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मेरी बहन या दोस्त की स्कर्ट आपको एंटी-नैशनल कैसे बना सकती है?

चंडीगढ़ प्रशासन ने फैसला लिया, लड़कियां डिस्को में स्कर्ट नहीं पहन सकेंगी. मैं चंडीगढ़ का हूं. शर्मिंदा हूं.

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रजत सैन
20 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 21 अप्रैल 2016, 07:18 AM IST)
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भूल सुधार: बुधवार को 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने एक खबर की थी. लिखा था कि चंडीगढ़ के डिस्कोज में मिनी स्कर्ट बैन कर दी गई है. तमाम मीडिया ने इस खबर को कवर किया. हमने भी इस पर अपने विचार रखे. लेकिन अगले दिन शहर के होम सेक्रेटरी ने इस खबर को झूठ बताया. उन्होंने साफ किया कि तथ्यों को गलत तरीके से पेश किए जाने की वजह से यह भ्रम फैला है. किसी के कपड़ों को लेकर कोई बैन नहीं लगाया गया है. यह लेख जो आप नीचे पढ़ेंगे, यह इस स्पष्टीकरण के सामने आने से पहले लिखा गया था. शुक्र है कि वह खबर गलत निकली. सही तथ्य सामने आने के बाद हमने उसे भी रिपोर्ट किया, उसे आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं.



चंडीगढ़ एडमिनिस्ट्रेशन ने दो फैसले लिए हैं. पहला डिस्को में लड़कियों की शॉर्ट स्कर्ट पर बैन, दूसरा डिस्को अब 2 बजे की बजाय रात 12 बजे बंद हो जाएंगे. दूसरे वाले से मुझे उतनी दिक्कत नहीं, जितनी पहले वाले से है. बताता हूं क्यों.
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फोटो  Tamzaraa Lounge & Bar - Night Club के फेसबुक पेज से

पहली बात तो स्कर्ट पर बैन लगाना ही एक बकवास फैसला है. उससे भी ज़्यादा बकवास ये कि ये कौन डिसाइड करेगा कि कौन सी स्कर्ट छोटी होती है. 'छोटी' की डेफिनीशन तो हर किसी के लिए अलग होती है न. ऐसा फैसला ही सुनाना था तो साथ में मेंशन कर देते. कि कितनी बड़ी हो स्कर्ट. या फिर कितने से छोटी ना हो. एंकल लेंथ, घुटनों तक, या फिर धुटनों से कमर के बीच वाली. जैसे स्कूलों में बताते थी स्कर्ट की लंबाई. मुद्दा सबजेक्टिव है. सब अपने-अपने हिसाब से मानेंगे. या फिर ड्रेस कोड ही बना देते. कि सलवार कमीज़ में आ जाएं लड़कियां. क्योंकि कल्चर तो अब कपड़ों से ही बचना है, न?
एडमिनिस्ट्रेशन का कहना है कि डिस्कोथेक राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का अड्डा बनते जा रहे हैं. हां, इनका कहना है कि यहां एंटी-नैशनल एक्टीविटी होती है. हमारे शहर के डिस्को में. पहले दिल्ली के JNU को ये ‘माननीय’ दर्जा मिला था और अब इन डिस्को की बारी है. चलो माना कि डिस्को का कॉन्सेप्ट आपको ऑफेंड करता है. पर मुझे समझ नहीं आ रहा कि अगर डिस्को में ऐसी एक्टीविटीज़ होती भी हैं, तो इसमें लड़कियों की स्कर्टों का क्या कॉन्ट्रीब्यूशन है. किसी की स्कर्ट कैसे किसी को देश-विरोधी बना सकती है? ये तो ऑफेंसिव है. हम चंडीगढ वालों के लिए भी. और लड़कियों के लिए भी. भला मेरी बहन या दोस्त की स्कर्ट आपको एंटी-नैशनल बनने पर कैसे मजबूर कर सकती है? और वो घुटनों से ऊपर की स्कर्ट जब टखने तक चली जाएगी तो क्या आप सच्चे देशभक्त बन जाएंगे? फालतू सा फैसला है ये.
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फोटो Tamzaraa Lounge & Bar - Night Club के फेसबुक पेज से

ज़्यादा खीज इसलिए भी है क्योंकि मेरे चंडीगढ़ में ऐसे आलतू-फालतू काम कम ही करता है ऐडमिनिस्ट्रेशन. चंडीगढ़ के लोग इसलिए बड़ी रिस्पेक्ट करते हैं अपने शहर की. शहर के बाहर जाते हैं तो तारीफें करते नहीं थकते. पर इसका मतलब ये नहीं कि हम इनके हर फैसले का वेलकम करेंगे. आज स्कर्ट है तो कल को कहेंगे कि ऐसे टॉप भी मत पहनो जिसमें आपकी नाभि दिखे. वैसे तो हमारे शहर में क्राइम रेट भी कम है. और लड़कियों का सेफ्टी रेशिओ भी अच्छा है. फिर भी आप इस फैसले के पीछे ये दलील दे रहे होते कि सिक्योरिटी कारणों से ये फैसला लिया गया है, तो भी रीज़न इतना घटिया ना होता, जितना अब है. कम से कम स्कर्ट बैन करने का कारण तो ढंग का खोज लेते. बताओ, एंटी नैशनल! मतलब कुछ भी, हां?
मैं जब ग्रैजुएशन कर रहा था, तब भी कुछ ऐसी ही हुआ था. कॉलेज में नोटिस लगा था कि कैज़ुअल ड्रैस पहनकर आने पर फाइन लगेगा. और अटेंडेंस भी मार्क नहीं होगी. दो लड़कियों को क्लास में घुसने नहीं दिया. वापस घर भेज दिया. मैं तब कैपंस रिपोर्टर था दैनिक भास्कर के लिए. न्यूज़ रूम में जब ये सब बताया तो एडिटर बोले कि ये कल की फ्रंट पेज खबर है. और फिर अगले दिन अखबार में खबर छपी तो कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन हड़बड़ाया. मुझे प्रिंसिपल ऑफिस बुलाया. बातें चली देर तक. और फिर खबर के दबाव में ये फैसला वापिस लिया गया. अच्छा हुआ. बेतुके फैसले का वापस लिया जाना तो बनता ही था.
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फोटो: चंडीगढ़ भास्कर

ये आर्टिकल भी यही सोच कर लिख रहां हूं. कि हम जैसे कई लोग अगर विरोध करें, तो प्रशासन के कानों तक ये बात पहुंचे. कि चंडीगढ़ एडमिनिस्ट्रेशन या तो अपने इस फैसले पर गौर करे. या फिर हम लोगों के बता दे कि भाई किसी लड़की की टांगें या जांघें देखने से कोई-एंटी नैशनलिस्ट कैसे हो जाता है!

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