किस्सा बुलाकी साव-11: बंजारन लड़की के रेप की कहानी
तांबई रंग वाली बंजारन के बाल भीगे हुए थे. चेहरा कई जगह से छिला हुआ था, जैसे किसी ने नोंंच लिया हो. पर आंखों में लाचारी नहीं गुस्सा था.
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अविनाश दास
अविनाश दास पत्रकार रहे. फिर अपना पोर्टल बनाया, मोहल्ला लाइव
नाम से. मन फिल्मों में अटका था, इसलिए सारी हिम्मत जुटाकर मुंबई चले गए. अब फिल्म बना रहे हैं, ‘आरा वाली अनारकली’ नाम से. पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है. कविताएं लिखते हैं तो तखल्लुस ‘दास दरभंगवी’ का होता है. इन दिनों वह किस्से सुना रहे हैं एक फकीरनुमा कवि बुलाकी साव के, जो दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आ रहा है. किस्सों की दस किस्तें आप पढ़ चुके हैं. जिन्हें आप यहां क्लिक कर पा सकते हैं.
हाजिर है ग्यारहवीं किस्त, पढ़िए.
बुलाकी के साथ लड़की थी, जिसने चादर लपेट रखी थी हमारे गांव के एकमात्र मैदान में, जहां हम क्रिकेट खेलते थे, मगहिया डोमों का एक पूरा कुनबा साल दो साल पर आकर छोटे-छोटे तंबू तान देता था. ढेर सारी स्त्रियां, ढेर सारे मर्द और उनके बच्चे. वे जब आते, तीन-चार-छह महीने तक टिके रहते. उन्हें मगहिया डोम क्यों कहते थे, नहीं मालूम. लेकिन अब अनुमान लगाता हूं कि वे शायद मगध की तरफ के बंजारे रहे होंगे. उनकी भाषा भी हमारी मैथिली से अलग थी. जब वे आपस में बातें करते, हमें कुछ भी समझ में नहीं आता था. एक ही गांव में दो अलग-अलग जबान के लोगों के बीच एक ख़ामोश-सा रिश्ता था. डोम हमारे यहां सबसे निकृष्ट जाति होती है और चूंकि हमें उनकी जाति का पता नहीं था तो हमारे लिए उन्हें डोम समझना और कहना आसान था.
हम शाम के वक्त अक्सर उनके तंबुओं की ओर जाते और देखते कि स्त्रियां चूल्हा जोड़ कर मोटी-मोटी रोटियां सेंक रही हैं. ठीक उसी वक्त सामने से एक चूहा उछल कर दूसरी तरफ भागता, तो कोई किशोर बंजारा बैठे बैठे उसकी तरफ अपना भाला फेंकता. भाले का निशाना इतना अचूक होता था कि वह सीधा चूहे की पीठ में जाकर लगता. फिर वह किशोर उठ कर भाले में अटके हुए चूहे को हाथ में लेकर उन स्त्रियों की तरफ जाता और उन्हें दिखाता. स्त्रियां खिलखिला कर हंस पड़तीं. उन स्त्रियों की नाक में चमकते हुए गोल छल्ले लटकते थे, जो हंसते वक्त हिलने लगते थे.
एक बार जब मगहिया डोमों यानी बंजारों की टोली आयी, तो उनके साथ एक तेरह-चौदह साल की एक ख़ूबसूरत लड़की भी थी. तांबई रंग में दमकता हुआ चेहरा, सुनहरे बाल और दोनों बांह पर गोदना. उन दिनों हमारी उम्र सोलह के करीब रही होगी. उन दिनों हम वक्त-बेवक्त उनके तंबू की तरफ जाने लगे. वह लड़की हमारी नज़रों से बेख़ौफ़ तंबुओं के बीच से गुज़रती डोलती रहती थी. दिन में बंजारे मर्द पता नहीं कहां शिकार पर निकल जाते थे, वह लड़की अपने छोटे भाई को लेकर गांव में आती थी और घर-घर से राशन मांगती थी. हम चाहते कि उससे बातें करें, लेकिन न वह हमारी भाषा समझती, न हम उसका बड़बड़ाना समझ पाते. महीना होते-होते उसे देखने और पाने का हमारा आवेग अपने उफान पर था.
