सुप्रीम कोर्ट का एक जजमेंट है, भारत गणराज्य तथा अन्य बनाम तुलसीराम पटेल तथा अन्य1985. इसमें 5 जजों की बेंच ने फैसला दिया है. इस फैसले से जुड़े मुकदमे के बारेमें बहुत ही कम डीटेल इंटरनेट पर उपलब्ध है. ये मुकदमा 1979 में बोकारो में भारतीयसेना और CISF के बागी जवानों के बीच हुए खूनी संघर्ष के बारे में है. दरअसल सेना औरपैरामिलिट्री के बीच हाइरार्की और बराबरी के दर्जे की मांग बहुत पुरानी है. BSF,ITBP जैसे तमाम अर्धसैनिक बल ऐसे कई काम करते हैं, जो सेना की तरह ही ऑपरेशनल स्किलवाले काम करते हैं. मगर इनमें से कई को दर्जा केंद्रीय पुलिस का मिला हुआ है. इसतकनीकी हेर-फेर के कारण अर्धसैनिक बलों के जवान कई सुविधाओं से महरूम रह जाते हैं.जैसे युद्ध के समय कितनी भी बहादुरी से लड़ने के बावजूद बीएसएफ के जवान परमवीर चक्रजैसे वीरता सम्मान नहीं पा सकते. CISF की स्थापना 1969 में हुई. इसका उद्देश्य देशमें तमाम औद्योगिक इकाइयों, एयरपोर्ट्स और बंदरगाहों की सुरक्षा करना था. लगभग 10साल तक CISF के जवान खुद को सशस्त्र बल का दर्जा दिए जाने की मांग करते रहे. मार्च1979 में देश भर की CISF यूनिट्स ने मिलकर एक यूनियन बनाई, इसके महासचिव सदानंद झाबने. इसके बाद जून में इस यूनियन के कुछ सदस्यों ने तत्कालीन जनता पार्टी सरकार केगृह मंत्री से मुलाकात की. इन लोगों ने दिल्ली में प्रदर्शन भी किया. ठीक इसी समयबोकारो स्टील प्लांट में भी CISF के जवान प्रदर्शन के लिए जमा थे. जवान नारे लगानेलगे,वर्दी-वर्दी-वर्दी, भाई-भाई लेकर रहेंगे पाई-पाई पंजाब की जीत हमारी है अब CISF कीबारी है.CISF के बागी जवानों ने CISF के अधिकारियों को घेर लिया. 1900 जवानों की यूनिट में1100 जवान बाग़ी हो गए थे. इन जवानों की उग्रता ने देश की सरकार को पैनिक में डालदिया. ये वो दौर था, जब इन इलाकों में नक्सलवाद और उसका रोमैंटिसिज़म चरम पर था.प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सेना को बुलाया. राज्य सरकार ने भी 9 मैजिस्ट्रेट औरCRPF को बुलाकर पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी. फ्लड लाइट्स और बैरिकेडिंग लगा दीगईं. 24 जून 1979 को बाग़ी जवानों ने भी रेत की बोरियों और प्लांट में मौजूदहथियारों के साथ पोज़ीशन ले ली. दोनों पक्षों में तनाव रहा. फिर 27 जून 1979 का वोकाला दिन आया, जब दोनों पक्षों में गोलीबारी शुरू हो गई. बोकारो की ज़मीन पर लगातारतीन घंटों तक देश के दो सुरक्षाबल आपस में एक दूसरे पर गोलियां चलाते रहे. एक मेजरसमेत सेना के तीन लोगों की मौत हो गई. CISF की ओर से मरने वालों की गिनती 22 से 29के बीच थी. इनमें से कितने लोगों को क्या सज़ा मिली, इसकी कोई स्पष्ट जानकारीपब्लिक डोमेन में नहीं है. मगर उस हादसे से जुड़े लोग बताते हैं कि इस घटना मेंशामिल जवानों में से कई को फांसी और उम्रकैद की सज़ा हुई. बाकी को बर्खास्त कर दियागया, साथ ही उनके सभी रिकॉर्ड CISF की फाइलों से मिटा दिये गए. इसके बाद 1983 मेंजाकर CISF को सशस्त्र बल का दर्जा मिला और इसके जवानों को भी बाकी अर्धसैनिक बलोंकी तरह सुविधाएं मिलीं.