RRB भर्ती में छात्रों का आक्रोश और आशंका दोनों देख ली. रेल मंत्री का आश्वासन भीदेख लिया. अब राजनीति की बारी थी सो RRB भर्ती के मुद्दे पर बिहार बंद बुला लिया.इस बार छात्र कम, विपक्षी पार्टियों से छात्र नेता ज्यादा सड़कों पर थे. बिहार मेंजगह-जगह सड़कें रोकी गईं और टायर भी जलाए गए. बिहार बंद के दौरान ऐसी तस्वीरेंपटना, सीतामढ़ी, कैमूर, मोतिहारी जैसे कई जिलों आई हैं, विपक्ष ने भी सरकार को खूबघेरा मगर खान सर की अपील काम आ गई. प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी करने वालेअभ्यर्थियों में पटना वाले खान सर बहुत फेमस हैं. आपने भी अनोखे तरह से पढ़ाने औरदेसी अंदाज में सिखाने के उनके वीडियो जरूर देखे होंगे. 25 और 26 जनवरी को छात्रोंकी तरफ से जो हिंसा हुई इस मामले में उन पर भी FIR दर्ज हुई, आरोप उकसाने का लगाथा. मगर खान सर ने आज छात्रों से बिहार बंद में ना शामिल होने की अपील की थी और इसअपील का नतीजा ये हुआ कि बड़े पैमाने पर रेलवे के अभ्यर्थी सड़कों पर नहीं उतरे,लेकिन ट्विटर पर राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव हर किसी ने RRB भर्ती पर सरकार कोघेरा, क्योंकि विपक्षधर्म भी यही करने को कहता है. छात्रों को उग्र देख केंद्र कीमोदी सरकार यहां बैकफुट भी है और सांसद सुशील मोदी भी युवाओं के साथ खड़े नजर आए.यानी सरकार के पक्ष के लोग ही मान रहे हैं RRB भर्ती में गड़बड़ी हुई है उसेदुरुस्त किया जाएगा. लेकिन छात्रों का सवाल है कि जब सरकार को पता है कि गलत हुआ हैतो कमेटी किस बात के लिए बनाई गई है, 4 मार्च तक मुद्दे को टाला क्यों गया ? जबसमस्या का पता है तो सीधे समाधान क्यों नहीं किया जा रहा है ? छात्रों की मांगे अगरसरकार को जायज लग रही हैं तो उसे बिना देरी मान लेने में क्या बुराई है ? आखिर 4साल से लटकी भर्ती और कितना लटकाया जाएगा ? और ये लटकाने वाला मसला सिर्फ RRB कीभर्तियों तक सीमित नहीं है, केंद्र ही नहीं, देश के तमाम राज्यों में होने वालीभर्तियों परिक्षाओं हाल यही है. पहली बात तो समय से परीक्षा होती नहीं, और देर-सबेरपरीक्षा हो भी गई तो तो पेपर लीक हो जाता है. मजबूरन छात्रों को किताब-कॉपी छोड़करसड़कों पर भटकना पड़ता है. कभी लाठियों तो कभी मुकदमों से लड़ना पड़ता है. अब दूसरीभर्ती की बात. राजस्थान की REET परीक्षा. REET मतलब Rajasthan EligibilityExamination for Teachers जैसे UP TET, MPTET है, वैसे ही REET. फुल फॉर्म जानलिया. अब विवाद और छात्रों की पीड़ा को समझिए. राजस्थान की गहलोत सरकार ने 35000शिक्षकों की भर्ती निकाली. कब निकाली, दिसंबर 2019 में. मगर परीक्षा यहां भी समयपर नहीं हुई. कभी कोरोना, कभी कर्फ्यू, कभी महावीर जयंती की छुट्टी के नाम परकैंसिल होती रही. 2019 में हो जाने वाली परीक्षा पूरे दो साल बाद 26 दिसंबर 2021 कोहुई. बीच में कोरोना का दौर रहा तो देरी की बात पर छात्रों ने संतोष कर लिया. लेकिनउनके भविष्य के लिए आफत तब हो गई, जब परीक्षा से ठीक दो दिन पहले 24 दिसंबर को पेपरही लीक हो गया. मन लगाकर पढ़ने वाले छात्रों की स्थिति अब काटो तो खून नहीं वाली.फिर क्या...