भाई बर्तन उठाकर अपनी रसोई अलग कर ले तो ऐसा लगता है
डाक यूरोप फिर आ पहुंची है, जिस सुबह ब्रेक्जिट का नतीजा आना था एक इंडियन दर्द से नहीं सो पाया.
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यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूर रहा.
लेकिन ये सब का सब पास्ट है, जो टेंस रहा. प्रेजेंट मजेदार है. हमने भाई का अलग होना सहा है. पाकिस्तान प्यारा पपलू है. पर अब बार यूरोप वालों की. वहां ब्रेक्जिट ही ब्रेक्जिट चल रहा है. पर आप तक डाक यूरोप
लाने वाले विवेक कुमार के साथ कुछ और ही चल रहा. विवेक कुमार. जर्मनी में रहते हैं. और उन्होंने वादा किया है कि यूरोप के किस्से-कहानियां, सियासत और समाज के खूब नजारे दिखाएंगे. हमें. आपको. नया ताज़ा क्या है, जो ब्रेक्जिट से जुड़ा है. दर्द समेत और दर्द समेटकर लाए हैं, दर्द काहे का. पढ़िए इस डाक यूरोप
में.
ब्रैग्जिट का नतीजा जिस सुबह आना था, उस रात मैं भी नहीं सोया था. नहीं, ब्रैग्जिट से मेरा कोई खास निजी वास्ता नहीं था. मेरे तो दांत में दर्द था. सुबह जब मैं डॉक्टर के यहां पहुंचा तब तक नतीजा आ चुका था. ब्रैग्जिट हो चुका था. और मेरा डॉक्टर दुखी था. ब्रैग्जिट हो गया. अब क्या होगा. कैसे हो गया ये. मुझे तो अब तक यकीन नहीं हो रहा. मैं तो रातभर सो नहीं सका.

उसने मेरी लाइन कॉपी की जो मैंने उसे अपना दर्द बयान करते हुए बोली थी. मैंने सांत्वना दी कि कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा. पर डॉक्टर साहब को कोई खास उम्मीद नहीं थी. कुछ भी ठीक नहीं होगा. ब्रैग्जिट हो गया तो अब चेक्जिट होगा (मतलब चेक रिपब्लिक का एग्जिट). फिर नेक्जिट होगा (मतलब नीदरलैंड्स) देखना फ्रांस और इटली में भी आवाजें उठेंगी. यह सब कहने के दौरान डॉक्टर साहब के औजार मेरे मुंह में घुसे हुए थे. उनके एक औजार ने मेरा दांत पकड़ रखा था. मेरी चीख का एग्जिट होने वाला था. हर लाइन के साथ डाक साब का पारा चढ़ता जा रहा था. और उन्होंने लगभग गुस्से से कहा कि कहीं डेग्जिट ही ना हो जाए. इतना कहते ही मेरी चीख का जोरदार एग्जिट हुआ क्योंकि मेरा दांत मेरी आंखों के सामने था. उसका दर्दनाक लेकिन सफल एग्जिट हो चुका था.
डाक साब ने फिर मेरी लाइन कॉपी की, इस बार मुझे तसल्ली देने के लिए, सब ठीक हो जाएगा, बस डेग्जिट ना हो. (यानी डॉयचलैंड उर्फ जर्मनी का एग्जिट).
मैं क्लिनिक से बाहर निकला. मातम नहीं पसरा था लेकिन ब्रैग्जिट को महसूस किया जा सकता था. दो रात पहले ही जर्मनी के कई शहरों में ब्रिटेन के लोगों को अपील करते जुलूस निकले थे जिनमें अपील की गई थी कि ब्रिटेन छोड़कर न जाए. यूरोपीय लोगों ने इससे पहले किसी भाई का अलग होना शायद देखा ही नहीं था. भाई जब अपने बर्तन उठाकर नए घर में चला जाता है, तो दिल पर क्या गुजरती है, यह हम भारतीय जितने अच्छे से जानते हैं, यूरोपियन जान रहे हैं. ब्रिटेन के जाने पर आप वैसी ही गमी महसूस कर सकते हैं. कोई रो नहीं रहा है. लेकिन टीस तो है.

फ्रांस की मारियान ला पेन
और शाम होते-होते मेरे डॉक्टर के डर सच्चे होने लगे. एक-एक करके कई दक्षिणपंथी यूरोपीय नेताओं के चहकते हुए बयान आने लगे. नीदरलैंड्स में पार्टी फॉर फ्रीडम के गीर्ट विल्डर्स ने कहा, ब्रिटिशर्स के लिए हुर्रा! अब हमारी बारी है. डच रेफरेंडम का वक्त आ गया है. जर्मनी की एएफडी नेता बीट्रिक्स फोन स्टोर्च ने कहा कि नतीजा सुनते ही वह खुशी के मारे रोने लगी थीं. उन्होंने ट्वीट किया कि नए यूरोप के लिए एकदम सही वक्त है. फ्रांस की मारियान ला पेन ने लिखा कि यह आजादी की जीत है, मैं तो इसके लिए सालों से कह रही थी, अब फ्रांस और बाकी देशों में भी हो जाए. स्वीडन की दक्षिणपंथी पार्टी स्वीन डेमॉक्रैट्स ने ब्रिटेन को बधाई दी और कहा कि अब हमें स्वेग्जिट का इंतजार है. डेनमार्क कि अति दक्षिणपंथी डीपीपी ने कहा कि यह तो पूरे सिस्टम पर एक चमाट है. इस तरह की आवाजें पूरे यूरोप से सुन रही हैं और यूरोप के उदार लोगों के दिलों में चुभ रही हैं.
ब्रैग्जिट क्या है? ब्रिटेन में दक्षिणपंथ की जीत. वही दक्षिणपंथ जो पूरी दुनिया में हिलोरें मार रहा है. कहीं बीजेपी की शक्ल में तो कहीं ट्रंप की शक्ल में. यूरोप में जगह-जगह दक्षिणपंथी आवाजें मजबूत हो रही हैं. कुछ दिन पहले ऑस्ट्रिया में एक अतिदक्षिणपंथी पार्टी का नेता प्रेजिडेंट बनते-बनते टला था. जब ऑस्ट्रिया के नतीजे आ रहे थे तो यूरोप की सांसें हलक में अटकी हुई थीं कि कहीं घोर दक्षिणपंथी नॉबर्ट जीत न जाएं.
मजे की बात यह है कि जर्मनी में क्रिश्चन डेमोक्रैटिक यूनियन के पास सत्ता है, जो खुद एक सेंटर राइट पार्टी है. ब्रिटेन में दक्षिणपंथ की जिस जीत से सब सहमे हुए हैं, उसने जिस प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की कुर्सी खाई है, वह खुद भी तो दक्षिणपंथी कंजर्वेटिव पार्टी के ही हैं. तो मजेदार बात यह है कि पूरे यूरोप के दक्षिणपंथी दक्षिणपंथ की जीत से दुखी हैं. क्या इसलिए कि वे जानते हैं कि दक्षिणपंथ जब अपने पर आ जाए तो क्या कर सकता है?
डाक यूरोप का पहला हिस्सा आपने पढ़ा था- डाक यूरोप: भला खंभा भी कोई साफ करता है!

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