ऐसे में एक दिन जब मुंह अंधेरे हम गांव के बाहर बागमती की ओर दिशा मैदान के लिए जा रहे थे, मैंने देखा कि बुलाकी साव बांध पर चला आ रहा है. उसके साथ कोई लड़की थी, जिसने चादर लपेट रखी थी. मैं दौड़ कर बुलाकी साव के पास पहुंचने ही वाला था कि उसने हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया. मैं पांच कदम पीछे ही रुक गया. उस लड़की को देखा, तो वह तांबई रंग वाली वही बंजारन लड़की थी. बाल भीगे हुए थे और पानी की बूंदें ज़मीन पर गिर रही थी. चेहरा कई जगह से छिला हुआ था, जैसे किसी ने नोंंच लिया हो. आंखों में लाचारी नहीं थी. नाराज़गी थी और गुस्सा था. हम वापस बागमती की ओर चल पड़े. बुलाकी साव उस लड़की के साथ बंजारों के तंबू की तरफ निकल गया.
उस सुबह के बाद हमनेे उस लड़की को गांव में राशन मांगते नहीं देखा. बंजारों के तंबुओं की ओर जाते, तो देखते कि वह लड़की अब भी तंबुओं के बीच डोल रही है. लेकिन उसकी चाल में अब पहले वाली बेपरवाही और तेज़ी नहीं दिखती थी. धीरे-धीरे हमने देखा कि उसका पेट बड़ा हो रहा है. हम आपस में फुसफुसाने लगे. मुझे बुलाकी साव से नफ़रत होने लगी. एक दिन भरी दोपहरी में हमने देखा कि बुलाकी साव उन बंजारों के बीच बैठ कर पंचैती कर रहा है. पंचैती के बाद बंजारे तंबू समेटने लगे और दूसरे दिन पूरा मैदान खाली था. खाली मैदान के एक कोने में हरी घास पर हमने गमछा बिछा दिया. मेरा दोस्त बब्बू ताश लेकर आया था. उसनेे जैसे ही पत्ते फेंटने शुरू किये, पीछे से किसी ने मुझे आवाज़ लगायी. वह बुलाकी साव की आवाज़ थी. मैंने अनसुना कर दिया. बुलाकी साव ने फिर आवाज़ लगायी. अनमना सा उठ कर उसकी तरफ गया.
बुलाकी साव ने कहा, 'नाराज़ हो?' मैंने कुछ नहीं कहा. वह मुझे लेकर बांध पर चला गया. एक जगह पर नहर का चबूतरा था. वहीं बैठ कर उसनेे बताया कि एक रात जब ज़ोर की हवा चली, तो वह लड़की आम का टिकोला चुनने बांध के पार चली गयी. पैनचोभ के तीन बाभन लड़के वहीं पर थे. वे उसे उठा कर क़ब्रिस्तान की तरफ ले गये. उसके साथ ज़ोर-ज़बर्दस्ती की. मारा-पीटा. उसे वहीं छोड़ कर चले गये. बुलाकी ने बताया कि उस दिन उसका पेट ख़राब था. अगर वह आधी रात को बागमती की तरफ पेट साफ करने नहीं गया होता, तो वह लड़की बागमती में बिला चुकी होती. बुलाकी के लिए मेरे मन का मैल उतर चुका था, लेकिन कोई टीस थी, जो बहुत अंदर तक दर्द की बेहिसाब घुमड़न पैदा कर रही थी. बुलाकी साव ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और एक छोटी सी कविता सुनायी. कविता के शब्द मेरे दिल में धम-धम की आवाज़ के साथ आज भी अक्सर बजने लगते हैं.
एक देश था उस देश में बस एक लड़की रह रही थी
एक नदी थी वह नदी उससे तैरने को कह रही थी
और मौसम पतझड़ों का था हवाएं बह रही थीं
एक दिन आकाश में उड़ते बकुल की पांत देखी दूसरे दिन ढेर सारी चील जैसी जात देखी दोपहर और सांझ देखी रात देखी प्रात देखी एक ही जीवन में उसने जीत देखी मात देखी
कुछ खुशी अनगिनत पीड़ाएं अकेली सह रही थी
और मौसम पतझड़ों का था हवाएं बह रही थीं
थक गयी थी मगर फिर भी चल रही थी बढ़ रही थी बिखरती थी बिखर कर फिर नयी आशा गढ़ रही थी लांघ कर पर्वत नयी ऊंचाइयों पर चढ़ रही थी समय के बारीक अक्षर ग़ौर से वह पढ़ रही थी
रेत के महलों सी पल में बन रही थी ढह रही थी
और मौसम पतझड़ों का था हवाएं बह रही थीं
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