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चीन के नए तटरक्षक कानून से दक्षिण एशिया में क्या बदलने वाला है?

इस नए कानून से अमेरिका एशिया में आकर चीन से लड़ेगा?

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28 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 28 जनवरी 2021, 04:07 PM IST)
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चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग. (तस्वीर: एपी)
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हमारा पड़ोसी चीन एक नया क़ानून लाया है. इसके मार्फ़त चीन ने ख़ुद को ये अधिकार दिया है कि वो चाहे, तो अपने पड़ोसियों को उनके अपने ही इलाके में घुसने से रोक दे. अब कोई भी संप्रभु देश चीन के कहने पर अपना इलाका तो नहीं छोड़ेगा. ऐसे में चीन ने ख़ुद को पड़ोसियों पर हिंसा करने, उनकी संपत्ति में आग लगाने और उनपर गोली चलाने का भी अधिकार दे दिया है. ये क्या मामला है. इसका असर क्या होगा. विस्तार से बताते हैं आपको.
आज शुरुआत करते हैं 2013 के एक घटनाक्रम से. इस बरस चीन ने दो सुधार योजनाएं पास कीं. एक, स्टेट इंस्टिट्यूशनल रिफॉर्म. दूसरा, फंक्शनल ट्रांसफ़ॉर्मेशन प्लान. इन दोनों योजनाओं के द्वारा चीन ने अपनी लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियों के ढांचे में एक बड़ा बदलाव किया. पहले वहां समंदर की सुरक्षा के लिए कई अलग-अलग नागरिक सुरक्षा एजेंसियां थीं. इनमें प्रमुख तीन एजेंसियां थीं- चाइना मरीन सर्विलांस, चाइना फिशरीज़ लॉ एनफोर्समेंट और मैरिटाइम ऐंटी-स्मगलिंग यूनिट्स. इन सारी एजेंसियों को पहले से मौजूद CCG, यानी चाइना कोस्टगार्ड में मिला दिया गया.
कोस्टगार्ड क्या होता है?
इसका हिंदी नाम है, तटरक्षा. इसका काम है, समंदर में पुलिसिंग करना. आपको याद है, दूरदर्शन पर एक सीरियल आता था- सी हॉक्स. उसमें इंडियन कोस्टगार्ड्स की ही कहानी थी. चलिए, अब आगे बढ़ने से पहले एक बार चाइना कोस्टगार्ड की इस रीस्ट्रक्चरिंग का मकसद समझ लेते हैं. देखिए, चीन की पश्चिम दिशा पूरी तरह से समंदर के किनारे बसी है. इस समुद्री हिस्से के तीन मुख्य भाग हैं- साउथ चाइना सी, ईस्ट चाइना सी और येलो सी.
South China Sea East China Sea Yellow Sea
चीन के पश्चिम में साउथ चाइना सी, ईस्ट चाइना सी और येलो सी. (तस्वीर: गूगल मैप्स)

ये सभी हिस्से उत्तरी प्रशांत महासागर के अंतर्गत आते हैं. इन तीन में से दो के नाम में चीन जुड़ा है. मगर इसका ये मतलब कतई नहीं कि ये समंदर अकेले चीन की जागीर हो. जापान, ताइवान, इंडोनेशिया, वियतनाम, मलयेशिया, सिंगापोर, फिलिपीन्स और ब्रुनेई, इन सभी देशों की हिस्सेदारी है यहां. दिक्कत ये है कि चीन करीब-करीब ये समूचा इलाका हड़पना चाहता है. वो अपने पड़ोसियों के संप्रभु हिस्सों को भी अपना बताता है.
जब आप किसी और की चीज हड़पेंगे, तो झगड़ा होगा ही. इसी झगड़े को जोर-ज़बर्दस्ती से जीतने की मंशा से चीन ने समुद्रीय इलाके की सुरक्षा बढ़ाने की सोची. इसी के तहत कोस्टगार्ड को ज़्यादा पावरफुल बनाने की ज़रूरत समझी गई. इसी का नतीजा थी, 2013 में हुई रीस्ट्रक्चरिंग. ताकि कई छोटी-छोटी एजेंसियां अलग-अलग काम करने की जगह एकजुट होकर फंक्शन करें. मगर अब भी एक बड़ी कमी छूट गई थी.
People's Armed Police China
चीन की पीपल्स आर्म्ड पुलिस. (तस्वीर: एपी)

