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शिवसेना के किस नेता ने आरोप लगाया था कि पार्टी में पद ख़रीदे जाते हैं?

धवल कुलकर्णी की किताब 'ठाकरे भाऊ' का एक पुस्तक-अंश.

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25 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 25 जनवरी 2021, 09:58 AM IST)
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ठाकरे भाऊ-उद्धव, राज और उनकी सेनाओं की छाया

पुस्तक अंश

2004 आते-आते उद्धव के पिता स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय भूमिका से दूर होने लगे और राज को किनारे किया जाने लगा, उद्धव ने पूरी तरह कमान संभाल रखी थी. धीरे-धीरे इस तरह की बातें सुनाई देने लगीं कि उद्धव पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की पहुंच से बाहर रहते थे. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और पत्रकारों का तो यह भी कहना था कि यहां तक कि प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे जैसे नेताओं के लिए भी शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष तक पहुंच पाना मुश्किल हो जाता था. उद्धव और राणे के बीच के रिश्ते पहले से भी अच्छे नहीं थे लेकिन अब और ख़राब हो गए थे. अंदरूनी सूत्रों का यह कहना था कि राणे को हल्के-फुल्के तरीक़े से यह जता दिया जाता था कि उनका महत्त्व नहीं रह गया था. जैसे, पार्टी अध्यक्ष या उनके बेटे से मिलने के पहले उनको इंतज़ार करने के लिए कहा जाता था या उनका फ़ोन नहीं उठाया जाता था. वागीश सारस्वत उस समय संवाददाता थे और उनका कहना है कि शिवसेना के कार्यकर्ताओं को अलिखित निर्देश था कि वे किसी कार्यक्रम में नारायण राणे या राज ठाकरे को न बुलाएं. शिवसेना की संरचना इतनी एकायामी थी कि पार्टी प्रमुख पार्टी को चलाने के लिए क्षेत्रीय और उप क्षेत्रीय क्षत्रपों के ऊपर निर्भर रहते थे. मातोश्री के वफ़ादार नेताओं को ऐसा लगता था कि राणे इतने ताकतवर होते जा रहे थे कि पार्टी के ऊपर पारिवारिक नियंत्रण के लिए ख़तरा बनते जा रहे थे, और इसलिए उन लोगों ने उनके पंख काटने की कोशिश की. कांग्रेस के नेता विजय वडेट्टीवार, जो उस समय राणे के ख़ास थे और उन्होंने राणे के साथ शिवसेना छोड़ी थी, उनका कहना था कि उद्धव के विश्वस्तों को इस बात का डर था कि राणे और राज कहीं सेना के ऊपर क़ब्ज़ा न कर लें. अपनी आत्मकथा में राणे ने इस बात को स्वीकार किया है कि पार्टी के ऊपर सरकार गिराने के अभियान के पहले से ही नियंत्रण ख़त्म हो गया था और उनको महत्त्वपूर्ण बैठकों में लाया नहीं जाता था. उनका आरोप था कि उद्धव, मनोहर और सुभाष देसाई की तिकड़ी उनको नीचा दिखाना चाहती थी. उद्धव के निजी सचिव मिलिंद नारवेकर लोगों को मिलने का समय देने न देने को लेकर मातोश्री में सत्ता केंद्र के रूप में उभर कर आए थे. उद्धव जल्दी ऐसे लोगों के साथ नहीं मिलते-जुलते थे जो उनके आसपास के नहीं होते थे, इसलिए नारवेकर उनके लिए दीवार की तरह से हो गए. लम्बे और दुबले-पतले नारवेकर लिबर्टी गार्डेंस, मलाड में गटप्रमुख थे जो पार्टी संगठन में सबसे नीचे का पद होता