुसफुस संप्रदाय के. कि नाम न छापने की शर्त पर. तो हम पर भी लागू. हां, तो गांधी परिवार के करीबी ने बताया. 4 राज्यों में हार और पांचवे महत्वपूर्ण राज्य पुदुच्चेरी में कांग्रेस की प्रेरणा से गठबंधन के सिरमौर बने डीएके के नेतृ्त्व में प्रेरणादायी जीत का राहुल के प्रमोशन से कोई संबंध नहीं. राहुल जी कांग्रेस के अध्यक्ष बनकर रहेंगे. मम्मी जी ने मन बना लिया है. और कांग्रेसी प्रजा को पता है. ब्लू ब्लड का महत्व. अब कोई चिरौंजी लाल तो आएंगे नहीं. पंचायती और बिलाक लेवल की पालिटिक्स कर. फिर जिला और सूबा निपटा. और बन जाएंगे ग्रैंड ओल्ड पार्टी के प्रमुख. हलुवा है क्या. अरे काबिलियत से ज्यादा रसूख चाहिए. क्या हुआ जो पार्टी सूखे में है. देश में भी तो सूखा है. पार्टी कोई परदेसी तो नहीं. सब संघी लोग झूठ फैलाते हैं. कि मम्मी जी इटली से हैं. ये क्या बात हुई जी. हमारी चच्चू वाली चाची अजीतमल से हैं. दूसरा मुलुक. हमारा जिला जालौन. उनका इटावा. बीच में जमुना जी और बीहड़. तो देस बदल गया तो क्या चाची, चाची नहीं रहेंगी. हां. तो राहुल भइया हैं गांधी. तो पार्टी प्रमुख तो वही बनेंगे. वैसे हमको एक और असूत्र सूत्र बता रहे हैं कि बीजेपी वाले हवन करवा रहे हैं. कि ये काम जल्दी हो.यहां गंभीर बात हो रही है और बीजेपी को अपनी लुकलुक मची है. मजाक चल रहा हो जैसे.

वो सब तो ठीक है पर राहुल जी जिम्मेदारी कब उठाएंगे

सबसे पहले तो हमको इस सवाल की टोन से दिक्कत है. राहुल जी बचपन से देख रहे हैं. दादी को. चाचा को. पिता जी को. मां को. उनके यहां डिनर पर ये बातें तो न होती होंगी. कि सिलेंडर बुक कर दिया है. या फिर ये कि रिक्शेवाला रोज लेट आता है. स्कूल में मैडम डांटती हैं. कोई ये भी न कहता होगा कि हमको आम का नहीं मिर्ची का अचार दिया करो टिफिन में परांठे के साथ. हम बड़े हो गए हैं. बातें बुनियादी होती होंगी. ये उड़ीसा के सीएम बहुत फायर हो रहे हैं. इनको फुर्र किया जाए. या फिर ये कि महाराष्ट्र में बहुत दिनों से नानू के नाम पर कोई बिल्डिंग नहीं बनी. ग्रांट जारी की जाए. आप बातें बना रहे हैं. असली बात नहीं बता रहे. असली बात. जुलाई में कांग्रेस का संगठन बदलेगा. सोनिया गांधी पार्टी अध्यक्ष के बजाय मार्गदर्शक मंडल टाइप किसी संस्था की प्रभारी हो जाएंगी. तमाम और बुजुर्गों को वहीं एडजस्ट किया जाएगा. जनार्दन द्विवेदी और मोतीलाल वोरा सरीखे पार्टी (पढ़ें परिवार) के वफादारों को. और तौलिया वाली कुर्सी से सीसाधारी मेज के सामने बैठेंगे राहुल गांधी. कहो जिंदाबाद. अरे विरोधी हो तो भी कह दो. मुस्किया तो रहे ही होगे. आश्वस्त भी हो रहे होगे. क्या कहें. समय का फेर है. हमको लगता था कि डिंपल वाले लड़के नामी होते हैं. मगर डिंपल तो लड़की हो गई. फिर उनकी भी लड़कियां हो गईं. डिंपल की मौड़ी ट्विंकल. छोटी रिंकी भी रही. पर ऊ मुसु मुसु हासी हुई गईं.