क्या थी कमी?
आमतौर पर कोस्टगार्ड रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आता है. मगर चीन ने 2013 में इसे 'पब्लिक सुरक्षा मंत्रालय' से 'मिनिस्ट्री ऑफ़ लैंड ऐंड रिसोर्सेज़' में ट्रांसफ़र कर दिया. यानी अब भी कोस्टगार्ड रक्षा विभाग में नहीं था. इस वजह से मिलिटरी को कोस्टगार्ड के साथ कॉर्डिनेट करने में दिक्कत होती थी. इस दिक्कत का हल निकाला गया 2018 में. इस बरस फिर से एक बड़ा बदलाव हुआ. कोस्टगार्ड का कमांड अब PAP, यानी 'पीपल्स आर्म्ड पुलिस' नाम के विभाग को सौंप दिया गया.
ये PAP क्या है? ये है एक पैरामिलिटरी फोर्स. ये वही फोर्स है, जिसने जून 1989 में टियाननमन स्क्वैयर नरसंहार को अंजाम दिया था. PAP चीन की तीन सबसे मुख्य आर्म्ड फोर्सेज़ में से एक है. ये सीधे चाइना की सुप्रीम सैन्य बॉडी CMC, यानी सेंट्रल मिलिटरी कमीशन को रिपोर्ट करता है. और CMC का रिपोर्टिंग मैनेज़र कौन है? ख़ुद चेयरमैन शी चिनफिंग.
Tiananmen Square
पीपल्स आर्म्ड पुलिस वही फोर्स है, जिसने जून 1989 में टियाननमन स्क्वैयर नरसंहार को अंजाम दिया था (तस्वीर: एएफपी)

तो 2018 में उस आख़िरी बड़े फेरबदल का नतीजा क्या हुआ?
आज की तारीख़ में चाइना के पास दुनिया की सबसे बड़ी कोस्टगार्ड फोर्स है. उसके पास अपने किसी भी पड़ोसी से ज़्यादा ज़हाज़ हैं. मसलन, चाइनीज़ कोस्टगार्ड के पास 500 से ज़्यादा जहाज़ हैं. वहीं जापान के पास 373 जहाज़, ताइवान के पास 161, फिलिपीन्स के पास 86 और इंडोनेशिया के पास महज 41 जहाज़ हैं. इन सारे देशों का चीन के साथ समुद्री विवाद है.
ऐसा नहीं कि चीन केवल संख्या में ही आगे हो. उसके कोस्टगार्ड शिप्स अपनी स्ट्रेन्थ में भी औरों पर भारी हैं. आमतौर पर कोस्टगार्ड्स के पास छोटे जहाज़ होते हैं. मगर चाइनीज़ कोस्टगार्ड्स के पास वॉरशिप जैसे जहाज़ हैं. इतने बड़े कि इनके आगे पड़ोसी देशों के सबसे बड़े वॉरशिप भी बौने लगते हैं.
अब समझिए इस ताकत बढ़ाने का असली खेल
चाइनीज़ कोस्टगार्ड केवल चीन की समुद्रीय सीमा में पेट्रोलिंग नहीं करते. वो करते हैं शक्ति प्रदर्शन. सारांश समझिए, तो ये कोस्टगार्ड चीन की बुलिइंग पॉलिसी का औज़ार है. इस आरोप का आधार समझाने के लिए CCG की तीन गतिविधियां बताते हैं आपको.
1. पहली घटना दिसंबर 2019 की है. इस महीने चाइनीज़ नेवी ने वियतनाम के समुद्री क्षेत्र में एक सर्वे जहाज़ भेजा. इस जहाज़ की रखवाली में CCG का भी एक बड़ा दस्ता साथ भेजा गया. CCG के जहाज़ों ने समंदर का रास्ता इस कदर ब्लॉक कर दिया कि वियतनामी कोस्टगार्ड अपने ही इलाके में नहीं घुस पाए.
2. दूसरी घटना जनवरी 2020 की है. साल के पहले दिन चीन के कुछ मछली पकड़ने वाले जहाज़ इंडोनेशिया के एक्सक्लूज़िव इकॉनमिक ज़ोन में घुस गए. उन्होंने ग़ैरक़ानूनी तरीके से वहां मछलियां पकड़ीं. इस पूरी गतिविधि में चीनी फिशिंग बोट्स की रखवाली कर रहा था CCG.
3. तीसरी घटना नवंबर 2020 की है. इस महीने मलयेशिया अपने इलाके में समंदर की तलछटी से तेल और कच्चा गैस निकाल रहा था. CCG अपने दस्ते के साथ वहां पहुंचा. उसने मलयेशियन टीम को धमकाकर काम बंद करवा दिया.
ये तीन घटनाएं अपवाद नहीं हैं. CCG पूरे टाइम ऐसी ही दादागिरी करता है. मसलन, अप्रैल 2020 में उसने वियतनाम के समुद्री क्षेत्र में घुसकर उसके मछली पकड़ने वाले जहाज़ों को टक्कर मारी और डुबा दिया. वियतनाम ने विरोध किया. अंतरराष्ट्रीय फोरम में चीन की शिकायत भी की. मगर चीन का कुछ नहीं बिगड़ा. इससे पहले 2016 में चीन के पड़ोसियों की शिकायत पर UN की एक कोर्ट ने फैसला भी सुनाया था. इसमें चीन को अंतरराष्ट्रीय समुद्री क़ानूनों के उल्लंघन का दोषी पाया गया. मगर चीन ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया था.
China Cost Guards
2016 में चीन को अंतरराष्ट्रीय समुद्री क़ानूनों के उल्लंघन का दोषी पाया गया था. (तस्वीर: एपी)

