'इधर पधारिए, कबीर की झोपड़ी का यह रास्ता है'
1 सितंबर यानी बिज्जी का हैप्पी बर्थडे. यहां पढ़िए उनकी कहानी- दूजौ कबीर.
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फोटो - thelallantop
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हम हर वक्त बीत रहे हैं. तकलीफ है. जो सामने से गुजर रहा है, वो याद भी रहेगा या नहीं. छटपटाहट. हड़बड़ी. और खुद पर भरोसा कतई नहीं. इसलिए तस्वीरें खींचते हैं. चेक इन करते हैं. स्टेटस अपडेट करते हैं. फिर भी गुजारा नहीं होता. सब कुछ इतना रियल, सब कुछ इतना वर्चुअल. फर्क खत्म हो गया है. एक दिन सब मिल जाएगा. तब इंसान को कैसे पता चलेगा कि जो हो रहा है, वो सच है या सपना. और जो सपना है तो किसका दिखाया है. उसकी नीयत क्या है.
ऐसा ही हुआ था क्रिस्टोफर नोलन की कमाल फिल्म इन्सेप्शन में. जहां आदमी दूसरों के सपनों में घुस अपने मुताबिक सपने रचता है. मगर इन सबके बीच उसे कैसे पता चलता था कि ऐन अभी वो जो कर रहा है. वो सच्ची मुच्ची है या नहीं. टोटम. एक टोटका. एक लट्टू, जो वो अपनी हथेली में या जेब में रखता था. वो उसे छूता था और उसे जिंदा होने का पता चलता था.
विजय दान देथा की कहानियां हमारे वक्त की और आने वाले वक्त की टोटम होंगी. उन्हें यथार्थ का लालच नहीं है. वो बिल्कुल अभी को कैद नहीं करतीं. वे अपनी मर्जी से आगे पीछे जाती हैं. वहां सब कुछ विज्ञान तर्क या धर्म से नहीं बंधा है. जब जिसका मन होता है उड़ जाता है, मर जाता है, जी जाता है. ये तर्क को ठेंगा है. ये बचकाना लग सकता है, मगर बेहद जरूरी है. और एक उम्दा बात ये भी. कि बिज्जी ने ये सब अपनी मादरी जबान में लिखा. दी लल्लनटॉप ऐसे ही लोगों के हौसलों के सहारे पैदा हुआ है. अपनी भाषा, अपनी बोली, अपनी निजता, अपनी माटी का गौरव.

विजयदान देथा. (वाग्देवी)
कल्पना, कल्लोल कल्पना ही इंसान को बचाएगी. नींद में भी, उसके पार भी. विजयदान देथा उर्फ बिज्जी की कहानियां हमारी संजीवनी बूटी हैं. इन्हें पढ़ें. क्योंकि आज (1 सितंबर) बिज्जी का बर्थडे है. तस्वीर देखिए. हमारे आपके बाबा से दिख रहे हैं. खादी की सदरी बने. मोटे लेंस के चश्मे से छांकती दुलारती आंखें. दूध उमड़ आया हो जैसे. इस आशीर्वाद को हम अगले आठ दिन बांचेंगे. बिज्जी का हफ्ता 1 सितंबर से शुरू हो गया है. हफ्ते भर में सात कहानियां और आठवीं कहानी ब्याज में.
हम आपको ये कहानियां पढ़वा पा रहे हैं, इसके लिए दिल से शुक्रिया बीकानेर के वाग्देवी प्रकाशन का. उन्होंने हमें बिज्जी के लिखे ये अक्षर, ये किस्से मुहैया कराए. ये कहानियां लजवन्ती- बिज्जी की प्रेम कथाएं किताब से हैं. किताब की कीमत 80 रुपये है. अब आप हैं और बिज्जी हैं. हवा पर दौड़ने का वक्त हो चला है कॉमरेड. खुद अपने ही फेफड़ों में हवा भर. - सौरभ
तो वक्त के मुताबिक यह बात बरसों पुरानी है कि हरियाली के बीच और हवा के झूले पर एक गांव बसा हुआ था. जहां धरम-करम के सांचे में ढले नितनेमी इनसानों की बस्ती, पर एक झोंपड़ी टली हुई. उस झोंपड़ी में बसने वाले व्यक्ति का नाम तो कुछ और ही था, पर गांव व इलाके के लोग उसे व्यंग्य और ताने के बहाने कबीर के नाम से ही बतलाते थे. अलाव के चारों ओर बैठकर कभी-कभी उस बस्ती के लोग पुरजोर शब्दों में कहते थे कि किसी औरत की कोख से जन्म न लेकर यह कबीर कुकुरमुत्ते या नाग-छतरी की तरह आप-ही-आप जमीन से उगा होगा. इनसान की औलाद होता तो इनसान-माफिक बातें करता.
