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कृष्ण चंदर और ख्वाजा अहमद अब्बास की बातचीत

ख्वाजा अहमद अब्बास का निधन 1 जून को 1987 को हुआ था.

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1 जून 2020 (अपडेटेड: 1 जून 2020, 01:50 PM IST)
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ख्वाजा अहमद अब्बास. वो शख्स जो पहले पहल एक पत्रकार था. फिर लेखक बना. फिर संपादक. फिर फिल्म समीक्षक. उसके बाद फिल्म लेखन में भी हाथ आज़माया. आखिर में फिल्म डायरेक्शन का ज़िम्मा भी संभाला. सामाजिक सरोकारों के लिए हमेशा जागृत इस शख्स की मौत 1 जून 1987 को हुई थी. कृश्न चंदर और अब्बास, दोनों ही उर्दू और हिंदी के बहुत बड़े साहित्यकार थे और एक दुसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे. ये बातचीत एक दोस्त से ज़्यादा दो साहित्यकारों के बीच के आपसे सामंजस्य और प्यार को बहुत सरल शब्दों में बयां करती है.

पुस्तक अंश : मुझे कुछ कहना है


कृष्ण- अपनी जन्म-तिथि याद है? मेरा मतलब साहित्यिक जन्म-तिथि से है. अब्बास- यों तो मैं अपने जन्म से बहुत पहले पैदा हो गया था, लेकिन... कृष्ण- जन्म से पहले...कैसे? अब्बास- मेरा अभिप्राय साहित्य, शिक्षा और संस्कृति के उत्तराधिकार से है, जो मेरे पैदा होने से पहले मेरे यहां वर्तमान था. हाली की शायरी में मेरा जन्म हुआ, किताबों और पत्रिकाओं में पला और बढ़ा. तुम मुझे सही मायनों में किताबों का कीड़ा कह सकते हो. ननिहाल हाली का ख़ानदान था. चचा ख्वाजा ग़ुलाम-उस-सक़लैन वकील राजनीति और साहित्य के रसिया थे. हाली के बेटे $ख्वाजा सज्जाद हुसैन, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के पहले मुस्लिम ग्रेजुएट, मेरे नाना थे. घर की औरतें 'तहज़ीबे निसवां’ में बाक़ायदा लिखती थीं. इस साहित्यिक उत्तराधिकार को लेकर... कृष्ण- (बात काटकर) लेकिन सब कुछ उत्तराधिकार ही तो नहीं है. आदमी सब कुछ उत्तराधिकार ही से तो नहीं बनता. उसके विकास में बहुत से तत्त्व काम करते हैं. मुझी को देख लो, बाप डॉक्टर,किन्तु आर्यसमाजी. लेक्चर झाड़ने के बड़े शौकीन. मां कुंआरपने में कविता किया करती थीं. लोकगीत क़िस्म की चीज़ें हुआ करती थीं वे. मैं जब स्कूल में पढ़ा करता था, उन्होंने मुझे अपने गीतों की एक पांडुलिपि दिखाई थी, हो सकता है, उसे उन्होंने अब तक संभालकर रखा हो. लेकिन इसके बावजूद हमारे घर का वातावरण बिलकुल साहित्यिक नहीं था. जाने विवाह के बाद मेरी मां जी को ऐसी किताबों से चिढ़ क्यों हो गई थी, जिन्हें लोग साहित्यिक कहते हैं. मुझे मालूम है, पहली साहित्यिक किताब जो मैंने पढ़ी, वह 'अलिफ़ लैला’ थी. मां जी ने उसे फाड़कर बाहर फेंक दिया. दूसरी किताब प्रेमचन्द की 'प्रेम पच्चीसी’ थी. मां जी ने उससे भी यही सलूक किया. मेरे दोस्तों में भी किसी को पढ़ने-लिखने का शौक़ नहीं था. मुझे स्वयं छुटपन में पहलवानी का बहुत शौक़ था. अब्बास- पहलवानी का तो नहीं लेकिन दूसरे खेलों का मुझे भी बहुत शौक़ था. फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, टेनिस-सब खेल मैंने खेले, लेकिन किसी में सफलता न मिली. इस चीज़ का मुझे बहुत मलाल रहा. अर्से तक यह बात दिल में खटकती रही कि मैं एक बड़ा स्पोर्ट्समैन बनना चाहता था, लेकिन न बन सका. दरअसल मेरा छोटा क़द और मेरा सन्दिग्ध किस्म का स्वास्थ्य (मुझे हमेशा नज़ले की शिकायत रही) मेरे मन में एक तरह का हीन भाव पैदा करने का कारण बने और मैंने सोचा कि अगर मैं खेलों के मैदान में सफल नहीं हो सका, तो मुझे जीवन के किसी दूसरे क्षेत्र में सफलता प्राप्त करनी चाहिए. फिर मैंने देखा कि जो लोग अच्छा बोल लेते हैं, अच्छी बहस कर लेते हैं, उनकी बड़ी आवभगत होती है. स्कूल के वाद-विवादों में, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के मुक़ाबलों में मैंने भाषण-कला में बड़ी सफलता पाई. और तुम जानते हो, अच्छा बोलने का अच्छे लिखने से कितना गहरा सम्बन्ध है. यही विचार मुझे साहित्य के मैदान में खींच लाया. कई बार सोचता हूं, यदि मैं खेलों के मैदान में सफल हो जाता, तो मर्चेंट या मुश्ताक़ की तरह एक सफल खिलाड़ी होता. कृष्ण- और मैं एक मशहूर पहलवान होता...लेकिन मैं इस बात को तुम्हारे या अपने हीन भाव से सम्बद्ध नहीं करूंगा. क़द तो मेरा भी छोटा है और नज़ले की शिकायत मुझे भी सदा रहती है, पर मेरे साहित्य-क्षेत्र में आने का यही एक कारण नहीं हो सकता. मैं इसे यों समझता हूँ कि जब मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति किसी एक दिशा में रुक जाती है और भरसक कोशिश करने पर भी उस दिशा में आगे बढ़ने का उसे कोई रास्ता नहीं मिलता, तो मनुष्य पराजय स्वीकार नहीं करता. वह अपनी उन्नति के दूसरे मार्ग खोज लेता है, क्योंकि विकास मनुष्य की चेतन-प्रकृति का सहज स्वभाव है. कृष्ण- लेकिन मेरा वह पहला सवाल तो बीच ही में रह गया. तुम साहित्य-क्षेत्र में कब आए? अब्बास- उन्नीस सौ पैंतीस में. बम्बई में एक कहानी लिखी थी- 'अबाबील’ और वह जिसे कहते हैं- एक रात में मशहूर हो जाना- बस, यों समझो कि मैं एक कहानी लिखकर मशहूर हो गया. उसका अनुवाद संसार की लगभग सभी सभ्य भाषाओं में हो चुका है. अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन, स्वीडिश, अरबी, चीनी इत्यादि-इत्यादि. जर्मन भाषा में संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानियों का एक संकलन छपा है. उसमें वह कहानी शामिल की गई. इसी तरह डॉक्टर मुल्कराज आनन्द और इक़बाल सिंह ने जो संकलन किया है, उसमें भी वह कहानी शामिल है. कृष्ण- उस कहानी का विषय क्या है? माफ़ करना, मैंने उसे नहीं पढ़ा. अब्बास- वह एक ज़ालिम किसान के जीवन से सम्बन्ध रखती है. कृष्ण- तुम्हें किसानों के जीवन के बारे में क्या मालूम है? अब्बास- अजीब बात है कि वह कहानी लिखते समय किसानों के बारे में मेरा ज्ञान नहीं के बराबर था. कारण, उनके जीवन-सम्बन्धी मेरा व्यक्तिगत अनुभव बहुत कम था. शून्य ही समझो, इसलिए कि मैं आज तक गांव में नहीं रहा. किसानों के