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किस्सा बुलाकी साव-9, बेंता चौक पर अगरबत्ती देकर हंस खरीदते थे मनोज बाबू

मनोज बाबू अगरबत्ती बेचते थे. फणीश्‍वरनाथ रेणु के परमभक्‍त थे. रेणु जी की मोहब्‍बत में औराही-हिंगना का तीर्थ कर आये थे.

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30 मई 2016 (अपडेटेड: 30 मई 2016, 09:45 AM IST)
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फोटो क्रेडिट- सुमेर सिंह राठौड़
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Avinash Das अविनाश दास

अविनाश दास पत्रकार रहे. फिर अपना पोर्टल बनाया, मोहल्ला लाइव  नाम से. मन फिल्मों में अटका था, इसलिए सारी हिम्मत जुटाकर मुंबई चले गए. अब फिल्म बना रहे हैं, ‘आरा वाली अनारकली’ नाम से. पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है. कविताएं लिखते हैं तो तखल्लुस ‘दास दरभंगवी’ का होता है. इन दिनों वह किस्से सुना रहे हैं एक फकीरनुमा कवि बुलाकी साव के, जो दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आ रहा है. किस्सों की आठ किस्तें आप पढ़ चुके हैं. जिन्हें आप यहां क्लिक कर पा सकते हैं.
 हाजिर है नौवीं किस्त, पढ़िए.