सूने आकाश में कोई बदली का टुकड़ा सहसा प्रकट हो जाता है, वैसे ही एक दिन वो कबीर अचीता उस बस्ती में प्रकट हुआ. तभी से जुलाहे का काम तो बहुत उम्दा करता, पर बातें एकदम उलटी, सिरफिरी व बेहूदी करता था. कद-काठी और चेहरा तो फबता और सुन्दर, पर बातें ऊटपटांग. कैसे और कहां से अनमापे की सूझती, सो वो ही जाने. हाथ का पूरा उस्ताद. पर उलटी खोपड़ी का. जैसे घुंघराले व काले बाल, वैसी ही टेढ़ी-मेढ़ी व काली-स्याह बातें.

कालीन, शाल और कम्बलों में बेल-बूंटे, झाड़-झंखाड़ व फल-पत्ते ऐसे बुनता था गोया सचमुच के हों. उसके हाथों बुने कालीन के फूलों पर भंवरे भ्रम से मंडराते थे और कभी पके फूलों के भुलावे में तोते चोंच मारते थे. अगर हाथों की कारीगरी के समान उसमें अक्ल भी होती तो फिर कहना ही क्या! न कबीर की सनक व बेवकूफी की कोई सीमा थी और न बस्ती के लोगों की चिकचिक का कोई छोर. कबीर के हुनर की बातें हवा में घुली हुई थीं. समूची रियासत में उसकी शोहरत थी. एक दफा ऐसा इत्तफाक हुआ कि देश के मालिक राजा ने राजकुमारी के साथ गांव के तालाब-किनारे पड़ाव डाला. एक-सौ-एक घोड़ों का लशकर. घने बरगद की छांव तले पसीने से सराबोर घोड़ों को बहुत देर बाद विश्राम मिला. सुरंगी जाजम बिछी.
भनक पड़ते ही समूचा गांव राजा और राजकुमारी के दर्शन की खातिर हाजिर हुआ. राजा ने खुशी-खुशी जनता को दर्शन दिए. सहसा राजकुमारी के कानों में कबीर के नाम की फुसफुसाहट सुनायी पड़ी. राजकुमारी ने छलकते उत्साह से पूछा, ‘क्या कबीर का गांव यही है?’ लोगों ने जवाब दिया कि गांव तो मालिकों का है, पर कबीर यहीं रहता है. राजकुमारी का उत्साह गले में समाया नहीं. बेहद ललक से फिर पूछा, ‘वाकई?’
बस्ती के लोगों ने गर्दन हिलाकर ‘हां’ की. और ‘हां’ के साथ ही राजकुमारी फौरन दौड़कर राजा के पास पहुंची. खुशी के फूल बरसाती बोली, ‘इत्तफाक की बात कि हमने कबीर के गांव में अचीता पड़ाव डाला. आपकी इजाजत हो तो मैं उसकी कारीगरी देखने के लिए जाऊं.’राजकुमारी के मुंह से यह नादानी की बात सुनकर राजा कुछ देर तक टग-मग उसके चेहरे की ओर देखता रहा. राजा अपनी इकलौती बेटी का बहुत मन रखता था. और बेटी भी मन रखने लायक थी. बरसात के पानी की माफिक पवित्र और अनछुआ उसका अन्तस्. जैसा अकथनीय रूप, वैसा ही अकथनीय स्वभाव. अथाह सागर-सी अक्ल. निर्मल नजर और ताजे दूध-सी मुस्कराहट. राजा के मौन को कुरेदकर फिर पूछा, ‘जाऊं?’
