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ना बुर्के में इस्लाम है, ना इस्लाम में बुर्का है?

इस मुद्दे पर दोनों ख़ेमों के पास बहस के सिवा सब कुछ है. लड़कियों के लिए गालियां, उन्हें शरीफ़ बन जाने की हिदायत, मारने की धमकियां, जाने क्या-क्या?

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ब्राजील की तस्वीर है. फोटो: रॉयटर्स
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लल्लनटॉप
27 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 27 अप्रैल 2016, 01:29 PM IST)
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Shahnawaz malik1

शाहनवाज़.

फेसबुक पर लुबना ग़ज़ल की बुर्काविरोधी पोस्ट से चली बहस बहुत छिछले अंजाम तक पहुंची. दो धड़े बन गए. लड़कियों के लिए गालियां लिखी गईं. (पूरा माजरा यहां पढ़ें
). इस बुर्का-बहस में एक और टिप्पणी शाहनवाज मलिक ने 'दी लल्लनटॉप' के लिए लिखी है.



क्या सचमुच बुर्के पर कोई बहस चल रही है? फेसबुक पर चल रही लानत-मलामत के बाद मेरा जवाब है...नहीं, इसे बहस नहीं कह सकते. इस मुद्दे पर दोनों ख़ेमों की टाइमलाइन पर बहस के अलावा सब कुछ है. मसलन लड़कियों के लिए गालियां, उन्हें शरीफ़ बन जाने की हिदायत, मारने की धमकियां, मुकदमे की तैयारियां समेत जाने क्या-क्या?
डिस्प्रिन की गोली लेनी पड़ जाएगी अगर इस जूतम-पैजार में कोई गलती से भी दाख़िल हो जाए. दो तरह की बेचैन आत्माएं हैं, थके हुए तालाब के किसी दो छोर की तरह. अपनी-अपनी टाइमलाइन पर पोस्ट गिरा रही हैं, फिर थोड़ा इंतज़ार करने के बाद दूसरे ख़ेमों की टाइमलाइन खंगाल रही हैं कि ज़रा देखूं कि मेरे जवाब में फलाने ने क्या लिखा. लब्बोलुआब ये कि पोस्ट गिरते ही बहस की बजाय तू-तू-मैं-मैं होने लग रही है. थोड़ी गर्मी बढ़ने के बाद लड़के लंपट बना दिए जा रहे हैं और लड़कियां की इज़्ज़त कोठे पर नीलाम हो रही है. पर्दे पर बहस से मर्दों की शिनाख़्त की जा रही है. आख़िर में जाते-जाते दोनों ख़ेमों की आत्माएं एक-दूसरे से कह रही हैं कि अबे तुम जाहिल और तुम्हारा मज़हब जहालत का मरक़ज़. इल्म की घुट्टी तो सिर्फ हमने पी रखी है. इंसाफपसंद तो बस हम हैं. अब आप ख़ुद ही तय करें कि ये बहस है या मुर्ग़े-मुर्ग़ियों का दड़बा?
होना तो ये चाहिए था कि ढंग से तैयारी के साथ बात होती. कम से कम शीबा असलम और कविता कृष्णन सरीखी आलिमों को ही इससे जोड़ लेते. ख़ुदा की कसम बात निकलती तो कम से कम दो चार लोगों के ज़ेहन का जाला ज़रूर साफ़ होता. मगर हुआ इसका उल्टा. इस तूतू-मैं-मैं ने ऐसा नरक मचाया कि बस पूछिए मत. फेसबुक पर हाथ जोड़ना पड़ गया कि भाइयों-बहनों...अब बस भी करो. अमन की अपील करने वालों में दोस्त निदा रहमान, शबनम ख़ान और सीमा आरिफ़ भी शामिल रहीं. ख़ैर, मसअला सिर्फ इतना है कि बुर्का पहना जाए या उसे 18वीं सदी का एक चिथड़ा मानकर गटर में बहा दिया जाए.
यही बात फेसबुक पर रखी गई थी कि हथियारों से लैस दूसरा ख़ेमा मैदान में कूद पड़ा. उसने कहा कि ये हमारा ज़ाती मसअला है. ये भी कि तुम्हें बुर्के से ज़्यादा इस्लाम और मुसलमानों से परेशानी है. मैंने तुम्हारी नीयत नाप ली है. चोर की दाढ़ी में तिनका पकड़ा लिया है. इस दावे में एक हद तक सच्चाई भी है. ये नाचीज़ भी थोड़ी-बहुत नज़र बनाए हुए था. दोनों तरफ के जज़्बात देखने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि जब सरगर्मी इस कदर है तो क्यों ना दो चार लतीफ़े लिखकर मैं भी बहती गंगा में हाथ धो लूं. ईमान से कह रहा हूं कि मैंने बस इतना ही किया. पूरी बहस से बुर्के के अलावा निक़ाब, हिजाब, ख़िमार, अबाया, चादर, शायला और अल-आमिरा का ज़िक्र गायब था. ये पर्दे की अलग-अलग शक्लें हैं. हम इनके फर्क़ और बारीकियों पर भी बात कर सकते थे ताकि कारवां कुछ आगे बढ़ता. इस पहलू पर मेरा ज़ोर इसलिए है कि किसी तहज़ीब की जड़ें तलाशे बिना उस पर बहस-मुबाहिसा हवा में तीर चलाने जैसा है. जो ख़ेमा ख़ुद को रेश्नलिस्ट या नास्तिक मान रहा है, उसे ज़्यादा पढ़ने की ज़रूरूत है ताकि वो दुश्मनों को ढंग से ललकार सके. मगर मज़े की बात है कि वो इस पर मिनिमम होमवर्क भी करने की बजाय इसे सीधे रिजेक्ट कर रहा है. मतलब कि गंगा ही उल्टी बहाने की कोशिश की जा रही है.
