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खुलासा: UPA के समय हुई एयरक्राफ्ट डील में हुई थी दलाली

दलाली की डील होने के बाद भारत को बेचे गए थे एयरक्राफ्ट.

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फोटो - thelallantop
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विशाल
7 नवंबर 2016 (Updated: 7 नवंबर 2016, 06:20 AM IST)
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डिफेंस सेक्टर. हिंदी में बोले तो रक्षा क्षेत्र. डिफेंस सेक्टर हमारे देश में बड़ी पाक चीज है. एकदम होली काऊ माफिक. किसी को भी इस पर कोई शक-शुबहा नहीं होता. डिफेंस सेक्टर को हम भगवान का दर्जा देते हैं, लेकिन इसका एक सच ये है कि इसमें दलाली होती है. कमाल की बात ये कि डिफेंस सेक्टर की दलाली भी भगवान की तरह ही होती है. सब लोगों में से ढेर सारे लोग मानते हैं कि ऐसा होता है. उससे भी कम लोग इस पर विश्वास करते हैं. सबसे कम लोग इसे अंजाम देते हैं. लेकिन, जब हम इसे खोजने निकलते हैं, तो हमें कुछ नहीं मिलता. कोई सबूत, कोई गवाह... कुछ भी नहीं.



बोफोर्स और अगस्टा वेस्टलैंड जैसे मामले इसका उदाहरण हैं. बोफोर्स ने राजीव गांधी की खटिया खड़ी कर दी थी. बच्चन अमिताभ को चुप रहना सिखा दिया. अगस्टा वेस्टलैंड ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के दूसरे नेताओं के धुर्रे खोल दिए. वो बात दूसरी है कि 'सब कुछ' साबित नहीं हो पाया, लेकिन एडवोकेट राजेश श्रीवास्तव के शब्दों में कहें, तो 'जो बात है वो बात है.' ये सब हम आपको इसलिए बता रहे हैं, क्योंकि डिफेंस सेक्टर में एक और दलाली का खुलासा हुआ है. ये मामला है ब्राजीली कंपनी एंब्रायर का, जिसने भारत को एयरक्राफ्ट बेचे थे और इस डील में दलाली हुई थी.


बोफोर्स
बोफोर्स
कैसे हुई शुरुआत

पिछले महीने अक्टूबर की 24 तारीख को फ्लोरिडा की एक कोर्ट में 59 पन्नों का एक दस्तावेज पेश किया गया, जिसमें एंब्रायर ने माना कि दुनियाभर से एयरक्राफ्ट के कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए उसने दलाली दी है. अमेरिका को 2010 में ही इस कंपनी पर शक हो गया था और अब फैसला आया है कि एंब्रायर अमेरिका में अपना बिजनस जारी रख सकती है, लेकिन अमेरिकी अथॉरिटीज को 20 करोड़ डॉलर चुकाने के बाद.


क्या है मामला

भारत से 20 करोड़ डॉलर की एक डील हासिल करने के लिए एंब्रायर ने 2009 में 'एजेंट डी' नाम के एक इंडियन आर्म एजेंट को 58 लाख डॉलर की दलाली दी थी. उस समय एंब्रायर और भारत के बीच तीन ERJ-145 जेट कस्टमाइज करने की डील हुई थी. CBI की शुरुआती जांच में 'एजेंट डी' की पहचान मूलत: दिल्ली के 87 साल के डिफेंस कंसल्टेंट विपिन खन्ना के तौर पर हुई है.

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एंब्रायर और 'एजेंट डी' का कनेक्शन

एंब्रायर और भारत पहली बार 2004 में एक-दूसरे के संपर्क में आए थे, जब पालम के कम्युनिकेशन स्क्वाड्रन ने तीन ECJ 135 बिजनस जेट खरीदे और चौथा जेट गृह मंत्रालय ने BSF के लिए खरीदा था. रक्षामंत्री और सर्विस चीफ के यूज करने के लिए खरीदे गए इस एयरक्राफ्ट ने सुविधाओं के इतने ऊंचे पैमाने तय कर दिए थे कि यूपीए-1 के रक्षामंत्री विभाग बदलने के बावजूद इस एयरक्राफ्ट का यूज करने पर जोर देते रहे.


जनवरी, 2005 में जब एंब्रायर और भारत की बातचीत पूरी तरह पटरी पर आ गई, तो इसने 'एजेंट डी' से जुड़ी शेल कंपनी के साथ एक अग्रीमेंट किया. इस अग्रीमेंट के हिसाब से एंब्रायर शेल को कुल डिफेंस डील का 9% कमीशन देने को राजी हो गई. इस अग्रीमेंट के पेपर्स भी तैयार हुए, जिनके मुताबिक एंब्रायर को ये यकीन था कि 'एजेंट डी' की वजह से उन्हें ये डील बिना किसी कॉम्पिटीशन के मिल जाएगी, जबकि उसे पता था कि भारतीय नियमों के मुताबिक ये गलत है.