चीन ने एकबार फिर कोस्टगार्ड से जुड़े अपने क़ानूनों में बदलाव किया
नए क़ानून के तहत, चीन ने अपने कोस्टगार्ड को कई सारी पावर्स दी हैं. इनमें विदेशी जहाज़ों को जलाना और ज़रूरत पड़ने पर दूसरे देश के जहाज़ों पर हथियार चलाने का अधिकार भी शामिल है. एक पंक्ति में इस क़ानून का सारांश है-
समुद्र में चीन की राष्ट्रीय संप्रभुता, संप्रभु अधिकार और अधिकारक्षेत्र में ग़ैरक़ानूनी तरीके से दखलंदाज़ी करने, इनका उल्लंघन करने वाले विदेशी संगठनों और व्यक्तियों पर हथियारों के इस्तेमाल समेत सभी ज़रूरी तरीके इस्तेमाल करने की इजाज़त होगी CCG को.
इस क़ानून में CCG को छूट दी गई है कि वो स्थिति के स्वभाव और ज़रूरत में अपनी समझ के हिसाब से फैसला ले. साथ ही साथ, उसे ये रेकमेन्ड भी किया गया है कि वो ज़रूरत पड़ने पर अपने टारगेट के ऊपर आग छोड़े. वो भी जल की सतह के जितने ऊपर हो सके, उतना. ताकि टारगेट को ज़्यादा-से-ज़्यादा नुकसान हो. CCG को गोली चलाने का भी हक़ मिल गया है. अब वो चीन की दावेदारी वाले इलाकों में होने वाले किसी भी विदेशी निर्माणकार्य को रुकवा सकता है. अगर निर्माण हो गया है, तो उसे नष्ट भी कर सकता है. साथ ही, CCG को ये ताकीद भी की गई है कि वो चीन के दावे वाले समुद्री क्षेत्रों में अस्थायी एक्सक्लूज़िव ज़ोन्स बनाए. और, उनमें किसी भी विदेशी जहाज़ की आवाजाही न होने दे.
इस क़ानून से दिक्कत क्या है?
आप जानते हैं कि चीन दूसरे देशों के वैध इलाकों को भी अपना बताता है. वो दूसरे देशों की जायज़ और क़ानूनी दावेदारी को भी तवज़्जो नहीं देता. उसने ख़ुद विवादित इलाकों में दर्जनों कृत्रिम द्वीप बना लिए. वहां मिसाइलें तक तैनात कर दीं. अब उसने इस इलाके में ख़ुद को ऐब्सोल्यूट पावर भी दे दी.
एक बड़ी दिक्कत कोस्टगार्ड को बल प्रयोग करने के मनमाने अधिकार दिए जाने से भी है. नेवी और कोस्टगार्ड, दोनों का मकसद होता है देश के समुद्रीय हितों की सुरक्षा करना. मगर इनके बुनियादी स्वभाव में फ़र्क है. नेवी युद्ध करती है. कोई और देश उसकी समुद्री सीमा में आक्रामकता दिखाए, तो उसका जवाब देती है. जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही से जुड़े अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को भी लागू करती है.
China Cost Guard South Asia
चीन ने अपने कोस्टगार्ड को किसी को भी गोली मारने का अधिकार दे दिया है. (तस्वीर: एपी)

