गलत फिल्म 'रॉय' का यह गाना सही है यार. बालकों को खासतौर पर पसंद आया. मुझे भी धुनअच्छी लगी. सुर भी. कुछ टुकड़े अटक गए. इतने कि ‘मैं तुम हम’ जैसे मोमेंट्स की जीभबिराती क्यूटत्व का जतन करती एक स्वयंक्लिक फोटो फेसबुक पर शेयर की, तो कैप्शन मेंयही लिखा. रिकवेस्टां पाइयां वे. फिर इस गाने को लूप में डालकर खूब सुना. सुना तोअखरने लगा. घामड़ गाना है. निहायत ही पोंगापंथी. स्त्रीविरोधी. अब इसे खब्त कह सकतेहैं. पर है तो है. आइए देखें जरा. https://www.youtube.com/watch?v=zpsVpnvFfZQनायिका पेशे से ब्रिटेन की एक फिल्म डायरेक्टर है. शूट करने के लिए मलेशिया आई है.फिलहाल एक कैफे में बैठी है. यानी आज की नारी है. आर्थिक रूप से स्वावलंबी. चूंकिमैंने फिल्म देखी है, इसलिए यह भी बता देता हूं कि नायिका स्वाभिमानी भी है. मगरफिर उसे इश्क सा कुछ हो जाता है. और तब उसके भीतर का सारा ओज अभिसार के फेर में बहजाता है. लड़की का इसरार क्या है. हे पिया, मेरे लिए गोल्डन झुमके ले आओ. उन्हेंमैं चूमकर कान में पहन लूं. हे पिया, मुझे शॉपिंग करवाओ. प्यार मुहब्बत वाली फिल्मदिखाओ. और ये सब तुम क्यों करो. क्योंकि जी मेरी कलाइयां गोरी हैं. गोरी भी नहीं.और आगे बढ़कर अगली लाइन में कलाइयों के व्हाइट होने की दुहाई दी जाती है. और फिरकिलर गिराया जाता है. तेरे हिस्से आइयां वे. हमें लगता है कि हॉट पैंट्स पहनी हुईनायिका हर मायने में एक सशक्त महिला होगी. लेकिन यह भ्रम बुरी तरह टूटता है जब वहकहती है, 'रिक्वेस्टां पाइयां वे.' शॉपिंग कराने के लिए वह पुरुष पर आश्रित है औरइसके लिए बाकायदा दरख्वास्त मोड में है.स्त्री की पुरुष पर निर्भरता का यहउत्तर-आधुनिक रूप ही तो है. अर्थात हे पुरुष. ये संपूर्ण चराचर जिसकी कामना करताहै. वह तेरे प्रारब्ध का हिस्सा है. पर उसके लिए तुझे नायिका को खरीदारी करवानीहोगी. नायक भी रैप करते हुए अपने कोमल उदगार उगल ही देता है. वह अपनी कुंठा कामनाको यूं प्रकट करता है. व्हाइट कलाइयां ड्राइव्स मी क्रेजी. और फिर कुछ कुछ लंतरानी.नायिका अब और भी हुलस जाती है. उसे सिर्फ शॉपिंग और फिल्म की ही तमन्ना नहीं है. अबउसे गुलाबी चुन्नी भी चाहिए. और कलरफुल चूड़ी भी. क्यों चाहिए. उसकी मर्जी.व्यक्तिगत तौर पर मुझे लड़कियों को सिर्फ गुलाबी रंग से बांधने से ऐतराज है. होसकता है कि गुलाबी रंगत के कुछ ऐतिहासिक कारण रहे हों. मगर उनकी पड़ताल तो अब होतीनहीं. ये मान लिया जाता है बाई डिफॉल्ट कि लड़की है तो उसे पिंक ही पसंद आएगा. याकहें कि करवाया जाएगा. कभी किसी बच्चे के लिए फ्रॉक खरीदने जाइए. मुंह से निकलानहीं कि लड़की है और सेल्समैन मार पिंक पिंक आपको पका देगा. पर ठीक है, यहां नायिकाकी मर्जी है. कि उसे गुलाबी चुन्नी दिलवाई जाए. मुझे रंग पर नहीं मांगने पर आपत्तिहै. नायिका पढ़े. नौकरी करे. अपने पैसे से जमकर शॉपिंग करे. गाए. मैंने गुलाबीचुन्नी ले ली. कलरफुल चूड़ी ले ली. खूब सारी शॉपिंग कर ली. और फिर कहे. ए लड़के.मेरे साथ फिल्म देखने चलेगा क्या. मतलब दो ढाई दशक में हम इतना तो आगे आ ही गए हैंन सोच, समझ और जमीनी मामले में. भरपूर मेहनत के साथ. अब नया जमाना है. नायिका क्योंचूड़ी के लिए नायक से इसरार करे. ज्यादातर नायक एसी कमरों में कंप्यूटर के सामनेगुलामी करते हैं. फिर ब्रेक के दौरान बर्गर खाकर बस एक मिनट के लिए बाहर निकलतेहैं. चिट्टियां कलाइयां सुनते ही गोरी है कलाइयां याद आता है. फिल्म आज का अर्जुनका गाना. यहां भी नायिका गांव के सेटअप में नायक को लुभा रही है. कह रही है कि गोरीहै कलाइयां, तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियां. अपना बना लूं तुझे बालमा. आप कह सकतेहैं कि नब्बे का मनमोहनी समां तब नहीं बंधा था. नायिका खेत में खाना ले जाती थी. घरसंभालती थी. मगर फसल बेचने मरद ही जाता था. उसके हिस्से बच्चे, कपड़े लत्ते और जेवरआते थे. कैश नहीं. तो उसका कहना बनता था कि मुझे चूड़ियां ला दो. और तब हीरो के पासगिफ्ट के ऐसे विकल्प भी नहीं थे कि देख