छात्र सड़कों पर प्रदर्शन करने को मजबूर होना पड़ा दिसंबर से लेकर अब तककई बार छात्र और छात्र संगठन प्रदर्शन कर चुके हैं या कह लीजिए राजस्थान में लगातारप्रदर्शन चल ही रहे हैं. इस मामलें में पहले तो गहलोत सरकार ना-नुकुर करती रही,लेकिन दबाव बढ़ा तो SOG की जांच बिठा दी गई. और अब तक करीब 35 लोगों को राजस्थान कीSOG गिरफ्तार भी कर चुकी है. यानी कहीं ना कहीं सरकार की तरफ से गठित SOG भी पेपरलीक की बात पर मुहर लगा रही है. दिलचस्प बात ये है कि REET के पेपर लीक अतिसुरक्षितमाने जाने वाले जयपुर शिक्षा शंकुल के स्ट्रॉंग रूम से हुआ और अब इस पूरे मामले केतार सीधे माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डीपी जारौली तक जाने लगा है. SOG ने कलयानी 27 जनवरी को उनसे अजमेर में पूछताछ की है. वो खुद को निर्दोष बता रहे हैं,जैसा कि आरोपी करता है. मगर बोर्ड के सबसे बड़े अधिकारी डीपी जारौली पर सबसे बड़ाआरोप है, कि उन्होंने जयपुर जिले का कॉर्डिनेटर अपने नजदीकी प्रदीप पराशर को लगादिया, जबकि वो शिक्षा विभाग में कार्यरत भी नहीं हैं. SOG की रडार पर कॉर्डिनेटरप्रदीप पराशर भी हैं, उनसे भी पूछताछ चल रही है. अब सवाल है कि पेपर लीक किसने किया? तो इसका मास्टरमाइंड रामकृपाल मीणा नाम का शख्स है. उसे SOG गिरफ्तार कर चुकी हैऔर कोर्ट में पेशी भी कल हुई है. लेकिन अब सवाल ये भी है कि सुरक्षित स्ट्रांग रूमसे रामकृपाल मीणा ने पेपर लीक कैसे किया ?तो जवाब है कि रामकृपाल भी शिक्षा शंकुलमें नियुक्त था, वो एक स्कूल भी चलाता है. आरोप है कि उसी ने अपने सहयोगियों के साथपेपर स्ट्रांग रूम से निकाले और लेक्चरर उदयराम बिश्नोई को दिए. इसके लिए 2 करोड़की रकम भी ली. वहां से पेपर भजल, पृथ्वीराज और बत्तीलाल नाम के आरोपियों के जरिए 7सेंटरों तक पहुंचाए गए. ये वो आरोपी हैं जिनको राजस्थान की SOG गिरफ्तार कर चुकीहै. बड़े खिलाड़ी तो अब भी पकड़ से बाहर हैं. माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्षडीपी जारौली और कॉर्डिनेटर प्रदीप पराशर पर गिरफ्तारी की तलवार तो लटक रही है, मगरअब तक गिरफ्तारी नहीं हुई है. मगर कानूनी दांवपेंच से इतर परिक्षार्थियों का क्याजो मारे-मारे फिर रहे हैं. उनका भरोसा तो गहलोत सरकार से डिगा नजर आता है और शायदइसीलिए राजस्थान बेरोजगार संघ की सीधी मांग है, जांच CBI को दे दीजिए, SOG पर भरोसानहीं है पुरानी भर्ती और पुरानी लीकेज की हवाला है और मांग ये भी है कि पेपर लीककराने वाले माफियों के लिए उम्रकैद का कानून बने, यूपी की तरह आरोपियों की संपत्तिभी जब्त की जाए. क्योंकि उदारण के तौर पर देखेंगे तो यूपी में TET का पेपर लीक हुआतो तत्काल परीक्षा रद्द कर दी गई, 36 आरोपियों को गिरफ्तार किया और सब पर गैंगस्टरएक्ट, रासूका लगा दिया गया. यूपी के सीएम योगी ने आरोपियों के घर बुल्डोजर भीपहुंचा दिया. यहां सवाल यूपी मॉडल का नहीं बल्कि उस मॉडल का है, उस सख्त कार्रवाईका है, जिसके बाद कोई भी गैंग पेपर लीक कराने की सोच ना सके. क्योंकि राजस्थान मेंये हर बार की कहानी हो गई है, कोई भी परीक्षा होता है, पेपर लीक हो जाता है. आरोपीपकड़े जाते हैं और फिर छूटकर दूसरा पेपर लीक कराने में लग जाते हैं. उदारण के तौर2018 में हुई जेईएन और लाइब्रेरियन की भर्ती परीक्षा का पेपर लीक हुआ तो सरकार नेदोनों परीक्षा रद्द कर दी, लेकिन REET के मामले में अब तक ऐसा नहीं हुआ और युवासंगठन चाहते हैं कि पेपर ना सिर्फ रद्द हो बल्कि 35 की जगह 50 हजार शिक्षकों