लॉकडाउन में बढ़ी बेरोजगारी का 'अनलॉक' के बाद क्या हुआ? इस डेटा से जानिए
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी यानी CMIE ने चौंकाने वाला डेटा दिया है.
Advertisement

CMIE ये हर हफ्ते देश में बेरोजगारी के आंकड़े जारी करता है. CMIE के 23 जून को जारी डेटा के मुताबिक अब देश में सिर्फ उतनी ही बेरोजगारी रह गई है जितनी कोरोना संकट से पहले थी.
Quick AI Highlights
Click here to view more
ढाई महीने के लॉकडाउन के बाद सरकार के अनलॉक-1 को तीन हफ्ते पूरे हो गए हैं. आपको टीवी पर वैसी तस्वीरें तैरती नहीं दिखती होंगी, जिनमें प्रवासी मजदूर अपने गांवों की तरफ पैदल जा रहे थे. कोई बेटी अपने बाप को साइकिल पर ले जा रही थी, तो कोई मां बच्चे को सुलाकर सूटकेस खींच रही थी. या फिर वो तस्वीरें, जिसमें भूखे प्रवासी मजदूरों खाने के पैकेट पर झपट रहे थे. अब चीजें पीछे छूट गई हैं. अब खबरों में चीन से झगड़ा है, बिहार चुनाव की तैयारियां और कोरोना ठीक करने वाली दवा भी खबरों में है. लेकिन उन लाखों मजदूरों का क्या हुआ, जो लॉकडाउन के बाद शहरों में अपना रोज़गार छोड़कर गांवों की तरफ गए थे. वो लाखों मजदूर, जिनकी परेशान करने वाली तस्वीरें हमने देखी थी. उन कामगारों का क्या हुआ, जिनकी फैक्ट्रियां या उद्योग-धंधे बंद होने से नौकरियां चली गईं. क्या उनको दोबारा नौकरी मिली?
लॉकडाउन में काम नहीं होने की वजह से लाखों करोड़ों मजदूर अपने घरों को लौट गए थे. फाइल फोटो-पीटीआई
21 जून को जो हफ्ता खत्म हुआ, उसमें बेरोजगारी दर 8.5 फीसदी रही. लॉकडाउन के दौरान 3 मई को बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा 27.1 फीसदी थी. लॉकडाउन से पहले मार्च महीने में बेरोजगारी दर थी 8.75 फीसदी थी. यानी मार्च में 8.75 फीसदी से बढ़कर मई में 27.1 फीसदी तक पहुंची और फिर लॉकडाउन खुलते ही ये दर 8.5 फीसदी हो गई.
लॉकडाउन से पहले बेरोजगारी बेरोजगारी दर थी 8.75 फीसदी. यानी 100 लोगों में से करीब करीब 9 के पास नौकरी नहीं थी. ऐसे लोगों की संख्या मई में 27 पहुंची और फिर जून के तीसरे में CMIE के आंकड़ों के मुताबिक वापस 9 से नीचे आ गई. तो इसका क्या मतलब है. क्या लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था और लेबर मार्केट को जो नुकसान हुआ था, उसकी भरपाई अब हो गई है? अर्थशास्त्रियों का कहना है.
स्कॉच ग्रुप के चेयरमैन समीर कोचर का कहना है,
अब ग्रामीण इलाकों की बात करते हैं. ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी दर अब 7.26 फीसदी है. और लॉकडाउन से पहले थी 8.3 फीसदी. यानी ग्रामीण इलाकों में लॉकडाउन के बाद बेरोजगारी और कम हुई है. इसका मतलब ये है कि शहरों से जो प्रवासी मजदूर गांवों की तरफ गए थे, उनको भी गांवों में रोजगार मिला है. और गांवों में रोजगार के क्या साधन हैं- खेती और मनरेगा. इस बारे में अर्थशास्त्री एमके वेणु कहते हैं कि एग्रीकल्चर सेक्टर में अच्छी ग्रोथ से लोगों को रोजगार मिल रहा है. पहले भी का अनुभव रहा है कि खेती की उच्च वृद्धि दर से अर्थव्यवस्था का ओवरओल रिवाइवल होता है. इसके साथ ही एमके वेणु मनरेगा को भी श्रेय देते हैं.
पीएम ने कहा था कि गड्ढा खोदना और भरना कोई काम नहीं होता. (फाइल फोटो)
ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी घटने की वजह हमने और भी अर्थशास्त्रियों से पूछी.
