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आत्महत्या की कोशिश कर चुके बंदे ने बताया, दिमाग में ये 13 बातें चल रही थीं

पढ़िए लगभग आत्महत्या कर चुके इंसान की डायरी.

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मुबारक
15 जून 2020 (अपडेटेड: 15 जून 2020, 05:42 AM IST)
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मर जाना एक बहुत बड़ी त्रासदी है. शायद सबसे बड़ी. तमाम दुख, तकलीफें, खुशियां, असंतुष्टि, नेम, फेम या बदनामी का अस्तित्व तभी तक है, जब तक सांसें चल रही हों. एक बार दम निकला नहीं कि सब कुछ निरर्थक हो जाता है. फिर भी लोग मर जाते हैं. ख़ुशी-ख़ुशी. पूरे होशो-हवास में जान जैसी चीज़ लुटा देते हैं, जिसको वापस पाने का कोई ज़रिया नहीं. 14 जून 2020 को  मुंबई में एक्टर सुशांत सिंह राजपूत ने अपनी जान ले ली. मौत को गले लगाने को तत्पर एक मनुष्य की ज़िंदगी के प्रति वो उदासीनता विचलित करने वाली थी. उसे देख कर एक ज़हन में बार-बार बज रहा है कि जो लोग मौत को गले लगाने का इरादा कर लेते हैं, उनके अंदर क्या चल रहा होता है!
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जब इंसान मरने की ठान लेता है, उसके दिमाग में एक पैरेलल यूनिवर्स जन्म ले लेता है. एक और दुनिया! जहां सिर्फ मौत से जुड़ी चीज़ों के विजुअल्स चलते रहते हैं. उसी से जुड़े ख़याल ज़हन पर हावी रहते हैं. कुछ भी कर रहे हो, बैकड्रॉप में एक ही सीन चलता रहता है. मौत का, उसे अंजाम देने वाले संभावित पलों का. उन संभावित घटनाओं और प्रतिक्रियाओं का, जो उसकी मौत के बाद वजूद में आएंगी. इंसान मौत के अलावा और कुछ सोचता ही नहीं. नीचे कुछ ऐसी बातें हैं जो मौत की राह का राही बनने के ख्वाहिशमंद शख्स के दिमाग में चलती रहती हैं. उसके साथ होती रहती हैं.
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सुसाइड की चाहत रखने वाले शख्स को एक अलग दुनिया नज़र आती है.

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इन सबके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा चलता रहता है ज़हन में. तमाम बातें शब्दबद्ध करना नामुमकिन है. डर भी लगता है उसे. और फिर उस डर को ओवरटेक करने की संभावना से बहादुर वाली फीलिंग भी आती है.
मेरे उस दोस्त ने उन दिनों – जब उसके ज़हन पर मौत सवार थी – अपनी डायरी के पन्ने काले किए थे. नीचे लिखा पैराग्राफ उसी डायरी से उठाया गया है. एक भी शब्द नहीं बदला है. पढ़िए इसमें उसने कैसे दार्शनिक टच देकर मौत को एक सामान्य घटना साबित करने की कोशिश की है. आज इस पन्ने को पढ़ कर वो खुद भी दहल जाता है.
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हर किसी को दिलचस्पी है ये जानने में कि मौत के आगे क्या है.
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इसे गौर से पढ़िएगा दोस्तों. ये वो रोजनामचा है, जो आपको बताएगा कि ज़िंदगी जैसी कीमती चीज़ फेंक देने का इरादा करने से पहले दिमाग किस हद तक आपको कायल करने की कोशिशें करता है. आज मेरा वो दोस्त वो सब याद करता है, तो उस घड़ी को शुक्रिया अदा करता है, जब वो मौत के सम्मोहन से खुद को छुड़ा सका.अब वो उन तमाम पलों को याद करता है, जो उसने उस भयानक रात के बाद जिए. और फिर उसे एहसास होता है कि मर जाना भी उतना ही निरर्थक है, जितनी कभी-कभी ज़िंदगी लगती है.


एक वीडियो देख लें:
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