जीवन से बिलकुल अनभिज्ञ हूं, परन्तु वह कहानी न केवल राष्ट्रीय दृष्टि से, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य की दृष्टि से भी बहुत उच्च कोटि की समझी जाती है. कृष्ण- यह कैसे हो सकता है कि तुम्हें किसानों के जीवन के बारे में कुछ ज्ञान न हो और तुम उनके सम्बन्ध में इतनी अच्छी कहानी लिख सको? अब्बास- यह तो मैं नहीं कह सकता कि मुझे किसानों के बारे में कुछ भी मालूम न था. व्यक्तिगत रूप से मैंने उन्हें देखा और जाना न था, लेकिन घर के राजनीतिक वाद-विवाद में और बाहर की दुनिया में किसानों की चर्चा अक्सर होती रहती थी. राजनीति और अर्थशास्त्र की पुस्तकें पढ़कर भी उनकी दरिद्रता से परिचित हो चुका था. अलीगढ़ में हर इतवार हम एक ही विचार के कुछ विद्यार्थी 'सोशल सर्विस’ के बहाने देहात में पहुंच जाया करते थे और वहां किसानों के जीवन का अध्ययन करने का प्रयास करते थे. कृष्ण- तुमने अपने ननिहाल के बारे में तो सुनाया, लेकिन ददिहाल के बारे में कुछ नहीं बताया. अब्बास- मेरे दादा किसान थे. कृष्ण- देखो, अब 'अबाबील’ पकड़ी गई! कहां जाकर इसने घोंसला बनाया! कृष्ण- तुम कभी सोए हो? अब्बास- नहीं...और तुम? कृष्ण- इंटरव्यू मैं कर रहा हूं कि तुम? मेरे सवाल का जवाब दो, क्यों नहीं सोए? अब्बास- नहीं सो सका. एक बार कुछ दोस्त घसीटकर मुझे उस महफ़िल में ले भी गए, पर मैं जल्द ही वहां से भाग आया. दरअसल कृश्न, बात यह है कि मनुष्य ने अपने सांस्कृतिक प्रयास से यौन-क्रिया को प्रेम के उस ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां से नीचे गिरना पशु बनने के बराबर है. कृष्ण- तुमने कभी प्रेम किया है? अब्बास- हां. कृष्ण- शादी से पहले या शादी के बाद? डरो नहीं...तुम्हारी बीवी यहां मौजूद नहीं, इसलिए साफ़-साफ़ बता सकते हो. अब्बास- बीवी से मैं डरता नहीं, न मेरी बीवी मुझसे डरती है. हम दोनों एक-दूसरे के बहुत गहरे दोस्त और साथी हैं. वह मेरे सारे भेद जानती है. उसे मेरे उस प्रेम का भी पता है, जो शादी से बहुत पहले की बात है. असल में उस प्रेम की असफलता ने ही मुझसे 'अबाबील’ के बाद दो और कहानियाँ लिखवाईं- 'फैसला’ और 'एक लड़की’. और ये दोनों कहानियाँ 'ग़मे-जानां’ के दो विभिन्न पहलुओं काख़ाका खींचती हैं. 'फैसला’ में मैं बहुत भावुक हो गया हूं, लेकिन 'एक लड़की’ में उस प्रेम को हास्य द्वारा जीतने और उस पर क़ाबू पाने की कोशिश करता हूं. कृष्ण- यानी जि़न्दगी प्रेम पर भी हावी है? अब्बास- कुछ समझ लो. परन्तु मेरा यह प्रेम बड़ा अजीब-सा प्रेम था. वह बेहद हसीन थी. साहित्यिक अभिरुचि रखती थी. हम लोग घंटों पास बैठे बातें करते रहते. पर तुम विश्वास न करोगे, मैंने उसे कभी हाथ से भी नहीं छुआ. कभी प्रेम का एक शब्द भी मुंह पर नहीं लाया. कृष्ण- यही तुम्हारी सबसे बड़ी भूल थी, प्यारे! अब्बास- साले...