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डार्क शिपिंग: समंदर में 'गुमनाम जहाजों' का वो काला खेल जिसने भारत की नींद उड़ा दी है

हिंद महासागर में बढ़ते घोस्ट टैंकर्स और डार्क शिपिंग के खेल का पूरा सच. जानिए कैसे ये 'भूतिया जहाज' भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे हैं और तेल के इस सीक्रेट कारोबार के पीछे की कहानी क्या है.

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28 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 03:53 PM IST)
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हिंद महासागर में बढ़ते घोस्ट टैंकर्स (फोटो-एपी)
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कल्पना कीजिए कि आप एक सुनसान हाईवे पर रात के अंधेरे में अपनी कार चला रहे हैं. अचानक आपके बगल से एक विशाल ट्रक गुजरता है जिसकी हेडलाइट्स बंद हैं, नंबर प्लेट पर कालिख पुती है और ड्राइवर का चेहरा ढका हुआ है. आपको पता ही नहीं चलता कि वो ट्रक कहां से आया और कहां गायब हो गया.

अब इसी मंजर को समंदर के बेहिसाब पानी पर उतार लीजिए. दुनिया के नक्शे पर जो नीली लकीरें आपको व्यापार का रास्ता दिखाती हैं, वहां आजकल हजारों ऐसे 'भूतिया जहाज' यानी घोस्ट टैंकर्स घूम रहे हैं जो रडार की नजरों से ओझल हैं. इसे कहते हैं 'डार्क शिपिंग'. ये कोई जासूसी फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि साल 2026 की वो कड़वी हकीकत है जिसने भारतीय नौसेना और दुनिया भर की सुरक्षा एजेंसियों के माथे पर पसीना ला दिया है.

जब आप अपनी बाइक या कार में पेट्रोल भरवाते हैं, तो शायद आपको अंदाजा भी नहीं होता कि उस तेल का एक बड़ा हिस्सा शायद किसी ऐसे जहाज से आया हो जिसने अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाकर सफर तय किया है.

हिंद महासागर में इन जहाजों की तादाद ने इस साल पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. ये वो जहाज हैं जो अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम यानी AIS बंद कर देते हैं. मतलब ये कि ग्लोबल ट्रैफिक कंट्रोल रूम को पता ही नहीं चलता कि समंदर के किस कोने में कौन सा जहाज क्या लेकर घूम रहा है. ये खेल इतना गहरा है कि इसमें रूस, ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों पर लगे प्रतिबंधों को धता बताने की पूरी प्लानिंग छिपी है.

लेकिन सवाल ये है कि भारत के लिए ये सिरदर्द क्यों है? हमारे देश की तीन तरफ की सीमाएं समंदर से घिरी हैं. अगर हमारे घर के पिछवाड़े में बिना पहचान वाले जहाज घूमने लगें, तो ये सिर्फ व्यापार का मामला नहीं रह जाता, ये सीधे-सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा की बात हो जाती है. क्या इनमें सिर्फ तेल है? या फिर इन जहाजों की आड़ में हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी भी हो रही है?

हम इस 'सीक्रेट इकॉनमी' की परतें खोलेंगे और समझेंगे कि कैसे समंदर का ये काला कारोबार आपकी जेब, आपके देश की सुरक्षा और दुनिया की कूटनीति को बदल रहा है.

क्या है डार्क शिपिंग और कैसे काम करते हैं ये घोस्ट टैंकर्स

डार्क शिपिंग को समझने के लिए सबसे पहले AIS यानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम को समझना होगा. ये समंदर का 'गूगल मैप्स' जैसा है. हर बड़े जहाज के लिए ये अनिवार्य है कि वो अपनी लोकेशन, अपनी स्पीड और अपनी पहचान दुनिया को बताता रहे.

