20 रुपये मिलते थे स्कूल जाने के लिए. वैसे तो डीटीसी का एक साइड का किराया ही 15रुपये हुआ करता था. पर उन दिनों दिल्ली में ब्लू लाइन बस का कहर बरस रहा था. अब कहरतो उन लोगों के लिए था जो उसकी चपेट में आ कर चपटे हो गए. मेरे जैसो के लिए तो ब्लूलाइन एक वरदान था. जहां डीटीसी में 15 खर्च होते थे, वहीं इसमें 5 में काम बन जाताथा. टोला, पुष्कर, गोल्डी और खत्री नाम के कुछ लोग होते थे. कहां पता नही? इनका नामलेने पर कभी-कभी ब्लू लाइन का कंडक्टर किराया नही लेता था. ऐसे में 20 में से कम सेकम 10 और ज्यादा से ज्यादा 15 रुपये बच जाते थे. जो लंच टाइम पर समोसे या छुट्टीमें जीटीबी नगर का मसाला सोडा पीने के काम आता था. सोमवार का दिन था. सो कर लेट उठातो स्कूल के लिए भी लेट हो गया. स्कूल के मेन गेट पर पीटी वाले सर खड़े थे. इसलिएस्कूल की पीछे की दीवार टाप कर क्लास में घुसा. वहां मेरे क्लासमेट आपस में बतियारहे थे. अपनी गर्लफ्रेंड के साथ दबंग देखकर आए थे. और पिज्जा खा कर भी. मैं भीसुनने लगा. उनकी रामायण कथा खत्म होने के बाद मेरे दिमाग में बस पिज्जा रह गया.जिसे मैंने कभी खाया नहीं था. बस टीवी पर देखा था. पिज्जा का ख्याल मेरे दिमाग मेंचल रहा था. ऐसा लग रहा था मानो वो पिज्जा मुझे चिढ़ा रहा हो. '12वीं में आ गए औरअभी तक पिज़्ज़ा नहीं खाया?' बात तो सही थी. आगे जा कर अपने बच्चों से क्या कहूंगा कि'मैंने पिज्जा कॉलेज में खाया था.' इस ख्याल के दिमाग मे आते ही मैंने 'मिशनपिज़्ज़ा' को कम्पलीट करने का संकल्प कर लिया. अब बस पैसों का जुगाड़ करना था. पैसोंकी बात पर सबसे पहले याद आया डॉमिनोज का वो एड 'Starting at just rupees 67*'. मतलब67 रुपये के लिए मुझे अगले सात दिनों तक समोसे, मसाला सोडा सबको टाटा बाय-बाय करनाथा. तभी मिशन पिज्जा पूरा हो पाएगा. मैं जुट गया था. शनिवार तक लगातार स्कूल आया.बिना समोसे और मसाला सोडे के ज़िन्दगी ज़हर सी लग रही थी. पर मैं भोलेनाथ की तरह उसेपी रहा था. क्योंकि इस ज़हर के बाद अमृत जैसा पिज़्ज़ा मिलने वाला था. संडे को ट्यूशनसे आने के बाद हिसाब लगाया. 60 रुपये हो गए थे. अगर 7 रुपये और होते तो अभी निकलजाता पर मुझे कल तक रुकना था. सोच ही रहा था कि इतने में पापा आ गए. उन्होंने देखलिया. बोले 'वाह! पैसे जोड़ना सीख गया है. ये ले 10 रुपए.' अब रकम 70 हो गई थी. परफिर भी मैंने कल तक रुकने का फैसला किया. ये सोच कर की सब्र का फल मीठा होता है. कलतो पिज़्ज़ा के साथ एक मसाला सोडा भी हो जाएगा. अगले दिन स्कूल पंहुचा. पहले पीरियडमें अटेंडेंस लगाई और दूसरे से चौथे तक पीरियड गोल कर ग्राउंड में खेला. चौथे केबाद लंच हुआ तो पीछे वाली दीवार टाप कर खुद गोल हो लिया. ब्लू लाइन पकड़ कर