3 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 5 नवंबर 2016, 10:09 AM IST)
फोटो - thelallantop
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बाबा नागार्जुन की आज बरसी है. अब ये भी बताना पड़े कि बाबा हिन्दी और मैथिली के लेखक-कवि थे तो कोई बात हुई. हां इतना जान लो ऐसे तो बाबा का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था पर जब हिंदी में लिखते तो नागार्जुन और मैथिली में लिखते तो यात्री हो जाते थे. दरभंगा, बिहार में रहते थे.
अविनाश दास भी दरभंगा के ही हैं. पत्रकार, कवि, लेखक और अब फिल्ममेकर भी. कुल मिलाकर पढ़ने-पढ़ाने का चस्का है. बाबा के साथ अच्छा-खासा वक्त गुजारा है. अब उनके किस्से सुना रहे हैं. आज चौथी किस्त में 2 किस्से हैं आपके लिए. पढ़ जाओ बिना नजर हटाए, फटाफट.
नींद में भी शब्द कानों में घुसते हैं
ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय जलते हुए पंजाब में लेखकों ने नयी तरह से प्रतिरोध का बिगुल फूंका था. थोड़े-थोड़े समय पर रात में वे किसी गांव में इकट्ठे होते थे. कहानियां-कविताएं सुनते-सुनाते थे. पंजाब में यह “दिवा बले सारी रात” के नाम से मशहूर हुआ. यानी दीया जले सारी रात. दमन की आग मद्धिम पड़ी, तो इस जुटान का सिलसिला खत्म हो गया. ठीक उसी समय सन ‘90 में कुछ मैथिली लेखकों ने मिल कर झंझारपुर (मधुबनी) के पास लोहना गांव में कहानियों पर ऐसा ही एक आयोजन शुरू किया. सगर राति दीप जरय. सारी रात दीया जले. हर तीन महीने पर मैथिली के रचनाकार किसी एक गांव में जुटते हैं और सारी रात (शाम छह बजे से सुबह छह बजे तक) कहानियों का पाठ और उन पर चर्चा होती है. कोई एक लेखक इस आयोजन का मेजबान होता है और सब अपने अपने खर्चे पर उसके यहां पहुंचते हैं. यह आज भी बदस्तूर जारी है. मैं बीस से अधिक आयोजनों में हिस्सा ले चुका हूं. बाबा के बड़े बेटे शोभाकांत जी ने एक बार अपने गांव तरौनी में “सगर राति दीप जरय” का आयोजन किया. तरौनी दरभंगा से बीस-पचीस किलोमीटर पर मधुबनी के रास्ते में सकरी के पास है. शोभा चचा बाबा को लेकर दो-तीन दिन पहले ही गांव पहुंच गये. मैं आयोजन के दिन पहुंचा. गर्मी के दिन थे और दालान के सामने दरियां बिछायी गई. मैथिली के लेखकों में बाबा की उपस्थिति की वजह से स्वाभाविक उत्साह था. वे बड़ी संख्या में आये. गया से हिंदी के आलोचक सुरेंद्र चौधरी भी आये थे. [हिंदी कहानियों पर सुरेंद्र चौधरी का बहुत विशिष्ट काम है. 2009 में जेएनयू के शोध छात्र उदय शंकर ने उनके रचना संसार को तीन पुस्तक-खंडों में समेटा है, जिसे अंतिका प्रकाशन ने छापा है.] शाम होते होते बाबा ने कहा कि वे भी रात भर जगेंगे. उनके लिए एक चौकी रखी गई. चौकी के बीचोबीच बाबा बैठे. कई कहानियां सुनीं. अपनी अस्पष्ट आवाज में उन्होंने प्रतिक्रियाएं भी दीं. लेकिन दस बजते-बजते ओस की बूंदों ने उन्हें हलकान कर दिया. वे बुरी तरह खांसने लगे. उसी चौकी पर लेट गये. किसी को उन्होंने इशारे से कहा कि कंबल ओढ़ा दे. शोभा चचा ने उन्हें घर में सोने के लिए कहा, पर वे वहीं सोये. कहा कि नींद में भी शब्द कानों में घुसते हैं. बाबा सो गये और सुबह चार बजे जब उनकी नींद खुली, उन्होंने देखा कि लोग अभी भी कहानियां पढ़ रहे हैं, कहानियां सुन रहे हैं.
