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पर बॉलीवुड जैसी देशभक्ति परोसता है, उसका क्या करें!

JNU से निकली देशभक्ति की बहस बॉलीवुड तक आ पहुंची है.

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लल्लनटॉप
4 मार्च 2016 (Updated: 4 मार्च 2016, 01:10 PM IST)
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mihir pandya the lallantopJNU में नारेबाजी हुई तो देश में बहस-मुबाहिसा होने लगा कि देशभक्ति आखिर चीज क्या है. पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर JNU के स्टूडेंट और पत्रकार पीटे गए. एक रिपोर्टर ने हमले के आरोपी वकील साहब से बात करनी चाही तो वह बोले, 'पहले भारत माता की जय बोलिए, तब जवाब दूंगा.' किसी ने कहा कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति में फर्क है और आदमी अपना काम ईमानदारी से करे तो नारे लगाए बिना भी वह देशभक्त कहला सकता है. कुछ लोग महान विचारकों और कवियों को कोट करते हुए लिखने लगे. चूंकि हम सिनेमाप्रेमी मुल्क से हैं, तो ये बहस भी बॉलीवुड तक गई. देशभक्ति के उस प्रकार तक गई जो 'एयरलिफ्ट' जैसी फिल्में हमें सिखाती हैं.डीयू में पढ़ाते हैं मिहिर पंड्या. 'दी लल्लनटॉप' के लिए सिनेमा पर लिखते रहते हैं. शुक्रवार को उन्होंने अपना चार साल पुराना एक लेख फेसबुक पर शेयर किया. इसे आगे बढ़ाते हुए हम यहां छाप रहे हैं. आइडियाज पर बात करने वालों को पढ़ना चाहिए. असहमत हों तब भी. आगे मिहिर का लेख, लेकिन उससे पहले उनकी एक ताजा और छोटी टिप्पणी.

मिहिर लिखते हैं:

तो जब भारतीय न्याय व्यवस्था ने 'राष्ट्रभक्ति' सिखाने का काम आधिकारिक रूप से सिनेमाई गानों द्वारा करना शुरु कर ही दिया है, तो हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम हिन्दी सिनेमा की ओर से रचे जा रहे 'राष्ट्रवाद' का अध्ययन फिर से पेश करें. यह समझने की कोशिश करें कि कैसे नए आज़ाद हुए मुल्क में नए नागरिक को राज्य की संस्था के लिए 'भक्ति' सिखाने की कोशिश में 'शॉर्टकट' अपनाए गए और कैसे यही आगे जाकर घातक साबित हुआ. यह कैसा 'राष्ट्रवाद' है, और कैसे इसका निर्माण हुआ - जिसका इस्तेमाल अन्तत: रोहित जैसे छात्र को अपनी ही यूनिवर्सिटी में अकेला कर दिए जाने में हो सकता है, इसे समझने की ज़रूरत है. इसका इस्तेमाल करने वाले बदलते रहे हैं, बदलते रहेंगे. हमें सवाल ऐसे 'राष्ट्रवाद' की परिभाषा पर खड़ा करना चाहिए जिसमें देश का हर नागरिक बराबरी के साथ शामिल नहीं होता.
