हैवेल्स की हवा आपको 'एंटी रिजर्वेशन' बना सकती है!
पंखों से गर्मी दूर भागती है. पर 'हैवेल्स' के पंखों की हवा आपको रिजर्वेशन विरोधी बना सकती है. क्यों?
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फोटो - thelallantop
पंखों से गर्मी दूर भागती है. पर 'हैवेल्स' के पंखों की हवा आपको रिजर्वेशन विरोधी बना सकती है. क्यों?
'हैवेल्स' का नया ऐड आया है- 'हवा बदलेगी.' चर्चा में है क्योंकि इसमें आरक्षण को 'सीढ़ी' बताया गया है. सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखा यह एंटी रिजर्वेशन और जातिवादी ऐड है. कैसे? पहले आप यह ऐड देखें.
https://www.youtube.com/watch?v=A1TrevAyvvc
यह ऐड आपको हैवेल्स के यूट्यूब चैनल पर नहीं मिलेगा. वहां से हटाया जा चुका है. कंपनी ने सोशल मीडिया पर माफीनामा जारी करके विज्ञापन वापस ले लिया है. लेकिन अंबेडकरवादी ग्रुप्स ने इसे यूट्यूब पर सहेजकर रखा है. ताकि विज्ञापन बनाने वालों के एंटी रिजर्वेशन स्टैंड को उजागर किया जा सके.
हैवेल्स की सफाई: मकसद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था.
'Dr. Ambedkar's Caravan' नाम के चैनल पर यह ऐड है.
तीन सीन/कहानियां हैं. जिनमें समाज में 'बदलाव' दिखाने की कोशिश की गई है. इसके पहले सीन पर बवाल हुआ.
वॉयस ओवर कहता है, यानी विज्ञापन कहता है कि नई पीढ़ी (जिसे बदलाव की हवा कहा गया है) आरक्षण की 'सीढ़ी' नहीं चाहती और अपने दम पर खड़ी है. यानी हाथ घुमाकर कान पकड़ें तो इसका मतलब है कि आरक्षण ले रहे लोग अपने दम पर नहीं खड़े हैं. जैसे आरक्षण लेना कोई रूढ़ि हो. जैसे यह पिछड़ेपन की निशानी हो. जैसे आरक्षण संविधान से अलग कोई चीज हो. जैसे इसे लेने वाले सहारा ले रहे हैं. और न लेने वाले किसी पुरातन परंपरा को ध्वस्त कर रहे हैं. रिजर्वेशन की बहस में 'क्रीमी लेयर' को डिफाइन करने का सवाल जायज मालूम पड़ता है. इस पर बहस होनी चाहिए कि एक संपन्न दलित अफसर/डॉक्टर/इंजीनियर के बेटे को रिजर्वेशन की क्या जरूरत है. इस बात को आधार बनाकर एक दोस्त ने इस ऐड को 'क्रीमी लेयर' की बहस से जोड़ने की कोशिश की. उनकी दलील थी कि कोटा वाला फॉर्म ठुकराने वाली लड़की संपन्न परिवार से होगी. इसलिए अपनी मरजी से वह जनरल का फॉर्म चुनती है तो दिक्कत क्या है? उसके इस कदम से किसी जरूरतमंद को सीट मिलेगी.
लेकिन इस थ्योरी में थोड़ी सी दिक्कत है. यह मेरे मित्र का विशुद्ध अनुमान है. इस लड़की के कपड़ों पर नजर डालें. उस लाइन में लगी बाकी छात्राओं के कपड़ों पर नजर डालें. छात्रा अच्छे आर्थिक बैकग्राउंड से आती है, इसका सबूत देती कोई बात ऐड में नहीं दिखाई गई है. बल्कि उसका पहनावा बहुत ही सिंपल है. उसके पीछे लाइन में लगी लड़कियों से भी साधारण.
