केरल के एक गांव को कैशलेस कर दिया गया है. नोटबंदी के बाद से शुरू हुए राष्ट्रीयजलसे में एक उपलब्धि और जुड़ गई. लेकिन जिस तरह ये गांव कैशलेस हुआ है, वैसे कोई औरना ही हो तो बेहतर है. नोटबंदी के बाद से जारी सर्कस तो आपको याद ही होगा. पहलेसरकार ने कहा कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक है. प्रधानमंत्री का भाषण याद ही होगा जबउन्होंने ऐलान किया था कि भारत में मौजूद तमाम 'ब्लैकमनी होल्डर्स' के लिए प्रलय कीघड़ी आ पहुंची है. लोगों से कहा गया था कि वो ‘कुछ’ दिन की परेशानी सहकरभ्रष्टाचार-मुक्त भारत बनाने में योगदान दें. लोगों ने दिया. फिर कहा गया कि कुछदिन नहीं पचास दिन चाहिए. तब तक नोटों की किल्लत भी ख़त्म कर ली जाएगी और सर्जिकलस्ट्राइक का विशाल अभियान भी अपनी मंजिल को पा लेगा. लाइन में अटेंशन खड़ी जनता नेये भी क़बूल किया. पचास दिनों तक दर-दर भटकने के लिए ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो गई. वैसे‘ख़ुशी ख़ुशी तैयार होना’ मुहावरा है जो कभी-कभी तब भी इस्तेमाल कर लिया जाना चाहिए,जब आपको बताना हो कि और कोई चारा नहीं था. खैर, जनता ने दिए पचास दिन भी. फिर जबज़िंदगी झंड करने के तमाम पैंतरों के बाद भी जनता कालेधन की वापसी के लिए हर तकलीफ़सहने के लिए तैयार दिखी, तब सरकार भी अचंभित रह गई. कैसे लोग हैं यार! कोई रीढ़ कीहड्डी ही नहीं. जिधर हांको उधर चल पड़ते हैं. जो कहो करने लगते हैं. ऐसी आज्ञाकारीजनता पाकर सरकार वैसे ही प्रसन्न हुई जैसे सीबीआई से क्लीन चिट पाकर अमित शाह खुशहुए होंगे. ये अलग बात है कि अबकी बार सरकार भी अमित शाह ही हैं. पचास दिनों में भीजब स्थिति ना संभलने का अंदेशा हुआ तो सरकार ने मामले को अभूतपूर्व ट्विस्ट देतेहुए इसकी शक्ल ही बदल दी. रातो-रात काले धन को दफ़न करके कैशलेस को मैदान में उतारा.ये ऐसे ही था जैसे मैथ्स की जमकर तैयारी करके परीक्षा-हॉल पहुंचे बालक को इतिहास कापेपर पकड़ा दिया गया हो. जनता हक्का-बक्का रह गई. हर तरफ पेटीएम- पेटीएम होने लगा.जिस देश की ज़्यादातर जनता के पास बैंक अकाउंट तक नहीं है, वहां उम्मीद की जाने लगीकि लोग खड़े पैर कैशलेस ट्रांजेक्शन करने लगें. सवा-सौ करोड़ लोगों के प्रधानमंत्रीने लाइव भाषण में व्हाट्सएप्प को कोट करते हुए बताया कि कैसे एक भिखारी तकस्वाइप-मशीन रखता है. वो पल इतिहास में अमर कर देने लायक है. वो व्याख्या है इसमहान लोकतंत्र की जहां मूर्खताओं पर नीचे से ऊपर तक सबका समान रूप से क्लेम है. जिसदेश का मुखिया ही ऐसी बातें करता हो वहां की जनता ‘जोहार-माईबाप’ करती पाए जाए तोक्या हैरानी! कैशलेस कंट्रीज के तौर पर स्वीडन, नॉर्वे के उदाहरण भारत कीहैरान-परेशान जनता के मुंह पर फेंक-फेंक कर मारे गए. ये तथ्य बड़ी सहूलियत से भुलायागया कि इन देशों की मुकम्मल आबादी से ज़्यादा लोग भारत की एक मेट्रो सिटी में बसतेहैं. एक करोड़ से भी कम जनसंख्या वाले देश के पैमाने से सवा-सौ करोड़ी मुल्क कीतरक्की का हाइवे बनाने का ख़्वाब देखा जाने लगा. या यूं कहिए दिखाया जाने लगा. औरइसके लिए नित नए फ़ॉर्मूले बाज़ार में उतारे जाने लगे. अक्सर जब