'राष्ट्रवाद' का सिनेमाई उत्सवगान
“यह दीप अकेला स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता पर, इसको भी पंक्ति दे दो” – अज्ञेय
बीते महीने में हमारे देश के सार्वजनिक पटल पर हुई विविधरंगी प्रदर्शनकारी गतिविधियों ने फिर मुझे यह याद दिलाया है कि आज भी अपने मुल्क में सबसे ज्यादा बिकने वाला विचार, ‘राष्ट्रवाद’ का विचार है. और जैसा किसी भी ‘कल्पित समुदाय’ के निर्माण में होता है, उस दौर के लोकप्रिय जनमाध्यम का अध्ययन इस ‘राष्ट्रीय भावना’ के निर्माण को बड़े दिलचस्प अंदाज में आपके सामने रखता है. मजेदार बात यह है कि नवस्वतंत्र मुल्क में जब हमारा समाज इस विचार को अपने भीतर गहरे आत्मसात कर रहा था, सिनेमा एक अनिवार्य उपस्थिति की तरह वहां मौजूद रहा. यही वो दौर है जिसे हिंदी सिनेमा के ‘सुनहरे दौर’ के तौर पर भी याद किया जाता है. पारिवारिक और सामुदायिक पहचानों में अपने को तलाशते और चिह्नित करते नवस्वतंत्र मुल्क की जनता को ‘राष्ट्र-राज्य’ की वैधता और आधिपत्य का पाठ पढ़ाने का काम हमारा लोकप्रिय सिनेमा करता है. और प्रक्रिया में वह दो ऐसे काम करता है, जिन्हें समझना ‘आधुनिकता’ के भारतीय मॉडल (जिसे आप सुविधा के लिए ‘नेहरुवियन आधुनिकता’ भी कह सकते हैं) को समझने के लिए कुंजी सरीखा है. पहला तो यह कि वह व्यक्ति की पुरानी वफादारियों (पढ़ें समुदाय, परिवार) के ऊपर राज्य की सत्ता को स्थापित करने के लिए पूर्व सत्ता को विस्थापित नहीं करता, बल्कि उन पुरानी वफादारियों को ही वह ‘राष्ट्र’ के रूपक में बदल देता है. इससे सहज ही और बिना किसी मौलिक परिवर्तन के इस नवनिर्मित ‘राष्ट्र-राज्य’ की सत्ता को वैधता मिल जाती है. इसे उदाहरण के माध्यम से समझें. सुमिता चक्रवर्ती लोकप्रिय हिंदी सिनेमा पर अपने सर्वप्रथम अकादमिक कार्य में दो आइकॉनिक हिंदी फिल्मों को इस संदर्भ में व्याख्यायित करती हैं. सबसे पहले याद आती है, महबूब खान की अविस्मरणीय ‘मदर इंडिया’ जहां मां – देवी मां और भारत मां के बीच की सारी रेखाएं मिट जाती हैं. सुमिता चक्रवर्ती लिखती हैं, “एक विचार के तौर पर मदर इंडिया हिंदुस्तान के कई हिस्सों में पूजी जाने वाली ‘देवी मां’ के कल्ट से उधार लिया गया है.” वे आगे लिखती हैं, “यह रस्मी गौरवगान समाज में होने वाले स्त्री के सामाजिक शोषण और उसकी गैर-बराबर सामाजिक हैसियत के साथ-साथ चलता है. लेकिन हिंदुस्तानी समाज में एक ‘मां’ के रूप में स्त्री की छवि सिर्फ एक ‘स्त्री’ भर होने से कहीं ऊंची है.” यहां हिंदुस्तानी समाज में पहले से मौजूद एक धार्मिक प्रतीक को फिल्म बखूबी राष्ट्रीय प्रतीक से बदल देती है. यह संयोग नहीं है कि फिल्म की शुरुआत इन ‘भारत माता’ द्वारा एक बांध के उदघाटन से दृश्य से होती है. वैसा ही एक बांध, जिसे जवाहरलाल नेहरू ने ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था. वैसा ही एक बांध जैसे बीते साठ सालों में लाखों लोगों की समूची दुनियाओं को ‘विकास’ के नाम पर अपने पेटे में निगलते गये हैं.
‘विकास’ के नेहरुवियन मॉडल की पैरवी करती फिल्म 'मदर इंडिया' अंत तक पहुंचते हुए एक ऐसी व्यवस्था की पैरवी में खड़ी हो जाती है, जहां ‘बिरजू’ जैसी अनियंत्रित (लेकिन मूल रूप से असहमत) आवाजों के लिए कोई जगह नहीं.