कीभर्ती की जाए और इसके लिए 9 फरवरी को युवाओं ने विधानसभा घेराव का ऐलान कर दिया हैये तो रहा युवाओं का पक्ष मगर राजस्थान में कांग्रेस की सरकार का क्या ? एक तरफराहुल गांधी और प्रियंका गांधी यूपी में युवाओं के लिए यूथ मेनीफेस्टो जारी करतेहैं, कहते हैं कि हमारी सरकार बनी तो पारदर्शी नौकरी देंगे और उदाहरण भी कांग्रेसके राज वाले राज्यों का देते हैं और राजस्थान में नौकरी कैसे मिल रही है,राहुल-प्रियंका को एक बार REET के मामले को भी कायदे से देख लेना चाहिए. सड़क परठोकरें खाते छात्र-छात्राओं के चेहरे निहार लेने चाहिए एक तरफ उनके मुख्यंमंत्रीगहलोत पोस्टर लगवाते हैं कि एक लाख नौकरी दे दी, एक लाख देने की तैयारी है और दूसरीतरफ वही मुख्यमंत्री कहते हैं हम हर किसी को सरकारी नौकरी नहीं दे सकते. हम कहतेहैं कि एक बार को सीएम गहलोत की बात सही भी है, हर किसी को सरकारी नौकरी नहीं मिलसकती है, मगर साहब सरकारी नौकरी की जो परीक्षा हो रही है, वो तो सही और पारदर्शीतरीके से हो सकती है. अगर 100 में 10 युवाओं को ही नौकरी मिलती है तो मिले, मगरपेपर तो लीक ना हो. युवा साल-साल एक अदद नौकरी के लिए पढ़ाई करते हैं और जब पेपरलीक हो जाता है तो उनके सपने पर सीधे कुठाराघात होता है. वो कभी सोशल मीडिया परट्रेंड कराते हैं तो कभी सड़कों पर आवाज उठाते हैं. और इन सबके बीच वो अपने मुख्यकाम पढ़ाई से दूर हो जाते हैं. उनका और राज्य दोनों का नुकसान होता है. गहलोत सरकारको चाहिए कि वो REET ठीक ढंग से जांच कराए, दोषियों को सजा दिलाएं. चूंकि पेपर लीकहुआ तो फिर से परीक्षा हो.और इन सबके लिए सबसे पहले सिस्टम के उस होल दुरुस्त कियाजाए, जहां से बार-बार पेपर चू जाते हैं. चूंकि राहुल गांधी और प्रियंका गांधीकांग्रेस के राज्यों में नौकरी मॉडल का उदाहरण दिया था तो अब दूसरे कांग्रेस शासितराज्य की भी बात कर लेते हैं. छत्तीसगढ़. यहां साल 2012 से प्राथमिक और मिडिल केशिक्षकों की भर्ती ही नहीं हुई थी. सरकार तब बीजेपी की थी. भर्ती ना होता देख 2017में शिक्षक अभ्यर्थियों का एक संगठन बना. नाम हैछत्तीसगढ़ प्रशिक्षित डीएड और बीएडसंगठन. संगठन ने तब बीजेपी सरकार का विरोध शुरू किया और 2018 के चुनाव में सरकारबदल गई. अब अभ्यर्थियों ने शिक्षक भर्ती की मांग के लिए सीएम भूपेश बघेल से मुलाकातकी और सीएम बघेल ने तुरंत तत्परता दिखाते हुए शिक्षक भर्ती का फैसला ले लिया. यहांतक सबकुछ अच्छा था. छत्तीसगढ़ सरकार ने 2019 के मार्च में 14580 शिक्षकों की तीनकैटगरी में भर्ती भी निकाल दी. पहली कैटगरी लेक्चरर की, जिसमें 3177 पद, दूसरीशिक्षक की जिसमें करीब 5500 पद और तीसरी सहायक शिक्षक की जिसमें 5812 पद भरे जानेथे. मगर ताज्जुब की बात ये है कि दो साल बाद भी अब तक पूरे पद भरे नहीं जा सके हैं.जिसके बाद छात्रों प्रदर्शन शुरू कर दिया विरोध इसलिए हैं क्योंकि भर्ती प्रक्रिया2019 शुरु हो गई थी और नवंबर में डॉक्यूमेंट वैरिफिकेश हुआ. मगर फिर मुआ कोरोना आगया. प्रक्रिया रुकी तो भर्ती विभाग ने डॉक्यूमेंट वैरिफिकेश को जीरो कर दिया औरकहा फिर से वैरीफिकेशन करेंगे. अभ्यर्थियों ने इसका बड़ा विरोध किया. जैसे-तैसे बातआगे बढ़ती रही. सरकार ने नियुक्तियां भी शुरू कर दी. लेक्चरर वाले पद तो भर लिए गए.मगर विवाद शिक्षक और सहायक शिक्षक पर हो गया. इसमें भर्ती की दो लिस्ट आ चुकी है.