लेकिन जब कोई जहाज जानबूझकर इसे बंद कर देता है, तो उसे तकनीकी भाषा में 'गोइंग डार्क' कहा जाता है. साल 2026 में हिंद महासागर में ऐसे जहाजों की आवाजाही में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है. ये जहाज अक्सर पुराने होते हैं, जिनका बीमा यानी इंश्योरेंस खत्म हो चुका होता है और जिनका मालिकाना हक किसी ऐसी शेल कंपनी के पास होता है जिसका ऑफिस सिर्फ कागजों पर एक छोटे से आइलैंड पर मौजूद है.

ये जहाज अक्सर रात के अंधेरे में बीच समंदर में अपना माल दूसरे जहाज को ट्रांसफर करते हैं. इसे 'शिप-टू-शिप' (STS) ट्रांसफर कहते हैं. मान लीजिए रूस से एक जहाज तेल लेकर निकला. उसने प्रतिबंधों की वजह से सीधे किसी बड़े बंदरगाह पर जाने के बजाय बीच समंदर में अपना ट्रांसपोंडर बंद किया और वहां खड़े किसी दूसरे 'साफ सुथरे' जहाज में तेल पलट दिया. अब वो दूसरा जहाज इसे किसी और देश का तेल बताकर खुले बाजार में बेच देता है. इस पूरी प्रक्रिया में दुनिया की आंखों में धूल झोंकी जाती है और करोड़ों डॉलर का मुनाफा कमाया जाता है.

रॉयटर्स और मैरीटाइम सिक्योरिटी की रिपोर्ट्स बताती हैं कि इन जहाजों के पास अक्सर सही दस्तावेज नहीं होते. ये अपनी पहचान छुपाने के लिए कई बार अपने नाम के ऊपर पेंट फेर देते हैं या फिर फर्जी झंडों (Flags of Convenience) का इस्तेमाल करते हैं. कूटनीति की दुनिया में इसे एक बड़ा खतरा माना जाता है क्योंकि अगर इनमें से कोई जहाज किसी हादसे का शिकार हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं होता.

फर्जी झंडों का मायाजाल: जब जहाज अपनी 'राष्ट्रीयता' बदल लेते हैं

​डार्क शिपिंग के इस खेल में सिर्फ रडार बंद करना काफी नहीं है, बल्कि अपनी पहचान को कागजों में दफन करना भी जरूरी है. यहीं काम आता है 'फ्लैग्स ऑफ कन्वीनियंस' (FOC) का खेल. अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक हर जहाज को किसी न किसी देश में रजिस्टर होना पड़ता है और उस देश का झंडा लगाना पड़ता है. लेकिन पनामा, लाइबेरिया और मार्शल आइलैंड्स जैसे छोटे देशों ने इसे एक कमाई का जरिया बना लिया है. ये देश बहुत कम फीस लेकर और बिना किसी कड़ी जांच के किसी भी जहाज को अपना झंडा इस्तेमाल करने की इजाजत दे देते हैं.

​2026 में हिंद महासागर में घूम रहे घोस्ट टैंकर्स इस सुविधा का जमकर फायदा उठा रहे हैं. कई बार तो ये जहाज सफर शुरू करते वक्त किसी और देश का झंडा लगाए होते हैं और बीच समंदर में उसे बदलकर किसी ऐसे देश का कर लेते हैं जिस पर कोई अंतरराष्ट्रीय पाबंदी न हो. इसे समुद्री भाषा में 'फ्लैग होपिंग' कहा जाता है. जब भारतीय कोस्ट गार्ड या नौसेना इन जहाजों को रोकने की कोशिश करती है, तो ये तकनीकी और कानूनी दांवपेच में उलझा देते हैं. चूंकि ये जहाज छोटे और अनजान देशों के झंडे तले रजिस्टर्ड होते हैं, इसलिए उन पर कड़ी कानूनी कार्यवाही करना एक कूटनीतिक सिरदर्द बन जाता है.

​आसान भाषा में कहें तो ये वैसा ही है जैसे किसी अपराधी ने अपनी गाड़ी पर फर्जी नंबर प्लेट लगा रखी हो और हर दो जिले पार करने के बाद वो प्लेट बदल देता हो. इस फर्जीवाड़े की वजह से इन जहाजों के असली मालिक तक पहुंचना लगभग नामुमकिन हो जाता है. ये शेल कंपनियां अक्सर ऐसे देशों में होती हैं जहां के बैंकिंग और कॉरपोरेट कानून इतने उलझे हुए हैं कि जांच एजेंसियां थक हारकर बैठ जाती हैं.

