The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Conch Shell : The importance of shankh and shankhadhwani in Indian history, Hindu religion and culture

शंख बजाने से क्या वाकई फेफड़े मजबूत हो जाते हैं? शंखों की पूरी कहानी जान लीजिए

एक आदमी ने इतनी देर तक शंख बजाया कि आम आदमी की तो फूंक सरक जाए!

Advertisement
Img The Lallantop
लगातार 80 सेकंड्स तक शंख बजाने का रिकॉर्ड बनाने वाले शम्भु कुमार (बाएं), और दाएं शंख की सांकेतिक तस्वीर.
pic
प्रेरणा
29 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 29 दिसंबर 2020, 01:18 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
श्रीमद्भागवद्गीता. प्रथम अध्याय. श्लोक 15-18 .

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः । पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ॥

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌ ॥

पांडवों और कौरवों की सेना आमने-सामने खड़ी है. अठारह दिनों तक चलने वाला महाभारत का युद्ध शुरू नहीं हुआ है अभी. युद्ध के आरम्भ होने से पहले, शंख की तीव्र ध्वनियां गूंजती हैं. ऊपर लिखे श्लोक में उन सभी शंखों के नाम हैं, जो महाभारत में पांडवों की सेना की तरफ से फूंके गए. श्रीकृष्ण के पास पांचजन्य था. अर्जुन के पास देवदत्त. युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नाम का शंख फूंका, भीमसेन ने पौण्ड्र. नकुल के शंख का नाम सुघोष, और सहदेव के शंख का नाम मणिपुष्पक था. इसके अलावा काशीराज, शिखंडी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, सात्यकि, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पांचों पुत्रों और अभिमन्यु के पास भी अलग-अलग शंख थे. सभी शंखों की ध्वनि से कुरुक्षेत्र की धरती गूंज उठी.
Image embed
अपने-अपने शंखों का नाद करते दिख रहे श्रीकृष्ण और अर्जुन की एक पेंटिंग.

लेकिन शंख की बात हम आज क्यों कर रहे हैं? पहले ये जान लीजिए.
शम्भु. बेगूसराय के बछवाड़ा गांव के हैं. फिलहाल दिल्ली में रहते हैं. 'आज तक' से जुड़े पत्रकार सौरभ कुमार के मुताबिक़ भारतीय सेना की 16 राजपूत बटालियन में तैनात हैं. इन्होंने एक नया रिकॉर्ड बनाया है, जो गिनीज बुक में दर्ज हुआ है. शम्भु ने लगातार 80 सेकंड तक एक ही सांस में शंख फूंका है. इससे पहले उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हुआ था.
Image embed
अपने गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स सर्टिफिकेट के साथ शम्भु. (तस्वीर: सौरभ कुमार/आजतक)

ये तो हुई खबर. शंख फूंकने को लेकर आप भी लगातार चीज़ें पढ़ते-सुनते रहते होंगे. जैसे फेफड़ों पर इसका अच्छा असर होता है. या इसे घर में रखना शुभ माना जाता है. अलग-अलग शंखों की पूजा भी की जाती है. तो हमने सोचा आज क्यों न थोड़ा समझा जाए कि शंखों की कहानी है क्या. विज्ञान क्या कहता है. जानकार क्या कहते हैं. कहां से आए शंख और कैसे पहुंचे घरों में. आइये जानते हैं.
कहां से आए शंख?
विज्ञान के अनुसार, शंख यानी conch shell समुद्री घोंघे के कवच होते हैं. ये कैल्शियम कार्बोनेट से बने होते हैं. प्रकृति में शंख बनने की प्रक्रिया समय लेने वाली होती है. घोंघों की पीठ पर ख़ास तरह का टिशू होता है. इसको मैंटल टिशू कहते हैं. ये प्रोटीन और मिनरल का स्राव करता है. इससे ही धीरे-धीरे इस कवच का निर्माण होता है. नीचे से ऊपर की तरफ ये कवच बढ़ते जाते हैं. इन कवचों में बहुत कम मात्रा में प्रोटीन भी होता है. अपनी सुरक्षा के लिए ये कवच बनाने वाले घोंघे जैसे जैसे साइज में बढ़ते हैं, उनके इस कवच का साइज भी बढ़ता है. इसमें मुख्य रूप से तीन परतें होती हैं.
Image embed
अपने कवच के साथ एक घोंघा. (तस्वीर: पिक्साबे)

