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बाबा नागार्जुन रोए और लोगों ने पहली बार उन्‍हें रोते देखा

हिंदी-मैथिली के इस महान साहित्यकार के किस्से सुना रहे हैं फिल्ममेकर अविनाश दास.

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2 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 5 नवंबर 2016, 10:09 AM IST)
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बाबा नागार्जुन की आज बरसी है. अब ये भी बताना पड़े कि बाबा हिन्दी और मैथिली के लेखक-कवि थे तो कोई बात हुई. हां इतना जान लो ऐसे तो बाबा का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था पर जब हिंदी में लिखते तो नागार्जुन और मैथिली में लिखते तो यात्री हो जाते थे. दरभंगा, बिहार में रहते थे.
अविनाश दास भी दरभंगा के ही हैं. पत्रकार, कवि, लेखक और अब फिल्ममेकर भी. कुल मिलाकर पढ़ने-पढ़ाने का चस्का है. बाबा के साथ अच्छा-खासा वक्त गुजारा है. अब उनके किस्से सुना रहे हैं. आज तीसरी किस्त में 3 किस्से हैं आपके लिए. पढ़ जाओ बिना नजर हटाए, फटाफट.

बाबा रोए और तमाम लोगों ने पहली बार उन्‍हें रोते देखा

अपराजिता देवी. बाबा की पत्‍नी का यह नाम मुझे अनूठा लगता था. मैंने पहले कभी यह नाम नहीं सुना था. बाद में भी इस नाम की कोई स्‍त्री मुझे नहीं मिली. चुप-सी रहने वाली एक बेहद आत्‍मीय स्‍त्री. बाबा की उच्छृंखल घुमक्कड़ी के दिनों में अकेले पूरा घर और बच्‍चों को संभालते-संभालते उन्‍हें बाबा से ज्‍यादा खुद के साथ रहना ही नियति लगती थी. बाबा जब दरभंगा में होते थे, तब भी वह गांव में ही रहा करती थीं. एक बार शहर आयीं, तो बाबा अपने साथ मेरे घर भी ले आये. उनसे मेरा और मेरे परिवार का बहुत रागात्‍मक रिश्‍ता बन गया. हम उन्‍हें दादी कहते. उन्‍हीं दिनों बाबा का दिल्‍ली जाना हुआ, तो पटना तक के लिए शोभाकांत जी के साथ मुझे भी उन्‍होंने साथ ले लिया. पटना में एक दोपहर जब हम बंदरबगीचा में उषाकिरण खान जी के यहां थे और मैंने वापस दरभंगा के लिए बस पकड़ने से पहले बाबा की इजाजत ली, तो बाबा ने अपनी जेब से पांच सौ रुपये निकाल कर दिये. कहा, “ई दादी के हाथ मे ध’ दिय’ही…” (ये दादी के हाथ में दे देना…). शोभा चचा ने इस लेन-देन को देख लिया. वह भी साथ ही लौट रहे थे. बंदरबगीचा से निकल हम मौर्यालोक के सामने वाली सड़क पर आये, तो शोभा चचा ने कहा, “पैसे मुझे दे दो. सुम्‍मी (उनकी छोटी बेटी) की फीस देनी है और मैं पैसे के इंतजाम में लगा हूं. तुम्‍हारी दादी के लिए इसी में से एक साड़ी भी ले लूंगा.” मैंने पांच सौ रुपये उन्‍हें दे दिये. उस घटना के साल भर बाद अपराजिता देवी का निधन हो गया. बाबा तब दरभंगा में ही थे और मैं पटना आ गया था. बाद में मैंने सुना, बाबा रोये थे और घर के तमाम लोगों ने पहली बार उन्‍हें रोते हुए देखा था. इसके बाद बाबा और ज्‍यादा कमजोर और बीमार रहने लगे. इसके बाद बाबा कभी दरभंगा से गये भी नहीं.