ऐसा ही एक और मजेदार उदाहरण है राज कपूर की ‘आवारा’. यह राज्य की सत्ता के सबसे चाक्षुष हिस्से – कानून व्यवस्था, को परिवार के मुखिया पुरुष पर आरोपित कर देती है और इस तरह पारिवारिक वफादारी की चौहद्दी में रहते हुए भी व्यक्ति को राज्य-सत्ता की वैधता के स्वीकार का एक आसान या कहें जाना-पहचाना तरीका सुझाती है. ‘आवारा’ के संदर्भ में बात करते हुए सुमिता चक्रवर्ती लिखती हैं, “हिंदी सिनेमा देखने वाली जनता एक नये आजाद हुए मुल्‍क की नागरिक भी थी और यह जनता एक नागरिक के रूप में अपने परिवार और समुदाय की पारंपरिक चौहद्दियों से आगे अपने उत्तरदायित्व समझने में कहीं परेशानी महसूस कर रही थी. नये संदभों में उन्हें मौजूद मुश्किल परिस्थितियों को भी समझना था और बदलाव और सुधार का वादा भी ध्यान रखना था. यह वादा अब नयी एजेंसियों द्वारा किया जा रहा था और यह एजेंसियां थीं राज्य-सत्ता और उसकी अधिकार प्रणाली. क्योंकि ‘कानून-व्यवस्था’ आम जनमानस में राज्य की सत्ता का सबसे लोकप्रिय प्रतीक है, इसलिए हिंदी सिनेमा में एक आम नागरिक के जीवन में राज्य की भूमिका दिखाने का यह सबसे माकूल प्रतीक बन गया.” फिल्म ‘आवारा’ में जज रघुनाथ की भूमिका में कानून-व्यवस्था के प्रतीक बने पृथ्वीराज कपूर न सिर्फ फिल्म में कानून के दूसरी तरफ खड़े नायक राज (राज कपूर) के जैविक पिता हैं, बल्कि असल जीवन में भी वह राज कपूर के पिता हैं. ऐसे में इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पहले से तय सोपान और अधिकार श्रृंखला में बिना किसी छेड़छाड़ के यह फिल्म नवनिर्मित ‘राष्ट्र-राज्य’ की कानून-व्यवस्था की वैधता की स्थापना आम जनमानस में करती है. दूसरा यह कि इस ‘सार्वभौम राष्ट्रीय पहचान’ की तलाश में वह तमाम इतर पहचानों को अनुकूलित भी करता चलता है. हिंदी सिनेमा के शुरुआती सालों में ‘जाति’ के सवाल सिनेमाई अनुभव का हिस्सा बनते हैं लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते जाते हैं, हमारा सिनेमा ऐसे सवाल पूछना कम करता जाता है. हमारे नायक-नायिकाओं के पीछे से इसी ‘सार्वभौम पहचान’ के नाम पर उनकी जातिगत पहचानें गायब होती जाती हैं. इस ‘राष्ट्रवाद’ का एक दमनकारी चेहरा भी है. साल 1954 में बनी ‘जागृति’ जैसी फिल्म, जिसे ‘बच्चों की फिल्म’ कहकर आज भी देखा-दिखाया जाता है, में ‘शक्ति’ की मौत जैसे अजय के ‘शुद्धिकरण’ की प्रक्रिया में आखिरी आहूति सरीखी है. शक्ति की मौत अजय को एकदम ‘बदल’ देती है. अब वह एक ‘आदर्श विद्यार्थी’ है. किताबों में डूबा हुआ. आखिर ‘शक्ति’ की मौत ने अजय को अपने देश और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारियों का अहसास करवा ही दिया! और फिर ऊपर से ‘शेखर’ जैसे अध्यापक दृश्य में मौजूद हैं, जो फिल्म के अंत तक आते-आते एकदम नियंत्रणकारी भूमिका में आ जाते हैं. यहां भी फिल्म तमाम ‘अन्य पहचानों’ का मुख्यधारा के पक्ष में बड़ी सफाई से अनुकूलन कर देती है. इस समूचे प्रसंग को एक प्रतीक रूप में देखें तो बड़ी क्रूर छवि