लाइब्रेरी अय्यारों की दुनिया है
कभी-कभी किसी किताब की तलब होती है. पिछले दिनों ताजिकिस्तान की ताजिक भाषा के विख्यात लेखक सदरुद्दीन एनी की किताब “गुलामान” खोज रहा था. किसी ने कहा कि आजमगढ़ में राहुल सांकृत्यायन लाइब्ररी है, वहां मिल जाएगी. गुलामान का हिंदी अनुवाद राहुल जी ने 1947 में किया था. अब कोई लाइब्रेरी जाने की सलाह नहीं देता. मुझे भी याद नहीं, पिछली बार कब मैं किसी लाइब्ररी में घुसा था. पहली बार रांची में रामकृष्ण मिशन लाइब्रेरी देख कर लगा था कि यहां तो अय्यारों की दुनिया है. एक कहानी में घुसो, दूसरी कहानी में निकलो. ‘92 में दरभंगा लौटने पर कोई ऐसी लाइब्रेरी तो नहीं मिली, लेकिन पुराने बस स्टैंड के पास मिथिला विश्वविद्यालय के बाहर एक छोटी सी गुमटी मिल गई, जहां साहित्यिक किताबें और हिंदी की लघुपत्रिकाएं बिकती थीं. गुमटी का नाम था, मैत्रेयी साहित्य संगम. इस गुमटी के ठीक सामने सर्वे ऑफिस था, जहां दस्तावेजों का काम होता है. पर यहां किताबें खरीदनी पड़ती. पैसे होते नहीं थे. इसका उपाय भी मैत्रेयी साहित्य संगम के संचालक ने निकाल दिया. उन्होंने मुझे पीएचडी थीसिस की नकल का काम दे दिया. मैं वहीं एक चाय की दुकान पर बैठ कर यह काम करता था और बदले में हर महीने पांच-छह किताबें और पत्र-पत्रिकाएं मिल जाती थीं. वहां शहर के कुछ पढ़ने-लिखने वाले शाम को जुटते थे. एक शाम जब मैं वहां था, तो मुझे पता चला कि बाबा नागार्जुन आये हुए हैं. मैं तब तक बाबा से नहीं मिला था. वहीं मैंने उनके घर का पता लिया और अपनी साइकिल पंडासराय की तरफ हांक दी. वहां से करीब सात-आठ किलोमीटर की दूरी थी. पूछते-पाछते मैं करीब आठ बजे बाबा के घर पहुंचा. शोभाकांत जी से मुलाकात हुई. उन्होंने कहा कि बाबा तो सोने चले गये. आप सुबह आइए. मैं घर लौट आया. रात भर किसी तरह नींद आयी. सुबह बाबा से मिलने का उत्साह अपने उरुज पर था. आमतौर पर देर से मेरी नींद खुलती थी, पर उस दिन सुबह छह बजे उठ गया. जाड़े की सुबह थी. साढ़े छह बजते-बजते धूप निकल आई. सात बजे तक मैं बाबा के यहां पहुंच गया. बाबा घर के पिछवाड़े में बैठे थे. धूप वहां सीधे आ रही थी. सामने बरसाती पानी का ढेर जमा था. उस पर जलकुंभियां उग आई थीं. बाबा ने मुझे देखा. कुछ नहीं बोले. बोल नहीं पा रहे थे. बहुत बीमार थे. फिर थोड़ी देर बाद मेरी डायरी लेकर उन्होंने उसमें लिखा, “तुम आये, अच्छा लगा. युवाओं से मिल कर ताजगी मिलती है. अगली बार जब भी आना, समय लेकर आना.” यह बाबा से मेरी पहली मुलाकात का किस्सा है, जो बाद में एक ऐसे अनौपचारिक रिश्ते में बदल गया, जिसमें समय लेकर आने का आदेश अदृश्य हो गया था.