पर उसे मेरे प्रेम का पता था. कृष्ण- फिर शादी क्यों न हो सकी? अब्बास- शायद उसके ख़ानदानवाले न चाहते थे. और मेरे ख़ानदानवाले तो बहुत ही खिलाफ़ थे. लेकिन इस विरोध से भी ज़्यादा दिलचस्प पहलू यह है कि अपने प्रेम की असफलता का बोझ सीने पर लिये हुए जब मैं आख़िरी बार उससे मिलकर घर लौट रहा था, तो रास्ते में मौत के एक अजीब से एहसास ने मुझे घेर लिया. मेरा दम घुटने लगा और मुझे महसूस हुआ कि मैं अभी-अभी रास्ते ही में मर जाऊंगा. लेकिन जब मैं रेलवे स्टेशन पर पहुंचा और लोगों की भीड़-भाड़ देखी, तो स्टेशन की उस चहल-पहल में मेरा वह मूड ख़त्म हो गया. वह भी अपनी उसी प्रेमिका को देखकर. उसकी शादी के आठ-दस वर्ष बाद फिर उससे अचानक मेरी भेंट हो गई तो उससे बिछुड़ते समय फिर बड़ी तीव्रता से मुझे ऐसा लगा मानो मेरा दम घुटा जा रहा है, सांस रुकी जा रही है! या तो मेरा सीना फट जाएगा या हृदय की गति रुक जाएगी. यह अजीब तरह की शारीरिक अनुभूति थी, जो फिर उसके घर से बाज़ार तक आते-आते रास्ते की चहल-पहल में आप-से-आप खो गई. इसी अनुभूति को मैंने एक अप्रकाशित उपन्यास में यों बयान किया है : '...आखि़रकार वह रो पड़ा और उसके सीने में दुख की सारी घुटन आंसुओं के प्रबल वेग में बदल गई. मस्जिद के विशाल, खुले दालान में खड़े होकर, ऊंचे मीनारों के साए में उसने अपने-आपको नितान्त बेबस, अकेला, असहाय और अनदेखे ज़ुल्म देनेवाली उस नियति से भयभीत पाया, जिसे वह अभी-अभी अच्छी तरह कोस चुका था. उसने अपने आंसू पोंछ लिये और थकान से लड़खड़ाता-सा बाहर चला आया और सोचने लगा—क्या प्रेम के बिना जीवित रहा जा सकता है? 'पूर्वी द्वार से बाहर निकलते हुए वह कुछ क्षण के लिए ऊंची-ऊंची सीढ़ियों पर खड़ा हो गया. सामने प्राची के क्षितिज पर गुलाब में सोना घुल रहा था. नीचे लोग-बाग काम-काज के लिए बाहर निकल रहे थे. सफेद साड़ियां पहने स्त्रियां नदी की ओर जा रही थीं. एक ट्राम शोर मचाती हुई आई और गुज़र गई एक धचके के साथ- जो तुरन्त एक गहरे सन्नाटे में समा गया. उसे लगा कि उसके प्रेम की असफलता के बाद भी दुनिया ख़त्म नहीं हुई है. जीवन उसी तरह चल रहा है. सुबह होती है, लोग काम करते हैं और खेलते हैं. जि़न्दगी में मौत और मौत में जि़न्दगी आती है. 'और तब उसे याद आया कि 'ग़ालिब’ ने जो कुछ कहा था, वह ठीक था. एक गूंज के साथ उसके विचार उसके पास लौट आए. एक ओर सृजन थी और दूसरी ओर मृत्यु. और दोनों के बीच दुख और पीड़ा का एक लम्बा सिलसिला था. लेकिन उस सिलसिले में जि़न्दगी भी थी. वह जि़न्दगी, जो उसके सामने एक फूल की तरह स्वच्छ थी. पुरुष और स्त्रियाँ चलती हुई, बच्चे स्कूल जाते हुए, ट्राम पैसेंजरों से भरी हुई, अख़बार बेचनेवाले लड़के- सुर्ख़ियों पर शोर मचाते हुए. उस क्षण उसके अन्तर में अनजाने से एक नया विश्वास उत्पन्न हो गया.. उस क्षण अनजाने वह अपनी उम्र से बड़ा हो गया!’

किताब का नाम - मुझे कुछ कहना है

लेखक - ख्वाजा अहमद अब्बास

विधा - कहानी संग्रह

प्रकाशन - राजकमल प्रकाशन

कीमत - 250 रुपये


विडियो- किताबवाला: कश्मीर में छह सौ साल पहले संस्कृत में लिखा गया हजरत मुहम्मद पर सच

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