पत्रकार दिलीप मंडल ने फेसबुक पर लिखा है कि कंपनी मालिक सवर्ण हैं और यह ऐड उनकी जातिवादी सोच की झलक भर था. उनकी टिप्पणी इस तरह है, 'हैवल्स वाले गुप्ताजी यूं तो मेरिटवादी हैं, और पंखे के विज्ञापन तक में जातिवाद ठेल देते हैं पर उनके लगभग 250 प्रोडक्ट की इनवेंट्री में 30 से भी कम का प्रोडक्शन भारत में होता है. HAVELLS के प्रोडक्ट के अमूमन हर पैकेट में Made in China लिखा मिलेगा. हैवल्स वाले SC, ST, OBC आरक्षण के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. ऐसे में उन्हें बताना चाहिए कि 1958 में कंपनी बनने से लेकर आज तक उन्होंने किस एक चीज का आविष्कार किया है. किसी एक प्रोडक्ट का नाम. आपके पास तो शुद्ध मेरिट है. कितने पेटेंट हैं आपके पास? जीरो. चाइना का बना माल भारत में बेचने वाले, मेरिट की बात करते अजीब दिखते हैं.'
विज्ञापन के बैकग्राउंड में जो गाना चल रहा है, वह इन लाइनों पर खत्म होता है, हवा ऐसे बदलेगी तो इस मुल्क के वे करोड़ों लोग क्या करेंगे जो आज भी ठाकुरों के सामने अपनी खटिया पर नहीं बैठते. मेरे घर में भी हैवेल्स के पंखे लगे हैं. ठीक रहते हैं. पर मैं अब उनका फैन नहीं रहा. विज्ञापन इंडस्ट्री को भी लगे हाथ लताड़ने का मन होता है, जिसे हर चीज पर सामाजिक सरोकार की चमकीली और कच्ची पैकिंग करने की बीमारी लग गई है. लेकिन 'मेन प्रॉब्लम' कुछ और है. वह है देश के ज्यादातर सवर्णों का आरक्षण को लेकर नैसर्गिक नजरिया. यह ऐड उसी की झलक मात्र है. इसमें कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है.
वैसे रिजर्वेशन क्योंकर जरूरी है, इस पर एक जागरूकता प्रोग्राम भारत की 'आरक्षण समर्थक' सरकार करवा सकती है. भारत के कई घरों में हैवेल्स की हवा ही बहती है.
'हैवेल्स' का नया ऐड आया है- 'हवा बदलेगी.' चर्चा में है क्योंकि इसमें आरक्षण को 'सीढ़ी' बताया गया है. सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखा यह एंटी रिजर्वेशन और जातिवादी ऐड है. कैसे? पहले आप यह ऐड देखें.
https://www.youtube.com/watch?v=A1TrevAyvvc
यह ऐड आपको हैवेल्स के यूट्यूब चैनल पर नहीं मिलेगा. वहां से हटाया जा चुका है. कंपनी ने सोशल मीडिया पर माफीनामा जारी करके विज्ञापन वापस ले लिया है. लेकिन अंबेडकरवादी ग्रुप्स ने इसे यूट्यूब पर सहेजकर रखा है. ताकि विज्ञापन बनाने वालों के एंटी रिजर्वेशन स्टैंड को उजागर किया जा सके.
हैवेल्स की सफाई: मकसद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था.
'Dr. Ambedkar's Caravan' नाम के चैनल पर यह ऐड है.
तीन सीन/कहानियां हैं. जिनमें समाज में 'बदलाव' दिखाने की कोशिश की गई है. इसके पहले सीन पर बवाल हुआ.
सीन क्या है?
