बिहार के मंत्री ने रामचरित मानस पर कितना सही, कितना गलत कहा, सब पता चल गया
बिहार की नीतीश सरकार में सबकुछ ठीक चल रहा है?
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दो सवाल हैं पहला सवाल ये है कि राम चरित मानस में जो लिखा गया, जिस संदर्भ में लिखा गया और जैसे लिखा गया, क्या उसकी आज के वक्त में समीक्षा या आलोचना हो सकती है? और दूसरा सवाल है कि बिहार में राजद-जदयू के महाठगबंधन की नीतीश कुमार सरकार में सबकुछ ठीक चल रहा है क्या?
आम दिन होते, तो आप इन दोनों सवालों को साथ सुनकर परेशान हो जाते कि इतनी भिन्न चीज़ों में संबंध कैसे खोजा जा सकता है. लेकिन जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि. और जहां कवि भी न पहुंच पाए, वहां पहुंचने वाले ही कहलाते हैं नेता. महाकाव्य और महागठबंधन की बात एक सुर में हम नहीं, नेता कर रहे हैं. यकीन नहीं आता तो आपको बताते हैं नेताओं ने क्या कहा? आरजेडी नेता सुधाकर सिंह ने कहा,
"बिहार में न्याय का शासन नहीं है. झूठ का मॉडल है. ऐसा शासन है कि यहां कि पुलिस भी जांच करने में फेल है."
RJD विधायक सुधाकर सिंह जो अपने ही गठबंधन की सरकार पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं, अब इन्हें नोटिस जारी किया जा चुका है. आप पूछेंगे कि भैया मानस की बात कहां से आ गई. तब आपको कुछ दिन पीछे जाकर बिहार से आए बयान सुनने होंगे. 12 जनवरी को सुशील मोदी ने कुछ हफ्तों पहले आरजेडी के बिहार अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने राममंदिर पर एक विवादी बयान दिया जिसमें उन्होंने कहा कि राम मंदिर नफरत की जमीन पर बनाया जा रहा है. इसके कुछ समय बाद बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने राम चरित मानस को लेकर आपत्तिजनक बयान दे दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि राम चरित मानस समाज में नफरत पैदा करती है. इन घटनाओं के बाद सुशील मोदी ने आपती जताई. और उन्होंने तो नीतीश कुमार से शिक्षा मंत्री को बर्खास्त करने की मांग कर दी.
सुशील मोदी राज्यसभा में बिहार से भाजपा सांसद. और एक वक्त में नीतीश कुमार के दोस्त. कह रहे हैं कि नीतीश अपने मंत्री को बर्खास्त करेंगे क्या. इसपर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन सिंह ने सिर्फ इतना कहा कि हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और आरजेडी नेताओं पर टिप्पणी नहीं कर सकते. साथ ही ये भी कहा कि ये तो RJD नेतृत्व को तय करना है कि मामले में क्या होना चाहिए. ये बात थी 15 जनवरी की. 17 जनवरी को RJD के मुखिया और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा,
"हम उनकी बातों का जवाब नहीं देना चाहते. ये सब बेकार की बातें हैं."
इसी रोज़ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी हर धर्म के सम्मान की बात कर दी. उन्होंने कहा-
"सभी धर्मों का सम्मान होना चाहिए, किसी की आस्था पर सवाल नहीं उठाने चाहिए"
इतने बयानों से आपको ये तो समझ आ ही गया होगा कि बिहार में सियासत गर्म है. और बात सिर्फ राम चरित मानस की नहीं रह गई है. खटपट और विवाद की शुरुआत एक बयान से हुई. दरअसल बीते दिनों RJD कोटे से बिहार के शिक्षा मंत्री प्रोफेसर चंद्रशेखर ने, पटना में नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए, रामचरित की एक चौपाई पर सवाल उठाए.
शिक्षा मंत्री ने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रची रामचरित मानस की दो चौपाइयों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई. जिसके बाद देशभर में विवाद होने लगा. विपक्षी होने के नाते अपनी हिंदुत्व की पॉलिटिक्स लाइन पर बीजेपी ने मुखर होकर विरोध किया. साधु-संतों को भी बयान आने लगे. किसी ने निंदा की तो किसी ने शिक्षा मंत्री की जीभ काटने वाले को ईनाम देने का ऐलान कर दिया. अब यहां से हमारे सामने दो सवाल थे. पहला ये कि क्या रामचरित मानस में ऐसा कुछ लिखा है? दूसरा ये कि अगर लिखा है तो क्या उसका संदर्भ वही है जो बिहार के शिक्षा मंत्री कह रहे थे. जाहिर है ये दोनों ही बातें जानने के लिए पत्रकार होने के नाते हमें विद्वानों के पास जाना पड़ा. विद्वानों की बात सुनाएं, उससे पहले रामचरित मानस के बारे में कुछ बातें जान लीजिए.