उभरकर हमारे सामने आती है. सुमिता चक्रवर्ती फिल्म ‘जागृति’ पर टिप्पणी करते हुए लिखती हैं, “यहां कमजोर की कुर्बानी दी जाती है, जिससे बलशाली आगे जिये और अपनी शक्ति को पहचाने. ‘शक्ति’ न सिर्फ शारिरिक रूप से कमजोर है, गरीब और दया के पात्र की तरह दिखाया गया है. उसे साथी बच्चों द्वारा उसकी शारीरिक अक्षमता के लिए चिढ़ाया जाता है. लेकिन वह सुशील और उच्च नैतिकता वाला बच्चा है, जिसे फिल्म अपने पवित्र विचारों के प्रगटीकरण के लिए एक माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करती है. लेकिन उसे मरना होगा (दोस्ती की खातिर) उस मिथ को जिलाये रखने के लिए. एकीकृत जनता का मिथ.” अगर लोकप्रिय सिनेमा के ढांचे पर इस राष्ट्रवादी बिंब को आरोपित कर देखें, तो यह अनुकूलन बहुत दूर तक जाता है. मुख्य नायक हमेशा एक ‘सार्वभौम राष्ट्रीय पहचान’ लिये होता है (जो आमतौर पर शहरी-उच्चवर्ण-हिंदू-पुरुष की होती है) और उसके दोस्त या मददगार के रूप में आप किसी अन्य धार्मिक या सामाजिक पहचान वाले व्यक्ति को पाते हैं.
‘जंजीर’ में ईमानदार नायक ‘विजय’ की सहायता के लिए ‘शेर खान’ मौजूद रहता है और ‘लक्ष्य’ में नायक ‘करण शेरगिल’ की सहायता के लिए ‘जलाल अकबर’. फिल्म ‘तेजाब’ में तड़ीपार नायक ‘मुन्ना’ को वापस ‘महेश देशमुख’ की पहचान दिलाने की लड़ाई में ‘बब्बन’ जैसे इतर पहचान वाले दोस्त ‘कुर्बान’ हो जाते हैं, और ‘लगान’ के राष्ट्रवादी उफान में ‘इस्माइल’ से लेकर ‘कचरा’ की भूमिका हमेशा मुख्य नायक ‘भुवन’ (उच्चवर्ण हिंदू) के सहायक की ही रहती है.
एक तय प्रक्रिया के तहत सिनेमा का यह राष्ट्रवादी विमर्श तमाम ‘इतर’ पहचानों को सहायक भूमिकाओं में चिह्नित करता जाता है और हमें इससे कोई परेशानी नहीं होती. और फिर एक दिन अचानक हम ‘गदर’ या ‘ए वेडनसडे’ जैसी फिल्म को देख चौंक जाते हैं. क्यों? क्या जिस अनुकूलन की प्रक्रिया का हिंदी सिनेमा इतने सालों से पालन करता आया है, उसकी स्वाभाविक परिणिति यही नहीं थी? हम ऐसा सिनेमाई राष्ट्रवाद गढ़ते हैं, जिसमें तमाम अल्पसंख्यक पहचानें या तो सहायक भूमिकाओं में ढकेल दी जाती हैं या वह मुख्य नायक के कर्मपथ पर कहीं ‘कुर्बान’ हो जाती हैं. क्या यह पूर्व तैयारी नहीं है ‘गदर’ जैसी फिल्म की, जो अन्य धार्मिक पहचान को सीधे तौर पर खलनायक के रूप में चिह्नित करती है? ‘ए वेडनसडे’ जैसी फिल्म, जिसे इस बहुचर्चित छद्मवाक्य, “सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं होते, लेकिन सारे आतंकवादी मुसलमान होते हैं” के प्रमाण-पत्र के रूप में पढ़ा जा सकता है, क्या उन फिल्मों का स्वाभाविक अगला चरण नहीं है जिनमें मुसलमान चरित्र हमेशा दोयम दर्जे की सहायक भूमिका पाने को अभिशप्त हैं? और सवाल केवल धार्मिक पहचान का ही नहीं. मैंने एक और लेख में ‘हिंदी सिनेमा में प्रेम’ पर लिखते हुए यह सवाल उठाया था कि क्या ‘शोले’ में जय और राधा की प्रेम-कहानी का अधूरा रह जाना एक संयोग भर था? क्या यह पहले से ही तय नहीं था कि जय को आखिर मरना ही है.
