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केजरीवाल के साथी ने किया था पंजाब के सबसे बड़े जेल ब्रेक का खुलासा

जानें अंदर की पूरी कहानी, उसी की जुबानी.

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फोटो - thelallantop
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रजत सैन
29 नवंबर 2016 (Updated: 26 अप्रैल 2017, 03:39 AM IST)
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पंजाब की नाभा जेल में बीते दिनों जो घटना घटी, वो किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं. 4 गाड़ियों में भर कर करीब 20 बंदूकधारी आए और इस हाई सिक्योरिटी जेल से 6 कैदियों को छुड़ाकर ले गए. इन कैदियों में कुख्यात आतंकवादी और गैंगस्टर शामिल हैं. यहां पर एक खास बात ध्यान देने लायक है. ये सभी कैदी जेल में भी मोबाइल इस्तेमाल करते थे. जेल में रहते हुए भी इनका कहर और आतंक बाहर वालों पर बना रहे, इसलिए फेसबुक पर कभी अपनी फोटो डालते तो कभी स्टेटस अपडेट करके अपने जुर्म कबूलते. इस बारे में लगातार खबरें भी छपती रहीं
, लेकिन किसी के कान पर जूं तक ना रेंगी. मीडिया ने कई बार सवाल किए, लेकिन जेल अधिकारियों के पास एक ही जवाब था. "हम जांच कर रहे हैं."

पर देखिए, इन कैदियों ने आपका (जेल अधिकारियों का) काम बढ़ा दिया. अब जेल में इस्तेमाल हो रहे मोबाइल फोन के साथ-साथ इस बात की भी जांच कीजिएगा कि कैसे 20 बंदूकधारी जेल एरिया में घुसे. सिक्योरिटी में सेंध लगाई. गोलियां बरसाईं. अपने साथियों को लेकर फरार हो गए. और आप अंदर खड़े हवाई फायरिंग ही करते रहे. कम से कम मेहमानों को बाहर तक छोड़ने तो आ जाते. खैर "जांच जारी है" और सर्च ऑपरेशन भी चलाया जा रहा है. मिंटू दिल्ली से पकड़ा भी गया है. बादल सरकार पर इन कैदियों को दोबारा पकड़ने का दबाव भी होगा, 2-3 महीने बाद इलेक्शन जो हैं.


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पंजाब की नाभा जेल से ये 6 कैदी फरार हुए थे. (क्रेडिट:दैनिक भास्कर)

इस से पहले एक जेल ब्रेक और हुआ था पंजाब में. जगह थी चंडीगढ़ के पास बुड़ैल की मॉडल जेल. तारीख थी 22 जनवरी, 2004. हमें पता चला 23 जनवरी की सुबह. अच्छे-खासे बड़े और बोल्ड फॉन्ट में दी ट्रिब्यून की हेडलाइन थी, Beant case accussed flee. 8वीं क्लास में पढ़ता था तब मैं. स्कूल जाने से पहले ब्रेकफास्ट करते वक्त न्यूज़पेपर पर नज़र मारने की आदत थी. तब तक मैं सिर्फ पंजाब के पूर्व सीएम बेअंत सिंह को ही जानता था. उनके कातिलों को नहीं. लेकिन उस हेडलाइन के नीचे छपे चारों फरार कैदियों के नाम और शक्ल ज़हन में ऐसे बैठे कि दिन भर स्कूल में भी याद रहे. बड़ा सरप्राइज़िंग और इंट्रस्टिंग लग रहा था कि कैसे जेल से 94 फुट लंबी सुरंग खोद कर खूंखार आतंकवादी फरार हो गए.


tribune
बुड़ैल की मॉडल जेल (फोटो: The Tribune)