हिंद महासागर में बढ़ता खतरा: भारत के लिए क्यों बजी खतरे की घंटी

भारत की समुद्री सीमा लगभग 7500 किलोमीटर लंबी है. हमारी अर्थव्यवस्था का 90 प्रतिशत व्यापार समंदर के रास्ते होता है. ऐसे में अगर हिंद महासागर में 'भूतिया जहाजों' का जमावड़ा बढ़ता है, तो भारत का सबसे बड़ा डर 'मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस' यानी अपनी समुद्री सीमा की जानकारी खोने का है. भारतीय नौसेना के अधिकारियों का मानना है कि ये जहाज सिर्फ तेल की चोरी या प्रतिबंधों से बचने का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये सुरक्षा चक्र में एक बड़ा छेद कर रहे हैं.

26/11 के हमले हमें याद दिलाते हैं कि समंदर के रास्ते आई एक छोटी सी नाव क्या तबाही मचा सकती है. अब कल्पना कीजिए कि हजारों टन वजनी एक विशाल जहाज, जिसकी कोई पहचान नहीं है, हमारे कोस्टल एरिया के पास से गुजर रहा है. उसमें क्या लदा है, उसमें कौन सवार है, ये किसी को नहीं पता. क्या पता इन जहाजों का इस्तेमाल आतंकी संगठनों को फंडिंग करने या फिर समुद्री डकैती के लिए किया जा रहा हो? हिंद महासागर में चीन की बढ़ती दखलअंदाजी के बीच इन बेनाम जहाजों की मौजूदगी भारत की डिफेंस स्ट्रेटेजी के लिए एक नई चुनौती बन गई है.

इसके अलावा, इन जहाजों की वजह से पर्यावरण का जो खतरा है, वो अलग है. ये जहाज पुराने होते हैं और इनका रखरखाव घटिया स्तर का होता है. अगर इनमें से कोई भी जहाज भारत के समुद्र तट के पास तेल लीक कर दे यानी 'ऑयल स्पिल' हो जाए, तो इसकी सफाई का अरबों रुपये का खर्च भारत को उठाना पड़ेगा क्योंकि इन जहाजों की कोई बीमा कंपनी नहीं होती जो हर्जाना दे सके.

युद्ध, प्रतिबंध और तेल का ये 'डार्क इकॉनमी' कनेक्शन

दुनिया में जब भी बड़े युद्ध होते हैं, तो उसके साथ ही ब्लैक मार्केट भी फलता-फूलता है. यूक्रेन और रूस के युद्ध ने डार्क शिपिंग को एक नया आयाम दे दिया है. रूस पर पश्चिमी देशों ने कई तरह के कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, खासकर उसके तेल निर्यात पर. लेकिन रूस के पास तेल का विशाल भंडार है और दुनिया को उसकी जरूरत भी है. यहीं से जन्म होता है 'शैडो फ्लीट' या डार्क फ्लीट का. ये वो जहाजों का बेड़ा है जो खास तौर पर रूसी तेल को दुनिया के उन हिस्सों तक पहुंचाने के लिए बनाया गया है जो इसे खरीदने को तैयार हैं.

चीन और भारत जैसे देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारी मात्रा में तेल आयात करते हैं. भारत सरकार हमेशा अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की बात कहती है, लेकिन ग्लोबल मार्केट में जब तेल की कीमतें आसमान छूती हैं, तो ये 'सीक्रेट इकॉनमी' बैकडोर से अपनी जगह बना ही लेती है. इसमें बिचौलिए सबसे ज्यादा कमाते हैं. वे सस्ते में रूसी तेल खरीदते हैं, डार्क शिपिंग के जरिए उसकी पहचान बदलते हैं और फिर उसे ऊंचे दामों पर बेच देते हैं.