स्कॉच ग्रुप के चेयरमैन समीर कोचर का कहना है,
लेकिन इस आंकड़े के आने के बाद सरकार ढीली न पड़ जाए. मनरेगा कुछ महीनों तक ही काम दे पाता है. वो सरदर्द की दवा है, न कि माइग्रेन का इलाज. बेरोज़गारी का स्थायी समाधान नए अवसरों में है. इसके लिए क्या करना चाहिए, ये भी सरकार जानती है. सवाल बस इतना है कि सरकार कितनी ईमानदारी से इसके लिए प्रयास करती है.
क्या मोदी सरकार पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी कम करके किसानों को राहत देगी?
क्या कहते हैं आंकड़े?
रोज़गार या बेरोज़गारी की बात सरकार आंकड़ों में कहती है. आंकड़ों से ही समझती है. तो बेरोजगारी दर पर ताज़ा आंकड़ों की बात कर लेते हैं. बेरोज़गारी दर का नया आंकड़ा आया है. सरकार की तरफ से नहीं. एक थिंक-टैंक ने जारी किया है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी यानी CMIE. ये हर हफ्ते देश में बेरोजगारी के आंकड़े जारी करता है. CMIE के 23 जून को जारी डेटा के मुताबिक, अब देश में सिर्फ उतनी ही बेरोजगारी रह गई है, जितनी कोरोना संकट से पहले थी. यानी लॉकडाउन खत्म होते के तीन हफ्ते में ही उतने लोगों को फिर से रोज़गार मिल गया है, जितने लोगों के पास लॉकडाउन से पहले रोजगार था. आंकड़ों का अगर सरलीकरण करके कहें, तो लॉकडाउन में लोगों की नौकरी गई जरूर थी, लेकिन अब उतने लोगों को वापस रोजगार मिल गया है.
लॉकडाउन में काम नहीं होने की वजह से लाखों करोड़ों मजदूर अपने घरों को लौट गए थे. फाइल फोटो-पीटीआई21 जून को जो हफ्ता खत्म हुआ, उसमें बेरोजगारी दर 8.5 फीसदी रही. लॉकडाउन के दौरान 3 मई को बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा 27.1 फीसदी थी. लॉकडाउन से पहले मार्च महीने में बेरोजगारी दर थी 8.75 फीसदी थी. यानी मार्च में 8.75 फीसदी से बढ़कर मई में 27.1 फीसदी तक पहुंची और फिर लॉकडाउन खुलते ही ये दर 8.5 फीसदी हो गई.
आसान भाषा में समझिए
थोड़ा और आसानी से समझिए. बेरोजगारी दर का मतलब होता है देश के लेबर फोर्स यानी देश में जितने भी काम करने लायक लोग हैं, उनमें से ऐसे लोगों का प्रतिशत, जो काम तो करना चाहते हैं, लेकिन रोजगार मिल ही नहीं रहा, इसलिए घर बैठना पड़ रहा है. यानी अगर देश में काम करने लायक कुल 100 लोग हैं और इनमें से 27 लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा, तो इसका मतलब है कि बेरोजगारी दर 27 फीसदी है.लॉकडाउन से पहले बेरोजगारी बेरोजगारी दर थी 8.75 फीसदी. यानी 100 लोगों में से करीब करीब 9 के पास नौकरी नहीं थी. ऐसे लोगों की संख्या मई में 27 पहुंची और फिर जून के तीसरे में CMIE के आंकड़ों के मुताबिक वापस 9 से नीचे आ गई. तो इसका क्या मतलब है. क्या लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था और लेबर मार्केट को जो नुकसान हुआ था, उसकी भरपाई अब हो गई है? अर्थशास्त्रियों का कहना है.
स्कॉच ग्रुप के चेयरमैन समीर कोचर का कहना है,
CMIE के डेटा को हमें तीन-चार चीजों के साथ देखना चाहिए. कोविड से पहले जीडीपी थी 4.2 प्रतिशत. कोविड के बाद यह माइनस 5 प्रतिशत तक जा चुका है. हो सकता है कि ये माइनस 8 या 8.5 जाए. ऐसे में इस रोजागार के डेटा को देखना सही नहीं होगा, क्योंकि वेज लॉस बहुत ज्यादा हो चुका है.जेएनयू के प्रोफेसर प्रवीण झा का कहना है,
एक चीज पर ध्यान देने की जरूरत है- अंडर एंप्लॉयमेंट. मान लीजिए कि पहले कोई दिन में 8 घंटे का रोजगार कर पा रहा था, लेकिन अब उसे दो-चार घंटे ही मिल रहा है, तो ऐसे में तो वो रोजगार की श्रेणी में आ रहा है. डेटा सुधरने का एक कारण ये हो सकता है. मेरा मानना है कि रोजगार और अर्थव्यवस्था के नजरिए से स्थिति ठीक नहीं है. अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है.
