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तुझे मेले में सब देखेंगे, मेला कौन देखेगा

विश्व पुस्तक मेले के छठवें दिन का आंखों देखा हाल.

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फोटो : अनिमेष
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अविनाश
13 जनवरी 2017 (अपडेटेड: 13 जनवरी 2017, 06:00 PM IST)
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इस बरस की अपनी आधी उम्र जी चुके विश्व पुस्तक मेले के पांचवें रोज जब कृष्ण ने कल चार बजे मिलने को कह कर शेखर को छोड़ा, तब संजय को देवी प्रसाद मिश्र की एक कविता याद आई :

‘‘तू मेरा साथ दे या साथ न दे चार बजे मैं किसी फिक्र में फनकार हुआ चार बजे
मैं कहूं और कहूं और भी कहता जाऊं आखिरी दोस्त से तकरार हुई चार बजे
मैं जो होता हुआ आया तो खुदा खो आया मैं जो बहका हुआ खुद्दार हुआ चार बजे
मेरा अफसोस मेरे काम बहुत आने लगा मैं जहां भी था वहां क्यों नहीं था चार बजे
मीर को दोस्त किया जो मैं अकेला न हुआ मैंने ईनाम को इंकार किया चार बजे’’
धृतराष्ट्र उवाच : हे संजय! देवी की यह कविता कृष्ण और शेखर दोनों के लिए मेरे हृदय में असीम फिक्र उत्पन्न कर रही है. शीघ्र कहो कि मेले के छठवें दिन चार बजे क्या हुआ?
संजय उवाच : हे धृतराष्ट्र! शेखर वक्त का कम पाबंद नहीं है, अर्थात बहुत पाबंद है. वह ठीक चार बजे कृष्ण के सम्मुख पेश हुआ और फिर दोनों जन ‘मानुषी पैवेलियन’ की तरफ बढ़ गए.
धृतराष्ट्र उवाच : यह ‘मानुषी’ क्या है?
संजय उवाच : हे राजन! ‘मानुषी’ इस बार के विश्व पुस्तक मेले की प्रमुख थीम है. इसका अर्थ स्त्रियों द्वारा और उन पर केंद्रित पुस्तकों की प्रदर्शनी से है. लेकिन साहित्य को शेखर अपनी रूढ़ समझ के चलते लिंग से परे मानने की भूल कर रहा है. इस भूल-सुधार के लिए मेले के छठवें रोज कृष्ण उसे समझा रहे हैं कि स्त्री-लेखन पुरुष-लेखन से कैसे भिन्न है.
कृष्ण उवाच : हे शेखर, यह मुआ मर्दवाद हर जगह घुसा हुआ है. ‘नारीवाद’ भी पुल्लिंग है. इस घुसपैठ से मुक्ति के लिए ही तो माननीय प्रधानमंत्री ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान चला रहे हैं जिससे यह पुस्तक मेला भी अछूता नहीं है. लेकिन यह भी गौर करने योग्य है कि विश्व पुस्तक मेले में ‘मानुषी’ थीम की वैश्विकता नजर नहीं आती, वह पूरी तरह राष्ट्रवादी प्रतीत हो रही है. जबकि स्त्री-विमर्श के आधुनिक स्वरूप को लेकर भारतीय भाषाओं में अपनी सीमाओं के चलते बहुत मामूली काम ही हुआ है.
 
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