कृषि कानूनों की वापसी के ऐलान के बाद इस बात के आसार बनने लगे हैं कि केंद्र सरकार44 श्रम कानूनों को 4 लेबर कोड में बदलने वाले कानूनों को भी फिलहाल लागू नहींकरेगी. एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक श्रमिकों और उनके संगठनों के विरोध के चलतेकेंद्र सरकार 4 बार इन कानूनों को लागू करने की तारीख आगे बढ़ा चुकी है. दिलचस्पबात यह है कि चौथी बार तारीख आगे खिसकाते समय अगली तारीख का जिक्र नहीं किया गयाहै. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक श्रम मंत्रालय के सूत्रों ने ही यह जानकारी दीहै. इससे संकेत गया है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मोदी सरकारअपनी लोकप्रियता को खतरे में नहीं डालना चाहती.इस रिपोर्ट में बात करेंगे कि ये चारों कोड क्या हैं और इनके आम मजदूरों से लेकरसभी नौकरीपेशा लोगों, कंपनियों, ट्रेड यूनियनों के लिए क्या मायने हैं, इस पर तफसीलसे बात करेंगे. लेकिन यह भी जानते चलें कि देश के 10 श्रमिक संगठनों ने पहले ही नएश्रम कानून और अन्य मुद्दों पर 26 नवंबर को देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन और फिर दो दिनकी हड़ताल का ऐलान कर रखा है. ये कोड केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर 1 अप्रैल2021 से लागू होने थे. करीब 9 राज्यों ने सभी चार कोड पर और 21 राज्यों ने किसी नकिसी कोड पर ड्राफ्ट रूल्स भी तैयार कर लिए हैं. लेकिन आगामी चुनावों और ट्रेडयूनियनों के बढ़ते दबाव के बाद इसके ठंडे बस्ते में जाने के संकेत मिलने लगे हैं.गतिरोध का लुब्ब-ए-लुबाब ये है कि सरकार इन कानूनों को इंडस्ट्री की नजर में ईज ऑफडुइंग बिजनेस यानी कारोबार आसान बनाने के टैग तले बढ़ाना चाहती है, वहीं श्रम संगठनइसे श्रमिकों के हितों के खिलाफ देख रहे हैं.तस्वीर- पीटीआई से साभार.वेज कोडः बदल जाएंगे मजदूरी और सैलरी के ढांचेइसके पहले कि इस कोड की बारीकियों में जाएं, एक अपडेट जानते जाएं कि देश भर मेंसैलरी स्ट्रक्चर को रिवाइज करने के साथ ही सरकार पहले पूरे देश के लिए एक अलग नेशनलमिनिमम वेज तय करने वाली थी. इसमें जोनवाइज 4 फ्लोर रेट तय होने थे. हाल ही मेंसरकार ने साफ किया है कि वह नेशनल मिनिमम वेज थोपने नहीं जा रही है. जहां तक सैलरीस्ट्रक्चर का सवाल है, सबसे अहम प्रावधान यह है कि बेसिक सैलरी कुल वेतन यानीसीटीसी का 50 प्रतिशत होगी.फिलहाल प्राइवेट सेक्टर में इसका कोई एक ढांचा देखने को नहीं मिलता. यहां आम तौर परबेसिक सैलरी सीटीसी का 25-30 प्रतिशत होती है. इसके दो मायने हैं, वर्कर की टेक होमसैलरी घट जाएगी, लेकिन पीएफ खाते में ज्यादा रकम जाएगी. वहीं, एम्प्लॉयर्स पर पीएफऔर ग्रेच्युटी में योगदान का बोझ बढ़ेगा.विरोध क्यों?संगठित क्षेत्र में काम करने वालों को लिए इस ढांचे पर क्या ही ऐतराज होगा. असलीपेच असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करीब 43 करोड़ दिहाड़ी और अन्य कामगारों केहितों को लेकर है. ट्रेड यूनियनों का कहना है कि उन्हें बेसिक और अलाउंसेज तो दूर,सरकार की ओर से तय न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती. इस कोड के समानांतर सरकार ने जिसनेशनल मिनिमम वेज फ्लोर रेट की बात कही थी, वहां भी एक पेच है.दिल्ली जैसे राज्य में अकुशल मजदूरों के लिए किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे ज्यादा15,908 रुपये मासिक मिनिमम वेज तय है, जबकि कुशल मजदूरों के लिए 19,291 रुपये.लेकिन पड़ोसी यूपी और हरियाणा में यह रेट 30-35 फीसदी तक कम है. नतीजतन,दिल्ली-एनसीआर में पहले ही एक तरह का श्रमिक असंतुलन पैदा हो गया है. एनसीआर कीइंडस्ट्रीज रोती हैं कि वर्कर्स का रुझान दिल्ली की तरफ होता है, जबकि बिजली-पानीके मामले में दिल्ली में लिविंग कॉस्ट भी कम है. इससे एनसीआर में लेबर क्रंच पैदाहोता है. ऐसी समस्याएं दूसरे राज्यों में भी पेश आ सकती हैं.तस्वीर- पीटीआई से साभार.इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोडः विवाद और विरोध की जड़ट्रेड यूनियनों के विरोध और सरकार के संभावित बैकफुट पर जाने के पीछे इस कोड काबड़ा हाथ है. मौजूदा श्रम कानूनों के तहत 100 से कम वर्कर्स वाली कंपनियों को बिनासरकार को बताए हायर एंड फायर की छूट है. लेकिन अब यह श्रमिक सीमा बढ़ाकर 300 की जारही है. काम के घंटे बढ़ाने (12 घंटे ) और शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट को वैधानिक जामापहनाने जैसे प्रावधान भी हैं.विरोध क्यों?श्रम संगठनों की दलील है कि बड़े कॉरपोरेट के साथ ही अब देश की ज्यादातर कंपनियांऔर एम्प्लॉयर इस श्रेणी में आ जाएंगे. उनका कहना है कि इससे एक तरह से पूरे देश मेंश्रमिकों के शोषण और बेरोजगारी की खुली छूट मिल जाएगी.इसके अलावा इस कोड में ट्रेड यूनियनों का वजूद भी खतरे में दिख रहा है. यह कोडट्रेड यूनियनों के गठन, अधिकार और मेंबरशिप को भी नए सिरे से परिभाषित और रेग्युलेटकरने की बात करता है. कोड के मुताबिक यूनियन बनाने के लिए कुल श्रमिकों का 10 फीसदया कम से कम 100 श्रमिकों की जरूरत होगी और इसमें बाहरी उद्योग या संस्थान का कोईव्यक्ति मेंबर नहीं हो सकेगा.जानकारों का कहना है कि प्राइवेट सेक्टर में इतने मेंबर जुटाना भी मुश्किल होगा.मिनिमम वेज के निर्धारण में भी ट्रेड यूनियनों को हटा दिया गया है. पे कमिशनों काप्रभाव भी नहीं के बराबर रह सकता है. हालांकि कोड कहता है कि अकेला कर्मचारी भीअपनी मांगों और मसलों के निपटारे के लिए मैनेजमेंट से बात कर सकता है और कोर्ट जासकता है.सोशल सिक्योरिटी कोड - सारे कॉलर ब्लू या व्हाइट नहीं होतेइसके तहत सरकार ने तमाम तरह के सरकारी स्कीमों के लाभार्थियों के लिए आधार कार्डअनिवार्य करने और एक विशेष कोड जारी करने की बात कही है. वर्कर्स सोशल सिक्योरिटीऔर मैटर्निटी लाभ से जुड़े सभी 9 कानूनों को भी एक कोड में समाहित करने की कोशिशहै. श्रमिकों के वेतन का डिजिटल भुगतान करना होगा. साल में एक बार सभी श्रमिकों काहेल्थ चेकअप भी अनिवार्य होगा. पहले साल में न्यूनतम 240 दिन का काम करने के बाद हीहर 20 दिन पर एक छुट्टी (ईएल) का अधिकार था, अब इसकी एलिजिबिलिटी 180 दिन काम करनेके बाद ही शुरू हो जाएगी. शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वालों को भीग्रेच्युटी का फायदा मिलेगा.तस्वीर- पीटीआई से साभार.विरोध क्यों?मजदूर संगठन इस कोड को भी सब्जबाग बता रहे हैं. उनका दावा है कि अब तक सोशलसिक्योरिटी स्कीमों में केवल 11 करोड़ श्रमिक ही कवर्ड हैं और कोड का लाभ भी ज्यादासे ज्यादा उन्हीं को मिलेगा. जबकि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर,रेहड़ी-पटरी वाले, कृषि मजदूरों के एक्सेस का कोई ठोस प्रावधान या गारंटी नहीं है.कोड ऑन ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशनयह कोड कारखानों और दूसरी जगहों पर कामकाज का माहौल सेफ और लेबर फ्रेंडली करने कीबात करता है. उनके लिए लेबर आइडेंटिफिकेशन नंबर का भी प्रावधान है, ताकि एक जगह सेकाम छोड़ने और दूसरी जगह जाने के बाद भी वर्कर को तात्कालिक सहायता मिलती रहे. साथही फैक्ट्रियों में बुनियादी सुविधाएं और काम की जगहों पर सुरक्षा उपायों औरसहूलियतें मुहैया कराने की बात कही गई है.विरोध क्यों?इस सवाल पर ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर ने दीलल्लनटॉप से कहा, ‘कोरोना के दौरान हम माइग्रेंट वर्कर्स की दुर्दशा देख चुके हैं.वर्कर्स की सोशल सिक्योरिटी, सेफ्टी और हेल्थ के लिए पहले से कई प्रावधान हैं औरआईएलओ के दिशानिर्देश भी. लेकिन जिस सरकार ने 2015 के बाद से इंडिया लेबरकॉन्फ्रेंस की सालाना बैठक ही नहीं बुलाई है, उस पर हम भरोसा नहीं करते कि वह इनकोड्स का लाभ गली-मोहल्ले के श्रमिकों तक पहुंचा पाएगी.’ अमरजीत कौर ने कहा कि श्रमकानूनों के कोडिफिकेशन से पहले श्रमिक संगठनों को भरोसे में नहीं लिया गया. बाद मेंकाफी विरोध के बाद हर कोड पर एक मीटिंग की गई, लेकिन सुझावों को तवज्जों नहीं दीगई.