फैंटेसी एक अनोखी साहित्यिक विधा है. लेखक आपको एक ऐसी दुनिया में ले जाता है, जहांसबकुछ काल्पनिक होता है फिर भी आपको इसे सच मानने में मज़ा आता है. जोनाथन स्विफ्टकी किताब गुलिवर्स ट्रैवल्स को कौन भूल सकता है. जॉर्ज ऑरवेल भी फैंटेसी की दुनियाके ऐसे ही महान रचनाकार थे, जिन्होंने एनिमल फॉर्म और नाइनटीन एटी फोर जैसे उपन्यासरचे. भारत में फैंटेसी के एकमात्र बड़े लेखक के तौर पर हिंदू-उर्दू के अफसानिगारकृशनचंदर का नाम जेहन में आता है. एक गधे की आत्मकथा से लेकर एक वायलिन समंदरकिनारे, एक करोड़ की बोतल और कागज की नाव जैसी कई किताबें आपको एक अनोखे कल्पना लोकमें ले जाती हैं. व्यंगकार राकेश कायस्थ मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों कोफैंटेसी के कैनवास पर उतार लाये हैं. प्रजातंत्र 2018 से लेकर 2030 तक रिवाइंडफारवर्ड होता एक सोशियो पॉलिटिकल सटायर है, जिसमें ज़बरदस्त हयूमर के साथ एक गहरामैसेज भी है. इसे आप भारतीय समाज और राजनीति का रूपक मान सकते हैं. खास बात यह किकिताब ऐसे समय आई है,जब प्रजातंत्र भी गर्म है और पकौड़ों पर चर्चा भी. किताब केकंटेट का अंदाज़ा इसकी भूमिका से लगाया जा सकता है.--------------------------------------------------------------------------------मेरा देश तल रहा है रक्त वर्षों से नसों में खौलता है आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजनाहै अंकल दुष्यंत ने यह सवाल बहुत पहले पूछा था. दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र तबभी खौल रहा था, अब भी खौल रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि हमारी थिंकिंग अब पॉजेटिवहै. यह रक्त नहीं है बाबू, खौलता हुआ तेल है, क्योंकि व्यापार हमारी रग-रग में है.अपने ही तेल में पकौड़े तलकर हम खुद खा रहे हैं और पूरी दुनिया को भी खिला रहे हैं.पेट तो भर ही रहा है, तिजोरी भी भर रही है. हरित क्रांति, आर्थिक उदारीकरण और संचारक्रांति के बाद पकौड़ा क्रांति इस देश की सबसे बड़ी घटना है. लेकिन इसका प्रभावबाकी क्रांतियों से कई गुना ज्यादा है. पकौड़ा क्रांति ने अर्थ नीति, राजनीति औरविदेश नीति को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है. अब पूरी दुनिया में शांति और समृद्धिहै. भारत ने विश्व गुरू होने का अपना फर्ज फिर से निभाया है. यह किताब पकौड़ाक्रांति के महानायक बाबू रामभरोसे और उनके साथियों की उपलब्धियों की महागाथा है.--------------------------------------------------------------------------------...तो कहानी दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में पकौड़ा टाइकून रामभरोसे के एक भाषणसे शुरू होती है. रामभरोसे वही शख्स हैं, जो कभी नोएडा में ठेले पर पकौड़े बेचाकरते थे लेकिन पकौड़ों पर दिये गये प्रधानमंत्री के बयान ने उनकी जिंदगी बदल दी.