आमतौर पर बजाने वाले शंख से घोंघे को निकाल लिए जाने पर इनके कवच के ऊपरी नुकीले हिस्से में छेद किया जाता है. फिर उसी से हवा फूंकी जाती है, और शंख बजने की आवाज़ आती है. पेरू और मेक्सिको जैसे देशों में भी पुराने जमाने में शंख इस्तेमाल किए जाने के सुबूत मिले हैं. कुछ प्राचीन कलाकृतियों में शंख की आकृति उकेरी हुई भी मिली है.
विज्ञान से विरासत तक
ये तो हुई विज्ञान की बात. अब आते हैं भारतीय परंपरा और प्राचीन कहानियों पर. एक कहानी जो काफी प्रचलित है और विष्णु पुराण के साथ-साथ भागवत पुराण में पढ़ने को मिलती है, वो ये है कि देवों और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था. क्यों? दुर्वासा ऋषि के शाप से देवराज इंद्र की शक्तियां चली गई थीं, और तीनों लोकों पर दैत्यों का राज हो गया था. भगवान् विष्णु ने देवों को उपाय सुझाया, कि समुद्र मंथन करो. उसमें से अमृत निकलेगा, उसका पान करने से दैत्यों को हराना संभव हो जाएगा. उस समय दैत्यों के राजा बलि थे. बलि और इंद्र ने बातचीत की. समुद्र मथने की बात पर समझौता हो गया.
क्षीर सागर को मथने के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया गया, और वासुकि नाग को रस्सी (जिसे नेती भी कहते हैं). नीचे समुद्र तल पर भगवान विष्णु कच्छप (कछुआ) अवतार लेकर बैठ गए. पर्वत उन्हीं की पीठ पर रखा गया. वासुकि के मुंह की तरफ असुर थे, और पूंछ की तरफ देव. जब समुद्र मंथन हुआ, तब उसमें से चौदह रत्न निकले. जिसमें से पहला रत्न हलाहल विष था. और आखिर वाला अमृत. इन रत्नों के बारे में आपने दूसरी जगहों पर भी पढ़ा होगा. जैसे ऐरावत हाथी, कामधेनु गाय, चन्द्रमा, शारंग धनुष, इत्यादि. इन्हीं रत्नों में से एक थीं देवी लक्ष्मी, और एक था शंख. दोनों समुद्र से निकले, इसलिए शंख को देवी लक्ष्मी का भाई भी कहा जाता है. कई जगहों पर देवी लक्ष्मी की पूजा में शंख का इस्तेमाल भी होता है.
Image embed
समुद्र मंथन दिखाती एक तस्वीर.

शंख को लेकर एक और कहानी चलती है. थोड़ी कम लोकप्रिय है, लेकिन पढ़ने को मिलती है. शिव पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने शंखचूड़ नाम के एक दानव का वध किया था. वध के बाद शंखचूड़ की आत्मा को तो मुक्ति मिल गई. लेकिन उसकी अस्थियां समुद्र में बिखर गईं. बाद में इन्हीं हड्डियों से शंख का जन्म हुआ.
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख को चंद्रमा और सूर्य के समान माना गया है. यानी देवस्वरूप. वहीं अथर्ववेद के चतुर्थ कांड के दसवें सूक्त यानी शंखमणि सूक्त में शंख का महत्त्व बताया गया है.
Image embed
अथर्ववेद में शंख को मणि कहा गया है.

शंख के प्रकार
वैसे तो कई तरह के शंख मिलते हैं. लेकिन अपने यहां भारत में दो तरह के शंख ज्यादा प्रचलित हैं. एक दक्षिणावर्ती. एक वामावर्ती. दक्षिणावर्ती यानी वो जिसका पेट दाईं तरफ खुलता हो. वामावर्ती इसका उलटा.  इनके अलावा एक मध्यवर्ती शंख भी होता है. जिसे गणेश शंख कहते हैं. इसके अलावा हीरा शंख, मोती शंख, कौड़ी शंख भी मिलते हैं.
Image embed
शंख में लोग जल भरकर भी रखते हैं. मान्यता है कि ये जल छिड़कने से घर शुद्ध होता है.

ये तो हुई शंख गाथा. अब आते हैं इसके इस्तेमाल और असर पर.
शंख और संगीत 
शंख को 'विंड इंस्ट्रूमेंट' की श्रेणी में रखा गया है.  यानी ऐसा वाद्य यंत्र जिसे बजाने में हवा का इस्तेमाल हो. जैसे बांसुरी, बैगपाइपर, माउथ ऑर्गन इत्यादि. इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए हमने बात की प्रवीण कश्यप से. दिल्ली के रहने वाले हैं. बांसुरी वादक हैं. शंख भी बजाते हैं. दिल्ली और दिल्ली से बाहर कॉन्सर्ट्स में परफॉर्म करते हैं. इन्होंने बताया,
Image embed
संगीत से सेहत तक 
कई जगह आपने ये भी पढ़ा होगा कि शंख बजाने से फेफड़ों को ताकत मिलती है. इसकी सच्चाई जानने के लिए हमने बात की डॉक्टर दीपक शुक्ल से. ये उदयपुर के गीतांजलि मेडिकल कॉलेज में पोस्टेड हैं. पल्मोनरी मेडिसिन, यानी सांस से जुड़ी दिक्कतों का इलाज करते हैं. इन्होंने बताया,
Image embed
इसलिए इस रिकॉर्ड के बारे में पढ़कर सीधे आप भी 80 सेकंड तक शंख बजने की कोशिश न करें. डॉक्टर का कहना है ज़रूरत से ज्यादा फेफड़े फुला लिए तो नुकसान भी हो सकता है. शम्भु कुमार ने बताया कि वो रोज लगातार कई मिनट प्रैक्टिस किया करते थे. तब जाकर उन्होंने 80 सेकंड तक शंख बजाया है. आपको भी शंख बजाना है, तो कम समय से शुरू करिए, और फिर धीरे-धीरे समय बढ़ाते जाइए. क्या पता अगला रिकॉर्ड आप ही बना लें.

Advertisement

Advertisement

()