और फर्ज करें कि अगर ‘शोले’ में यह प्रेम-कहानी, जो सामाजिक मान्यताओं के ढांचे को हिलाती है, पूर्णता को प्राप्त होती तो क्या तब भी ‘शोले’ हमारे सिनेमाई इतिहास की सबसे लोकप्रिय फिल्म बन पाती? यह सवाल मैं यहां इसीलिए जोड़ रहा हूं क्योंकि एक विधवा से शादी करने के फैसले के साथ खुद ‘जय’ भी एक अल्पसंख्यक पहचान से खुद को जोड़ता है. और उसका भी वही क्रूर अंजाम होता है, जिसकी परिणति आगे जाकर ‘राष्ट्रवादी अतिवाद’ में होती है.
चाहें तो ‘राष्ट्रवाद’ का यह अतिवादी चेहरा देखने के लिए हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर लेखक जोड़ी सलीम-जावेद की लिखी ‘क्रांति’ तक आएं, जहां एक अधपगली दिखती स्त्री की ओर इशारा कर नायक मनोज ‘भारत’ कुमार कहता है कि यह अभागी अपने पति के साथ सती हो जाना चाहती थी, इन जालिम अंगेजों ने वो भी न होने दिया. इन्हें भारतीय आधुनिकता के मॉडल के ‘शॉर्टकट’ कहें या ‘षड्यंत्र’, सच यही है कि इन्हीं चोर रास्तों में कहीं उन तमाम अतिवादी विचारों के बीज छिपे हैं, जिन्हें भारत ने बीते सालों में अनेक बार रूप बदल-बदल कर आते देखा है. जब हम पारिवारिक सत्ता के और धार्मिक मिथकों में ‘राष्ट्र-राज्य’ की सत्ता के बिंब को मिलाकर परोस रहे थे, उस वक्त हमने यह क्यों नहीं सोचा कि आगे कोई इस प्रक्रिया को उल्टी तरफ से भी पढ़ सकता है? और ऐसे में ‘राष्ट्र-राज्य’ और उसकी सत्ता किसी खास बहुसंख्यक पहचान के साथ जोड़ कर देखी जाएगी और लोग इसे स्वाभाविक मानकर स्वीकार कर लेंगे? आज ऐसा होते देखकर हम भले ही कितना बैचैन हों और हाथ-पांव मारें. सच्चाई यही है कि यह हमारी ‘आधुनिकता’ और ‘राष्ट्रवाद’ के मॉडल की स्वाभाविक परिणिति है.

