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बोधगया महाबोधि मंदिर पर हिंदुओं का नियंत्रण? नाराज बौद्ध भिक्षु आंदोलन पर उतरे

Bodh Gaya Mahabodhi Temple movement: बोधगया टेम्पल मैनेजमेंट कमेटी में 4 बौद्ध हैं, 4 हिंदू और चेयरमैन गया के जिलाधिकारी होते हैं. सारा विवाद कमेटी में शामिल हिंदुओं को लेकर है.

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Mahabodhi Temple
महाबोधि मंदिर में अनशन पर बैठे बौद्ध भिक्षुओं की तस्वीर. (X-@AIB_Forum)
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सौरभ
28 फ़रवरी 2025 (अपडेटेड: 28 फ़रवरी 2025, 04:23 PM IST)
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बिहार के गया में महाबोधि मंदिर में कुछ बौद्ध भिक्षु पिछले 17 दिन से जमीन पर दरी बिछाए अनशन पर बैठे हैं. इनके हाथों में भगवान बुद्ध और बीआर आंबेडकर की तस्वीरें हैं. कुछ के हाथों मे तख्तियां हैं, जिनमें लिखा है- ‘REPEAL BT ACT 1949’; 'ALL MEMBERS OF BTMC SHOULD BE BUDDHIST'. हिंदी में इनका मतलब है- ‘बोधगया टेंपल एक्ट 1949 खत्म हो’; 'BTMC के सभी मेम्बर बौद्ध हों'. अनशन पर बैठे भिक्षुओं का कहना है जो तख्ती पर लिखा है बस उतनी ही मांग है. सरकार के साथ बातचीत हुई है लेकिन हल अब तक नहीं निकला है. ताज़ा अपडेट ये है कि 28 फरवरी की सुबह अनशन कर रहे भिक्षुओं को प्रशासन ने उठा दिया है. उन्हें एक मेडिकल कॉलेज ले जाया गया था. हालांकि, भिक्षुओं का कहना है कि अनशन अभी समाप्त नहीं हुआ है, आंदोलन के लिए दूसरी जगह तय की जा रही है. क्या है ये पूरा विवाद, BT एक्ट और BTMC के मौजूदा ढांचे का विरोध क्यों हो रहा है, इतिहास में क्या-क्या हुआ. आइए समझने की कोशिश करते हैं.

बोधगया टेंपल एक्ट और BTMC

बोधगया में करीब ढाई हजार साल पहले एक पीपल के पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था. इसी स्थान पर बने मंदिर को महाबोधि मंदिर कहा जाता है, जो बौद्ध धर्म के सबसे पुराने मंदिरों में एक है. महाबोधि मंदिर परिसर को पहली बार सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बनवाया था. इतिहास की किताबों के मुताबिक वर्तमान मंदिर 5वीं-6ठी शताब्दी में बनाया गया था. यह गुप्तकाल के अंतिम दौर का मंदिर है. UNESCO ने 2002 में इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया था.

महाबोधि मंदिर की जिम्मेदारी बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी के हाथों में है. लेकिन सबसे पहले हमें 1949 के बोधगया टेंपल एक्ट (BT एक्ट) को समझने की जरूरत है. इसी एक्ट से बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी (BTMC) का गठन हुआ है. एक्ट के सेक्शन 3 के मुताबिक-

1. इस अधिनियम के लागू होने के बाद, राज्य सरकार एक समिति का गठन करेगी. इस समिति को मंदिर की भूमि और उससे जुड़ी संपत्तियों का प्रबंधन और नियंत्रण सौंपा जाएगा.

2. समिति में एक अध्यक्ष और आठ सदस्य होंगे, जिन्हें राज्य सरकार नामित करेगी. सभी सदस्य भारतीय नागरिक होंगे. इनमें से चार सदस्य बौद्ध धर्म के होंगे और चार हिंदू धर्म के होंगे, जिनमें महंत (मुख्य पुजारी) भी शामिल होंगे. यदि महंत नाबालिग हैं, मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं या समिति में शामिल नहीं होना चाहते, तो उनकी जगह किसी अन्य हिंदू सदस्य को नामित किया जाएगा.

