प्रवीण चौधरी. 30 नवंबर 1937 को लुधियाना में जन्मे. 1961 में अमरीका चले गए.मटीरियल फ़िज़िक्स को अनुगृहीत करने. प्रवीण चौधरी IBM में रिसर्च डिवीज़न में कामकरते थे. इसका हेडक्वार्टर न्यू यॉर्क में था. IBM में प्रवीण ने 36 साल काम किया.इसमें उन्हें फिज़िकल साइंस डिपार्टमेंट में 1970 में मैनेजर बनाया गया. इसके बादIBM में उन्हें कई पोजीशंस मिलीं. इस दौरान उन्होंने फिज़िकल साइंस में मैग्नेटिकबबल, ऑप्टिकल रिकॉर्डिंग और जोसेफ़सन टेक्नोलोजी प्रोग्राम पर काम किया. प्रवीणचौधरी की सभी डिस्कवरी में अगर एक चीज जिसने आम जन मानस को सबसे ज़्यादा अफेक्ट कियाहै वो है मैग्नेटो-ऑप्टिक डेटा स्टोरेज सिस्टम में इस्तेमाल आने वाली मैग्नेटिकफ़िल्म्स. यानी ऐसी फ़िल्म्स जिसपर डेटा स्टोर किया जा सकता था. ऐसी फ़िल्म्स को हीसीडी और फ्लॉपी बनाने में काम में लिया जाता था. इस फ़िल्म से फ़िल्म और म्यूज़िकइंडस्ट्री में सबसे ज़्यादा बदलाव आया. आज भले ही हार्ड डिस्क और क्लाउड का ज़माना आगया है लेकिन 5 साल पहले जब सीडी और डीवीडी का दौर था, हम सभी प्रवीण चौधरी के कर्जमें दबे हुए थे. हालांकि प्रवीण चौधरी न होते तो हार्ड डिस्क भी न आई होती. आई होतीतो तनिक देर में आई होती. हम अभी भी कैसेट में पेन घोंस के रील रिवाइंड कर रहेहोते. ऐसी फ़िल्म्स में दो लेयर होती हैं. एक रिकॉर्डिंग लेयर होती है. दूसरी फालतूहोती है. फल्तून नहीं बस प्रोटेक्शन के लिए होती है. और कोई काम नहीं. ऐसी फ़िल्म्सपर रिकॉर्डिंग हेड से डेटा ठेला जाता है. रिकॉर्डिंग हेड रिकॉर्डिंग लेयर पर बनेसेक्टर्स में डेटा भरता है. इससे फ़ायदा ये होता है कि आप डेटा ढूंढते टाइम कम टाइमखर्च करते हैं. पहले कैसेट होती थीं. उनमें कोई गाना बजाना होता था तो उसे आगे यापीछे बढ़ाना पड़ता था. ये भी एक मैग्नेटिक फिल्म ही होती थी लेकिन उसमें सेक्टर्सनहीं बंटे होते थे. मगर जब सीडी आई तो आप गानों को आगे पीछे कम देर में करने लगे.अगले गाने पर जाने के लिए चल रहे गाने को पूरा नहीं सुनना पड़ता था. बस नेक्स्ट काबटन दबाओ. खतम. ये सब कुछ मैग्नेटिक फिल्म पर बने सेक्टर्स की बदौलत. इन्हींफ़िल्म्स का ईजाद किया था प्रवीण चौधरी ने.