प्रधानमंत्री से रामभरोसे की मुलाकात, ठेले से लेकर पकौड़ा आउटलेट और फिर एक दिनपिज्जा हट और केएफसी जैसे बड़े-बड़े ब्रांड के अधिग्रहण तक की कहानी इतनी दिलचस्पहै कि आप एक बार पढ़ना शुरू करते हैं तो फिर रूकने का नाम ही नहीं लेते. देश कीमौजूदा सियासत से लेकर भावी राजनीतिक घटनाक्रम का अति नाटकीय और बेहद दिलचस्प खाकाइस उपन्यास में मिलता है. एक प्लेट पकौड़े से लेकर शुरू हुई कल्पना की उड़ान जिसतरह आगे बढ़ती है, वह सचमुच अकल्पनीय है. पकौड़ा क्रांति भारत को आर्थिक और सैनिकमहाशक्ति बना देता है. पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों को भारत में विलय होजाता है. मामला यहीं ना रूकता. एक दिन प्रधानमंत्री भारत में पकौड़ा क्रांति लानेवाले बाबू रामभरोसे को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी घोषित कर देते हैं. उपन्यासका आखिरी चैप्टर आपको कल्पना की उस दुनिया में ले जाता है, जहां पहुंचकर आपको समझमें नहीं आता कि हंसे, रूककर गहराई से सोचें या सिर्फ मजे लें.--------------------------------------------------------------------------------पकौड़ेश्वरम वंदे जगदगुरूम् 1, अप्रैल 2030, श्रीहरिकोटा मंगलमम भगवान विष्णु मंगलमगरुड़ध्वज मंगलम पुंडीरकाक्षमंगलाय तनो हरि नासा से आये साइंटिस्ट्स ने भारतीयवैज्ञानिकों के साथ अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर इस पवित्र मंत्र का उच्चारण किया.202 देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनने के लिए अपनी-अपनी सीटपर विराजमान थे. दुनिया पिछले बारह साल में बहुत आगे बढ़ चुकी थी. सहारा मरूस्थल सेलेकर अंटार्टटिका तक विश्व का कोई ऐसा कोना नहीं था जो भारत से शुरू हुई पकौड़ाक्रांति के महान प्रभाव से अछूता हो. पूरे विश्व में खुशहाली आ चुकी थी. मृत्यु दरघटने और आर्थिक विकास का नतीजा यह था कि इंसानी आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही थी.अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय इस बात को लेकर चिंतित था कि आनेवाले समय में मानवजाति का क्या होगा? इस धरती पर रहने लायक सारी जगहें खत्म हो जाएँगी, फिर होमोसीपियंस कहाँ रहेंगे? इस मामले में भी दुनिया को रास्ता एक बार फिर विश्वगुरू भारतने दिखाया. इसरो का मंगलयान कई बार वहाँ उतर चुका था और मंगल पर जीवन होने के संकेतग्रहण कर चुका था. मंगलयान ने जो तस्वीरें भेजी थीं, उनसे पता चलता था कि मंगल ग्रहके पास विशाल भूभाग है. बहुत सी वनस्पतियाँ हैं, जलाशय हैं. लेकिन जीवन बहुत कम है,नहीं के बराबर. फिर भी यह तय है कि जीव वहाँ बसते हैं. 2028 में लौटकर आये मंगलयानपर खरोंच जैसे कुछ निशान मिले. बहुत समय तक अध्ययन के बाद इसरो के वैज्ञानिक इसनिष्कर्ष तक पहुंचे कि यह एक संदेश है, जो मंगल के लोगों ने पृथ्वी वासियों को भेजाहै. संदेश बहुत अस्पष्ट था. दुनिया भर के विशेषज्ञों ने इस गुत्थी को सुलझाने कीकोशिश की. उकेरी गई चीज़ की तस्वीर ली गई उसे अलग-अलग कोण से घुमाया गया तो`हीदेहषांविह और `मनुजंव्यहेदी ’ की दो आकृतियां निकलकर सामने आईं. वैज्ञानिकों कीसमझ में कुछ नहीं आया. फिर काशी के प्राच्य विद्या विशेषज्ञों की मदद ली गई.