डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठीडॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता. लोक में खास दिलचस्पी, जो आपको यहांदिखेगी. अमरेंद्र हर हफ्ते हमसे रू-ब-रू होते हैं. ‘देहातनामा’ के जरिए. पेश हैइसकी सत्रहवीं किस्त:--------------------------------------------------------------------------------हे लच्छिमी मैया! रामनगरी के इस देहाती का परनाम तुम तक पहुंचे!कल दिवाली है. सबका मन उल्लास का पहाड़ा पढ़ रहा है या पढ़ना चाह रहा है. इस बीच मैंअस्सी के दशक का अपना बचपन याद करता हूं. कितना उल्लासमय होता था सब. सच में खुशीमें नहाते उजाले को देखकर लगता था कि राम के लौटने पर अयोध्याजी ऐसे ही उजियारी हुईहोंगी. तब उजाला अधिक था, पटाखे थोड़े थे, हाहाकारी विस्फोट तो एकदम नहीं थे.छुरछुरिया की लौ-लम्फ में चमकते चेहरे अभी भी यादों में उतनी ही चमक बिखेरते हैं.गांव में बस एक तिलंगे दादा के यहां दुनाली बंदूक थी. वही दो-चार फायर कर देते थे.हम गेद-गेदहरे उसी कौतूहल को देखने जाते थे. जब फायर होता था, तो हीही-ठीठी का एकदौर-दौरा चल पड़ता था. इसी का लुत्फ लेने तो जाते थे हम सब. नहीं तो दुनाली बंदूक काक्या! वो तो खूंटी पर टंगे-टंगे तिलंगे की बुढ़ौती का साथ निभा रही थी.लछिमी मैया, अब माहौल काफी बदल गया है. धमाके वाले पटाखे अनंत गुना बढ़ गए हैं.विस्फोट हाहाकारी हो चले हैं. मनिहार दादा से कोई गोला-बारूद नहीं खरीदता. उनको तोगौने-बियाहे भी कोई नहीं पूछता. अब सब टपाटप चाइना माल ले आते हैं और रेलमपेल दगाईकरते हैं. चीन-विरोधी शपथ के साथ. शहर का हाल और भी बुरा है. धांय-धांय, ठांय-ठांय!लगता है कश्मीर की सीमा पर गोली-बारी की नुमाइश की जा रही है. वो क्या चीज़ है,जिसने उल्लास को युद्ध-मार्का बना दिया है? दीवाली पीछे कई दिन तक आंख करुवाती है.कुछ कहने पर लोग तिरछी नसीहत कलेजे में भोंकते हैं- फलां-फलां वाले तिउहार पर काहेनहीं बोलते कुछ!अब सब चीनी झालर लगा देते हैं. कई दिनों तक परमानेंट लकदक-लकदक होती रहती हैं.लेकिन तालाब की माटी लाकर उससे बने दीयों का उजास और आह्लाद इन झालरों में नहींमिलता. भले वे आधी रात तक ही जलते थे. उजाले को भी आराम करने की मोहलत दे देते थे.अगले दिन सोकर उठते ही हम उस उजाले को ढूंढ़ते थे, फिर कई दिन तक दीये जला-जलाकर उसेबुलाते-पकड़ते-पाते रहते थे. उजाले से दोस्ती करते थे. रात में दोनों साथ-साथ सोजाते थे.दिवाली की गर्माहटकहां-कहां माटी के दीये नहीं धरे होते! अंगना-ड्यौढ़ी-दुवारे पर होते ही थे. खरिहानमें जलती बत्तियों की तरह दिखते थे. हर कोठरी में दीये. ताखे-खोह जहां भी दीयेअड़ियाने का मौका बनता, दीये रखे होते. घर के आगे, पीछे, दाएं, बाएं, कोने-कोने में.गली-गली में. कुंओं की जगत पर उजाले का वृत्त बन जाता। चरनी में रखे दीयों के उजालेमें गायों की आंखें चमकती रहतीं, उन आंखों में बिम्बित दीयों को देखने की छुअन अभीतक मन छूती रहती है!