राजा मुस्कराते बोला, ‘तू बेकार क्यूं तकलीफ उठाती है, मैं उसे यहीं बुला लेता हूं.’ इस आश्वासन के उपरान्त राजा ने हाथ जोड़े ठाकुर की ओर मुखातिब होकर पूछा, ‘लगता है, कबीर को मेरे आने की खबर नहीं हुई है. वरना अपनी कारीगरी दिखाने की खातिर वो सबसे पहले आता.’ ठाकुर के मन में पुराना कसैलापन भरा था. अच्छा मौका हाथ लगा. बेझिझक जवाब देते कहने लगा, ‘आपसे क्या अर्ज करूं अन्नदाता, इस कबीर का दिमाग आसमान में चढ़ा है. आपके बुलाने पर भी आ जाये तो गनीमत है.’राजा तो राजा ही होता है. जन-जन का मालिक. सर का मुकुट. किसकी मजाल जो राजा के आदेश को टाल सके! मौत अगर बख्शे तो मौत की मरजी, पर राजा की तो सपने में भी ऐसी मरजी नहीं होती. राजा के गुमान में गोया तकुआ घोंप दिया गया हो. पुतलियों की रंगत बदल गयी. गरजते हुए ठाकुर पर ही बरस पड़ा, ‘ठाकुर, तुम्हारी अक्ल और जबान तो ठिकाने है? किसके सामने क्या बकते हो, कुछ होश भी है? सरकार के आदेश से बेपरवाह नालायक तुम्हारे यहां फल-फूल रहे हैं और तुम ठाकुर कहलाते हो?’
ठाकुर के रोम-रोम में कंपकंपी घुस गयी. घोड़े पर सवार होकर मौत आई, उसमें कसर नहीं. अटकते हुए बमुश्किल बोल पाया, ‘अन्नदाता, मेरी तो औकात ही क्या, यह पागल कबीर तो भगवान की भी नहीं सुनता!’राजकुमारी की खुशी पर पाला पड़ गया. बात सीमा से बाहर निकलती दिखती है. वापस कैसे समेटी जायेगी! राजकुमारी को भी पहली मर्तबा अपनी अक्ल का पैंदा उघड़ता नजर आया. तब भी उसके मन में अक्ल से परे अटूट धीरज था. अब एक पल की भी देरी होने से राजा के गुमान का सांप हरगिज वापस बांबी में नहीं घुसेगा. बीन के बोल सुनकर शायद रीझ जाये. राजा के करीब आकर बोली, ‘आपसे बड़ा कला का पारखी दूसरा कौन है? आपके मुंह से ही तो मैंने सीख की यह बात सुनी कि कलाकारों की आदतें कुछ सनकी होती हैं. उनकी कद्र तो जानने वाला ही जानता है. आप ही तो फरमा रहे थे कि कलाकार विधाता के साक्षात् अवतार होते हैं! लाखों-करोड़ों दिखती आँखों में उनको पहचानने वाली एक दीठ बड़ी मुश्किल से मिलती है. ये बेअक्ल ठाकुर बेचारे दारू व ऐश के अलावा कुछ जानते भी तो नहीं!’
उफनते दूध पर मानो ठण्डे पानी का छींटा लगा हो! राजा मुस्कराने की कोशिश करते कहने लगा, ‘मेरी लाड़ली बेटी, तेरी समझ के आगे हार माननी पड़ती है...!’ राजकुमारी बीच में ही जल्दी से बोली, ‘यह जैसी-तैसी समझ आपकी ही बख्शी हुई है. मेरी तो बिसात ही क्या?’ राजकुमारी के गालों पर हाथ फिराते राजा कहने लगा, ‘तेरी बिसात का वजन मैं जानता हूं. तेरा स्वभाव व अन्तस् तो ऐसा है कि बेटा-बेटी दोनों की कमी पूरी होती है. अगर तू वक्त पर बात नहीं संभालती तो मेरे हाथों कबीर की मौत थी. यह किस तरह का अबूझ है कि राजा के इज्जत-कायदे भी नहीं समझता! चल, तेरे साथ मैं भी चलता हूं. तारीफ सुन-सुनकर कान पक गये. बेचारे कारीगर का वक्त जाया करना ठीक नहीं. जनता तो राजा की औलाद के समान होती है. जब वहां चलना ही है तो देरी करने से क्या फायदा!’