3. गया जिले के जिला मजिस्ट्रेट समिति के स्वत: अध्यक्ष (ex-officio Chairman) होंगे. यदि जिला मजिस्ट्रेट हिंदू नहीं हैं, तो उस अवधि के लिए राज्य सरकार किसी हिंदू को अध्यक्ष के रूप में नामित करेगी.

4. राज्य सरकार समिति के सदस्यों में से किसी एक को सचिव के रूप में नामित करेगी.

मामला यहीं फंसा है कि BMTC में हिंदू मेम्बर क्यों हैं. फिलहाल महाबोधि मंदिर में जो आंदोलन चल रहा है उसका नेतृत्व ऑल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम कर रहा है. फोरम ने अध्यक्ष जंबू लामा ने लल्लनटॉप से बात करते हुए कहा-

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आंदोलन का इतिहास

ऐसा नहीं है कि ये मांग पहली बार उठ रही है. ये विवाद 19वीं सदी में ही शुरू हो गया था. तब बीटी एक्ट भी पारित नहीं थी. लेकिन महाबोधि मंदिर में तब भी बौद्ध धर्म के लोगों को पूर्ण अधिकार नहीं था. श्रीलंका में अनागरिक धर्मपाल नाम के एक बौद्ध संत हुए. दक्षिण एशिया में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान में उनका विशेष योगदान माना जाता है. 1891 में अपनी भारत यात्रा के दौरान उन्होंने पहली बार महाबोधि मंदिर पर बौद्धों के अधिकार की मांग उठाई. उस समय बौद्ध धर्म के इस मंदिर पर बोधगया मठ का अधिकार था. बोधगया मठ, बिहार के गया में ही स्थित है. यह मठ शिव की आराधना स्थली के रूप में जाना जाता है.

अनागरिक धर्मपाल ने मांग उठाई लेकिन हिंदू महंतों ने मंदिर पर अधिकार नहीं छोड़ा. बौद्धों ने दशकों तक महाबोधि मंदिर का मुद्दा उठाया. 1922 में गया में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ. इस दौरान बौद्ध भिक्षुओं के एक शिष्टमंडल ने महाबोधि मंदिर के बौद्धों के अधिकार का मुद्दा उठाया. अनशन में शामिल और BMTC के सदस्य रहे बौद्ध भिक्षु प्रज्ञाशील कहते हैं-

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प्रज्ञाशील कहते हैं कि आज़ादी के बाद महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई और बौद्धों की मांग को हवा में उड़ा दिया गया. सरकार 1949 में बोधगया टेम्पल एक्ट लेकर आ गई और कानूनी रूप से महाबोधि मंदिर पर बौद्धों का अधिकार खत्म कर दिया गया.

इस कानून के बनने के बाद 40 साल सामान्य बीते. बौद्ध धर्म के अनुयायियों की तरफ से महाबोधि मंदिर, मंदिर प्रशासन को लेकर कोई आपत्ति नहीं आई. लेकिन 1992 में आंदोलन एक बार फिर उठ खड़ा हुआ. 1992 में यह आंदोलन तेज हुआ जब अखिल भारतीय महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन समिति ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किए और मंदिर का प्रबंधन बौद्धों को सौंपने की मांग उठाई. इस आंदोलन में अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ और बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया भी शामिल थे.

इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण 'धम्म मुक्ति यात्रा' थी, जो एक रथयात्रा के रूप में बंबई से महाबोधि मंदिर तक निकाली गई. यह यात्रा मंदिर की मुक्ति के आह्वान का प्रतीक थी. इस यात्रा का नेतृत्व भंते नागार्जुन आर्य सुरई ससाई ने किया, जो मूल रूप से जापान के भिक्षु थे, लेकिन बाद में भारतीय नागरिकता प्राप्त कर चुके थे. वे नागपुर के आंबेडकरवादी बौद्ध समुदाय के एक प्रमुख नेता माने जाते थे.