लछिमी मैया, पूरा देहात जगमगा उठता था माटी के दीयों से. हर घर जैसे महल को लज्जितकर रहा हो. कुटियों के सामने भवन का वैभव ठगा-सा रह जाता, क्योंकि यहां सामान्यजनों, बच्चों और महिलाओं की कुदरती किलक-पुलक होती, जो भवनों और महलों में कहां.धरती और आकाश का अंतर उजाले से भर जाता था और उसमें, मैया तुम, हर जगह भ्रमण करतीदिखती थी! लोककवि आचार्य विश्वनाथ पाठक ने तुम्हारे इस 'भरमन' को अपनी कविता मेंबताया है:एक-एक घर जगमग होइगा, जगमग खोंपा-खोंपा। मानौ रतिया बेलरि बनिगै, लाग फूल कै झोंपा॥तरे दिया कै पांती सोहै, उप्पर खची तरइया। भुइं-अकास कै भेद भूलि कै भरमी लछिमीमैया॥ (मतलब: एक-एक घर, कोना-कोना जगमगा गया. रात बेला हो गई और उजाले उसके फूल केसमूह हो गए. नीचे, धरती पर, दीयों की पंक्ति शोभा देती और आकाश में तारों कीपंक्ति. ऐसे में, धरती और आकाश के भेद को भूल कर लक्ष्मी मैया भ्रमण कर रही होतीं.)लच्छिमी मैयालेकिन क्या कहूं मैया, ये सब बातें तो अब यादों का सच बनकर रह गई हैं. कचोटती हैंबस. अयोध्या जी भी अब वैसी नहीं रहीं. विष्णु जी से आप शिकायत क्यों नहीं करतीं.कितना कुछ बदल गया. छीज-बट्टा हो गया. क्या-क्या राजनीति की भेंट नहीं चढ़ा.इतिहास-संस्कृति-मिथक सब जगह सेंध लग गई है. दो दिन पहले वरिष्ठ कवि कुंवर नारायणके घर, लालकोठी, के पास गया हुआ था. थोड़ी दूर, बड़ी देर तक, वहीं बैठा रहा. मोबाइलमें उनकी कविता 'अयोध्या 1992' सेव कर रखी है. वहीं बैठे इसे कई बार मैंने पढ़ा. इसपाती में वो कविता भी लिख दे रहा हूं. सुना दीजिएगा राम जी को!'हे राम, जीवन एक कटु यथार्थ है और तुम एक महाकाव्य!तुम्हारे बस की नहीं उस अविवेक पर विजय जिसके दस बीस नहीं अब लाखों सिर - लाखों हाथहैं, और विभीषण भी अब न जाने किसके साथ है.इससे बड़ा क्या हो सकता है हमारा दुर्भाग्य एक विवादित स्थल में सिमटकर रह गयातुम्हारा साम्राज्यअयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं योद्धाओं की लंका है, 'मानस' तुम्हारा 'चरित'नहीं चुनाव का डंका है!हे राम, कहां यह समय कहां तुम्हारा त्रेता युग, कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम कहांयह नेता-युग!सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ किसी पुरान - किसी धर्मग्रन्थ में सकुशलसपत्नीक... अबके जंगल वो जंगल नहीं जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक!'मैया, इस दीवाली पर तो रामनगरी का आम इंसान बड़ा डरा-डरा सा है. हुआ ये है किरामनगरी में गुण्डे बहुत फूल-फल रहे हैं. उन महंथों की तरह, जो मंदिर-मंदिरकब्जियाये बैठे हैं. कितना कुछ नागवाराना गुजर रहा है. कल तो हद ही हो गई. धनतेरसकी शाम को शहर के चौक इलाके के पास ही एक व्यापारी की पूरी दबंगई के साथ हत्या करदी गई. दो गुण्डे आए और गोलियों से भूनकर चले गए. कहते हैं कि एक गुण्डे को लोगोंने पकड़ा, थान्हे को सौंपा, वहां पुलिस ने उसे बाइज्जत छोड़ दिया. लोगों के दिमाग मेंगुण्डों का खौफ है. यकीन ही नहीं होता कि कभी की इसी रामनगरी के लिए गोस्वामीतुलसीदास ने लिखा था: 'दैहिक दैविक भौतिक तापा. / रामराज्य नहिं कावहिं व्यापा.'