इस खेल में सिर्फ रूस ही नहीं, बल्कि ईरान और वेनेजुएला भी पुराने खिलाड़ी हैं. इन देशों ने सालों से डार्क शिपिंग का इस्तेमाल करके अपनी इकॉनमी को जिंदा रखा है. जानकारों का कहना है कि 2026 में यह नेटवर्क इतना मजबूत हो गया है कि इसके पास खुद की अपनी लॉजिस्टिक्स चेन, अपने छोटे बंदरगाह और अपनी खुद की सुरक्षा व्यवस्था है. यह एक ऐसी समानांतर अर्थव्यवस्था है जो वाशिंगटन या ब्रुसेल्स के किसी भी कानून को नहीं मानती.

आर्थिक असर: आपकी जेब और देश के खजाने पर क्या फर्क पड़ता है

आपको लग सकता है कि समंदर में हो रहे इस खेल का आपके घर के बजट से क्या लेना-देना? सच तो ये है कि इसका सीधा असर होता है. जब डार्क शिपिंग के जरिए सस्ता तेल बाजार में आता है, तो कई बार ये कीमतों को स्थिर रखने में मदद करता है. अगर ये 'घोस्ट टैंकर्स' अचानक बंद हो जाएं, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई में 10 से 15 प्रतिशत की कमी आ सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम रातों-रात 20-30 रुपये तक बढ़ सकते हैं.

लेकिन इसका दूसरा पहलू नुकसानदेह है. भारत सरकार को तेल आयात पर जो ड्यूटी और टैक्स मिलते हैं, डार्क शिपिंग उसमें सेंध लगाती है. अगर तेल की सही ट्रैकिंग नहीं होगी, तो सरकार को मिलने वाले राजस्व में कमी आएगी. साथ ही, वैध तरीके से व्यापार करने वाली भारतीय कंपनियों को इन 'डार्क ऑपरेटर्स' से कड़ी टक्कर मिलती है क्योंकि डार्क शिपिंग करने वाले न तो टैक्स देते हैं, न सुरक्षा मानकों का पालन करते हैं और न ही इंश्योरेंस का भारी भरकम प्रीमियम भरते हैं.

आरबीआई और नीति आयोग की चर्चाओं में कई बार समुद्री सुरक्षा पर होने वाले खर्च का जिक्र आता है. डार्क शिपिंग से निपटने के लिए भारत को अपनी समुद्री गश्त बढ़ानी पड़ रही है, सैटेलाइट सर्विलांस पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है और नौसेना को हाई अलर्ट पर रखना पड़ रहा है. यह अतिरिक्त खर्च भी अंततः टैक्सपेयर्स की जेब से ही जाता है. यानी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के बीच का ये संतुलन बनाना अब पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है.

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डार्क शिपिंग के जरिए तेल का खेल (फोटो- एपी)

घोस्ट टैंकर्स पर 'आधुनिक गुलामी': उन नाविकों का क्या जो इन पर सवार हैं?

​अक्सर हम जहाजों और तेल की बात करते हुए उन इंसानों को भूल जाते हैं जो इन लोहे के विशाल ढांचों को चला रहे हैं. डार्क शिपिंग के पीछे एक बहुत ही दर्दनाक इंसानी पहलू छिपा है जिसे 'मॉडर्न स्लेवरी' यानी आधुनिक गुलामी कहा जा सकता है. इन जहाजों पर काम करने वाला क्रू अक्सर गरीब देशों जैसे फिलीपींस, म्यांमार या कुछ अफ्रीकी देशों से आता है. इन लोगों को मोटी तनख्वाह का लालच देकर इन अवैध ऑपरेशंस में धकेल दिया जाता है.