पहुंचाजीटीबी नगर मेट्रो के पीछे वाले डोमिनोज़ में. अब तक इस मिशन पिज्जा में जो भी था वोबस तैयारी थी. अब मिशन अपने आखिरी दौर में था. पहले कभी डोमिनोज़ गया नहीं था. परइतना अंदाज़ा था कि अंदर घुसना है, काउंटर पर जाना है और पैसे दे कर पिज़्ज़ा ले लेनाहै. बस, फिर मिशन कम्पलीट. पर डोमिनोज के सामने आते ही एक अजीब सा डर मेरे अंदर आगया. कहीं किसी ने दरवाजे पर ही रोक लिया तो. वैसे भी स्कूल ग्राउंड में खेलते हुएकपड़े गंदे हो गए थे. मैंने डोमिनोज़ का दरवाजा खोला और अंदर चला गया. वहां कोई गार्डही नहीं था. अब मुझे काउंटर तक जाना था. पर अंदर घुसते ही मेरा डर और बढ़ गया. मुंडीघुमा कर देखा. पूरा डोमिनोज़ डीयू के इंटेलेक्चुअल और हाई फाई दिखने वाले लोगों सेभरा था. लेकिन शोर नहीं था. सब लोग बहुत धीरे-धीरे बात कर रहे थे. सभ्य नज़र आ रहेथे और मेरे अंदर की इनसेक्योरिटी को बढ़ा रहे थे. इन सब में पिज़्ज़ा खाने का जोश कबऔर कहां गायब हो गया पता ही नहीं चला. मैं काउंटर की तरफ बढ़ा. वहां लड़की खड़ी थी.उसने अंग्रेजी में कुछ बोला. शब्द तो याद नहीं पर शब्दों का मतलब था- 'बता! क्याखाएगा?' अब इस फटी हालत में मुझ से हिंदी भी नहीं बोली जा रही थी. और यहां इंग्लिशमें बोलना था. दो मिनट तक मेरे अअअ... ह्म्म्म... और याया.. करने से वो समझ गई कि'हमको इंग्लिश कमिंग लिटिल लिटिल'. मेरे अंदर की शर्म अब मेरी सतह तक आ गयी थी. औरचेहरे पर साफ़ दिख रही थी. उस लड़की ने हिंदी में न बोलते हुए एक पर्चा मेरे हाथ मेंदे दिया और किसी दूसरे का आर्डर लेने लगी. मैंने पर्चे में जल्दी से 67 वाला पिज़्ज़ाढूंढा और उस लड़की को बता दिया. मेरे बताने के बाद उस लड़की ने 'ओके' बोला और झट सेबिलिंग मशीन में लग गई. उसने मुझसे तीन चार इंग्रीडिएंट और कोक के लिए पूछा. मैंनेमन कर दिया ताकि एक्स्ट्रा पैसे न लग जाए. बिलिंग मशीन की आवाज बन्द हुई और उसनेकहा '73 rupees sir!' दिल धक सा हो गया. उस दिन पहली बार मुझे 'terms andconditions apply' का मतलब समझ आया. बेटा अब मसाला सोडा भी गया और घर जाने काकिराया भी. अब खचाखच भरी डीटीसी में जाना पड़ेगा. इस ख्याल में डूबा हुआ मैं अभीकाउंटर पर ही खड़ा था कि उस लड़की ने पहली बार हिंदी में बोला 'आप बैठ जाइए, पिज़्ज़ाबनने में टाइम लगता है.' बस फिर से बेइज्जती हो गई. लाज-शरम से नहाय में बैठने कीजगह खोज रहा था. सोचा कोई कोना मिल जाए. पर सारे कोने पहले ही घिरे हुए थे. बस बीचमें रखा एक टेबल खाली था. वही बैठना पड़ा. मैं जल्दी में था. औऱ सोच रहा था कि येपचड़ा जल्दी खत्म हो. वेट करना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है. आप का मन तरह-तरह केख्याल सोचने लगता है. इतने सारे