यहां तो हर जगह दैहिक-दैविक-भौतिक ताप, और जाने कितने तरह के ताप-सन्ताप, व्यापेहुए हैं.अयोध्या दिवाली @2017इस बार दीवाली पर गुण्डों ने एक और काम प्रशासनिक रूप से संभाल लिया है- दीयाजलाने-जलवाने का. कल सुनने में आया कि गुण्डों ने, कॉलेज के लड़कों की लीडरी करतेहुए उन्हें सेना की तरह दीवाली पर पूरी अयोध्या में दिये जलाने के काम पर भिड़ा दियाहै. शाम को दीयों की दिव्य झांकी पेश की जाएगी. प्रदेश मुखिया की अवाई है. गुण्डेबोल रहे थे कि ये ही राम हैं, यहीं आ रहे हैं, इन्हीं के आने का उल्लास होना है.लाखों दीये जलाए जाएंगे. 'दीयों की रिकार्ड झांकी' एक ऐसा तर्क हो गया है, जिससे आमआदमी को तरह-तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. गुण्डों की आवाज़ दिनों-दिनऊंची होती जा रही है. सज्जन घुटन महसूस करता जा रहा है. गांव की एक बूढ़ा बरबरा रहीथीं- 'राम जी कै कौनौ कन्टौलै नहीं रहा अजुध्या पर!'अच्छा.बीती दीवालियों में कम से कम अयोध्या के इन घाटों पर बैठकर कुछ इत्मिनान के क्षणमैं बिता लेता था. मन ही मन उस अयोध्या को महसूस करने की कोशिश करता था, जो राम जीके लौटने पर खुशी हुई होगी. इस वाली दिवाली पर इसकी भी संभावना नहीं रही. मन कोगुप्तार घाट ले जाऊंगा. वही घाट जहां पर राम ने जल-समाधि ले ली थी. राम की करुणा सेमिलने की सही जगह यही है! है न मैया!गांव में लोग खुश कम दिख रहे हैं. जो दूर-दराज से आए हैं, उनके आने से घरवाले थोड़ेखुश जरूर हैं. हमारे पड़ोस में तो दुख ही पसरा है. मैया, सरौता चाची की बिटेवा को तोतुम जानती ही होंगी! वही जो मुखमंत्री वाले गोरखपुर में बियाही है. वो बहुत दुखीहै. एक अकेला बेटवा था उसके. उसके होने पर बड़ी खुश हुई थी. मारे खुशी के बेढ़वा केमेले में एक पौव्वा गरम जलेबी खिलाई थी. उसके घर का वही चिराग था. बुझ गया. उसेजापानी बुखार लील गया. सरौता बहुत उदास रहती हैं. बिटेवा गांव आई, तो मिली थी.नासकाटे नेताओं और डाकटरों पर बहुत बिगड़ रही थी. कह रही थी, पत्तरकारौ नासपीटे हैं!वो भला क्या जलाएगी इस दीवाली पर चिराग! लछिमी मैया, एक चिराग तुम जला देना उसकेघर.अयोध्या में रामअब अपनी 'विनय-पाती' समाप्त करता हूं मैया! भूल-चूक माफ कीजिएगा. लेकिन अरदास परध्यान तो ज़रूर दीजिएगा. एक सवाल आखिरी में कि तुम देश को खरीद रहे पूंजीपतियों कीदेवी हो कि कुटिया में कांपती आवाज़ में आरती गा रहे किसान-मजूर की? धन-देवीतुम्हारी दुनिया में असमानता और अन्याय का इतना बोलबाला काहे है!तुम्हारा कृपाकांक्षी, एक देहाती, अस्थान - रामनगरी--------------------------------------------------------------------------------पढ़िए देहातनामा की पिछली किस्तें:मांग में सिंदूर भरने की शुरुआत की एक कहानी, जिसे बेहद कम लोग जानते हैंजब ‘मॉब लिंचिंग’ का शिकार होते-होते बचे हबीब तनवीर!कहानी उस हिरण की, जिसका राम के जन्म पर भोज हुआ थालोना चमारिन, जिसने आपके बाप-दादा का भला चाहा, कौन हैं?