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'अब वह दूसरे दिन का सूर्य नहीं देख सकेगा'

पढ़िए धीरेन्द्र सिंह जफ़ा की पुस्तक 'मृत्यु कष्टदायी न थी' के कुछ अंश.

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12 मार्च 2019 (अपडेटेड: 12 मार्च 2019, 06:38 AM IST)
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सत्य1935 में उत्तर प्रदेश में जन्मे धीरेन्द्र सिंह जफ़ा ने 1954 में एक फाइटर-पायलट के रूप में वायु सेना जॉइन किया. धीरेंद्र सिंह जफ़ा, विंग कमांडर (रिटायर्ड) भारतीय वायुसेना को 1971 में हुई लड़ाई के दौरान पाकिस्तान में युद्धबंदी बनाया गया था. रणभूमि में उनके साहस के लिए उन्हें वीर चक्र से नवाज़ा गया. 1989 के अयोध्या-फ़ैज़ाबाद के साम्प्रदायिक दंगों में अमन चैन की दिशा में उनके प्रयासों को भारत के उप-राष्ट्रपति द्वारा सराहा गया और उन्हें 'समाज-रत्न' की उपाधि दी गई.
मृत्यु कष्टदायी न थी किताब उस पूर्व भारतीय फ़ाइटर पायलट के अनुभवों का सच्चा वृतांत है, जिसे 1971 भारत-पाक/बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के दौरान क़ैदी बनाया गया था. यह किताब युद्ध के दौरान फ़ाइटर पायलट्स के साहसिक जीवन का वर्णन तो करती ही है साथ ही इसका आत्मविश्लेषी पहलू भी है, जहां युद्ध की भयावह हक़ीकतों पर सैनिक की प्रतिक्रियाएं नज़र आती हैं. युद्ध के क़ैदी के अनुभवों को बारीकी से पेश किया गया है, और मृत्यु, विरक्ति, अकेलापन व दुःख जैसे युद्ध के भाव हमसे साझा होते जाते हैं. दिल को छूने वाले किस्सों और पाकिस्तानी जांच अधिकारियों, संतरियों, जेलर और नागरिकों की बातचीत के हिस्सों के ज़रिए, यह किताब आसमान में चलने वाले भौतिक युद्ध और दो देशों के मन में चलते द्वंद की तुलना बखूबी पेश करती है.
‘क्या नाम है तेरा?’ मेज़ के उस पार से आवाज़ आई, पंजाबी लहज़े की खरखराती उर्दू में. जफ़ा ने जल्दी से कुछ सोचा, फिर अंग्रेज़ी में जवाब दिया, ‘माई नेम इज़ जफ़ा,’ (मेरा नाम जफ़ा है.) ‘सिर्फ़ जफ़ा?’ फिर उसी लहज़े में पूछा गया, ‘न कुमार, न सिंह, न पंडित?’ ‘माई फुल नेम इज़ धीरेन्द्र सिंह जफ़ा,’ उसने फिर अंग्रेज़ी में जवाब दिया. (मेरा पूरा नाम धीरेन्द्र सिंह जफ़ा है.) ‘तुम्हारा घर कहां है? मतलब, तुम किस सूबे के रहने वाले हो?’ फिर वही लहज़ा पर आवाज़ दूसरी. ‘माई होम इज़ इन उत्तर प्रदेश,’ जफ़ा अंग्रेज़ी पर ही अड़ा रहा. (मेरा घर उत्तर प्रदेश में है.) ‘आह,’ एक तीसरे सज्जन वाकई आह भरते हुए मेज़ के उस पार से बोले, ‘तुम लोग गुलाम ही रहे हो...