उन्होंने बहुत दिमाग़ लगाया और अंतत: जो परिणाम सामने आया उससे पूरी दुनिया कीआँखें फटी रह गईं। यह देवभाषा संस्कृत का सबसे शुद्ध रूप था, जिसमें दो-तीनमात्राएं अतिरिक्त लगी थीं. इन मात्राओं को निकालकर अक्षरों का संयोजन करने पर दोवाक्य बनते थे- हविषां देहि और व्यंजनम् देही. मतलब हविषा यानी ईंधन यानी भोजन मांगरहे हैं, मंगल ग्रह वासी. अगर उन्हे कोई उत्तम पकवान भेजा जाये तो धरतीवासियों सेउनके संबंध सुदृढ़ होंगे और हो सकता है एक दिन वे पृथ्वी वालों को अपने ग्रह परज़मीन देने को भी तैयार हो जायें. मंगल ग्रहवासियों से संपर्क करना संपूर्णधरतीवासियों का सामूहिक उत्तरदायित्व था, जिसे भारत के प्रधानमंत्री श्री रामभरोसेके नेतृत्व में पूरा किया जा रहा था. इस धरती की सबसे नायाब चीज़ यानी पकौड़ीमंगलयान में भरकर भेजी जा रही थी और वह भी भारतीय प्रधानमंत्री के हाथ की बनी. यानपर जहां मंगलवासियों द्वारा उकेरे गये संदेश प्राप्त हुए थे, ठीक उसी के बगल मेंवैज्ञानिकों ने उसी शैली के संस्कृत में लिखा- हे मंगलवासी! अस्य लोकस्य विशालमतस्यप्रजातंत्रस्य पक्कवाटिका: स्वीकुरु. अर्थात— हे मंगलवासी! आप इस लोक के सबसे बड़ेप्रजातंत्र के पकौड़े स्वीकार कीजिये. मंगलयान तैयार था. मंगलयान जब पहली बार भेजागया था, तब उसकी यात्रा की लागत हवाई जहाज के बराबर थी. धीरे-धीरे लागत घटती गई औरराजधानी एक्सप्रेस के किराये के बराबर जा पहुँची. लागत जब कोलकाता के ट्राम भाड़ेतक आ गई तो देश के विजनरी प्रधानमंत्री रामभरोसे ने वैज्ञानिकों और नीति आयोग सेपूछा कि मंगलयान को अपने देश में यातायात के साधन के रूप क्यों इस्तेमाल नहीं कियाजा सकता है? सुझाव पंसद आया और इसे 2040 तक अमल में लाने की योजना पर काम शुरू होगया. लेकिन श्रीहरिकोटा में आज जो हो रहा था कि उसका अपना महत्व था. इसरो केवैज्ञानिक कंट्रोल में रूम तैयार थे. नासा वाले पोजीशन ले चुके थे. दुनिया भर केवैज्ञानिक और अध्येता दम साधकर देख रहे थे. नागपुर वाले वेदपाठी महापंडित ने शंखफूंका... पूं...ऊ...ऊ... ऊ… पाकिस्तान से आये तिलकधारी मौलानाओं ने घड़ियाल बजानेशुरू किये. ग्यारह हज़ार नारियल एक साथ फोड़े गये और मंगलायन चल पड़ा पकौड़े लेकर.थोड़ी देर बाद कंट्रोल रूम के वैज्ञानिको ने यह सूचना दी कि मिशन कामयाब हो गया है.मंगलयान सफलतापूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है. दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षोंने गले लगकर एक-दूसरे को बधाई दी. लेकिन भारत के प्रधानमंत्री श्री रामभरोसे बहुतगंभीर थे. परियोजना की सफलता को लेकर वे और ज्यादा आश्वस्त होना चाहते थे. उन्होंनेइसरो के निदेशक को पास बुलाया और पूछा- पकौड़े के साथ चटनी रखवा दी थी ना दोनों तरहकी? इसरो के निदेशक ने जवाब में थंप्स अप किया. पास खड़े नासा के डायरेक्टर नेएचआरडी और साइंस एंड टेक्नोलॉजी मिनिस्टर सपना मल्होत्रा से कहा- कितनेपरफेक्शनिस्ट हैं आपके प्रधानमंत्री! सपना ने मुस्कुरा कर जवाब दिया- हां बिल्कुलअपने गुरु की तरह. ~पकौड़ेश्वरम वंदे जगदगुरूम्~--------------------------------------------------------------------------------पुस्तक का नाम: प्रजातंत्र के पकौड़ेलेखक: राकेश कायस्थप्रकाशक: किस्सागोऑनलाइन उपलब्धता: अमेज़न (पेपरबैक)मूल्य: 49 रूपए--------------------------------------------------------------------------------वीडियो- किताबवाला: चौचक दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने सुनाए लखनउआ किस्से