था. उनके बारे में कहा जाता था कि वे अपने बॉस से 1990 के दशक के आरंभिक वर्षों में शाखा प्रमुख बनाए जाने की माँग को लेकर मिलने गए थे. हालाँकि उनको उद्धव ने अपना निजी सहायक बना लिया. चूंकि कई बार उनके बॉस सिर्फ़ अपने साथ यानी अकेले रहना ही पसंद करते थे, इसलिए पार्टी में नारवेकर का दबदबा बढ़ता गया. भास्कर जाधव (2004), नारायण राणे (2005) और मोहन रावले (2014) जैसे नेताओं का तो यह भी कहना था कि नारवेकर के कारण ही उन लोगों ने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया. नारवेकर आज भी सार्वजनिक रूप से उद्धव के पीछे-पीछे रहते हैं लेकिन सेना के अंदरूनी सूत्रों का यह कहना है कि अब उनकी शक्ति वैसी नहीं रह गई है, जैसी कि एक दशक पहले तक थी. इसका कारण यह है कि मातोश्री में सत्ता के कई केंद्र और उभर आए हैं. कहा जाता है कि नारवेकर राज्यसभा या राज्य विधानपरिषद की सदस्यता की होड़ में थे लेकिन जनवरी 2018 में उनको पार्टी का सचिव बना दिया गया. शिवसेना के बहुत से नेताओं के विपरीत नारायण राणे (जिनको दादा या एनटीआर बुलाया जाता था, जो उनके पूरे नाम नारायण ताटू राणे का संक्षिप्त रूप था) का सिंधुदुर्ग में जनाधार था और सेना के कुछ विधायक उनके प्रति निष्ठा भी रखते थे. 14 अगस्त 2005 को पार्टी के पदाधिकारियों की बंद कमरे में बैठक हुई जिसमें राणे का ग़ुस्सा भड़क उठा. उन्होंने आरोप लगाया कि ‘शिवसेना में पद ख़रीदे जाते हैं. पार्टी में इन पदों के लिए बाज़ार लगता है’. साफ़ था कि वे उद्धव और उनके दरबारियों के ऊपर उंगली उठा रहे थे. बाल ठाकरे और उद्धव उस बैठक में मौजूद नहीं थे. ठाकरे को जब यह बताया गया कि राणे ने क्या आरोप लगाया है तो वे बैठक में आए और उन्होंने मनोहर जोशी, राणे आदि नेताओं से पूछा कि जब उनको अपने पद पर बिठाया गया तो क्या किसी ने पैसों की मांग की थी? ‘अगर यह बात साबित हो जाती है कि उद्धव या राज ने पैसों की मांग की थी, तो मैं उनको शिवसेना में नहीं रहने दूंगा और अगर मेरे ख़िलाफ़ इस तरह के आरोप सिद्ध हो जाते हैं तो मैं भी शिवसेना छोड़ कर संन्यास ले लूंगा’, उन्होंने कहा. जून 2005 में मुंबई से 900 किलोमीटर दूर भंडारा जिले में शिवसेना के ज़िला प्रमुख शेषराव गिरहेपुंजे बहुत परेशान थे. संगठित प्रदर्शन के क़रीब चालीस मामलों में उनको स्थानीय सबडिविजनल पुलिस अफ़सर ने नोटिस भेजा कि वे भंडारा, नागपुर, गढ़चिरौली, चंद्रपुर और गोंदिया से दो साल के लिए दूर रहें. साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील भंडारा के सड़क अर्जुनी के निवासी गिरहेपुंजे शिवसेना के लिए 1987 से काम कर रहे थे. उन्होंने फ़ैसला किया कि मुंबई जाकर नारायण राणे से मिलेंगे और मदद की मांग करेंगे. राणे उस समय नेता प्रतिपक्ष थे. लेकिन उस समय वे विदेश जा रहे थे इसलिए उन्होंने उनको उद्धव से मिलने की सलाह दी. ‘पुलिस मुझे फंसाना चाह रही थी. ये सभी मामले राजनीतिक थे. जब मैं मातोश्री गया तो मुझे बताया गया कि उद्धव एक मीटिंग में थे. कुछ दिन बाद जब मैं दुबारा मिलने के लिए गया तो वहां मौजूद एक पुलिस वाले ने बताया कि उद्धव ने विदेश से 1.25 लाख की मछलियां