अब कोस्टगार्ड का काम समझिए
ये एक समुद्रीय लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसी है. इसके तीन मुख्य काम हैं- पोलिसिंग, सर्च और रेस्क्यू. इसमें गश्ती करना, तस्करों को पकड़ना, किसी डूबते को बचाना, सिविलियन्स और कारोबारियों की हिफ़ाजत करने जैसी जिम्मेदारियां शामिल हैं. युद्ध की स्थिति में विशेष निर्देश दिए जाने पर ये कॉम्बैट में भी शामिल हो सकती है, मगर ये उसकी रेगुलर प्रैक्टिस नहीं. नेवी और कोस्टगार्ड का ये फ़र्क आपको उनके जहाज़ के रंग में भी दिखेगा. नेवी के ज़्यादातर जहाज़ सलेटी रंग के होते हैं. जबकि कोस्टगार्ड शिप्स का रंग सफ़ेद होता है. ये सफ़ेद रंग धैर्य और शांति का प्रतीक है. कोस्टगार्ड से उम्मीद की जाती है कि वो ज़्यादा-से-ज़्यादा धैर्य दिखाए.
मगर चीन ने अपने कोस्टगार्ड को किसी को भी गोली मारने का अधिकार दे दिया है. फिर चाहे सामने वाला हथियारबंद हो या निहत्था. वो भी उस समुद्रीय इलाके में, जिसपर चीन नाजायज़ दावा करता है. मतलब इलाके का असली मालिक अब अपने ही इलाके में नहीं घुस सकता. उसके मछुआरे अपने हिस्से में मछली नहीं पकड़ सकते. चाइनीज़ कोस्टगार्ड उन्हें घुसपैठिया और अपराधी बताकर गोली मार सकते हैं. दूसरे देशों के इलाके में घुसकर उनका निर्माण ढहा सकते हैं. उनके इलाके में अपने इकॉनमिक ज़ोन बनाकर वहां से कच्चा तेल, गैस और मछलियां निकाल सकते हैं. ये क़ानून निरी बेहूदगी है, बदतमीज़ी है, दादागिरी है. और चीन की ढिठाई देखिए. 22 जनवरी को उसके विदेश विभाग के प्रवक्ता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. इसमें इस नए कोस्टगार्ड लॉ के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा-
हमारे नए क़ानून अंतरराष्ट्रीय संधियों और नियमों के मुताबिक हैं. हम आपसी बातचीत से विवाद सुलझाने और क्षेत्रीय शांति बरकरार रखने में यकीन रखते हैं.
राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने क्या कहा?
ऐसा ही बयान 25 जनवरी को चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी दिया. इस रोज़ वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम को संबोधित करते हुए वो बोले कि ताकतवर देशों को ज़ोर आजमाइश नहीं करनी चाहिए. अपने से कमज़ोर की बुलिइंग नहीं करनी चाहिए. चिनफिंग बोले कि चीन तो हमेशा से ही वार्ता के जरिये विवाद सुलझाने पर ज़ोर देता रहा है.
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चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम में कहा कि चीन तो हमेशा से ही वार्ता के जरिये विवाद सुलझाने पर ज़ोर देता रहा है. (तस्वीर: एपी)