हमेशा, हमेशा से. और आगे भी गुलाम ही रहोगे. अंग्रेज़ पच्चीस साल पहले तुम्हें छोड़कर चले गए, लेकिन तुम अभी भी उनके गुलाम हो, कम से कम उनकी ज़बान के गुलाम तो हो ही. शायद किसी न किसी तरह की गुलामी तुम्हारी मजबूरी है, तुम्हारे ख़ून में है. सदियों तक तुम कमबख़्त हमारी जूती के नीचे रहे, और अंग्रेज़ों के जाने के बाद तुम आज भी उनके रुतबे और ज़बान के ग़ुलाम हो.’ और भी हिकारत से भरी आवाज़ में एक और सज्जन बोले- ‘तुम अपनी ज़बान नहीं बोल सकते? तुम्हें अपने और अपनी ज़बान पर कोई नाज़ नहीं? या, तुम्हारे यहां इतनी ज़बानें हैं कि किसी को समझ ही नहीं आता कि कौन सी ज़बान इस्तेमाल करे?’ जफ़ा ख़ामोश रहा. ‘अबे, हिन्दी वाले, बोल, हिन्दी में बोल. या तेरा बॉस कोई एंग्लो-इंडियन या मद्रासी है जो तू हिन्दी बोलने से डरता है?’ जफ़ा ने सोचा कि यह सब लोग उससे पूछताछ के लिए बैठे हैं, अवश्य सब अंग्रेज़ी भी अच्छी तरह जानते होंगे. फिर भाषा के ऊपर इतनी गर्मा-गर्मी क्यों? केवल भाषा इनका मकसद नहीं हो सकती. असल में यह एक कड़ी पहल कर रहे हैं. चीख़ कर, हिकारत का अंदाज इख़्तियार करके, यह उसका मनोबल गिराने की चेष्टा कर रहे हैं जिससे वह बचाव की मुद्रा में रहे और भयभीत होकर उनके अगले सवालों का जवाब तुरंत दे. अचानक से जफ़ा ने सवाल-जवाब की दिशा बदलने की चेष्टा करने का निर्णय लिया. उसने बड़ी मासूमियत से फिर अंग्रेज़ी में ही कहा- ‘एक्सक्यूज़ मी, बट व्हाट लैंगवेज आर यू जेन्टिलमेन यूज़िंग?’ (माफ़ कीजिएगा, लेकिन आप जनाब कौन-सी ज़बान बोल रहे हैं?) अब कोई पांचवें या छठे सज्जन आग-बबूला होकर बरस ही पड़े - ‘अबे, यू.पी. वाले, तुझे हमारी उर्दू समझ में नहीं आती? जब तेरे बाप दादा हम लोगों के पैरों में सिर रगड़ते थे तो कौन सी ज़बान बोलते थे? और तू पूछ रहा है कि हम क्या बोल रहे हैं?’ ‘जनाब-ए-आला,’ जफ़ा ने धीमे से मुस्करा कर अब हिन्दुस्तानी में बोलना शुरू किया, ‘मैं अलीगढ़ के पास का रहने वाला हूं मगर पढ़ाई लिखाई की वजह से ज़्यादातर लखनऊ में ही रहा हूं. लेकिन मैं यह कहने पर मजबूर हूं कि आपकी उर्दू वैसी नहीं है जैसी कि मैंने जिन्दगी भर बोली और सुनी है- न तलफ़्फुज़ में, न लहज़े में. मैंने सोचा यह कोई और ही ज़बान है जो मेरे बस की नहीं इसलिए बोलने की गुस्ताख़ी नहीं की. अगर आपको मेरी यह ज़बान ठीक लगती है तो मैं इसी का इस्तेमाल करूंगा.’ जफ़ा ने एक प्रकार से उन्हें बता दिया कि लखनवी और अन्य प्रान्तों में बोली जाने वाली उर्दू में वैसा ही फ़र्क है जैसा कि ऑक्सफ़ोर्ड की अंग्रेज़ी और अनपढ़ों की अंग्रेज़ी में. लेकिन इससे अधिक न उसने कहा न उसके अन्तर्मन ने कहने का साहस किया. उसके बोलने के बाद जो सन्नाटा कुछ क्षणों तक छाया रहा उससे जफ़ा को लगा कि कम से कम मानसिक रूप से तो हिसाब बराबर हो चुका था. आखि़र पूछताछ एक दिमाग़ी हाज़िरजवाबी, शब्दों के तोड़-मरोड़ का ही तो खेल है...