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किस्सा बुलाकी साव-4, भाजपा में अवैतनिक कार्यकर्ता हो गया बुलाकी

एक आदमी था फकीर टाइप का. रोज नई-नई कविताएं सुनाता था. एक रोज मेरे चाचा ने उसे दो-तीन थप्‍पड़ लगाये.

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25 मई 2016 (अपडेटेड: 27 मई 2016, 08:29 AM IST)
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Avinash Das
अविनाश दास

अविनाश दास पत्रकार रहे. फिर अपना पोर्टल बनाया, मोहल्ला लाइव  नाम से. मन फिल्मों में अटका था, इसलिए सारी हिम्मत जुटाकर मुंबई चले गए. अब फिल्म बना रहे हैं, ‘आरा वाली अनारकली’ नाम से. पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है. कविताएं लिखते हैं तो तखल्लुस ‘दास दरभंगवी’ का होता है. इन दिनों वह किस्से सुना रहे हैं एक फकीरनुमा कवि बुलाकी साव के, जो दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आ रहा है. किस्सों की अगली किस्त हाजिर है, पढ़िए.


  बुलाकी ने मुझसे कहा वो स्त्री है  बुलाकी साव से मेरी दोस्‍ती का दिलचस्‍प किस्‍सा है. पड़ोस के आठ गांवों (अठगामा) में उस जैसा अरिपन बनाने वाला कोई नहीं था. हालांकि यह औरतों के हिस्‍से में आने वाली विशेष चित्रकला है - लेकिन बुलाकी साव ने इसी कला में विशेषज्ञता हासिल की थी. वह अक्‍सर मुझसे कहता था कि मैं दरअसल स्‍त्री हूं. ईश्‍वर की किसी गलती से पुरुष जाति में पैदा हो गया. बहरहाल, मेरे आंगन में जब भी कोई शुभ काम होता था, बुलाकी साव को बुलाया जाता था. वह पिठार (पिसे हुए चावल का बारीक घोल) से घर के हर दरवाजे पर फूल, पत्ती, चिड़ि‍या, मछलियों का खूबसूरत संसार रच देता था. उस वक्‍त मेरी उम्र दस बारह साल की रही होगी. जब बुलाकी साव अपनी कलाकारी में मगन रहता था, मैं उसके पीछे बैठ जाता. मिट्टी पर पिठार की रेखाएं उकेरते हुए वह एक गीत गुनगुनाता था. शब्‍द मेरी पकड़ में नहीं आते थे, लेकिन धुन दिल पर धम-धम की तरह बजती थी. अच्‍छा लगता था. थोड़ा बड़े होने और शब्‍दों से दोस्‍ती हो जाने के बाद अक्‍सर मैं उससे वह गीत सुनता था. वह एक फिल्‍मी गीत था और उसके बोल थे - "दिल मेरा एक आस का पंछी, उड़ता है ऊंचे गगन पर; पहुंचेगा एक दिन कभी तो, चांद की उजली जमीं पर।" बुलाकी साव चांद की उजली जमीन पर पहुंचा या नहीं - नहीं मालूम, पर मैंने अपनी आंखों से देखा कि उसने किसी भी आंगन के कोने-अंतरे में अरिपन बनाना छोड़ दिया. इस काम के बदलेे उसे हर घर से तीन सेर अनाज मिलता था. महंगाई जब बढ़ी, तो उसने तीन सेर की जगह पांच सेर अनाज की मांग की. मेरे एक चाचा ने उसे बुरी तरह लताड़ा और दो तीन थप्‍पड़ भी लगाये. वह दिन और मेरे दरभंगा छोड़ने का आख़ि‍री दिन, मैंने कभी बुलाकी साव को अरिपन बनाते नहीं देखा. उसके पास उदास कविताएं भी थीं.