गांव में बेरोजगारी घटी
आंकड़ों के हिसाब से बेरोजगारी पहले वाले ढर्रे पर ही आ गई है. लेकिन देश की कुल बेरोजगारी दर के भी दो हिस्से होते हैं. शहरी इलाकों की बेरोजगारी और ग्रामीण इलाकों की. अब शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर 11.2 फीसदी है, जबकि लॉकडाउन से पहले शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर थी 9 फीसदी. यानी लॉकडाउन के बाद शहरों में बेरोजगारी बढ़ी थी और अब भी पहले से ज्यादा है.अब ग्रामीण इलाकों की बात करते हैं. ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी दर अब 7.26 फीसदी है. और लॉकडाउन से पहले थी 8.3 फीसदी. यानी ग्रामीण इलाकों में लॉकडाउन के बाद बेरोजगारी और कम हुई है. इसका मतलब ये है कि शहरों से जो प्रवासी मजदूर गांवों की तरफ गए थे, उनको भी गांवों में रोजगार मिला है. और गांवों में रोजगार के क्या साधन हैं- खेती और मनरेगा. इस बारे में अर्थशास्त्री एमके वेणु कहते हैं कि एग्रीकल्चर सेक्टर में अच्छी ग्रोथ से लोगों को रोजगार मिल रहा है. पहले भी का अनुभव रहा है कि खेती की उच्च वृद्धि दर से अर्थव्यवस्था का ओवरओल रिवाइवल होता है. इसके साथ ही एमके वेणु मनरेगा को भी श्रेय देते हैं.
पीएम ने कहा था कि गड्ढा खोदना और भरना कोई काम नहीं होता. (फाइल फोटो)ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी घटने की वजह हमने और भी अर्थशास्त्रियों से पूछी.
स्कॉच ग्रुप के चेयरमैन समीर कोचर का कहना है,
पिछले महीने मनरेगा के एंप्लॉयमेंट में भारी जंप हुआ है. जून में करीब 65 प्रतिशत का जंप हुआ है. वो शायद इस वजह से है कि जो अर्बन माइग्रेंट अपने गांव गए हैं, वो लोग काम कर रहे हैं. क्या ये चीज सस्टेनबल है, आपको देखना होगा कि मनरेगा के लिए पक्का काम हम क्रिएट कर पाएंगे कि नहीं. क्योंकि मोदी जी ने कहा था कि गड्ढा खोदना और भरना कोई काम नहीं होता.उन्होंने आगे कहा,
अर्बन इंडिया और MSME के आंकड़े बता रहे हैं कि बहुत बड़ा क्राइसिस है. जो सर्वे था, अगस्त तक पांच से छह करोड़ नौकरियां खत्म होने की संभावना है. MSME सेक्टर के अंदर. अगस्त में मोराटोरियम भी खत्म हो जाएगा. उसके बाद पता चल जाएगा कि हमाम में कौन-कौन नंगा है. एक क्राइसिस की तरफ हम लोग बढ़ रहे हैं.प्रधानमंत्री मोदी ने कोविड राहत पैकेज में मनरेगा के लिए भी कुछ घोषणाएं की थीं. मनेरगा में रोजाना की मजदूरी बढ़ाकर 202 रुपये की थी, इसके अलावा 40 हजार करोड़ रुपये का और फंड आवंटित किया था. इससे पहले बजट में मनरेगा को 61 हजार करोड़ रुपये दिए गए थे. लॉकडाउन के बाद से मनरेगा में काम मांगने वालों की संख्या बढ़ी है. ग्रामीण इलाकों में मनरेगा आदमनी का जरिया बन रहा है. इसके अलावा अच्छे मानसून और खरीफ की सही बुआई से भी ग्रामीण इलाकों में एक बड़ा संकट टल गया, जो कोरोना की वजह से देश की अर्थव्यस्था पर आया था.
लेकिन इस आंकड़े के आने के बाद सरकार ढीली न पड़ जाए. मनरेगा कुछ महीनों तक ही काम दे पाता है. वो सरदर्द की दवा है, न कि माइग्रेन का इलाज. बेरोज़गारी का स्थायी समाधान नए अवसरों में है. इसके लिए क्या करना चाहिए, ये भी सरकार जानती है. सवाल बस इतना है कि सरकार कितनी ईमानदारी से इसके लिए प्रयास करती है.
क्या मोदी सरकार पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी कम करके किसानों को राहत देगी?