1995 में पंजाब के 12वें मुख्यमंत्री रहे बेअंत सिंह को चंडीगढ़ के सेक्रेटेरिएट कॉम्प्लेक्स में ह्यूमन बम से मार दिया गया. बब्बर खालसा  के आतंकवादी दिलावर सिंह जैसिंहवाला ने वारदात को अंजाम दिया. आत्मघाती हमलावर के बैक-अप में बलवंत सिंह राजोआणा और साज़िश रचने वाले जगतार सिंह हवारा, जगतार सिंह तारा और परमजीत सिंह भिओरा को कुछ टाइम बाद गिरफ्तार कर लिया गया. राजोआणा को छोड़ बाकि तीनों आरोपियों को बुड़ैल की मॉडल जेल में रखा गया. जेल के उस 15 फुट चौड़े और 22 फुट लम्बे कमरे में उनकी देवी सिंह नाम के शख्स से मुलाकात हुई. वो हत्या के आरोप में सज़ा काट रहा था. आप इस तालमेल पर गौर फरमाइए. कुख्यात आतंकियों के साथ एक ऐसे शख्स को बंद किया गया, जिसने एक कत्ल किया था. बड़े और छोटे अपराधियों का एक ही कमरे में रहना महज़ एक इत्तेफाक नहीं होता. दरअसल छोटे-मोटे अपराध करने वालों को बड़े अपराधियों के साथ उनकी सेवा करने के लिए रखा जाता है. तो भला देवी सिंह इन तीन बब्बर खालसा आतंकियों का हाथ कैसे ना बंटाता.


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मोहाली जेल ब्रेक के ग्राफिक्स. (फोटो: The Telegraph)

कहा जाता है कि इन तीनों आतंकियों की जेलर और उच्च पुलिस अधिकारियों से अच्छी बोलचाल थी. इतनी कि जब किसी ने जेल अधिकारियों तक सुरंग खोदे जाने की बात भी पहुंचाई तो उसे हल्के में लेकर टाल दिया गया. और ऐसा केवल एक बारी नहीं हुआ. साल 1998 और 2002 में भी खबरें आईं कि हवारा एंड ग्रुप जेल में सुरंग खोद कर भागने को तैयार है. लेकिन आप पुलिस और इन आतंकवादियों का याराना तो देखिए, पुलिस बार-बार नकारती रही और इन आतंकियों के हौंसले बुलंद होते रहे. दीपक बाजपेयी, जिन्होंने जनवरी 2004 में जेल ब्रेक की खबर को सबसे पहले डिसक्लोज़ किया, इस वक्त आम आदमी पार्टी के मीडिया सेल के मुखिया हैं. वे बताते हैं कि उन्होंने इस घटना के होने से पहले जेल ब्रेक पर एक सिरीज़ की थी. उनके अखबार में लगातार कई दिन फ्रंट पेज पर खबर लगाई गई कि बुड़ैल जेल में सुरंग खोदने का काम चल रहा है. फोटो बनाकर एग्ज़ेक्ट बताया गया कि सुरंग कहां से कहां जा रही है. अब अखबार में खबर छपी थी तो जांच का दिखावा करना भी ज़रूरी था. सीबीआई, चंडीगढ़ पुलिस, IB की टीम आई. जेल सुप्रिटेंडेंट से मिले. बातचीत की. मेन गेट के पास अपना टेबल चेयर लगाया और जेल के अंदर तक जाने की ज़हमत नहीं उठाई. कहा गया कि जेल में कोई सुरंग नहीं है. रिपोर्टर ने जेल सुप्रीटेंडेंट से आपसी मतभेद के चलते ये खबर की है.


यहां पर ये बताना ज़रूरी है कि एक तरफ तो प्रशासन को हवारा एण्ड ग्रुप के भाग जाने का डर इतना सताता था कि उनको ट्रायल के लिए भी कोर्ट नहीं ले जाया जाता था. कोर्ट जेल में ही लगती थी. और वहीं दूसरी तरफ दो बार रेड करने पर इनके पास से सिम कार्ड बरामद हुए. दो टेलीविज़न तो जेल सुप्रीटेंडेंट ने खुद ही दे रखे थे.