देखा जाएगा. परंतु उसके सामने बैठे लोग भी कम नहीं, वे भी अपने काम में माहिर होंगे, अतः उसे बहुत सतर्कता से जल्दी से सोचकर जवाब देने होंगे. किसी भी दशा में उसका रवैया अड़ियल या नकारात्मक नहीं होना चाहिए, शायद तभी वह उनको असली मक़सद से थोड़ा-बहुत गुमराह कर सकेगा. ‘तुम्हारा यूनिट?’ तेज़ी से सवाल आया. सहसा जफ़ा का ध्यान लगभग दस वर्ष पूर्व की एक घटना पर गया. वह समय था भारत-चीन युद्ध के कुछ माह बाद का. उस समय भी चीन से लगे बार्डर पर बहुत कशमकश चल रही थी और भारत की चौकसी अपने चरम पर थी. एक बहुत सीनियर अफ़सर जफ़ा के यूनिट का मुआयना करने आए हुए थे. सब कुछ देखने के बाद वे आखि़र में पायलट्स के आराम-कक्ष में आए जहां एयरमार्शल साहब को प्रथा के अनुसार यूनिट के अफ़सरों के साथ चाय पीनी थी. प्रथा के ही अनुसार एयरमार्शल साहब ने चाय की चुस्की लेते हुए पूछा, ‘तो बॉयज़, आप लोगों को मैं क्या बताऊं? पूछिए, जो भी मुझसे पूछना चाहते हों.’ अमूमन ऐसे अवसर पर जूनियर अफ़सर इतने बड़े ओहदे के अफ़सर से औपचारिक, हल्की-फुल्की बातें कर लेते थे. जैसे एयरमार्शल साहब के विदेशी दौरों के बारे में, वहां की वायुसेनाओं की गतिविधियों के बारे में. परन्तु चीन के आक्रमण ने तरह-तरह की आशंकाओं का पिटारा खोल दिया था और हर एक फ़ाइटर स्क्वाड्रन में निरन्तर नए रूप से हमला करने की और अपने बचाव की तकनीक पर बहस छिड़ी रहती थी. ख़ासतौर से ऐसे विषयों पर जिनका संबंध सीधे लड़ाकू विमानों के चालकों से हो. इसका कारण था वायुसेना की लड़ाई की ख़ासियत- इंजीनियरों और अन्य कार्यकर्ताओं का काम देश के भीतर हवाई अड्डों पर समाप्त हो जाता है, उसके बाद केवल चालक ही अकेला जहाज़ लेकर मोर्चे पर जाता है. अतः उसे अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए साफ़-साफ़ मार्गदर्शन मिलना अनिवार्य है और साथ ही कुछ आश्वासन, कुछ दिशानिर्देश, मरने या ज़िन्दा रहने के बाबत नहीं, अपितु ऐसी दशा के लिए जब उसका जहाज़ दुश्मन की गोलियों से क्षतिग्रस्त हो जाए और उसे पैराशूट से बर्फ़ीले पहाड़ों या दुश्मन के इलाक़ों में उतरना पड़े. ऐसे अवसर पर जूनियर अफ़सर प्रायः सवाल पूछने से पीछे हटते हैं, कि कौन अपना सिर ओखली में डाले. परन्तु परिस्थितियों के बोझ में एक ने पूछ ही लिया, ‘सर, चीन के मोर्चों तक पहुंचने के लिए हम अधिकतर पहाड़ों के ऊपर ही उड़ान भरेंगे. हिमाचल के पूर्वी और उत्तरी