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इंटर के ग्यारह लड़के हनुमान मंदिर के सामने भूत बन गए

फरवरी का महीना. कंपकंपाती ठण्ड. अलीगंज का सेन्ट्रल स्कूल. उसके सामने हनुमान मंदिर. 11 लड़के, रात के 3 बजे.

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10 मई 2016 (अपडेटेड: 10 मई 2016, 10:01 AM IST)
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स्कूल का आखिरी साल. आखिरी साल का आखिरी हिस्सा. बारहवीं के बोर्ड इक्ज़ाम्स से बस डेढ़ महीने पहले. साल 2009. फ़रवरी महीना. कड़ाके की ठण्ड. रात कुछ दस-सवा दस पर पीठ पर बैग टांगा, साइकिल उठाई और निकल पड़े पढ़ाई करने. एक मिनट! पढ़ाई? अजी काहे की पढ़ाई? वो तो सब कहने की बातें थीं. सीधे लफ़्ज़ों में, हम आठ-दस लड़के अपने-अपने घरवालों की आंखों में धूल झोंक रहे थे बस. सनाउर रहमान. क्लास का सबसे अमीर लड़का. येल्लम्बा. थोड़ा सा उचकता था तो बास्केटबॉल की रिंग छू लेता था. पापा क्रिमिनल वाले वकील थे. उसके घर पर उसका अपना कमरा था. ऐसा हमने या तो फिल्मों में देखा था या उसके घर पे. बस, उसी के घर में हमारा ठिकाना था. रात भर का. हम, यानी इक्कीसवीं सदी के सबसे आवारा लड़के. कम से कम हम अपनी नज़रों में और अपने मां-बाप की नज़रों में तो यही थे. हम यानी मैं, रमेश, आशुतोष, शशि, अजीत, विशाल, सुयश, श्रेष्ठ और तुषार. सनाउर और उसके छोटे भाई को मिलाकर कुल 11 लोग. एक कमरे में. गजब माहौल. बकैती अपने चरम पर. लेकिन इस बात का ख़ास ध्यान रखना होता था कि शोर बाहर तक न जाए. क्यूंकि हम 'पढ़ाई' कर रहे होते थे. इस पढ़ाई का सिलसिला हफ़्तों से बदस्तूर जारी था. हम रोज़ रात को मैगी खाते. कुछ लड़के सिगरेट फूंकते, कोई किसी लड़की से बात कर रहा होता था. मुझे सिर्फ़ नीड फॉर स्पीड के लेटेस्ट वाले गेम में इन्ट्रेस्ट था. सो मैं स्क्रीन में आंखें घुसाए बैठा रहता था. रात को एक ज़रूरी काम होता था. चाय पीने जाना. कड़ाके की ठण्ड में, कांपते हुए, हम सभी झुण्ड में चाय पीने जाते. पैदल. रास्ते में लोगों के घर पड़ते थे. लखनऊ है, कोई रेगिस्तान थोड़ी कि कोई रहता ही नहीं होगा. अब होता ये है कि लोग-बाग अक्सर शो-ऑफ करने के लिए अपने घरों में घंटी भी लगवा लेते हैं. वरना क्या पहले लोग एक दूसरे के घर नहीं जाते थे? खैर, अब जब घंटी लगी है तो ज़ाहिर सी बात है कि रात के दो-ढाई बजे घंटी बजाना तो बनता है. हर लड़का लाइन से एक-एक घर के सामने खड़ा हो जाता था. और घंटी तब तक बजाता था जब तक किसी एक घर की बत्तियां न जल जायें, या कोई बाहर न आ जाये. फिर जो दौड़ते थे तो चाय वाले ठेले पर ही रुकते थे. इससे जितनी मज़ा आती थी, दौड़ने से उतनी ही गरमी भी आ जाती थी. कई काम एक साथ हो जाते थे. लौंडपने का यही फ़ायदा होता है. फर्जी कामों में भी फ़ायदा निकाल लेते थे. तो हुआ ये कि इस रोज़-रोज़ की चाय, कंप्यूटर गेम, लड़कियों से बातें, घंटी बजाकर भागने के रूटीन से हम आजिज़ आ गए. और फिर किसी ने कहा, "अबे क्या यार रोज़ की वही बकचोदी! कुछ व्यापक सोचो बे भो***." इस घुड़की को हर पाले से समर्थन प्राप्त था. सिगरेट वालों से भी, लड़की से बतियाने वालों से भी, और उस कम्प्यूटर पर गेम खेलने वाले से भी. उसने तो बस मुंडी हिलाई, देख वो अब भी स्क्रीन में ही रहा था. काफ़ी लम्बा विमर्श चला. कि आखिर किया क्या जाए. ऑप्शन गिनाये जाने लगे. हमने पिछले डेढ़ सालों में रात को घर से निकल कर काफ़ी कुछ कर लिया था. मसलन किसी का घर बन रहा था तो उसके घर के सामने से ईंटें उठाकर, सवा घंटे खर्च कर पूरी सड़क पर कुछ चार-साढ़े चार फुट ऊंची