आपका कोई फैसला बुरीतरह नाकामयाब होने की सूरत बनने लगती है, तब उसे जायज़ ठहराने के लिए तमाम तरह केथिएट्रिक्स की ज़रूरत पड़ती है. सरकार उसी में मशगूल है इन दिनों. हालांकि इस ‘मैग्नमओपस’ नौटंकी से कुछ-कुछ ऐसे दृश्य भी झांक लेते हैं कभी-कभार, जिन्हें देख करविडम्बना भी ख़ुदकुशी करना चाहे. ऐसा ही एक मामला सामने आया है केरल से जहां कैशलेसके प्रकाशोत्सव ने दबे-कुचले लोगों के अभावों को रोशनी से सराबोर कर दिया है. केरलके मलप्पुरम जिले के एक गांव नेदुमकयम को कैशलेस गांव घोषित कर दिया गया है. ‘मायमलप्पुरम, माय डिजिटल’ उपक्रम के तहत मलप्पुरम को देश का पहला कैशलेस जिला घोषितकिया गया. जब इस गांव के ज़मीनी हालात इसमें रोड़ा बनने लगे तो इससे निपटने के लिए एकतोड़ निकाला गया. डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर अमित मीना ने इस गांव के 27 लोगों के अकाउंटमें पांच-पांच रुपए ट्रांसफर किए और कैशलेस के राष्ट्रीय यज्ञ में उनकी हाजिरीरजिस्टर करा दी. अब कैशलेस होने का मैडल माथे चिपकाए ये गांव सोच में दफ़न है किपीने का साफ़ पानी, बिजली और टॉयलेट जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए किसका मुंहदेखें! पनिया जनजाति के लोग इस गांव के बाशिंदे हैं. मूलतः दिहाड़ी मजदूरी कर केगुज़र-बसर करने वाले इन लोगों को कैश में ही मजदूरी हासिल होती है. वो भी बेहद कम.पीने के पानी के लिए उन्हें पास की एक नदी पर आश्रित रहना पड़ता है. वो भी रात मेंही मुमकिन हो पाता है. दिन में वहां जा नहीं सकते क्योंकि टूरिस्ट लोग नहाते हैंवहां. बरसात के मौसम में, जो कि केरल में पूरे चार महीने चलता है, उन्हें धोती सेछानकर पानी पीना पड़ता है. गांव में कुल 103 घर हैं जिनमे से सिर्फ 15 में टॉयलेट कीसुविधा है. बाकियों को कॉमन टॉयलेट पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर खुले में जानापड़ता है. जहां बुनियादी सहूलतें नदारद हो वहां कैशलेस जैसी लग्ज़री की बातें करनाक्रूर मज़ाक के अलावा कुछ नहीं. हमारे मुल्क में हमेशा प्रायोरिटीज़ को सेट करने कीसमस्या रही है. घोड़े के आगे बग्गी जोतने की हमारी पुरानी आदत है. नोटबंदी के फैसलेके इतने ज़्यादा साइड-इफेक्ट्स सामने आ चुके हैं, फिर भी इसके खिलाफ़ कुछ बोला जानेसे बचते हैं लोग. जज़्बाती तकरीरों के हवाले लोग असल में जज़्बात से कोरे हो गए हैं.वरना क्या ऐसा मुमकिन था कि देश-भर में 150 के करीब मौतें होने के बावजूद भी हर तरफएक बेशर्म सन्नाटा पसरा हुआ है! कहीं कोई हलचल नहीं, कोई आक्रोश नहीं, कोई जवाबतलबीनहीं. लोग परेशान हैं, मंत्री मज़ाक बना रहे हैं. कैशलेस के फंडे ने शेमलेस बनानेमें कोई कसर नहीं छोड़ी है. लोग निर्लिप्त हैं. लाइन सीधी रख रहे हैं. आप भी रखिए.--------------------------------------------------------------------------------इसे भी पढ़िएनोटबंदी कालेधन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' नहीं, काले को सफ़ेद करने का खेलATM की लाइन में लगने वालों का मजाक उड़ा रहे हैं BJP नेता मनोज तिवारी!मोदी के 50 दिन खत्म, अब RBI ने एक नया आदेश जारी किया है