झारखंड विधानसभा में बुधवार को वो हुआ, जिसके लिए हम नेता चुनते हैं. नेता कैसाहोना चाहिए? वो जो समाज का प्रतिनिधित्व करे, हमारी आवाज उठाए, हमारी परछाई बने.हमारी ओर से बोले. माने हम जो हैं, हम जो महसूस करते हैं, हम जैसे हैं. उसे सदन मेंले जाकर रखे. झारखंड की विधानसभा में वही हुआ, माइक तोड़े गए, विधानसभा अध्यक्ष परफोम फेंका गया. कुर्सी फेंकी गई, टेबल फेंके गए. और तो और उन पर जूता भी फेंका गया,पर्चे फाड़े गए. ये मार-पीट, तोड़-फोड़, उठापटक हमारी पहचान है. आम आदमी जल्दी आपाखोता है. हिंसा उसकी प्रवृत्ति है. सड़क पर लड़ता है, बच्चा फेल हो जाए तो उसे पीटताहै. चीजें पटकता है. हमें बिलकुल हमारे जैसे नेता मिले हैं. जो उतने ही हिंसक हैंजितने हम. दरअसल ये लोकतंत्र की जीत है, जब जन और जनप्रतिनिधि में कोई फर्क नहीं रहगया है. आम आदमी सड़क पर हॉर्न बाद में मारता है, मारता पहले है. दो मिनट जल्दी घरपहुंचने के चक्कर में वो रोड रेज के बाद सालों जेल में रहना ज्यादा पसंद करता है.बच्चे को रिजल्ट के दिन इसलिए पीटता है कि साल भर ध्यान न देने का पश्चाताप करनाचाहता है. माइक तोड़ते विधायक भी वैसे ही हैं, वो पश्चाताप मोड में होते हैं. वो येसाबित करना चाहते हैं कि नहीं, ऐसा भी नहीं है कि हमने पांच साल जनता की ओर से कुछनहीं किया. हमारे लिए ये क्या कम है कि नेता को पश्चाताप हो रहा है. हम प्रतीकोंमें खर्च हो जाते हैं, तो गौर कीजिए जूता फेंका गया. जूता किस चीज का सिंबल है?अपमान का? नहीं! जूता फेंककर ये बताया जा रहा था कि जाड़ा आ गया है. अगर आपको ये बातबेवकूफाना लग रही हो तो सोचिए विधानसभा में जूता फेंकना कितना बेवकूफाना रहा होगा.सोचना बंद कीजिए, सोचना तो ये चाहिए कि जिस बंदे ने जूता फेंका वो नंगे पैर घर कैसेगया होगा? आपको लगता है इससे बेवकूफाना और कुछ नहीं हो सकता, आप फिर गलत हैं.विधायक कह रहे थे उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, बदले में उन्होंने क्या किया माइकतोड़ दिया. https://www.youtube.com/watch?v=keXEMBz_C8o&t=72s बाहर से देखने परमाइक तोड़ना, कुर्सी-टेबल फेंकना बुरा लगता होगा, लेकिन खुशनुमा माहौल है, विधायककाम कर-कर बोर हो जाते हैं, वो एन्जॉय करना चाहते हैं. विधानसभा में पोर्न देखनेवाले बेचारे भी तो खुशियां ही खोज रहे थे. चीजें कैसे आपस में गुंथी होती हैं, जमीनवाले विधेयक पर बात करते-करते विधानसभा की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला जाते हैं. वोखुश न होना चाहते तो सदन में फोम क्यों ले जाते? बंदूक लेकर जाते, तलवार लेकर जाते.लेकिन झगड़ना उनका स्वभाव नहीं था. वो तो खुशियां मनाने के लिए फोम ले गए थे. मौकानहीं मिला तो स्पीकर पर ही छिड़क लिया. सदन के सबसे बड़े को भी अपने खेल में शामिल करलिया. खुशियां सबके साथ बांटने वाले अब कहां मिलते हैं. इस माहौल को देख मुझे कॉलेजकी याद आ गई, खासतौर पर तब जब कुर्सियां उठाई गईं. इतना उत्साह तो बस कॉलेज कैंटीनमें ही दिखता है.