चीन के ये बयान अलग ही लेवल की ढिठाई हैं. वो जो बोल रहा है, उसका ठीक उल्टा कर रहा है. मसलन, चिनफिंग के बयान के एक दिन बाद, यानी 26 जनवरी की एक घटना सुनिए. इस रोज़ फिलिपीन्स के ANC न्यूज़ चैनल ने एक विडियो प्रसारित किया. इस विडियो को बनाया था लैरी हूगो नाम के एक फिलिपीनो मछुआरे ने. लैरी अपनी नाव लेकर थिटू आइलैंड के पास मछली पकड़ने जा रहे थे. ये जगह साउथ चाइना सी के स्पार्टले आइलैंड्स के अंतर्गत आती है. ये फिलिपीन्स का भूभाग है. पीढ़ियों से उसके मछुआरे यहां मछली पकड़ते आए थे. मगर 26 जनवरी, 2020 को चाइनीज़ कोस्टगार्ड ने मछुआरे लैरी हूगो की नाव को वहां से खदेड़ दिया.
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक न्यूज़ में ऐसी ही एक और घटना मिली. पिछले हफ़्ते फिलिपीन्स की वायुसेना अपने पश्चिमी हिस्से में स्थित पलावान आइलैंड के ऊपर विमान उड़ा रही थी. विमान उनके प्यूरेटो प्रिंसेसा शहर के ऊपर था. इसी वक़्त चाइनीज़ कोस्टगार्ड ने रेडियो पर उन्हें चेतावनी भेजी. कहा कि वो चीन की वायु सीमा में हैं. बेहतर होगा कि वो फ़ौरन वहां से निकल जाएं. अब सोचिए, प्यूरेटो प्रिंसेसा मान्य तौर पर फिलिपीन्स का शहर है. इसके वायुक्षेत्र को भी चाइनीज़ कोस्टगार्ड ने अपना बता दिया.
चीन की बदतमीजियां दुनिया के सामने हैं. मगर सवाल है कि इन्हें रोके कौन? चीन किसी अंतरराष्ट्रीय क़ानून, संधियां या संस्था को नहीं मानता. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में क्षेत्रीय या समुद्री विवाद सुलझाने के लिए ताकत का इस्तेमाल प्रतिबंधित है. चीन का नया क़ानून स्पष्ट तौर पर इस चार्टर का उल्लंघन करता है. मगर चीन को इसकी कोई परवाह नहीं.
सवाल है कि उसकी इस मनमानी का असर क्या होगा?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये क़ानून टाइम बम है. इसके चलते पहले से ही तनावग्रस्त साउथ और ईस्ट चाइना सी में टेंशन बढ़ेगा. कन्फ्रंटेशन बढ़ेगा. इसके कारण यहां युद्ध की नौबत आ सकती है. फिलिपीन्स, ताइवान, जापान जैसे इस इलाके के कई देशों के साथ अमेरिका की रक्षा संधि है. इसके तहत, अगर इनमें से किसी भी देश पर हमला होता है, तो अमेरिका उन्हें सैन्य मदद देगा. ये स्थिति बहुत विस्फ़ोटक होगी.
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अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन. (तस्वीर: एपी)

चीन के इस क़ानून पर अंतरराष्ट्रीय सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है. उसके पड़ोसी देश इसके खिलाफ़ लामबंद हो रहे हैं. ख़बर है कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी इस मसले पर जापानी प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा को फोन किया. बाइडन ने जापानी PM को आश्वासन दिया कि अमेरिका हर हाल में जापान का साथ देगा. उसके साथ सैन्य समझौते के करार और मज़बूत भी करेगा. ये वादा रिमाइंडर है कि साउथ और ईस्ट चाइना सी में कोई भी लड़ाई हुई, तो अमेरिका की एंट्री निश्चित है. फिर जो स्थिति बनेगी, वो केवल अमेरिका बनाम चीन की नहीं होगी. उसमें कई देश शामिल हो जाएंगे.

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