हिस्से से ही सारा इलाका बर्फ़ से ढका है. यदि ऐसे इलाके में पैराशूट से कूदना पड़ा तो ठंड से बचाव की समस्या गंभीर होगी. इसके लिए कुछ विशेष कपड़े होने चाहिए. इस समय हम लोग अपने ही स्वेटर आदि पहनकर उड़ान भरते हैं. इन कपड़ों में दो-एक घंटे से अधिक जीवित रहना मुश्किल होगा. इसके अलावा केवल हेलीकॉप्टर के द्वारा ही वहां से बच कर निकला जा सकता है. सर, ये बातें हम लोग प्रायः आपस में करते रहते हैं, इसीलिए मैंने आपसे कहने का साहस किया.’ एयरमार्शल महोदय ने सुनकर आंखें मिचमिचायीं और चुप बैठ कर कुछ देर सोचते रहे. स्पष्ट था कि ये समस्याएं अभी तक उनके संज्ञान में थीं ही नहीं. अंत में जब वे बोले तो एक अन्य ही विषय को उछालने लगे. ‘पहले आप लोग मुझे बताइए कि अगर चीनियों ने आपको बंदी बना लिया तो आप क्या करेंगे? मेरा मतलब है कि आप उनको क्या बताएंगे?’ एयरमार्शल साहब ने ज़ोर देकर पूछा. सब चुप! हर व्यक्ति इस इंतज़ार में कि कोई अन्य ही मुंह खोले और अपनी गर्दन फंसाए. ‘बोलो, बताओ,’ एयरमार्शल ने आग्रह किया, ‘आखि़र तुम्हीं लोगों को वहां लड़ने जाना है, तुम्हें मालूम होना चाहिए कि दुश्मन को क्या बता सकते हो, क्या नहीं.’ एक नई उम्र के फ़्लाइंग अफ़सर ने झिझकते हुए कहा- ‘सर, मैं उनको अपना रैंक, नाम, सर्विस नम्बर और यूनिट बताऊंगा.’ ‘नहीं, नहीं, नहीं,’ एयरमार्शल गरजे, ‘तुम केवल अपना रैंक, नाम और नंबर बताओगे, केवल रैंक, नाम और नम्बर, इसके अलावा कुछ भी नहीं, बिल्कुल कुछ नहीं.’ एयरमार्शल अब यूनिट के कमान्डिंग अफ़सर की ओर मुखातिब हुए. ‘क्यों? तुम्हारे पायलट्स को ‘जेनेवा कन्वेंशन’ के बारे में नहीं मालूम? तुमने इन्हें ऐसी चीजें नहीं बतायीं?’ वे झल्लाये. ‘फौरन इनको ‘जेनेवा कन्वेंशन’ का ज्ञान प्राप्त होना चाहिए और यह याद रखें कि इसके अलावा दुश्मन को कुछ भी न बताएं.’ ‘जी हां, सर,’ कमान्डिंग अफ़सर तत्परता से बोला. मन ही मन उसने सोचा कि यह कमबख्त ‘जेनेवा कन्वेंशन’ है क्या, और मिलेगी कहां. व्यक्ति-विशेष अपनी बात समाप्त करते ही उठ गए और कमरे से बाहर चले गए. गरम कपड़ों और हेलीकॉप्टर से बचाव के विषय में कोई चर्चा ही नहीं हुई. होती भी कैसे? यह एक ऐसे देश की मिलिट्री के सीनियर अफ़सर थे जिस देश में चीन के हमले के पहले बहुत गंभीरता से कुछ दिग्गज दानिशमंद यह सलाह दे रहे थे कि भारत को अहिंसा की दिशा में अभूतपूर्व कदम उठाते हुए ऐलान कर देना चाहिए कि हम किसी से नहीं लडेंगे, हमें मिलिट्री की आवश्यकता ही नहीं है! ‘जेनेवा कन्वेंशन...मेरी जूती,’ एक नौजवान अफ़सर आवेश में बोला. ‘ज़रा रैंक, नम्बर, नाम बताकर तो देखिए! दुश्मन आपको इतने पर ही छोड़ देगा?’ दूसरे ने कहा, ‘जब थर्ड-डिग्री की मार शुरू होगी तो देखेंगे कि कौन कितनी चुप्पी साधता है.’ एक तीसरे अफ़सर ने शांत स्वरों में कहा, ‘मगर, हमारे पास उन्हें बताने के लिए है ही क्या? अगर हमारा जहाज़ मार गिराया जाता है तो उसकी रग-रग तो वे देख ही लेंगे. वैसे भी जहाज़ के कलपुर्ज़ों का मुआयना करके वे ‘जेन्स, दुनिया के वायुयान’ नाम की किताब में छपे आंकड़ों का मात्र सत्यापन ही तो करेंगे. रहा सवाल ऊंचें स्तर की नीतियों और युद्ध की रचना का, तो हमें उसके बारे में पता ही क्या है?’ ‘गूंगे गधे की तरह क्या बैठा है? तुझसे पूछा- कौन सा यूनिट है, बोलता क्यों नहीं? या हमें उगलवाना पड़ेगा?’ देरी के लिए डांट और धमकी एक साथ आईं. ‘एक मिनट जनाब,’ जफ़ा ने दबी ज़बान में कहा. दर्द के कारण वह वाकई परेशान था और कुर्सी में सरक-सरकाकर अपनी पीठ को आराम देने की कोशिश कर रहा था. ‘ज़रा रुकिए, दर्द कुछ ज़्यादा ही हो रहा है.’ जफ़ा का ध्यान फिर लड़ाई के कुछ दिनों पहले की एक घटना पर गया. एक दिन वायुसेना के मुख्यालय में उसके सामने ‘अत्यन्त आवश्यक’ फ़ाइल आई जिसे आला अफ़सरों तक तुरंत पहुंचाना था.  जफ़ा ने जल्दी से फ़ाइल खोल कर दो पन्नों का लेख पढ़ा. उसका शीर्षक था, ‘पाकिस्तान एयर अटैची द्वारा सब देशों के मिलिट्री अटैचियों को दी गयी आज सुबह की ब्रीफ़िंग.’ पाकिस्तान द्वारा इस खुलासे में ख़ास बात थी. भारतीय वायुसेना के लड़ाकू यूनिटों के ठिकाने जो विस्तार से दिए गए थे. यहां तक कि जो यूनिट पूर्वी पाकिस्तान के मोर्चे पर दर्शाये गए थे, पूरब की लड़ाई समाप्त होने पर उनके पश्चिमी मोर्चे के संभावित ठिकाने भी बताए गए थे. जफ़ा आश्चर्यचकित था, पाकिस्तान को हमारे प्लान की एक-एक बात मालूम थी. और अब ये उससे यूनिट पूछ रहे थे. अब क्या गोपनीय और क्या नहीं? ‘नं. 26 स्क्वाड्रन,’ जफ़ा ने बेहिचक बोल दिया. जब पूछा गया कि यह स्क्वाड्रन कहां तैनात है, उसने सही स्थान भी बता दिया. जब परस्पर दुश्मनों की ज़मीन पर एक दूसरे के सैकड़ों जासूस काम कर रहे हों, जब अमरीका, रूस जैसी महाशक्तियां भी चारों ओर अपने जासूस फैलाए हों, जहां अन्तरिक्ष में उड़ते जहाज़ और सेटेलाइट निरन्तर हर मिलिट्री हरकत पर नज़र रख रहे हों, तो क्या गोपनीय रह जाता है समझ से परे है. तोपें, टैंक, नौसेना और वायुसेना के जहाज़ और उनके असलहे, कम से कम ये तो गोपनीय रह ही नहीं सकते, क्योंकि यह सब दूसरे मुल्कों से ख़रीदे जाते हैं. बाकी सब जासूस पता लगा लेते हैं. सम्भवतः हमला करने के तरीक़े, पलटवार करने की समय-सीमा, कुछ आकस्मिक हमलों के प्लान, पायलटों की क्षमता आदि ही कुछ विषय हैं जिनको थोड़े समय के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है. ऐसे विशेष कार्यक्रम जैसे राडार का सर्वप्रथम प्रयोग या एटम बम का हमला, यह अलग मसले हैं जो हमारे संदर्भ में निरर्थक हैं. ‘तुम्हारा कमांडिंग अफ़सर कौन है?’ ‘तुम्हारा स्टेशन कमांडर कौन है?’ ‘तुम्हारे स्क्वाड्रन के पायलटों के नाम क्या हैं?’ आखि़र नाम में है क्या, जफ़ा ने सोचा. एच. सिंह या वाई. सिंह, डी. कुमार या ए.यू. ख़ान- क्या फर्क पड़ता है? शायद तभी जब बहादुरी के लिए मेडल पाने वालों या मृतकों की सूची में नाम दर्ज हो. जफ़ा ने नाम गिनाना शुरू कर दिया- कुछ सही, कुछ काल्पनिक और बीच-बीच में रुक-रुक कर, समय बर्बाद करने की चेष्टा से. वैसे भी जफ़ा उस दिन तड़के उठकर तीन हमले पाकिस्तान में कर चुका था; फिर गंभीर चोट, जीप का कष्टमय सफ़र और मानसिक तनाव उस पर अब असर दिखा रहे थे. उसके उत्तर रुक-रुक कर आने लगे, आवाज़ धीमी होने लगी, पूछताछ करने वाले और ज़ोरों से चिल्लाने लगे. अन्ततः जफ़ा अपनी कुर्सी में और धंस गया और अचेत हो गया. उसे लगा जैसे उसे उठाकर कहीं ले जाया जा रहा है. कुछ देर बाद उसकी आंख खुली तो तेज़ रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी. वह ज़मीन पर पड़ा था और अलग-अलग वर्दियों में कुछ लोग उसके आसपास खड़े थे. एक छोटा, मोटा, सफ़ेद बालों वाला अफ़सर चहलकदमी कर जफ़ा के चारों ओर घूम रहा था. अचानक रुक कर, अपना बूट ज़मीन पर फटकारते हुए वह चिल्लाया, ‘इस्लाम हमें सिखाता है कि दुश्मन का सिर फ़ौरन क़लम किया जाए. समझ में नहीं आता ऐसा करने से क्यों रोका जा रहा है!’ गुस्से से लाल-पीला वह पैर पटक कर इधर-उधर घूमता रहा जैसे बहुत परेशानी की हालत में हो. ‘और हमसे कहा गया है कि इस कमबख़्त की देखभाल करो, इसे खाना खिलाओ, इसका इलाज करवाओ! लाहौल-विला-कुव्वत! हम कितने बदल गए हैं!’ वह चिल्लाया, ‘खै़र, इस हरामज़ादे को यहीं पड़ा रहने दो.’ यह कहकर वह जल्लाद वहां से चला गया. लोहे का दरवाज़ा बंद किया गया और बाहर से ताला लगा दिया गया. जफ़ा कंकरीट के फर्श पर पड़ा था, केवल अपने सूती फ्लाइंग ओवरऑल और अन्दर चड्ढी-बनियान में, न कंबल, न कुछ और. जाड़े की रात की ठंडी हवा लोहे के सींख़चे से अन्दर आ रही थी, जफ़ा को तीव्र कंपकपीं होने लगी. फिर से अचेत होने के पहले उसके दिमाग़ में एक ही ख़याल था- अब वह दूसरे दिन का सूर्य नहीं देख सकेगा.

किताब का नामः मृत्यु कष्टदायी न थी

लेखकः धीरेंद्र सिंह जफ़ा

प्रकाशकः सेज भाषा

उपलब्धता: सेज

मूल्यः 295 रुपए (पेपरबैक)


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