इंटेलेक्चुअल और हाई क्लास दिखने वालों से घिराहोने पर, मेरा दिमाग भी उनकी तरह सोचा रहा था. मुझे लगने लगा कि सब लोग मुझे देखरहे हैं. बिल्कुल वैसे जैसे मेट्रो में जॉइंट पर बैठे मजदूरों को देखते है. अब मेरीकोशिश यही थी कि वो मुझे ऐसे न देखे. तो इस कोशिश में मैंने फिजिक्स की किताब खोलली. ताकि लोगो को पता चले की ' I'm a science student'. पर कोई फायदा न हुई. थोड़ीदेर के बाद काउंटर पर मेरा नाम पुकारा गया. मैं झट से उठा. लगा कि लोग मुझे देख रहेहैं इसलिए स्लो हो गया. पिज्जा देने वाले को मैंने हॉलीवुड वाला एक्सप्रेशन दिया.पर कोई फायदा नहीं. मैंने पिज्जा लिया औऱ अपने सीट पर आ गया. पिज़्ज़ा खोला तो छोटालगा. टीवी में तो बड़ा दिखाते थे. पिज़्ज़ा देने वाले ने पिज़्ज़ा के साथ टिश्यू पेपर औरदो तीन मसाले के पैकेट दिए. जिन्हें चिली फ्लैक्स बोला जाता है, यह बात कॉलेज मेंपता लगी थी. मैंने चिली फ्लैक्स का इस्तेमाल नहीं किया. क्योंकि पता था नहीं इसकाकरना क्या है. बस पिज़्ज़ा उठाया और सीधा मुंह में डाल लिया. बस यही गलती हो गई.टीवी पर पिज्जा के टेम्प्रेचर का पता नहीं लगता. अब पता लगा तो होठ-जीभ सब जल चुकाथा. आलम ये था कि उल्टे आंख से आंसू भी टपक पड़ा. ऊपर से ख्याल कि लोग देख कर बातेबना रहे हैं. फिर से भूल छुपाने के लिए हॉलीवुड एक्सप्रेशन दिए और दो मिनट के लिएरुक गया. रुकना तो ज्यादा समय के लिए चाहता था, पर दो मिनट रुकने में ही जान पर बनआई. दुबारा जब पिज्जा खाना शुरू किया तो खा नहीं पाया. मुंह लस गया था. मिर्ची लगरही थी. फिर पिज्जा सूखा भी लग रहा था. किसी से पानी मांगने की भी हिम्मत नही हुई.ऊपर से लोगों के मुझे देख कर मुंह बनाने का ख्याल. दो निवाले मुश्किल से खाए. हौसलाजवाब दे गया और पिज्जा वहीं छोड़ मैं बाहर कट लिया. पहले जा कर शीतल प्याऊ से पानीपीया और फिर डीटीसी पकड़ी. रस्ते भर पिज्जा का स्वाद याद किया पर वो याद करने लायकथा नहीं. इसी सोच में डूबा अपनी बेवकूफी पर खुद को लताड़ रहा था. पर कही मन मेंसंतुष्टि भी थी की मिशन पूरा हुआ. चाहे जो भी हो अब मैं अपने बच्चों को कहपाऊंगा. 'मैंने पिज़्ज़ा स्कूल में खाया था'. इस संतुष्टि जो सांत्वना जैसी थी, केसाथ डीटीसी की भीड़ में घर पहुचने का इंतज़ार कर रहा था. बस निरंकारी कॉलोनी पहुंची.टिकट चेकर्स ने मुझे बस से नीचे उतार कर अपनी गाड़ी में बिठा लिया.-------------------------------------------------------------------------------- ये किस्सा हमें हमारे रीडर निखिल विजय ने भेजा है. आपके साथ भी स्कूल-कॉलेज मेंकोई मजेदार वाकया हुआ हो तो lallantopmail@gmail.com पर भेज सकते हैं. मजेदार हुआतो हम उसे अपनी 'कैंपस किस्सा' सीरीज में छापेंगे.