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'ज़हरीली फसल देख लहलहा, कहकहा, अहा'

बुलाकी साव के किस्से-1: एक आदमी था फकीर टाइप का. रोज नई-नई कविताएं सुनाता था. वह नंगे पांव चलता था और उसके पास कोई डायरी नहीं थी.

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21 मई 2016 (अपडेटेड: 27 मई 2016, 08:33 AM IST)
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Avinash Dasअविनाश दास पत्रकार रहे. फिर अपना पोर्टल बनाया, मोहल्ला लाइव  नाम से. मन फिल्मों में अटका था, इसलिए सारी हिम्मत जुटाकर मुंबई चले गए. अब फिल्म बना रहे हैं, 'आरा वाली अनारकली' नाम से. पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है. कविताएं लिखते हैं तो तखल्लुस 'दास दरभंगवी' का होता है. इन दिनों वह किस्से सुना रहे हैं एक फकीरनुमा कवि बुलाकी साव के, जो लल्लनटॉप आपके लिए ला रहा है.

'ज़हरीली फसल देख लहलहा, कहकहा, अहा'

इस शीर्षक से आपने बुलाकी साव के दो किस्से पढ़े थे. किस्सों की अगली किस्त हाजिर है, पढ़िए.
  मेरी प्रिय कविता-3 किसी ने मुझे टैग किया था, मैंने रिमूव कर दिया. आज सुबह उठते ही वो कवि याद आया, जिसके पास कभी कोई डायरी मैंने नहीं देखी थी. मेरे गांव से पांच कोस दूर उसकी कुटिया थी और वह हमेशा नंगे पांव मुझसे मिलने आता था. एक नयी कविता सुनाऊं? हर मुलाकात में पहला वाक्‍य यही होता था. हर बार मैं उसकी नयी कविता सुनता था. अपनी पुरानी कविताएं उसे याद नहीं रहती थीं. वह अपनी हर नयी कविता के साथ पुरानी कविताएं भूलता चला जाता था. बुलाकी साव नाम का वह कवि अब कहां है, मुझे नहीं पता. आज से बीस साल पहले वह उम्र में मुझसे बीस साल बड़ा था. बुलाकी साव की ही एक कविता मेरी सबसे प्रिय कविता है. सुनिए...
कहकहा अहा उसने क्‍या क्‍या न सहा, हाय हाय हवा चली सांय सांय गोली थी ठांय ठांय! निर्ममता!! मां थी और बेटी थी ममता सड़कों मोहल्‍लों में कहीं नहीं समता किस्‍सा क्‍या थमता, सब लूट गये इज्‍जत के रंग कहीं छूट गये लाल लाल क्रांति के तहखाने कूट गये ज़हरीली फसल देख लहलहा कहकहा अहा
 
मेरी प्रिय कविता-4 एक दिन बुलाकी साव देर रात गये आया. मैं दालान पर सोया था. गांव में चारों तरफ सन्‍नाटा था. चांदनी रात थी, तो मैं देख पाया कि बुलाकी साव पसीना-पसीना है. वह अपने गांव से नंगे पांव दौड़ते हुए आया था. छह दिसंबर 1992 के बाद की कोई रात थी. हम दोनों आधी रात को बागमती नदी के किनारे गये, जहां आम के हजारों पेड़ थे. कहते हैं कि रात को वहां भूत-प्रेत नाचते हैं. मैं डर रहा था, लेकिन बुलाकी साव निर्भय था. उसने कहा कि भूत-प्रेत शहर में उत्‍पात मचा रहे हैं. तुम मेरी नयी कविता सुनो.और वह पागलों की तरह नाचते हुए गाने लगा. मुझे आज भी नृत्‍य की उसकी लय और कविता का उसका छंद अच्‍छी तरह याद है. सुनिए ज़रा...
लोटा था सोंटा था बाबा थे धोती थी कुर्ता था चकचक यादों का मोरपंख दिल में कुछ धक धक बांस की कलम थी और स्‍याही था नीला कविता थी कुनबा था मन गीला गीला शहर में सबेरा है सूरज को खोजो नीरज भी नहीं दिखा नीरज को खोजो सात बरस पहले गया था कमाने पहले बरस उसने भेजे चार आने डाक घर बंद है और बंद है दुकानें दंगाई सड़कों पर सत्ता को पाने तीन बलात्‍कार हुए, आठ गयीं जानें हम खुद को मानें या दुनिया को मानें कवि था बुलाकी और बाबा थे साव जी कविता में क्‍यों खाते रहते हो भाव जी गलियों में दंगे थे, नाक में पोंटा था रामधनी की बेटी का लंबा झोंटा था लोटा था सोंटा था कवि था बुलाकी और बाबा थे साव जी

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