सरकार दावा करती है कि 80% पद भरे जा चुके हैं, जो कुछ बचे हैं वो हाईकोर्ट मेंस्टे की वजह से बचे हैं. मगर अभ्यर्थी आरोप लगा रहे हैं कि ऐसा नहीं हुआ, क्योंकिकई ऐसे छात्र हैं जो तीनों कैटगरी में चयनित हो गए और नीचे का पद छोड़ ऊपर की नौकरीपकड़ ली. यानी पीछे के पद खाली हो गए तो छात्रों की मांग है कि जल्द से जल्द सारेपद भरे जाएं और बैकलॉक की गुंजाइश ना छोड़ी जाए. 2800 सहायक शिक्षकों का मामलाहाईकोर्ट में पेंडिग है. विवाद ये है कि ट्राइबल एरिया में सिर्फ वहीं केछात्र-छात्राओं का चयन हो. इसके लिए स्थानीय छात्रों ने हाईकोर्ट से स्टे ले रखाहै. मगर इसके अलावा शिक्षक संगठन 4000 खाली शिक्षकों के पदों पर जोर दे रहेंहैं,जिसपर नियुक्ति नहीं हुई है. अब सोचिए एक तो सालों बाद वैकेंसी आती है, वो भीहोने में इतना वक्त लग जाए और उसमें कोई छात्र ओवरएज जाए तो क्या करें ? इसकाहर्जाना कोई नहीं बता पाता. यही हाल बीजेपी शासित मध्य प्रदेश का भी है. वहां भीशिक्षकों की पूरी भर्ती के लिए अभ्यर्थी अब खून से प्रधानमंत्री मोदी के नाम खतलिखने लग गए हैं. कह रहे हैं नियुक्ति दो या मुक्ति दो. तो सवाल है कि आखिर टीचरबनने की ख्वाहिश रखने वाले ऐसे छात्रों को खून से खत क्यों लिखना पड़ रहा है. तोयहां भी कहानी साल 2018 यानी चुनाव से पहले से अटकी हुई है. 2018 में शिवराज सरकारने ही एमपीटेट का विज्ञापन निकाला. शिक्षा विभाग में 20679 और जनजाति विभाग में7924 पदों की भर्ती होनी थी. 4 साल बीतने को हैं, मगर आज तक ये काम पूरा नहीं होपाया. छात्र-छात्राएं लगातार प्रदर्शन करते रहे, मगर सरकारी गाड़ी तो अपनी रफ्तारसे ही बढ़ती रही. भर्ती भी हुई मगर अब भी 8627 पद खाली हैं. आरोप है कि भर्तीनियमित प्रक्रिया से इतर हुई है. सूचियों का मिलान सही से नहीं किया गया, पहलेज्ञापन पर ज्ञापन लिखा गया. अब खून से खत लिखे जा रहे हैं. तो बारी-बारी से केंद्रऔर तीन राज्यों की सरकारों की भर्तियों का हाल आपके सामने रख दिया और इसलिए रख दियाताकि आप समझ सकें कि सरकार कोई भी क्यों ना हो, इस देश सरकारी भर्ती का सिस्टम हरतरफ लचर ही है. पहले तो भर्ती नहीं आती और आती है तो सालों अटकी रहती है. प्रक्रियाइतनी लंबी होती है कि युवाओं का सब्र जवाब दे जाए. हाल ये हो गया है कि ये जवानी हैकुर्बान, एक-एक भर्ती तेरे नाम. बच्चे तैयारी करते हैं और इस दौरान रिश्तेदारों,जानकारों के सवालों से बचते रहते हैं...कोई पूछता है आजकल क्या कर रहे हो ? कोईपूछता है नौकरी मिलेगी ? उनके पास इन सवालों का जवाब नहीं होता क्योंकि जवाब तोसरकारी सिस्टम की चकरघिन्नी में पिस रहा होता है. जब नेता विपक्ष में होता है तोबातें ऐसी करता है मानों बित्ते से समंदर नाप देगा, आसमान में धान बो देगा. मगरसरकार में आते ही सारे शिथिल हो जाते हैं. तो एक सवाल हमारा देश की तमाम सरकारों सेहै कि जब करोड़ों लोगों से अपना चुनाव कराना होता है तो बड़ी आसानी से हो जाता है,मगर जब युवाओं को नौकरी के लिए चुनना होता है तो उनकी राह में इतने कांटे क्यों बोदे जाते हैं ? क्यों इस देश में भर्तियां टाइम से नहीं होती हैं ? क्यों करोड़ोंयुवाओं के सपनों और उन सपनों की खनकती गिन्नियों को सिस्टम के टकसाल में फंसा करतोड़ दिया जाता है ? देख रहे हों तो बैठकर सोचिएगा सरकार.