अवधि भाषा में लिखे रामचरित मानस को वाल्मिकी रामायण से प्रेरित माना जाता है. गोस्वामी तुलसीदास ने उसे आसान भाषा दी, जिसके बाद हिंदी पट्टी के राज्यों में रामायण की तरफ रामचरित मानस को पूजा जाने लगा. गांव-देहात में बाकयदा दो दिन रामायण का पाठ होता है, जिसमें रामचरित मानस की सभी चौपाइयां, छंद, दोहा और सोरठा पढ़े या गाये जाते हैं. रामचरित मानस में कुल 7 अध्याय हैं, जिन्हें कांड के नाम से जाना जाता है.
पहला बालकांड, जिसमें भगवान राम के बचपन की लीलाओं की गाथा है. दूसरा अयोध्याकांड है, जिसमें दशरथ पुत्र राम के राज्याभिषेक के बारे में बताया गया है. तीसरा अरण्यकांड, जिसमें भगवान राम के वनवास यात्रा की शुरूआत होती है. चौथा है, किष्किंधाकांड, जिसमें सुग्रीव से मुलाकात का वर्णन है. पांचवां है सुंदरकांड जिसमें हनुमान जी से मुलाकात और उनकी गाथाएं हैं. हनुमान जी की स्तुति के लिए इसका पाठ अलग से भी किया जाता है. छठा कांड है , लंका कांड जिसे युद्ध कांड भी कहते हैं. रावण से युद्ध का जिक्र इसी अध्याय में है. सातवां और आखिरी है, उत्तरकांड, जिसमें राजा राम के अयोध्या वापस आने का वर्णन है.
गोस्वामी तुलसीदास जी ने सारी कहानी चौपाई, दोहा, छंद और सोरठा के माध्यम से सुनाई है. रामचरित मानस की जिन लाइनों में 16-16 मात्राएं आती हैं, उन्हें चौपाई कहा जाता है. मात्राओं से मतबल शब्द और मात्रा दोनों से होता है. चौपाई दो लाइन की होती है. मानस में कुल 4 हजार 608 चौपाइयां हैं. दोहे में दो पद ऊपर और दो पद नीचे होते हैं. पहले पद में 11 मात्राएं और दूसरे में 13-13 मात्राएं होती हैं. दोहों की संख्या 1 हजार 74 है. जो सोरठा हैं, उनकी पहली लाइन के पहले पद में 13 मात्रा और फिर दूसरे पद में 11 मात्राएं होती हैं. छंद से ठीक उलट. इनकी संख्या 207 है. अवधि भाषा से अलग जो लाइनें संस्कृत में लिखी हैं उन्हें छंद कहा जाता है. कुल 86 छंद रामचरित मानस में हैं.
एक ब्रीफ जानकारी हमने आपको रामचरित मानस की हमने आपकी दी. अब उन दो चौपाइयों पर आ जाते हैं, जिनपे बिहार शिक्षा मंत्री आपत्ति जता रहे हैं. पहला है,
अधम जाति मैं बिद्या पाएं।
भयउं जथा अहि दूध पिआएं॥3॥
ये उत्तराकांड की चौपाई है. जिसका जिक्र मंत्री जी भी कर रहे थे. मगर क्या इसका संदर्भ वही जो उन्होंने कहा? पहली बात तो ये शिक्षा मंत्री ने आधी चौपाई पढ़ी. पूरी चौपाई है
हर कहुं हरि सेवक गुर कहेऊ. सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥
अधम जाति मैं बिद्या पाएं। भयउं जथा अहि दूध पिआएं॥3॥
इसकी संदर्भ सहित व्याख्या हमने कथावाचक अखिलेश शांडिल्य जी से समझा, उन्होंने बताया,
"ये प्रसंग है काकभुशुंडि का, जो कि कौवे के रूप में कथा में मौजूद हैं. गरुड उनके पास राम कथा सुनने के आते हैं. इसी दौरान बातचीत करते हुए गरुड के पूछने पर काकभुशुंडि अपने जीवन के बारे में बताते हैं. इस दौरान वे खुद को अधम जाति का बताते हैं यानी पक्षियों में सबसे निचले स्तर का पक्षी. उन्होंने किसी वर्ण के लोगों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया."
