पुलिया पर लिफ्ट मांगती सफेद चुड़ैल और कॉमरेड तांत्रिक
अथ कैंपस कथा 2: किस्सा नई दिल्ली के JNU का. जिसकी कुछ जगहों को भूतिया माना जाता है.
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फोटो - thelallantop
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'अथ कैंपपहला किस्सा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- जब हॉस्टल के कमरे में राजीव गांधी का भूत बुलाया गया कथावाचकः प्रकाश के रेस कथा' में हम आपको देश के तमाम कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिलचस्प वाकये सुना रहे हैं. ऐसी घटनाएं, अफवाहें, वाकये जिनका न कोई लिखित इतिहास है और न ही कोई कानूनी प्रमाण. मगर वे हैं. अकाट्य श्रद्धा वाले इस मुल्क में होना यूं भी अपनी गुजर खुद खोज लेता है. और मजे की बात देखिए. इनमें कुछ कुछ तो वेदों की तर्ज पर श्रुति परंपरा के आसरे पनप रहे हैं. रास्ते में जोड़ घटाना भी चल रहा है. अपनी सहूलियत और पॉलिटिक्स के हिसाब से. बूढ़े पुराने सीनियर किसी चाय, दारू की अड्डेबाजी में, किसी इनफॉर्मल रीयूनियन में इन्हें सरका देते हैं. तमाम लोग समेट आगे बढ़ाने में जुट जाते हैं.
बात शायद सन 2000 या 2001 की है. नई दिल्ली में बने-बसे जेएनयू का एक इलाका. पश्चिमाबाद. यहां तब कर्मचारियों की कॉलोनी थी. अब भी है. और, अब वहां मास्साब लोगों के भी अपार्टमेंट्स खड़े हो गये हैं. वहां जाने का रास्ता पोस्ट ऑफिस के आगे सर्कुलर रोड से कटकर जाता है. अब तो खूब गहमागहमी रहती है उस रास्ते पर, तब ऐसा नहीं था. शाम 7-8 बजे के बाद पश्चिमाबाद का रास्ता सुनसान हो जाता था. कैंपस के रिंग रोड और कॉलोनी के बीच की सड़क के दोनों तरफ था जंगल. और बीच में एक पुलिया भी. तब ऐसी चर्चाएं आम थीं कि उस रास्ते पर देर रात लक-दक सफेद लहंगे में एक चुड़ैल लिफ्ट मांगती है. जिस दौर का ये प्रकरण है, तब चर्चा को जोर मिल चुका था. यहां तक कियूनिवर्सिटी के सिक्योरिटी विभाग को भी शिकायत की गई थी. ऐप्लिकेशन लिखी गई कि डियर सर, अमुक जगह चुड़ैल लिफ्ट मांगती है. उचित कार्रवाई की जाए. एक बड़े अखबार के किसी कैंपस रिपोर्टर ने इस चर्चा और पर्चा को सूंघ लिया. और बना दी बड़ी सी खबर. अब खबर बननी थी और उसमें कुछ कैंपस के लोगों का बयान भी होना था. बिना नाम-गांव के दो-तीन कोट थे उसमें, जिसमें लोगों ने दावे किये थे कि उन्होंने चुड़ैल को देखा है. लेकिन उस खबर को कैंपस में महाखबर बनाया एक क्रांतिकारी छात्र संगठन के सक्रिय कार्यकर्ता और हिंदी के शोधार्थी के बयान ने. कारण यह था कि वामपंथी भला ऐसी बात की ताकीद क्यों करेगा, अगर उसे सही पता नहीं है तो! दूसरी बात यह थी कि वे महानुभाव खुद ही तांत्रिक थे. नवरात्र में बाकायदा खोपड़ी रख कर तंत्र-मंत्र किया करते थे. ऐसे में उनके बयान की अहमियत थी. आप सोच रहे होंगे. लाल झंडे वाले. वो भी सरकारी नहीं, तो और उग्र. उनका मेंबर ऐसा क्यों करेगा. दरअसल उस टाइम पर्ची कटवाने का एक ही क्राइटेरिया था. कैंपस के सरकारी लेफ्ट का विरोधी होना. आप सबसे बड़े के खिलाफ हैं, तो हमारे साथ हैं. बाकी सब चीजें एडजस्ट हो जाएंगी. इसी लॉजिक के तहत ये तांत्रिक महोदय इंकलाब जिंदाबाद कर रहे थे. उन्होंने स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज में चुनाव भी लड़ा था. खैर, उन्होंने चुड़ैल वाली खबर में अखबार को एक बयान दिया. इसके मुताबिक, पश्चिमाबाद के लोग सही कह रहे हैं. उस रास्ते पर भटकती आत्मा का बसेरा है. लेकिन, वह खतरनाक नहीं है. डरने की जरूरत नहीं है. लगे हाथ उन्होंने लाइब्रेरी के नौंवें फ्लोर और वीसी लॉज जाने वाले रास्तों पर भी पर भी भूतों के होने का जिक्र कर दिया. लाइब्रेरी वाली बात तो बाद में भी सालों तक होती रही थी. कई लोगों के दावे हैं कि लिफ्ट अपने-आप ऊपर चली गई और दरवाजा खुला, बंद हुआ. पता नहीं, फिलहाल क्या स्थिति है. अब बात निकली है तो एक जिक्र और. पेरियार हॉस्टल के एक कमरे में आत्मा की हरकतें होने की बात भी खूब चल रही है कब से. ग्राउंड फ्लोर के इस कमरे में पहले तो ताला डला रहता था. किसी भी स्टूडेंट को अलॉट नहीं किया जाता था. इधर शायद कुछ बरस पहले स्टोर बना दिया गया. वापस लौटते हैं चुड़ैल न्यूज की तरफ. अखबार में आया तो सबने मजे लिए. और आलोचनाओं के दायरे में तांत्रिक छात्र के बहाने वह क्रांतिकारी संगठन भी आ गया. कुछ दिन के बाद संगठन ने कर्मकांडी कॉमरेड को अलविदा सलाम कर लिया. पर भूतों-चुड़ैलों की कथाएं चलती रहीं. कई कहानियां तो पुराने सिक्योरिटी गार्ड भी सुनाते थे. उनकी एक ही सलाह होती थी. अगर आप कभी जनेवि में इधर-उधर भटक रहे हों, और अचानक कुछ अजीब सा अहसास हो, तो वैज्ञानिक बनने की कोशिश मत कीजिएगा, आगे कट लीजियेगा. क्या पता, रिस्क क्यों लेना.


स कथा' में हम आपको देश के तमाम कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिलचस्प वाकये सुना रहे हैं. ऐसी घटनाएं, अफवाहें, वाकये जिनका न कोई लिखित इतिहास है और न ही कोई कानूनी प्रमाण. मगर वे हैं. अकाट्य श्रद्धा वाले इस मुल्क में होना यूं भी अपनी गुजर खुद खोज लेता है. और मजे की बात देखिए. इनमें कुछ कुछ तो वेदों की तर्ज पर श्रुति परंपरा के आसरे पनप रहे हैं. रास्ते में जोड़ घटाना भी चल रहा है. अपनी सहूलियत और पॉलिटिक्स के हिसाब से. बूढ़े पुराने सीनियर किसी चाय, दारू की अड्डेबाजी में, किसी इनफॉर्मल रीयूनियन में इन्हें सरका देते हैं. तमाम लोग समेट आगे बढ़ाने में जुट जाते हैं.