​एक बार जब जहाज 'डार्क' हो जाता है, तो उस पर सवार नाविकों का बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग कट जाता है. उनके पास न तो सही मेडिकल सुविधाएं होती हैं और न ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम. चूंकि ये जहाज रडार से गायब होते हैं, इसलिए अगर कोई नाविक बीमार पड़ जाए या उसे चोट लग जाए, तो जहाज किसी भी देश के बंदरगाह पर मदद मांगने नहीं जा सकता क्योंकि पकड़े जाने का डर होता है. कई बार इन नाविकों के पासपोर्ट तक छीन लिए जाते हैं ताकि वे भाग न सकें.

​अगर कभी ये जहाज पकड़े जाते हैं, तो असली मास्टरमाइंड तो बच निकलते हैं, लेकिन ये गरीब नाविक सालों तक विदेशी जेलों में सड़ते रहते हैं. इनका कोई कानूनी प्रतिनिधित्व करने वाला भी नहीं होता. 2026 में हिंद महासागर में ऐसे कई 'लावारिस नाविक' मिले हैं जिनके जहाजों को उनके मालिकों ने खतरे की आहट मिलते ही बीच समंदर में छोड़ दिया. यह इस सीक्रेट इकॉनमी का वो काला चेहरा है जो हेडलाइंस में जगह नहीं पाता, लेकिन यह मानवता के लिए एक बड़ा कलंक है.

तकनीकी पेच: क्यों आसान नहीं है इन 'भूतिया जहाजों' को पकड़ना

अब आप सोचेंगे कि आज के जमाने में जब हम चांद पर घर बनाने की सोच रहे हैं, तो एक विशाल जहाज को ट्रैक करना इतना मुश्किल क्यों है? इसका जवाब डार्क शिपिंग की नई तकनीकों में छिपा है. ये जहाज सिर्फ अपना AIS बंद नहीं करते, बल्कि अब ये 'जीपीएस स्पूफिंग' का सहारा भी लेते हैं. ये ऐसी तकनीक है जिससे जहाज असल में होता कहीं और है, लेकिन सैटेलाइट पर अपनी लोकेशन कहीं और दिखाता है.

मिसाल के तौर पर, एक जहाज असल में मुंबई के तट के पास खड़ा हो सकता है, लेकिन उसका डेटा ये दिखाएगा कि वो सिंगापुर के पास घूम रहा है. इसे पकड़ने के लिए सिर्फ सैटेलाइट डेटा काफी नहीं है, इसके लिए 'सिंथेटिक अपर्चर रडार' (SAR) और विजुअल इंटेलिजेंस की जरूरत होती है.

भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो और नौसेना अब मिलकर इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन घोस्ट टैंकर्स की संख्या इतनी ज्यादा है कि हर एक पर नजर रखना नामुमकिन सा लगता है.

इसके अलावा, इन जहाजों के मालिकाना हक का मकड़जाल भी बड़ा जटिल है. एक जहाज का मालिक पनामा में बैठा हो सकता है, उसका मैनेजमेंट दुबई की कंपनी देख रही होती है, उसमें काम करने वाला क्रू फिलीपींस का होता है और उस पर झंडा मंगोलिया का लगा होता है. अगर ये जहाज पकड़ा भी जाए, तो कानूनी कार्यवाही करने में सालों लग जाते हैं. अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून (UNCLOS) में अभी भी कई ऐसी खामियां हैं जिसका फायदा ये डार्क ऑपरेटर्स उठाते हैं.

कूटनीतिक रस्साकशी: भारत के लिए 'दोधारी तलवार'

भारत के लिए डार्क शिपिंग का मुद्दा कूटनीतिक रूप से बहुत नाजुक है. एक तरफ अमेरिका और यूरोप का दबाव है कि हम रूसी तेल और उन जहाजों पर कड़ा रुख अपनाएं जो प्रतिबंधों को तोड़ रहे हैं. दूसरी तरफ भारत की अपनी जरूरतें हैं. भारत को अपनी विशाल आबादी के लिए सस्ता ईंधन चाहिए ताकि महंगाई काबू में रहे. भारत ने हमेशा ये स्टैंड लिया है कि वो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए जो भी फैसला लेगा, वो अपने राष्ट्रीय हित में होगा.