और अंत में : कुछ अपनी बात, गांधी की बात

बीते दिनों में महात्मा गांधी का नाम लौट-लौटकर संदर्भों में आता रहा. लेकिन यह जिक्र तमाम संदर्भों से गायब है कि आज भारतीय राष्ट्रवाद के पितृपुरुष घोषित किये जा रहे इस व्यक्ति को जीवन के अंतिम दिनों में इसी नवस्वतंत्र देश ने नितांत अकेला छोड़ दिया था. गांधी द्वारा उठाये जा रहे असुविधाजनक सवाल इस नवस्वतंत्र मुल्क के राष्ट्रवादी विजयरथ की राह में बाधा की तरह थे. राष्ट्र उत्सवगान में व्यस्त है, संशयवादियों के लिए उसके पास समय नहीं. जिस गांधी के नैतिक इच्छाशक्ति पर आधारित फैसलों के पीछे पूरा मुल्क आंख मूंदकर खड़ा हो जाता था, आज उसे संशय में पाकर वही मुल्क उसे कठघरे में खड़ा करता था. ठीक उस वक्त जब यह नवस्वतंत्र देश ‘नियति से साक्षात्कार’ कर रहा था, महात्मा सुदूर पूर्व में कहीं अकेले थे. अपनी नैतिकताओं के साथ, अपनी असफलताओं के साथ. सुधीर चंद्र गांधी पर अपनी नयी किताब में उस वक्त कांग्रेस के सभापति आचार्य कृपलानी के वक्तव्य, “आज गांधी खुद अंधेरे में भटक रहे हैं” को उद्धृत करते हुए एक वाजिब सवाल उठाते हैं, “कृपलानी के कहे को लेकर बड़ी बहस की गुंजाइश है. पूछा जा सकता है कि 1920 में, असहयोग आंदोलन के समय और उसके बाद क्या लोगों को गांधी की अहिंसा के कारगर होने के बारे में शक नहीं होता रहता था? कितनी बार उन तीस सालों के दौरान संकटों का सामना होने पर गांधी लंबी अनिश्चितता और आत्म संशय से गुजरने के बाद ही उपयुक्त तरीके को तलाश कर पाये थे? वैसे ही जैसे कि इस वक्त, जब कृपलानी और कांग्रेस और देश गांधी को अकेला छोड़ने पर आमादा थे.” सवाल वाजिब है. लेकिन एक बड़ा अंतर है, जो गांधी के पूर्ववर्ती अहिंसक आंदोलनों और उपवास को इस अंतिम दौर से अलगाता है. राष्ट्रवाद की जिस उद्दाम धारा पर गांधी के पूर्ववर्ती आंदोलन सवार रहे और अपार जनसमर्थन जिनके पीछे शामिल था, वह इन अंतिम दिनों में छिटक कर कहीं दूर निकल गयी थी. कभी यही ‘राष्ट्रवाद‘ उनका हथियार बना था. यह राष्ट्रवाद और अखंडता का ’पवित्र मूल्य‘ ही था, जिसके सहारे गांधी अंबेडकर से एक नाजायज बहस में ’जीते‘ थे. गांधी के आभामय व्यक्तित्त्व के आगे यह तथ्य अदृश्य रहा, लेकिन जब देश के सामने चुनने की बारी आयी, तो उसने ’राष्ट्र‘ के सामने ’राष्ट्रपिता‘ को भी पार्श्व में ढकेल दिया. कड़वा है लेकिन सच है, अपने देश के अतिवादी राष्ट्रवाद की पहली बलि खुद ’राष्ट्रपिता’ थे. ‘राष्ट्रवाद’ अपने आप में कोई इकहरा विचार नहीं. इसलिए सरलीकरण का खतरा उठाते हुए कह रहा हूं कि ‘राष्ट्रवाद’ आधुनिक दौर की सबसे वर्चस्ववादी और सर्वग्राह्य विचारधारा है. इसके आगे किसी और की नहीं चलती. यह सिद्धांतत: ‘ब्लैक होल’ की तरह है, किसी भी व्यक्ति / विचार / असहमति को समूचा निगलने में सक्षम. समझ आता है कि क्यों ओरहान पामुक पिछली हिंदुस्तान यात्रा में साहित्य के बारे में बात करते हुए कह गये थे, “साहित्य मानवता की अभिव्यक्ति है. लेकिन हमें समझना होगा कि मानवता और राष्ट्रवादी मानवता दो अलग-अलग चीजें हैं.”
(ये आर्टिकल अन्ना आंदोलन के समय लिखा गया था. सबसे पहले कथादेश में छपा, फिलहाल मिहिर पंड्या की वेबसाइट से लिया गया है. कहना न होगा कि साभार है.)

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