Baba Nagarjuna

मैं अपनी प्रेमिका को बाबा से मिलवाने ले गया

छोटे शहरों में जेंडर संकोच हर फ्रेम में किसी भी समय देखा जा सकता है. स्‍कूल के दिनों में एक असफल प्रेम के बाद जब पहली बार अपने से तीन साल बड़ी उम्र की लड़की ने दरभंगा में मेरा प्रेम निवेदन स्‍वीकार किया, तो मेरे लिए यकीन करना मुश्किल था. मैं उससे अक्‍सर कहता था कि हम इस शहर के पहले प्रेमी होंगे, अगर तुम मुझे प्‍यार करने लगोगी. इससे पहले प्रेम में हत्‍याओं की कुछ कहानियां थीं, जिनके सही-सही तथ्‍य हमसे उसी तरह दूर थे — जैसे कला के विद्यार्थियों के लिए विज्ञान का रहस्‍य होता है. पर उसे अपनी सहेलियों के प्रेम-प्रसंग पता थे. स्‍वीकार के उस पहले दिन मेरे दोनों गालों को अपने हाथों में लेते हुए उसने रहस्‍योदघाटन किया कि हमारे शहर में भी प्रेम के मो‍ती अनगिनत सीपियों में बंद हैं. ये वो दिन थे, जब बाबा के यहां जाने की जगह मैं अपनी प्रेमिका के साथ वक्‍त बिताने के लिए सुरक्षित ठिकाने ढूंढता रहता था. अपने जीवन की इस खूबसूरत घटना के बारे में मैंने बाबा को कभी नहीं बताया, पर उस लड़की को एक दिन उनसे मिलवाने ले गया. बाबा ने उस दिन लड़कियों के बारे में बात की. साइकिल चलाने वाली लड़कियों के हाथ से बजने वाली साइकिल की घंटी से निकलने वाले संगीत के कई आयाम बताए. बताया कि जब सारी लड़कियां साइकिल चलाना सीख जाएंगी, सुराज आ जाएगा. मेरी प्रेमिका से उन्‍होंने पूछा कि तुम साइकिल चलाना जानती हो? उसने नहीं में सिर हिलाया. बाबा ने कहा कि सीख लो, वरना ये लड़का तुम्‍हें अपनी साइकिल पर बैठा कर उड़ा ले जाएगा. वो शरमा गई और मेरे चेहरे का रंग उड़ गया. उस दिन के बाद मैं कभी उसे बाबा के पास नहीं ले गया.

किताबें सूंघो मत, पढ़ो

हमारे लिए पटना एक बड़ा आकर्षण था. वहां साहित्‍य से जुड़े ज्‍यादा लोग रहते थे. ज्‍यादा गतिविधियां थीं. तब पटना में आना-जाना लगभग नहीं के बराबर था. उस समय हमारे पास लोगों की नजर में आने लायक रचना भी नहीं थी. पर एक चीज थी, जो लोगों की निगाह में जल्‍दी ले आती थी -  वह था रचनात्‍मक उधम. बाबा ने एक बार गुस्‍से में कहा भी था कि किताबें सूंघो मत, पढ़ो. जाहिर है, हम तब किताबों के नाम ज्‍यादा जानते थे, किताबों के अध्‍याय और किताबों की बातों से बहुत कम रिश्‍ता था. सन ‘93 या ‘94 में जब प्रगतिशील लेखक संघ का राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन हुआ था, बाबा के साथ मैं पटना आया था. उस यात्रा की कई यादें हैं, पर आज उस शाम का जिक्र कर रहा हूं, जब बाबा के साथ मैं मैथिली के एक बड़े समालोचक मोहन भारद्वाज के यहां गया था. उससे पहले मैंने मोहन भारद्वाज के बारे में किसी पत्रिका में काफी उल्‍टी-सीधी बातें की थीं. उन्‍हें ब्राह्मणवाद का पोषक आलोचक मानता था. हालांकि मेरी यह राय बदली (और उनकी सहृदयता से रिश्‍ते भी), जब मैंने उन्‍हें पढ़ना शुरू किया, उनके सरोकार समझ में आये. उन्‍होंने बाबा के उपन्‍यास ‘बलचनमा’ पर एक खूबसूरत किताब भी लिखी है. ‘बलचनमा’ चालीस के दशक में बाबा ने लिखी थी. उस समय मिथिला के सामाजिक इतिहास को बलचनमा के माध्‍यम से मोहन भारद्वाज ने अपनी किताब में समझने-समझाने की कोशिश की है. मोहन भारद्वाज तब आर ब्‍लॉक के पास एक सरकारी क्‍वार्टर के ग्राउंड फ्लोर पर रहते थे. उनके यहां उस शाम हिंदी मैथिली के कई लेखक जुटे थे. एक कमरे में खचाखच भरे हुए लोग और बीच में बाबा. मैं बाबा के बगल में बैठा था. सबने मिल कर बाबा से बातचीत की और वह बातचीत रिकॉर्ड हुई. मैंने भी उत्‍साहित होकर एक सवाल किया कि साहित्‍य की नयी पीढ़ी के बारे में आप क्‍या सोचते हैं. गंभीर सवालों के बीच इस बेहद मामूली और सतही सवाल से बाबा को सांस लेने का मौका मिला और उन्‍होंने मेरा हाथ पकड़ कर कहा -“जब पीढ़ा घिसता है, तो पीढ़ी बनती है”. मुझे तब इसका तात्‍पर्य समझ में नहीं आया, पर जवाब पाकर ऐसे संतुष्‍ट दिखा जैसे सब समझ गया. [यह बातचीत मैथिली पत्रिका देसकोस में छपी और बाद में इस पूरी बातचीत का अनुवाद समकालीन भारतीय साहित्‍य के एक अंक में भी छपा.]
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