लेकिन 1995 में आंदोलन ने एक अहम मोड़ लिया. बौद्ध संगठन आवाज़ तो उठा ही रहे थे, लेकिन 1995 में बोधगया में लंबा विरोध प्रदर्शन हुआ. तब बिहार में लालू यादव की सरकार थी. करीब 86 दिनों तक प्रदर्शन के बाद उन्होंने अपनी चतुर कूटनीति से आंदोलन को शांत कराया और जो लोग आंदोलन कर रहे थे उन्हें BMTC में मेम्बर बना दिया, यह कहते हुए कि 'सिस्टम' के अंदर रहकर अपनी मांगों को पूरा करिए. फिलहाल अनशन पर बैठे बौद्ध भिक्षु प्रज्ञाशील उस वक्त BMTC में शामिल हो गए थे. वे समिति में अपने कार्यकाल के दौरान अलग-अलग पदों पर रहे.

मौजूदा आंदोलन और उसके विरोधाभास

इसके बाद कई सालों के लिए ये आंदोलन एक बार फिर शांत हो गया. कुछ साल पहले आंदोलन फिर जागा और महाबोधि मंदिर में बौद्धों के एकाधिकार की मांग उठी. 2017 में rediff.com को दिए एक इंटरव्यू में अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ के तब के अध्यक्ष भंते आनंद ने कहा-

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लेकिन समय के साथ आंदोलन में बिखराव भी देखा गया. जैसे, सबसे महत्वपूर्ण, भंते आनंद का महाबोधि मंदिर में जारी मौजूदा आंदोलन और अनशन में समर्थन है लेकिन अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ इसमें शामिल नहीं है. इतना ही नहीं, BTMC में शामिल चार बौद्ध मेम्बर भी इस प्रदर्शन का हिस्सा नहीं हैं. अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ के मौजूदा अध्यक्ष प्रज्ञातीत कहते हैं-

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इस पर अनशन में शामिल प्रज्ञाशील पलटवार करते हुए प्रज्ञातीत और अखिल भारतीय भिक्षु महासंघ पर RSS से मिला होने का आरोप लगाते हैं. हालांकि, इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इस बार आंदोलन में बौद्ध भिक्षु की संख्या काफी कम है. स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि अनशन के पहले दिन जितनी संख्या में लोग मौजूद थे, अब उससे काफी कम दिखाई देते हैं.

हालांकि, ऑल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम के अध्यक्ष दावा कर रहे हैं कि इस प्रदर्शन में धीरे-धीरे लोग जुट रहे हैं और सिर्फ बिहार ही नहीं दूसरे राज्यों में भी प्रदर्शन शुरू हो रहा है.

सरकार का क्या कहना है?

आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी तरफ से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दो बार चिट्ठी लिखकर बातचीत के लिए समय मांगा गया, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. हालांकि, इस आंदोलन में प्रशासनिक स्तर पर बातचीत चल रही है. गया के जिलाधिकारी और BMTC के चेयरमैन त्यागराजन एमएस ने लल्लनटॉप को बताया-

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27 फरवरी को बिहार सरकार के गृह मंत्रालय के आंदोलनकारियों को बातचीत के लिए बुलाया था. अधिकारियों ने साथ बैठक करके लौटे ऑल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम के जनरल सेक्रेटरी आकाश लामा ने बताया-

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इस पूरे विवाद का एक और पहलू जिसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, वो यह है कि दलाई लामा की तरफ से अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

वीडियो: बौद्ध धर्म में कथित पुनर्जन्म की कहानी, दलाई लामा को कैसे चुना जाता है ?

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