मंगावाई थीं जो मर गई थीं और इस कारण वे इतने दुखी थे कि किसी से मिलना नहीं चाहते थे’, गिरहेपुंजे ने आरोप लगाते हुए कहा. वापस आने पर राणे ने गिरहेपुंजे से यह कहानी सुनी. उस वक़्त मराठी दैनिक लोकसत्ता के लिए काम करने वाले पत्रकार संदीप प्रधान ने बताया कि राणे ने पत्रकारों को इस घटना के बारे में बताया और इस आधार पर यह कहा कि किस तरह से सामान्य कार्यकर्ताओं की पार्टी नेतृत्व द्वारा अनदेखी की जाती थी. उद्धव ने इस तरह की किसी घटना से इनकार किया और कहा कि यह उनको बदनाम करने के लिए किया जा रहा था. ‘आम तौर पर यह माना जाता था कि मिलिंद नारवेकर लोगों को भगा देते थे लेकिन मुझे उन्होंने जाने के लिए नहीं कहा’, गिरहेपुंजे ने कहा. बाद में वे राणे के साथ कांग्रेस में चले गए और अभी भारतीय जनता पार्टी में हैं. गिरहेपुंजे यह मानते हैं कि उनके अंदर भगवा के कुछ लक्षण अभी भी हैं, लेकिन उनका यह कहना था कि उनके पास इस बात की पुष्टि का कोई माध्यम नहीं था कि मछली के बारे में उनको जो बताया गया था वह बात सही थी या नहीं. गिरहेपुंजे का कहना है कि इस घटना के बाद राणे ने पार्टी छोड़ने का फ़ैसला कर लिया. राणे का कहना है कि उद्धव और उनकी पत्नी रश्मि बहुत अच्छे इनसान हैं. उनका कहना है कि उनको इस बात के लिए अपराधबोध होता था कि उनके लिए उद्धव और उनके पिता में लड़ाई होती थी. उनका कहना है कि शिवसेना छोड़ने के पीछे उनका यह अपराधबोध बड़ा कारण था. राणे ने बताया कि उन्होंने शिवसेना प्रमुख को एक अनौपचारिक पत्र लिखा कि वे शिवसेना छोड़कर अपने घर बैठ जाएँगे. राणे का कहना है कि चिट्ठी लिखने के बाद वे पन्द्रह दिनों के लिए विदेश चले गए. जब वे लौट कर आए तो उनको इस बात की बहुत हैरानी हुई कि नारवेकर, जोशी और देसाई के माध्यम से मीडिया में इस तरह की ख़बरें आ रही थीं कि वह शिवसेना छोड़कर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में शामिल होने वाले थे. बाद में, राणे पार्टी प्रमुख से मिले और उनको शिवसेना, नेता प्रतिपक्ष और विधानसभा से अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया. राणे का कहना है कि जब उद्धव को इस बारे में पता चला कि उनके पिता राणे के साथ समझौता करने की कोशिश कर रहे थे तो उद्धव ने धमकी दी कि वह अपनी पत्नी रश्मि के साथ मातोश्री छोड़ देंगे. इसके कारण सेना प्रमुख का संकल्प कमज़ोर पड़ गया क्योंकि वे एक बेटे को पहले ही खो चुके थे और एक उनसे अलग रहता था 28 जून 2005 को राणे अपने चुनाव क्षेत्र सिंधुदुर्ग जाने के लिए गोवा गए. क़रीब 250 गाड़ियों के क़ाफ़िले में उनके समर्थकों ने शक्ति प्रदर्शन किया. वे नारे लगा रहे थे, ‘नारायण राणे अंगार है, बाक़ी सब भंगार है’. कहा जाता है कि राणे ने अपने समर्थकों को संबोधित किया और उद्धव के कामकाज के तरीक़ों को लेकर अपना ग़ुस्सा प्रकट किया. इस बीच, पार्टी कार्यकर्ताओं से बाल ठाकरे ने कहा कि वे ऐसी अफ़वाहों के ऊपर ध्यान न दें जो पार्टी को तोड़ने वाली हों, और उन्होंने कहा कि राणे पक्के शिवसैनिक हैं जो शिवसेना को कभी धोखा नहीं देंगे.

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