दीवार खड़ी कर दी. और ऐसा ही न जाने क्या-क्या. उस रात कुछ बड़ा करना था. उस एक घुड़की में प्रोत्साहन इस कदर कूट-कूट के भरा था कि उसे 'ऐ मेरे वतन के लोगों' में कहीं भी जो फिट कर दिया जाता तो अब तक लाहौर हमारे कब्जे में होता. हर कोई दिमाग लगा रहा था. तरह की बातें कही जा रही थीं. लेकिन आध-एक घंटे तक कुछ न सूझा. फिर धीरे-धीरे बात जमने लगी. मैं भी अपना गेम बंद कर सबके बीच आकर बैठ गया. हर कोई अपना इनपुट देने लगा और प्लान बनके तैयार हुआ. ये सचमुच अब तक का सबसे बड़ा 'काण्ड' होने वाला था. अगर सक्सेसफुल हो गया तो. इस काम के लिए टैलकम पाउडर का एक डब्बा, दो काले कम्बल या शाल चाहिए थे. सब कुछ सनाउर के घर से ही ले लिया गया. हम 11 लड़के निकल पड़े. अलीगंज में एक सेंट्रल स्कूल है. उसके ठीक सामने हनुमान मंदिर है. मंदिर में तमाम लोग सोया करते थे. नियति में आज उनकी एक खराब रात लिखी थी. रमेश और सनाउर के छोटे भाई रज़ाउर ने ऊपर से लेकर नीचे तक खुद को काले कम्बल से ढका. मुंह और बालों में पाउडर पोता. एकदम सफ़ेद. दूधिया. अगर हम कुल 11 न होते तो शायद हम भी उन दोनों से डर गए होते. इन दोनों को छोड़कर बाकी सभी अलग-अलग जगहों पर छुप गए. रमेश और रज़ा धीरे से उन लोगों के बीच पहुंचे और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे. भुतही आवाजों में. उस सीन को यूं बातों में बयान पाना बहुत मुश्किल है. हम जहां कहीं थे, हंस-हंस के लोटे जा रहे थे. वो दोनों दौड़-दौड़ कर हर किसी के पास जा रहे थे. तब तक उन सोये हुए आदमियों में से एक उठा और दौड़ के हनुमान जी की मूर्ति के पास पहुंचा. वहां ज़ोर-ज़ोर से हाथ जोड़ कर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा. हमारे पास कुल 15-20 सेकंड थे. क्यूंकि लोगों की नींद खुलने, उनके डर को हटने और इस हरामखोरी का भेद खुलने में बस इतना ही वक़्त लगने वाला था. वहां लोग भी ज़्यादा थे, ऐसे में हाथ आ जाने पर जम के धुनाई का भी खतरा था. वो 15-20 सेकंड का 'आतंक' एक नम्बर था. हम सभी तुरंत ही वहां से वापस भागे. कुछ लोगों ने हमें दौड़ाया भी लेकिन हम बच निकले. भागने के चक्कर में तुषार की चप्पल वहीँ रह गयी. याद करते हुए अभी भी पेट में तितलियां उड़ रही हैं. करीब तीन-साढ़े तीन किलोमीटर का रास्ता हमने मिनटों में दौड़ के कवर किया. सीधे सनाउर के कमरे में रुके. खूब हंसे. खूब पीठ थपथपाई. इतना शोर हुआ कि घर के सारे लोग जाग गए. गिरोह का पर्दाफाश हुआ. मालूम चल गया कि असल में कौन सी पढ़ाई होती है. अगली सुबह साइकिल चलाते हुए घर जाते वक़्त रास्ते में एक सवाल उठा, "अबे लेकिन वो सब साले सो रहे थे. हमने बेकार में ही परेशान किया उन्हें. इससे अच्छा तो चाय ही पी लेते." बात सेंटी कर गयी. कोई कुछ कह नहीं पा रहा था. जो किया, कई ऐन्गलों से ग़लत था. लेकिन हम सभी मन ही मन अपनी 'सफ़लता' पर प्राउड फ़ील कर रहे थे. तभी मेरे मुंह से निकला "अबे, कोलैटरल डैमेज जैसी भी तो कोई चीज़ होती है. मस्त रहो." कोलैटरल डैमेज. शब्द यहां लागू नहीं होता लेकिन डैमेज कंट्रोल के लिए काफ़ी था. मिलिट्री वाले कंप्यूटर गेम्स खेलने का एक फ़ायदा ये भी था. ऐसे शब्द सीखने को मिलते थे जो गालियों की तरह चलन में नहीं थे. इसलिए गहरा घाव करते थे. सेंट्रल स्कूल की तरफ़ से जब भी निकलता हूं, हनुमान जी के मंदिर को देख मुस्कुराता ज़रूर हूं. अब उसके सामने, स्कूल से थोड़ी ही दूर एक बियर की दुकान खुल गयी है. सोचता हूं आस-पास मौजूद भीड़ में एक-दो कोलैटरल डैमेज आज भी आस-पास होंगे.

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