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जब आज़ाद हिंदुस्तान में दो सैन्य-बलों को एक दूसरे पर गोली चलानी पड़ी

सुविधाओं की मांग पर जवान पहले भी कर चुके हैं बगावत.

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11 जनवरी 2017 (अपडेटेड: 11 जनवरी 2017, 10:18 AM IST)
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सुप्रीम कोर्ट का एक जजमेंट है, भारत गणराज्य तथा अन्य बनाम तुलसीराम पटेल तथा अन्य 1985. इसमें 5 जजों की बेंच ने फैसला दिया है. इस फैसले से जुड़े मुकदमे के बारे में बहुत ही कम डीटेल इंटरनेट पर उपलब्ध है. ये मुकदमा 1979 में बोकारो में भारतीय सेना और CISF के बागी जवानों के बीच हुए खूनी संघर्ष के बारे में है. दरअसल सेना और पैरामिलिट्री के बीच हाइरार्की और बराबरी के दर्जे की मांग बहुत पुरानी है. BSF, ITBP जैसे तमाम अर्धसैनिक बल ऐसे कई काम करते हैं, जो सेना की तरह ही ऑपरेशनल स्किल वाले काम करते हैं. मगर इनमें से कई को दर्जा केंद्रीय पुलिस का मिला हुआ है. इस तकनीकी हेर-फेर के कारण अर्धसैनिक बलों के जवान कई सुविधाओं से महरूम रह जाते हैं. जैसे युद्ध के समय कितनी भी बहादुरी से लड़ने के बावजूद बीएसएफ के जवान परमवीर चक्र जैसे वीरता सम्मान नहीं पा सकते. CISF की स्थापना 1969 में हुई. इसका उद्देश्य देश में तमाम औद्योगिक इकाइयों, एयरपोर्ट्स और बंदरगाहों की सुरक्षा करना था. लगभग 10 साल तक CISF के जवान खुद को सशस्त्र बल का दर्जा दिए जाने की मांग करते रहे. मार्च 1979 में देश भर की CISF यूनिट्स ने मिलकर एक यूनियन बनाई, इसके महासचिव सदानंद झा बने. इसके बाद जून में इस यूनियन के कुछ सदस्यों ने तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के गृह मंत्री से मुलाकात की. इन लोगों ने दिल्ली में प्रदर्शन भी किया. ठीक इसी समय बोकारो स्टील प्लांट में भी CISF के जवान प्रदर्शन के लिए जमा थे. जवान नारे लगाने लगे,

वर्दी-वर्दी-वर्दी, भाई-भाई लेकर रहेंगे पाई-पाई पंजाब की जीत हमारी है अब CISF की बारी है.

CISF के बागी जवानों ने CISF के अधिकारियों को घेर लिया. 1900 जवानों की यूनिट में 1100 जवान बाग़ी हो गए थे. इन जवानों की उग्रता ने देश की सरकार को पैनिक में डाल दिया. ये वो दौर था, जब इन इलाकों में नक्सलवाद और उसका रोमैंटिसिज़म चरम पर था. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सेना को बुलाया. राज्य सरकार ने भी 9 मैजिस्ट्रेट और CRPF को बुलाकर पूरे इलाके की घेराबंदी कर दी. फ्लड लाइट्स और बैरिकेडिंग लगा दी गईं. CISF 24 जून 1979 को बाग़ी जवानों ने भी रेत की बोरियों और प्लांट में मौजूद हथियारों के साथ पोज़ीशन ले ली. दोनों पक्षों में तनाव रहा. फिर 27 जून 1979 का वो काला दिन आया, जब दोनों पक्षों में गोलीबारी शुरू हो गई. बोकारो की ज़मीन पर लगातार तीन घंटों तक देश के दो सुरक्षाबल आपस में एक दूसरे पर गोलियां चलाते रहे. एक मेजर समेत सेना के तीन लोगों की मौत हो गई. CISF की ओर से मरने वालों की गिनती 22 से 29 के बीच थी. इनमें से कितने लोगों को क्या सज़ा मिली, इसकी कोई स्पष्ट जानकारी पब्लिक डोमेन में नहीं है. मगर उस हादसे से जुड़े लोग बताते हैं कि इस घटना में शामिल जवानों में से कई को फांसी और उम्रकैद की सज़ा हुई. बाकी को बर्खास्त कर दिया गया, साथ ही उनके सभी रिकॉर्ड CISF की फाइलों से मिटा दिये गए. इसके बाद 1983 में जाकर CISF को सशस्त्र बल का दर्जा मिला और इसके जवानों को भी बाकी अर्धसैनिक बलों की तरह सुविधाएं मिलीं.

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