लेकिन हिंद महासागर में इन जहाजों की भीड़ भारत को सुरक्षा के नजरिए से असहज करती है. अगर भारत इन जहाजों को पूरी तरह नजरअंदाज करता है, तो ये सुरक्षा में बड़ी चूक होगी. और अगर भारत उन पर बहुत ज्यादा सख्ती करता है, तो इसका असर उसके तेल आयात और रूस जैसे पुराने रणनीतिक साझेदार के साथ रिश्तों पर पड़ सकता है. भारत अब 'क्वाड' (QUAD) जैसे समूहों के साथ मिलकर समुद्री जानकारी साझा करने पर जोर दे रहा है ताकि डार्क शिपिंग के इस नेटवर्क को समझा जा सके.

विशेषज्ञों का कहना है कि 2026 में भारत एक ऐसी भूमिका में है जहां वो दुनिया को रास्ता दिखा सकता है. भारत एक ऐसा पारदर्शी सिस्टम बनाने की वकालत कर रहा है जहां हर जहाज का डेटा डिजिटल रूप से सुरक्षित हो और उसे बदला न जा सके.

इसके लिए ब्लॉकचेन तकनीक के इस्तेमाल पर भी विचार चल रहा है, जिससे समंदर में हो रहे इस 'तेल के खेल' को पूरी तरह खत्म तो नहीं, लेकिन काफी हद तक पारदर्शी बनाया जा सके.

भविष्य का मंजर: क्या कभी खत्म होंगे ये घोस्ट टैंकर्स

क्या हम कभी एक ऐसे समंदर की उम्मीद कर सकते हैं जहां हर जहाज की पहचान साफ हो? फिलहाल 2026 के हालात देखते हुए ये मुश्किल लगता है. जब तक दुनिया में युद्ध रहेंगे और जब तक बड़े देश एक-दूसरे पर प्रतिबंधों को हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे, तब तक डार्क शिपिंग जैसे रास्ते निकलते रहेंगे.

ये एक ऐसी बीमारी है जो आधुनिक दुनिया के साथ ही विकसित हुई है.
हालांकि, आने वाले समय में सख्त अंतरराष्ट्रीय कानूनों और बेहतर टेक्नोलॉजी से इस पर लगाम कसी जा सकती है. इंटरपोल और इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन (IMO) अब एक 'ग्लोबल शिपिंग रजिस्ट्री' बनाने पर काम कर रहे हैं, जो हर जहाज के डीएनए की तरह उसकी हर हरकत को रिकॉर्ड करेगी. भारत की भूमिका इसमें सबसे अहम होगी क्योंकि हम हिंद महासागर के असली पहरेदार हैं.

आम आदमी के लिए इसका सबक ये है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा अब पहले से कहीं ज्यादा आपस में गुंथी हुई है. समंदर की लहरों पर जो हो रहा है, वो सिर्फ खबर नहीं है, वो हमारे भविष्य की दिशा तय करने वाला एक बड़ा घटनाक्रम है. भारत को अब 'मैरीटाइम पावर' बनने की अपनी यात्रा में इन अदृश्य खतरों से लड़ने के लिए खुद को और भी मजबूत करना होगा.

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समाधान की राह

डार्क शिपिंग का मुकाबला सिर्फ बंदूकों या जहाजों से नहीं किया जा सकता, इसके लिए 'डिजिटल रडार' और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की जरूरत है. भारत को अपनी समुद्री नीतियों में और अधिक कड़ाई लानी होगी और बंदरगाहों पर आने वाले हर जहाज की गहन जांच के लिए ऑटोमेटेड सिस्टम तैयार करना होगा.

साथ ही, वैश्विक स्तर पर एक ऐसा मंच बनाना होगा जहां कोई भी देश 'भूतिया जहाजों' को पनाह न दे सके. समंदर की शांति ही भारत की तरक्की की चाबी है, और इस शांति को बनाए रखने के लिए हमें इन अंधेरे कोनों में रोशनी डालनी ही होगी. 

वीडियो: अब तेल को लेकर ट्रंप ने क्या ऐलान कर दिया?

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