यहां से एक बात तो साफ है कि इस चौपाई को शिक्षा मंत्री ने अधूरे और गलत कान्टेक्ट के साथ व्याख्या की. चौपाई में रामचरित मानस के पात्र कागभुशुंडी और गरुण के बीच का संवाद है ना कि नायक राम के मुख से ऐसा कहा गया है. अब आते हैं दूसरी चौपाई जिस पर आपत्ति ज्यादा है. वो भी उत्तर कांड से है. ये कुछ इस प्रकार है,
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।
पनारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥3॥
इसमें तेलि, कुम्हार, कोल, कलवारा आदि जातियों का जिक्र है. अब इसका अर्थ और संदर्भ क्या है? इसे समझाने के साथ-साथ मानस लिखे जाने और उसके ऐतिहासिक कालखंड को हमने आपके लिए जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और हिंदू धर्म साहित्य के जानकार पुरुषोत्तम अग्रवाल से समझा. उन्होंने बताया,
"तुलसीदास ने वाल्मीकि रामायण को आधार बनाकर राम चरित मानस की रचना की. लेकिन साथ में उन्होंने इसमें अपने विचार भी रखे, जो उस समय के समाज के हिसाब से थे. आज वे विचार और शब्द आपत्तिजनक लग सकते हैं. दरअसल तुलसीदास के समय में निर्गुण भक्ति खूब चलन में थी. जिससे परंपरागत पूजा-पाठ करने वाले लोग बैचन थे. तुलसीदास ने रामचरित मानस में निर्गुण भक्ति संतों पर हमला बोला है."
प्रोफेसर तुलसी के मानस के मंतव्य को बताते हुए, उनकी लिखी कुछ लाइनों पर सवाल करते हैं. मगर साथ-साथ उनका मंतव्य भी समझाते हैं. प्रोफेसर अग्रवाल एक और बात कही, वो ये कि मानस की कुछ चौपाइयों पर सवाल है, लेकिन पूरी की पूरी रामचरित मानस को खारिज दिया जाए. ये भी गलत होगा. तुलसीदास की रामचरित मानस में कई बार जातियों का जिक्र आता है, लेकिन उसी मानस में राम का अन्य जाति के लोगों से जुड़ाव का भी जिक्र है.
रामचरित मानस की कुछ चौपाइयों के साथ दिक्कत है, कुछ चौपाइयां को काटकर अलग संदर्भ में देखा जा रहा है. अब तक की पूरी बातचीत से यही समझ आता है. अब यहां समझने की बात ये भी है कि आप तुलसीदास को एक कवि के तौर पर देखते हैं या फिर किसी देवदूत की तरह. देखने के नजरिए पर काफी कुछ निर्भर करता है. किसी भी लेखक की अपने समय के कालखंड से परे जाकर लिखने की भी एक क्षमता होती है. जाहिर है कि 400-500 लिखी किसी भी धर्मग्रंथ की सारी बातें सही नहीं हो सकती है. समय के साथ बहुत सी चीजें बदल जाती हैं. तुलसीदास में भी ये बदलाव नजर आता है. जो तुलसी रामचरित मानस में जातियों का जिक्र करते हैं, जीवन के आखिरी समय में जब उनकी जाति पर सवाल उठता है तो वो एक अलग लकीर खींचते हैं.
अब आते हैं इस स्टोरी के दूसरे पक्ष पर. कि मानस की समीक्षा, आलोचना, विरोध-समर्थन में महागठबंधन की सेहत पर सवाल क्यों उठाये जाने लगे. तो हुआ ये कि शिक्षा मंत्री चंद्र शेखर का बयान सामने आने के बाद भाजपा तो पूरी ताकत से बिहार सरकार को घेरने लगी. पार्टी रामायण पाठ करवा रही है. नीतीश कुमार से पूछा जाने लगा कि वो अपने मंत्री पर क्या कार्रवाई करेंगे. इस तरह जनता दल यूनाइटेड के लिए स्थिति असहज करने वाली हो गई. क्योंकि अव्वल तो ये विवाद उसका शुरू किया हुआ है नहीं. फिर वो गठबंधन में जूनियर पार्टनर भी है. तो जदयू ने चंद्र शेखर के बयान का न समर्थन किया और न पूरी ताकत से विरोध. उधर तेजस्वी ने कह दिया कि विवाद के पीछे भाजपा की कथित साज़िश है. तो हो ये रहा था कि सवाल जदयू से हो रहे थे क्योंकि मुख्यमंत्री उसी पार्टी से हैं. लेकिन वो कुछ करने की स्थिति में नज़र नहीं आ रहे थे.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: बिहार के मंत्री ने रामचरित मानस पर कितना सही, कितना गलत कहा, पकड़ा गया