एंब्रायर और शेल कंपनी के बीच हुए इस अग्रीमेंट का फुल वर्जन लंदन के एक सेफ डिपॉजिट बॉक्स में रखा है और ये तभी खुल सकता है, जब एंब्रायर का कोई शीर्ष अधिकारी और 'एजेंट डी' वहां एक साथ मौजूद होंगे. इसी अग्रीमेंट के हिसाब से दलाली हुई और पैसा स्विट्जरलैंड से सिंगापुर होते हुए भारतीय दलालों तक पहुंचा.


क्या थी उस समय की डीलembraer-deal

2005 में DRDO बिजनस जेट खरीदने जा रहा था और ये बड़े पैमाने पर होने वाला था. उसे AEW&C तकनीक वाला रडार भी खरीदना था, जो 250 किमी की दूरी से दुश्मन के एयरक्राफ्ट और क्रूज मिसाइलें भांप लेता है. DRDO के पास उस समय 2500 करोड़ का बजट था और एंब्रायर के साथ हुई डील इस बजट का एक बड़ा हिस्सा थी. उस समय एयरफोर्स ने ऐसे 12 अडवांस जेट मांगे थे, ताकि पाकिस्तान और चीन की सीमा पर पेट्रोलिंग की जा सके. खुद रक्षा विशेषज्ञ इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि जो तकनीक खरीदी जा रही है, वो सेना की जरूरत के हिसाब से बेहतरीन है.


परदे के सामने तो डिफेंस डील चल रही थी, लेकिन पीछे खेल चल रहा था. 2005 से 2006 के बीच दिल्ली के NRI विपिन खन्ना और उनके बेटे अरविंद और आदित्य गलत कारणों से खबरों में आ रहे थे. 2005 में आई वॉल्कर रिपोर्ट में ये भी पाया गया कि तत्कालीन विदेश मंत्री नटवर सिंह अपने पद का गलत इस्तेमाल करते हुए ईराकी मंत्रियों के साथ 'ऑयल फॉर फूड स्कैंडल' में लॉबिंग कर रहे थे. नटवर ने अपने बेटे जगत सिंह और एक रिश्तेदार आदित्य खन्ना (विपिन खन्ना का बेटा) की कंपनियों के साथ बिजनस करने के लिए ईराकी अधिकारियों के साथ लॉबिंग की थी.

अक्टूबर, 2006 की CBI की एक FIR में पता चला कि भारत को 2000 बराक-1 मिसाइलों की बिक्री में उस समय के कांग्रेसी विधायक अरविंद खन्ना को इजरायली एयरक्राफ्ट इंडस्ट्रीज (IAI) की तरफ से पैसा मिला. 1150 करोड़ की इस डील में पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस और आर्म एजेंट सुरेश नंदा का भी नाम आया, लेकिन सबूतों के अभाव में CBI ने 2013 में केस बंद कर दिया.


एंब्रायर और 'एजेंट डी' के बीच बात भी बिगड़ीpayment

डील होने के बाद एंब्रायर और 'एजेंट डी' के बीच बात बिगड़ने लगी थी. 3 जुलाई, 2008 को इंडियन एयर फोर्स एंब्रायर से लगभग 21 करोड़ डॉलर के तीन एयरक्राफ्ट खरीदने को राजी हो गई और अगले ही दिन 4 जुलाई को 'एजेंट डी' ने एंब्रायर से अपना कमीशन मांगा. कमीशन कितना देना था, इस पर कुछ महीनों तक दोनों के बीच विवाद चलता रहा. आखिरकार 2009 की शुरुआत में एंब्रायर का एक वकील 'एजेंट डी' के एक आदमी से मिला और लगभग 58 लाख डॉलर के कमीशन पर बात बन गई.


कैसे हुआ पेमेंट

'एजेंट डी' को दिए गए कमीशन का ट्रांजैक्शन छिपाने के लिए एंब्रायर ने फर्जीवाड़ा किया. 21 नवंबर, 2009 को एंब्रायर ने अपने मालिकाना हक वाली कंपनी ECC इन्वेस्टमेंट, स्विट्जरलैंड के जरिए सिंगापुर की शेल कंपनी के साथ एक अग्रीमेंट किया. सिंगापुर की शेल कंपनी 'एजेंट डी' से जुड़ी थी, जो विदेश में होने वाली बिक्री में एक एजेंट का काम करती थी. ये अग्रीमेंट एक ही दिन में हो गया, जिसके बाद शेल ने लगभग 20 लाख डॉलर की तीन रसीदें ECC को भेजीं. इन तीनों रसीदों का एयरक्राफ्ट्स की बिक्री से कोई लेना-देना नहीं था.