एडमिशन की लाइन है. जहां फॉर्म मिल रहा है, वहां दो तरह के फॉर्म रखे हुए हैं. एक 'कोटा' और एक 'जनरल' कैटेगरी के लिए. वहां खड़े एक अंकल (जो कौन हैं, स्पष्ट नहीं है), एक लड़की को 'कोटा' वाला फॉर्म पकड़ाते हैं. लेकिन लड़की वह फॉर्म रखकर जनरल कैटेगरी का फॉर्म लेकर चली जाती है.वॉयस ओवर कहता है, यानी विज्ञापन कहता है कि नई पीढ़ी (जिसे बदलाव की हवा कहा गया है) आरक्षण की 'सीढ़ी' नहीं चाहती और अपने दम पर खड़ी है. यानी हाथ घुमाकर कान पकड़ें तो इसका मतलब है कि आरक्षण ले रहे लोग अपने दम पर नहीं खड़े हैं. जैसे आरक्षण लेना कोई रूढ़ि हो. जैसे यह पिछड़ेपन की निशानी हो. जैसे आरक्षण संविधान से अलग कोई चीज हो. जैसे इसे लेने वाले सहारा ले रहे हैं. और न लेने वाले किसी पुरातन परंपरा को ध्वस्त कर रहे हैं. रिजर्वेशन की बहस में 'क्रीमी लेयर' को डिफाइन करने का सवाल जायज मालूम पड़ता है. इस पर बहस होनी चाहिए कि एक संपन्न दलित अफसर/डॉक्टर/इंजीनियर के बेटे को रिजर्वेशन की क्या जरूरत है. इस बात को आधार बनाकर एक दोस्त ने इस ऐड को 'क्रीमी लेयर' की बहस से जोड़ने की कोशिश की. उनकी दलील थी कि कोटा वाला फॉर्म ठुकराने वाली लड़की संपन्न परिवार से होगी. इसलिए अपनी मरजी से वह जनरल का फॉर्म चुनती है तो दिक्कत क्या है? उसके इस कदम से किसी जरूरतमंद को सीट मिलेगी.
लेकिन इस थ्योरी में थोड़ी सी दिक्कत है. यह मेरे मित्र का विशुद्ध अनुमान है. इस लड़की के कपड़ों पर नजर डालें. उस लाइन में लगी बाकी छात्राओं के कपड़ों पर नजर डालें. छात्रा अच्छे आर्थिक बैकग्राउंड से आती है, इसका सबूत देती कोई बात ऐड में नहीं दिखाई गई है. बल्कि उसका पहनावा बहुत ही सिंपल है. उसके पीछे लाइन में लगी लड़कियों से भी साधारण.
पत्रकार दिलीप मंडल ने फेसबुक पर लिखा है कि कंपनी मालिक सवर्ण हैं और यह ऐड उनकी जातिवादी सोच की झलक भर था. उनकी टिप्पणी इस तरह है, 'हैवल्स वाले गुप्ताजी यूं तो मेरिटवादी हैं, और पंखे के विज्ञापन तक में जातिवाद ठेल देते हैं पर उनके लगभग 250 प्रोडक्ट की इनवेंट्री में 30 से भी कम का प्रोडक्शन भारत में होता है. HAVELLS के प्रोडक्ट के अमूमन हर पैकेट में Made in China लिखा मिलेगा. हैवल्स वाले SC, ST, OBC आरक्षण के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. ऐसे में उन्हें बताना चाहिए कि 1958 में कंपनी बनने से लेकर आज तक उन्होंने किस एक चीज का आविष्कार किया है. किसी एक प्रोडक्ट का नाम. आपके पास तो शुद्ध मेरिट है. कितने पेटेंट हैं आपके पास? जीरो. चाइना का बना माल भारत में बेचने वाले, मेरिट की बात करते अजीब दिखते हैं.'
विज्ञापन के बैकग्राउंड में जो गाना चल रहा है, वह इन लाइनों पर खत्म होता है, हवा ऐसे बदलेगी तो इस मुल्क के वे करोड़ों लोग क्या करेंगे जो आज भी ठाकुरों के सामने अपनी खटिया पर नहीं बैठते. मेरे घर में भी हैवेल्स के पंखे लगे हैं. ठीक रहते हैं. पर मैं अब उनका फैन नहीं रहा. विज्ञापन इंडस्ट्री को भी लगे हाथ लताड़ने का मन होता है, जिसे हर चीज पर सामाजिक सरोकार की चमकीली और कच्ची पैकिंग करने की बीमारी लग गई है. लेकिन 'मेन प्रॉब्लम' कुछ और है. वह है देश के ज्यादातर सवर्णों का आरक्षण को लेकर नैसर्गिक नजरिया. यह ऐड उसी की झलक मात्र है. इसमें कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है.
वैसे रिजर्वेशन क्योंकर जरूरी है, इस पर एक जागरूकता प्रोग्राम भारत की 'आरक्षण समर्थक' सरकार करवा सकती है. भारत के कई घरों में हैवेल्स की हवा ही बहती है.

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