नदी के पार वह संसार जिसमें रास्‍ते हैं फूल-परियों तक पहुंचने के दिखाई दे रहे हैं पर नहीं है नाव कोई भी उजाले मर रहे हैं शाम की चट्टान से लड़ कर परिंदो! काम से लौटो चलो अब गांव कोई भी
बकरियां गाय पारा बैल सब खूंटे के आशिक़ हैं उन्‍हें मालूम है जन्‍नत से दोज़ख़ और फिर दोज़ख़ से जन्‍नत का पता लेकिन उन्‍हें तो बीच में बस टूंगते रहना है जंगल-झाड़ के सूखे-हरे पत्ते
हमें मालूम है हम तैर सकते हैं मगर पानी पे परियों ने लगा रखा है कांटों का बड़ा बाड़ा
ये परियां कौन हैं? सुख के सितारे झिलमिलाते से!
हमें ग़म का लबादा ओढ़ कर जीना है मरना है कि हम तो आदमी हैं इश्‍क हमको मार देता है!!!
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सझुआर टोले में पंचर बनवाता मिला बुलाकी जब मैं अठारह साल का हुआ, उसके बाद के चुनाव में नरसिम्‍हा राव प्रधानमंत्री बने थे. पर मैंने उन्‍हें प्रधानमंत्री नहीं बनाया था. मेरे घर पर तो लोक लहर पत्रिका आती थी. हमारे जिले से विजयकांत ठाकुर सीपीएम के उम्‍मीदवार थे. मैं बहुत उत्‍साह से वोट डालने गया था, लेकिन मेरा वोट पहले ही पड़ चुका था. बिना निशान वाला खाली अंगूठा लेकर बेहद उदास मैं अपने गांव से बाहर पोलो मैदान की तरफ निकल आया. वहीं किशोरी भैया की साइकिल पंचर की दुकान थी, जहां बुलाकी साव अपने गांव के सझुआर टोले के किसी लड़के की साइकिल का पंचर ठीक कराने आया था. पास से गुजरा तो उसने झकझोरा, "क्‍या मुन्‍ना, तुम्‍हारा भी पंचर निकल गया न!" उसकी बात पर इतना गुस्‍सा आया कि बता नहीं सकता. लेकिन बुलाकी साव ने कहा, "मेरा भी पंचर निकल गया. हम भी भोट नहीं डाल पाये." उसने अपना खाली अंगूठा दिखाया, तब जाकर तसल्‍ली हुई. उसने बताया कि जिस साल वह पैदा हुआ, उसी साल प्रजातांत्रिक सोशलिस्‍ट पार्टी बनी थी. लेकिन जब वह बड़ा हुआ, तो वह पार्टी थी ही नहीं. एक बार मैथिली के विराट कवि सुरेंद्र झा सुमन से मिला. सुमन जी जनसंघ के संस्‍थापकों में से थे और इसी पार्टी से चुनाव भी लड़ चुके थे. तो जब भारतीय जनता पार्टी की स्‍थापना हुई, तो वह इस पार्टी का अवैतनिक कार्यकर्ता हो गया. एक रात पार्टी दफ्तर में रुका. उसी रात जिला अध्‍यक्ष ने उसकी पैंट उतारने की कोशिश की. वह रातोरात वहां से भागा और तमाम पार्टियां, उनके झंडे और उनका वोटबैंक लांघते हुए बागमती नदी में कूद गया. कई डुबकियां लगाने के बाद पवित्र होकर निकला. फिर हर चुनाव में नेताओं के खिलाफ कविताएं लिखने लगा. यह कविता उसी दिन बुलाकी साव ने मुझे सुनायी थी.

कादो-कीचड़ भचर भचर बातों का नेता भूत भस्‍म भैरव भभूत लातों का नेता ऊंचे से ज्‍यादा ऊंची जातों का नेता बही संभालो, है उधार-खातों का नेता
ले लो इस चुनाव में ले लो
आर्य मिले अन-आर्य मुगल अंग्रेज मिले सोच समझ में जो भी सबसे तेज मिले ऊबड़ खाबड़ या फूलों की सेज मिले बर्तन बासन चौकी कुर्सी मेज मिले
ले लो इस चुनाव में ले लो
लोकतंत्र का मेला ठेला टके सेर है उम्‍मीदों-वादों का केला टके सेर है गुरु जलेबी चमचम चेला टके सेर है आम आदमी आज अकेला टके सेर है
ले लो इस चुनाव में ले लो


बुलाकी साव के किस्सों की पिछली तीन कड़ियां यहां हैं-
 

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