रसीद मिलने के कुछ दिनों बाद ही एंब्रायर ने ECC इन्वेस्टमेंट, स्विट्जरलैंड के नाम से तीनों रसीदों का पेमेंट कर दिया. एंब्रायर के रिकॉर्ड्स में कहीं ये जिक्र नहीं है कि ये ट्रांजैक्शन 'एजेंट डी' के साथ हुए अग्रीमेंट की वजह से किया गया. तीनों एयरक्राफ्ट 2011 में DRDO को डिलीवर कर दिए गए. उस समय तो किस्सा खत्म हो गया, लेकिन दिल्ली में ऊंची पहुंच वाले सोर्स बताते हैं कि इस पूरे मामले में विपिन खन्ना का नाम सिर्फ ऊपर-ऊपर ही था. असल डील लंदन में रहने वाला विपिन का बेटा आदित्य कर रहा था. इस बारे में बात करने के लिए जब खन्ना फैमिली से संपर्क किया गया, तो उन्होंने किसी ई-मेल और फोन का जवाब नहीं दिया.

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CBI की आंख कब खुली

2015 तक एंब्रायर एयरप्लेन बनाने वाली दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी कंपनी थी. उसके आगे सिर्फ बोइंग और एयरबस ही थीं. इसने हर साल 6.3% से ग्रोथ की और भारत के साथ इसकी डील पर किसी को शक नहीं था. लेकिन, इस साल सितंबर में एक ब्राजीली अखबार बड़े जोर-शोर से एंब्रायर की दलाली की खबरें चलाने लगा. CBI ने ध्यान दिया, तो पता चला कि कंपनी ने डील हथियाने के लिए एक भारतीय एजेंट को दलाली दी है.


भारत के नियम क्या कहते हैं

भारत का रक्षा मंत्रालय किसी भी कंपनी से डील करते समय दलालों और कमीशन को बैन कर देता है. डील करने वाली कंपनी से एक पैक्ट साइन कराया जाता है, जिसमें कंपनी को ये मानना पड़ता है कि वो डील में कोई हेर-फेर नहीं करेगी और किसी को कोई कमीशन नहीं देगी. एयर फोर्स के लिए एयरक्राफ्ट खरीदे जाने से पहले 8 फरवरी, 2005 को एंब्रायर ने DRDO के साथ ऐसी ही एक डील की थी, जबकि वो जानती थी कि वो धोखेबाजी कर रही है. जाहिर है, कंपनी ने ऐसा सिर्फ डील को पुख्ता करने के लिए किया था. अब जबकि ये मामला सामने आ गया है, तो कयास लगाए जा रहे हैं कि रक्षा मंत्रालय इस ब्राजीली कंपनी के साथ की गईं सभी डील रोक देगा और भ्रष्टाचार के भारतीय नियमों के हिसाब से जांच होगी.


ये दलाली नई नहीं है

एंब्रायर स्कैंडल यूपीए के कार्यकाल में हुए डिफेंस स्कैंडल्स की एक परत भर है. पिछले महीने 31 अक्टूबर को BBC और दि गार्जियन ने खुलासा किया था कि लंदन में एयरक्राफ्ट का इंजन बनाने वाली फर्म रॉल्स रॉयस ने लंदन में रहने वाले आर्म एजेंट सुधीर चौधरी की फर्म को चोरी-छिपे एक करोड़ पाउंड का पेमेंट किया था. ये पेमेंट हॉक ट्रेनर एयरक्राफ्ट की बिक्री से जुड़ा था, जो भारत ने लंदन की कंपनी BAE सिस्टम्स से दो बार में खरीदे थे. 2004 में ऐसे 66 जेट खरीदे गए थे और 2010 में 57 जेट खरीदे गए थे. बाकी बोफोर्स और अगस्टा चॉपर डील की दलाली किसी से छिपी नहीं है.

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सरकार क्यों अपंग है

एनडीए सरकार पिछले दो सालों से डीबारमेंट पॉलिसी में उलझी हुई है. इस पॉलिसी के हिसाब से अगर किसी कंपनी पर दलाली या भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो भविष्य में उसके साथ होने वाले सभी कॉन्ट्रैक्ट होल्ड पर डाल दिए जाएंगे और CBI उसके पिछले कॉन्ट्रैक्ट्स की जांच करेगी. अगर दलाली के आरोप सही पाए जाते हैं, तो कंपनी के साथ होने वाले सभी कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिए जाएंगे. अगर CBI सबूत भी जुटा लेती है, तो फर्म को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा. हालांकि, रक्षा मंत्रालय के पास भविष्य में ये बैन हटाने का अधिकार रहेगा. इस पॉलिसी पर कई मीटिंग्स हो चुकी हैं, लेकिन नतीजा अब तक कोई नहीं निकला है.

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