मैं तुझे कित्ता प्यार करता हूं. पूरे दोजीबी का नैटपैक डलवा दिया तेरे फोन में.https://www.youtube.com/watch?v=93F29mFIFWc बात चूड़ी की नहीं है. यहां नायक कुछठोस बात करता है. सबसे पहले तो गोरेपन की महानता का निषेध करता हुआ कहता है कि गोरीहो कलाई. चाहे काली हो कलाई. जो भी चूड़ी पहनाए फंस जाए. मतलब नायक कुछ प्रगतिशीलहै. खलरिया के कलर पर नहीं अटकता. शायद तब तक गांव में फेयर एंड लवली को बाजार नजरनहीं आया था. या फिर थोक के भाव एमबीए पढ़कर निकले लौंडे कोलगेट और लाइफबॉय केबाजार में सेंध लगाने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की फिसलपट्टी पर सवारहो इस नए अनदुहे स्वर्ग में नहीं उतरे थे. पर आगे नायक नालायक फंस जाए की बात क्योंकरता है. उसका मतलब क्या है जी. कि आदमी औरत के हुस्न में फंस जाता है. जैसे न फंसेतो मंगल पर कमंडल लेकर चढ़ जाए एक सांस में. पर ठहरिए, विमर्श इसके बाद है. गानेमें चूड़ी के बाद नायक अर्थ की यानी असल मुद्दे की बात करता है. वह कहता है कि हरीहरी चूड़ियों की देखे हरियाली, भीमा की न खेती सूख जाए. तो मतलब पहले खेत की, खरीदकी चिंता. तब ये सब रायता फैलाया जाए. अब नया जमाना है. नायिका क्यों चूड़ी के लिएनायक से इसरार करे. ज्यादातर नायक वैसे भी खेत छोड़ आए हैं. अब वे जेठ के महीने मेंगेंहू की कटाई की चिंता में पसीना नहीं बहाते. एसी कमरों में कंप्यूटर के सामनेगुलामी करते हैं. फिर ब्रेक के दौरान उसी गेंहू के बने रिफाइन्ड अवतार से बने बर्गरखाकर बस एक मिनट के लिए बाहर निकलते हैं. उस ठंडे निर्वात से. और कहते हैं. इट्स सोहॉट. नायिका मर्दों की चेरी नहीं रह गई है. उसने घाघरा उतार हॉट पैंट चढ़ा लिए हैं.उसकी मर्जी. जो कपड़े पहने. मगर यूं नायक से चिज्जू मांगना अखर गया कसम से. येलोफड़ाई और प्रलोभन वाला काम तो नब्बे का सलमान करता था. जब वह गाता था. चलती हैक्या नौ से बारह. वह सज्जनता का स्वांग नहीं करता. साफ कर देता है कि शो रात का है,टिकटें दो हैं और चिपक कर बैठूंगा मैं.https://www.youtube.com/watch?v=qeOfhT44XWg इसे कविता को गद्य में बदलते देखतेहैं हम फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में. नायक डॉन बन गया है. मगर देखने में चिमरखी हीहै. नायिका माधुरी का कस्बाई वर्जन है. भरो मांग मेरी भरो देखकर कसमसाती. नायकनब्बे फीसदी मर्दों की तरह गाइडेड हीट सेंसिंग मिसाइल सा बना हुआ है. क्लीवेज देखनेको आतुर व्याकुल. और तब नायिका पूछती है किताब की दुकान के बार रोमांस करते हुए.करण अर्जुन देखने जाने से पहले. सटकर बैठोगे, गोद में पॉपकॉर्न ढूंढोंगे. नायकबेचारा हड़काई के डर से न न कहता है. और तब नायिका कहती है कि जब ये सब नहीं करनातो अपनी अम्मा के साथ ही देखो न जाकर. https://www.youtube.com/watch?v=eiGFCOw2qTMखैर. नायिका बदल रही थी ये तो मुझ नायक को पता था. गानों ने भी देर सवेर इसकी साखीदे ही दी. याद करें. लक्ष्य फिल्म का वह सीन. नायक सीधे सीधे कह देता है कि हम साथहैं और हमें साथ होना चाहिए. नायिका गुस्सा जाती है. अरे, ऐसे कैसे सीधे फच्च सेमुंह पर दे मारा. अदा से कहो. और ये सुनते ही नायक चिबिल्ला मटकने फटकने लगता है.अगर मैं कहूं मुझे तुमसे मुहब्बत है. नायिका इस भोले भंडारी को समझाती है कि इस बातको और सजा के कहते, घुमा फिराके कहते तो अच्छा होता...https://www.youtube.com/watch?v=30tnmyzgRSI मगर दशक बीतते न बीतते नायिका को येढंग बोर करने लगता है. अब उसे सीधी बात वाला लड़का चाहिए. ये तू फूल मैं भंवरा टाइपरूपकों की दुकान का स्टॉल नहीं सजवाना उसे. तो नायक जब पिछले सबक के वशीभूत पुरखोंको प्रणाम करते हुए घुमाकर इश्क का इजहार करता है तो नायिका डपट देती है. सीधेप्वाइंट पर आने का फरमान सुनाती है. कसम से, उस वक्त शमशेर बहादुर की कविता ‘टूटीहुई बिखरी हुई’ की वो लाइन याद आ जाती है. उसके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ाप्रेम है. https://www.youtube.com/watch?v=Cc_cNEjAh_Y