पढ़ नहीं रहा, डूब रहा हूं. मर रहा हूं. बेंता चौक पर पत्र-पत्रिकाओं की एक छोटी सी गुमटी थी. वहां हंस पत्रिका आती थी. हमारे शहर के ही एक प्रोफेसर रामधारी सिंह दिवाकर की कहानियां कभी-कभी उनमें छपती थीं. वह सीएम आर्ट कॉलेज में हिंदी पढ़ाते थे. और कंधे तक झूलते बाल रखते थे. खैर, मैं उस गुमटी के बारे में बता रहा था. वहां एक दिन उजला पाजामा और पीली कमीज पहने एक व्‍यक्ति को हंस पत्रिका खरीदते हुए देखा. देखा कि वह अगरबत्तियों के कुछ पैकेट देकर पत्रिका का दाम चुका रहा है. इस पूरे दृश्‍य की सुगंध मेरी आत्‍मा में फैल गई. मैंने हाथ पकड़ कर उन्‍हें अपनी तरफ घुमाया और उनके गले लग गया. हालांकि हमारे शहर में गले लगा कर प्‍यार जताने का कोई रिवाज नहीं था. वह मनोज बाबू थे. वहीं पास के एक लॉज में रहते थे. मुझे अपने कमरे तक साथ ले गये. कमरे में एक चौकी थी. चौकी पर एक पुरानी चादर बिछी थी. नीचे गद्दा नहीं था. सिरहाने के पास एक तकिया पड़ा था. मनोज बाबू स्‍टोव जला कर चाय बनाने लगे. मैं चौकी पर बैठ कर कमरे में चारों तरफ देखने लगा. एक कोने में एक बोरी रखी थी, जिसमें अगरबत्तियों के पैकेट बंधे थे. मैंने पालथी लगाई और गोद में रखने के लिए जैसे ही तकिया उठाया, नीचे से मैला आंचल की एक फटी हुई कॉपी जमीन पर गिरी. तब तक मनोज बाबू स्‍टील के दो ग्‍लास में चाय लेकर आ गये थे. चौकी पर चाय रखकर उन्‍होंने नीचे से किताब उठायी और मेरी तरफ बढ़ाई. मैं हाथ में लेकर उसके पन्‍ने उलटने-पुलटने लगा.
"तो आप मैला आंचल पढ़ रहे हैं?" "पढ़ नहीं रहा, डूब रहा हूं. मर रहा हूं. बार-बार मर रहा हूं. और फिर से जी रहा हूं."
मनोज बाबू अगरबत्ती बेचते थे. फणीश्‍वरनाथ रेणु के परमभक्‍त थे. रेणु जी की मोहब्‍बत में औराही-हिंगना का तीर्थ कर आये थे. हमारी दोस्‍ती आज भी बदस्‍तूर जारी है. हम आज भी बात करते हैं. मैं अपनी यात्राओं की बात करता हूं. मनोज बाबू सिर्फ और सिर्फ फणीश्‍वरनाथ रेणु की बात करते हैं.
तो आगे किस्‍सा ये है कि एक बार मनोज बाबू गुदड़ी बाज़ार में मिले. सब्‍जी खरीदकर लौट रहे थे. उनकी आंखों पर काजल लगा था. बताया कि इसी लगन में उनका ब्‍याह हुआ. उनकी पत्‍नी बहुत प्‍यारी थी. मुझ पर ढेर सारा स्‍नेह उंड़ेलती थी. मनोज बाबू के सामने ही उनकी शिकायत भी करती थीं कि इनसे कहिए आधी आधी रात तक न पढ़ा करें. आंख कमजोर हो जाएगी. एक बार मेरे घर भी आयीं. मेरी बहनों नेे उन्‍हें सूजी का हलवा खिलाया था. कुछ दिनों बाद मनोज बाबू की पत्‍नी बीमार हो गयीं. बीमारी लंबी चली. हीमोग्‍लोबिन तीन से नीचे आ गया. उन्‍हीं दिनों एक नया प्राइवेट अस्‍पताल बना था, आरबी मेमोरियल. वहां उन्‍हें भरती कराया गया. उन दिनों मैं बांछारामेर बागान (बगिया बांछाराम की) का रिहर्सल कर रहा था. तो मनोज बाबू से ज्‍यादा मुलाकात नहीं हो पाती थी.
कुछ दिनों बाद लाइट हाउस सिनेमा के सामने मनोज बाबू दिखे. सिर मुंडा हुआ था. उनके साथ बुलाकी साव भी खड़ा था. मैंने चौंक कर पूछा, "बुलाकी तुम? मनोज बाबू के साथ?" जवाब मनोज बाबू ने दिया कि उन दोनों की मुलाकात आरबी मेमोरियल अस्‍पताल में हुई. बुलाकी साव किसी मरीज को पहुंचाने अस्‍पताल गया था, तो सीढ़ी पर मनोज बाबू रोते हुए मिले. पत्‍नी की तबीयत संभल नहीं पायी थी और वह चल बसी थी. अस्‍पताल ने लाश देने से मना कर दिया था, क्‍योंकि बिल जमा नहीं किया गया था. बुलाकी साव के लिए मनोज बाबू अनजान थेे. लेकिन एक अनजान आदमी के दर्द से हिला हुआ वह लौट कर आने की कह कर दो घंटे के लिए गायब हो गया. लौटा तो हाथ में रुपये थे. मनोज बाबू की आंख में अब पहले से ज्‍यादा आंसू थे.
इस पूरे प्रसंग ने मुझे अंदर तक मथ कर रख दिया. मुझे ग्‍लानि भी महसूस हुई कि इस बीच मैं एक बार भी मनोज बाबू का हालचाल लेने उनके पास नहीं गया. हम लाइट हाउस से विदा हुए तो बुलाकी मेरे साथ चल र‍हा था. मेरी खामोशी की समझ उसे सबसे ज्यादा थी. हम पैदल चल रहे थे. उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और एक कविता सुनानी शुरू की. कुछ इस तरह थी वो कविता...

जो हमारे और सबके सामने है बहुत सीधा नहीं है वह दृश्‍य आज भी छिप कर चबेना खा रहे हैं गांव में और शहर में अस्‍पृश्‍य

अफ़सरों के हैं गुलाबी गाल करो तुम हक के लिए हड़ताल या करो तुम आमरण अनशन कोठियों में सड़ेंगे राशन

जो हमारे और सबके सामनेे है बहुत सुलझा नहीं है वह जाल रंग अपने रंग खोते जा रहे गुमशुदा है हरा नीला लाल

टांग दो दीवार पर नारे कुछ करो कुछ तो करो प्‍यारे हम चले नुक्‍कड़ पे पीने चाय क्‍या करें जब मुल्‍क ही निरुपाय

जो हमारे और सबके सामने है बहुत सीधी नहीं है यह राह अमीरों की ठाठ के नीचे छिड़क दो कुछ ग़रीबों की आह




 
बुलाकी साव के किस्सों की पिछली आठ कड़ियां यहां हैं-  

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