तो कौन नहीं होगा राहुल का रश्मिरथी

अध्यक्ष के बाद होता है महासचिव. इधर कुछ दिनों से राहुल के चलते उपाध्यक्ष भी था. पर वो एडहॉक भर्ती थी. कि प्रिंसिपल साब छुट्टी पर हैं तो सुरेश सर प्रिंसिपल हो गए. हां, तो बात महासचिव की. संख्या है आठ. पुराने जाएंगे. अम्बिका सोनी, मोहन प्रकाश, मधुसूदन मिस्त्री, सीपी जोशी, बीके हरिप्रसाद, मुकुल वासनिक, गुरुदास कामत वगैरह. दिग्विजय बचे रहेंगे. पुराने गुरु रहे हैं राहुल के. यूपी में बातों बातों में सरकार बनवा दी थी 2012 में. मगर फिर अखिलेश अपनी साइकिल लेकर आ गए. हाथ मोचिया गया. खैर, शकील अहमद पंजाब प्रभारी हैं. पंजाब में चुनाव हैं. जहां कांग्रेस फिर हार सकती हैं. हालांकि तैयारी जीत की है. पर यहां झाड़ू वाले डटे हैं. तो शकील चच्चा पर गांठ फंसी है. जनार्दन द्विवेदी संगठन महासचिव हैं. मैडम के आदमी हैं. उनका भी एडजस्टमेंट देखा जा रहा है. वोरा जी फंड देखते हैं. जो खाली होता जा रहा है. वहां अशोक गहलोत या सुशील कुमार शिंदे आ सकते हैं.

और ये मिलिए नए नवेलों से

महासचिव में नए चेहरे भी होंगे. और कुछ कद्दावर नेता भी. कुछ जनाधार तो कुछ वफादार वाले. मसलन, कमलनाथ, भूपिंदर सिंह हुड्डा और आनंद शर्मा. शीला आंटी को भी ले सकते हैं. हालांकि उनके लिए यूपी में भी वैकैंसी खोजी जा रही है. राहुल गांधी युवा हैं. और जो युवा हैं. वो हैं. भंवर जितेंद्र सिंह (राजस्थान), आरपीएन सिंह (यूपी), मीनाक्षी नटराजन (मध्य प्रदेश), सूरज हेगड़े (कर्नाटक), मिलिंद देवड़ा (महाराष्ट्र) और के राजू (आंध्र प्रदेश) वैसे राजू आईएएस रहे हैं. सीनियर हैं. मगर पॉलिटिक्स में उमर सब कुछ कहां होती है. एंट्री भी तो चेक करनी पड़ती है न कि कित्ते बजे की है.

तो कब बंटेगी राहुल जी के नाम की बूंदी

दो तारीखें देख रहे हैं पंडित जी. एक, जून जुलाई में राहुल अध्यक्ष मनोनीत किए जाएं. अक्टूबर में संगठन के चुनाव हों तो औपचारिक मुहर लग जाए. या फिर अभी नाम भर को मम्मी रहें. काम राहुल देखें. टीम नई बना दी जाए. वो नेता जी का मिजाज समझ ले. और फिर अक्टूबर में तख्ती भी बदल जाए.

और प्रियंका दीदी

बस यही हमें तुम लोगों का पसंद नहीं. यूपी में चरचराहट काटे थे. अब दिल्ली में भी यही पूछ रहे हो. अरे बेटी प्रियंका आएगी. तो राहुल भइया के सहयोग के लिए. अब ये न कहना कि उनमें समझ और करिश्मा ज्यादा है. बालकों सी बात करते हो. संस्कार नहीं हैं सवाल पूछने के. हां तो युवा सोच, नई तरक्की, देश की सोच, हाथ, साथ और बाकी सब भी. राहुल गांधी. भइया. जिंदाबाद. गरीबी हटाओ. फालतू बातें भी हटाओ. जैसे इस आर्टिकल में उलीच दी गई हैं.

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