मेरा तजुर्बा है कि इस्लाम के वजूद, उसकी तारीख़ और तहज़ीब को रिजेक्ट करके उस समाज में घर कर गईं बुराइयों को निकालना ज़रा टेढ़ा काम है. थोड़ा बहुत तो कनविंस करना ही पड़ेगा कि देखो इस्लाम ये है और बुर्के के नाम पर औरतों को जिस तरह हांका जा रहा है, वो कुछ मर्द टाइप बदमाशों की कारस्तानी है, इस्लाम नहीं. मैंने मुहम्मद साहब की ज़िंदगी को जितना समझा, उसके बाद पूरे ईमान से कह रहा हूं कि वो दुनिया की किसी भी औरत को इस तरह बुर्के में क़ैद नहीं देख सकते थे. वो भी इस्लाम और उसकी तहज़ीब के नाम पर जिसकी वजह से उनके ज़माने में औरतों को सिर उठाकर, कंधे से कंधा मिलाकर चलने का मौक़ा मिला. इस्लाम में ना तो बुर्का है और ना ही निकाब टाइप कोई लफ्ज़. इसे ही समझना है कि आख़िर पर्दे से मुहम्मद साहब की मुराद क्या थी. उन्होंने क्या फरमाया और कुरआन में क्या हिदायत दी गई. कमाल ये है कि क़ुरआन में ना सिर ढंकने का हुक्म है, ना चेहरा और ना ही पांव. अरबी का एक लफ्ज़ जुयूब ज़रूर आया है जिसे अंग्रेज़ी में क्लीवेज कहते हैं.
सूरह 24 की 31वीं आयत में कहा गया है कि इसे ढंक लो. अब जब क़ुरआन में जुयूब का ज़िक्र आ सकता है तो बदन के दो-चार हिस्से और क्यों नहीं शामिल किए जा सकते थे? मेरे ख़्याल में यही समझने वाली बात है कि मुहम्मद साहब ने औरतों को ऊपर से नीचे तक ढंकने के लिए कहा या फिर अपनी उम्मत को कपड़ा पहनने और हमलावरों से महफूज़ रहने का तरीक़ा बता रहे थे. एक दूसरी मिसाल सूरह 33 की 59वीं आयत में मिलती है. इसमें कहा गया है कि कपड़ा लंबा होना चाहिए. इस लंबे कपड़े का कोई ख़ास डिज़ाइन नहीं बताया गया है. मतलब कि आपकी कमीज़ लंबी है तो इस्लामिक नज़रिए से बिल्कुल दुरुस्त है. क़ुरआन में हिदायत शालीन पहनावे को लेकर है, औरत-मर्द दोनों के लिए. सलवार कमीज़ काफी है. कोई शर्त नहीं कि सिर पर दुपट्टा रखा जाए, हिजाब या बुर्का पहना जाए. इसे ना तो इसे पहनने की मजबूरी है और ना ही फर्ज़ करार दिया गया है.
हालांकि कमोबेश सभी मज़हबों में सिर ढंकने की तहज़ीब भी चलन में है. मैंने कभी नहीं सोचा था कि इस पर कभी लिखना पड़ेगा लेकिन लिखने के लिए पढ़ना पड़ा. इस सफर में मज़ा बहुत आया लेकिन कुछ सियासी बदमाशियों का भी पता चला. यहां ज़िक्र करूंगा तो हम भटक जाएंगे. इसलिए उस पर कभी अलग से. बुर्का यकीनन तकलीफदेह है मगर सिर्फ बुर्के की वजह से ऐसी औरतों को कमतर और कमज़ोर समझने वाला तंग नज़रिया भी उतना ही शर्मनाक है. बुर्का परेशानी है लेकिन सारी परेशानियों की जड़ नहीं है. सिर्फ इसे उतरवा देने से ही सभी मसअले हल नहीं हो जाते. बुर्का पहनी औरत की इस हालत पर आप उन्हें गले लगाकर रो सकते है लेकिन डंडे से पिटाई या बेइज़्ज़त करने का हक़ किसी को नहीं है. ऐसा करेंगे तो उनकी आज़ादी का हिमायती यह कमबख़्त ही बीच में टांग फंसा देगा. बुर्का ज़ुल्म है और उसे पहनने वालियों पर ताने कसना उससे भी बड़ा जुर्म है. कहीं धमकाकर पहनाया जा रहा है तो कहीं बुरा कहकर उनके बुर्के को जबरन खींचा जा रहा है. दोनों तरफ से पिटी औरत ही. अब ये भी कोई बात हुई?
कोई दिल पर ना ले लेकिन फेसबुक पर बहस लिजलिजी रही. चाहता हूं कि इससे भी बुरा लफ्ज़ लिख दूं. जब हज़रत ज़ैनब पैदा हुईं तो अल्लाह के रसूल सफ़र में थे. घर लौटते ही वो हज़रत ज़ैनब का माथा चूमते हुए रोने लगे कि हसन और हुसैन के बाद घर में कोई लड़की आई है लेकिन यहां उसी ज़ात को रंडी और रंडी की औलाद बना दिया गया. ख़ैर, मौला से यही दुआ है कि दोनों तरफ की बेचैन रूहों को इल्म दे. इनके कुंद ज़ेहन को रौशन कर दे.


ये लेखक के निजी विचार हैं. 'दी लल्लनटॉप' इससे सहमत हो, जरूरी नहीं.
 

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