फिर आई 22 नवम्बर 2004 की सुबह. 2 बजे तीनों आतंकी और देवी सिंह 14 फुट गहरी, 2.5 फुट चौड़ी और 94 फुट लम्बी सुरंग खोदकर फरार हो गए. और ज़ाहिर सी बात है कि इतनी लम्बी सुरंग एक-दो दिन में खुदी नहीं होगी. एक्सपर्ट्स की मानें तो इस काम में कम से कम 6 महीने लगे होंगे. हैरानी की बात ये है कि इतनी लम्बी सुरंग खोदने के बाद जो मिट्टी निकलती थी, वो जाती कहां थी. इन आतंकियों के लिए जेल से सेफ जगह क्या हो सकती थी. सुरंग से मिट्टी निकाल-निकाल कर अलमारी के पीछे डालते रहे. हालांकि पुलिस का कहना था कि इस मिट्टी को वो जेल से पानी के साथ बहा दिया करते थे. एक खास बात और हुई उस रात. दो बार जेल की लाइट गई और जेनरेटर भी फेल हो गया. दरअसल इनका एक साथी नारायण सिंह चौरा जेल के बाहर खड़ा बिजली गुल करने का ही बंदोबस्त कर रहा था. कुछ ही दिन पहले वो हवारा को जेल में मिलने भी आया था. उसी दिन इस घटना को अंजाम देने की तारीख तय की गई थी.


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बुड़ैल जेल ब्रेक केस की जांच करती टीम. (फोटो: Hindustan Times)

आप जेल में बैठे इन आतंकियों का आतंक तो देखिए, ये लोग किसी पुलिस अधिकारी को अंदर घुसने तक नहीं देते थे और इसके पीछे भी पुलिस वालों के पास एक दलील थी. उनका कहना था कि तीनों कैदी सिख अमृतधारी हैं और ऐसे में किसी गैर-अमृतधारी के अन्दर आने से उन्हें (कैदियों को) परहेज़ है.

22 मार्च की सुबह पत्रकार दीपक बाजपेयी को इनके एक मित्र ने (जो कि जेल में ही काम करते थे) ने सुबह 6 बजे फोन किया और कहा "वो चारों तो आपकी सुरंग से भाग गए." दीपक ने हैरान हो कर पूछा कि तू पी (शराब) तां नहीं रखी. आगे से जवाब आया कि मैं इस वक्त मोहाली बस स्टैंड पर खड़ा हूं. सर्च ऑपरेशन जारी है. जेल टीम चंडीगढ़ और मोहाली में जगह-जगह छापे मार रही है. इस में भी एक कमाल की बात थी. इन आतंकियों को फरार हुए अब तक 4-5 घंटे हो चुके थे, लेकिन उच्च अधिकारियों को इत्तिला तक नहीं की गई थी. जेल सुप्रीटेंडेंट को लगा कि अपने ही आदमियों को भेज कर किसी तरह हवारा एंड ग्रुप को वापस गिरफ्तार कर लिया जाए. वो क्या है ना, बड़े बुज़ुर्ग समझाकर गए हैं कि घर की बात घर में ही रह जाए तो बेहतर है.

लेकिन जब पानी सिर से ऊपर निकलने लगा और पत्रकारों के फोन खड़कने लगे तो शाम तक इस कांड को जग-ज़ाहिर करना पड़ा.  पुलिस सर्च ऑपरेशन में जुटी रही और करीब डेढ़ साल बाद हवारा को गिरफ्तार कर लिया गया. जेल से फरार होने के दौरन वो कुछ समय संगरूर में भी रुका हुआ था, जो बुड़ैल जेल से सिर्फ 120 किलोमीटर दूर थी. बिजली गुल करने वाला नारायण सिंह सबसे पहले गिरफ्तार हुआ. फिर हवारा और तारा. परमजीत सिंह भिओरा को फरार होने के करीब 10 साल बाद गिरफ्तार किया गया. और चौथा आरोपी देवी सिंह अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. देवी आज-कल पाकिस्तान में है और उसने सिख धर्म अपना लिया है. वहां पर वो दूध का कारोबार कर रहा है. और बेहंत हत्याकांड के मुख्य आरोपियों में से एक जगतार सिंह हवारा श्री अकाल तख्त के जत्थेदार हैं.


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गिरफ्तारी के बाद जगतार सिंह हवारा और परमजीत सिंह भिओरा.

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