यह बात कहकर राजा आप ही जिस ओर मुंह था, उधर ही चल पड़ा. ठाकुर हाथ जोड़कर लपकते हुए सामने आया और बोला, ‘गरीबनवाज, इधर पधारिए. कबीर की झोपड़ी का यह रास्ता है.’
राजा ने मुड़कर ताज्जुब से पूछा, ‘झोंपड़ी! ऐसे मशहूर कलाकार की झोंपड़ी! अपने भले-बुरे का तुम्हें होश भी है! इन लच्छनों से यह ठिकाना ज्यादा नहीं टिकने का!’ जूड़ी के बुखार के मरीज की तरह ठाकुर थर-थर काँपने लगा. टूटते सुर में बोला, ‘अन्नदाता, आंखों से देखे बगैर इस सिड़ी की करतूतों पर यकीन ही नहीं हो सकता.’ राजकुमारी बात को खत्म करती-सी बोली, ‘पर अब देर ही क्या है? जिसकी करतूत होगी, सामने आ जाएगी.’
अपने होंठों पर पवित्र मुस्कराहट छितराते कबीर झटपट उठ खड़ा हुआ. हैरत भरी निगाहों से लोगों के चेहरे बारी-बारी से देख रहा था कि ठाकुर झुंझलाहट दरसाते कहने लगा, ‘बावले की तरह टग-मग क्या देख रहा है? तेरे अहोभाग्य कि देश के मालिक, तीन लोक के नाथ खुद तेरे घर पधारे हैं, तेरी कारीगरी देखने की खातिर. अब उल्लू की तरह आंखें क्या फाड़ रहा है? कालीन या शाल हो तो नजर कर!’
राजकुमारी ने कारीगरी से पहले नजर भरकर कारीगर को देखा. तांबई रंग. काले भुजंग बाल और काली भुजंग दाढ़ी. सफेद अंगरखी. सफेद ही धोती, घुटनों तक. घुंघराली, घनी रोमावली! बर्फजात धवल बत्तीसी. शीतल मुस्कराहट. अंगों से परे मोहक रूप. राजकुमारी को इनसान के रूप में पहली दफा असली इनसान नजर आया. कबीर एक अबूझ बालक की मानिन्द कहने लगा, ‘आपने तो यहां तक आने की तकलीफ की, पर मैं तो जैसा-तैसा फकत जुलाहे का काम ही जानता हूं. आप कारीगरी मानें तो आपकी मरजी. पर मैं तो इस काम के सिवाय किसी दूसरे काम के लायक नहीं हूं.

सहसा राजकुमारी को भंवरों की भनभनाहट सुनायी दी. एक गुलाब के पौधे पर फूलों के ऊपर भंवरे मंडरा रहे थे. पर यह पौधा तो धरती से अधर होते हुए भी हरा-भरा था. इस माजरे पर यकीन करने के लिए वह दौड़कर पौधे के करीब पहुंची. ऊपर हाथ फेरने पर मालूम हुआ कि यह तो बुनाई का पौधा है! आगे अलगनी पर चार-पांचेक कम्बल व शाल लटक रहे थे. राजा और राजकुमारी ने अपनी सुधबुध बिसराकर खुद उन्हें खोला. तहें खुलते ही एक-एक चित्र की बनावट में उनकी नजरें उलझ गयीं. काली घटा में गोया वाकई बिजली चमचमा रही हो. कहीं आंधी का अन्धड़ तो कहीं बवण्डर की घूमर. कहीं इन्द्रधनुष तो कहीं रेगिस्तान की बलखाती लहरें.
कहीं हरे करील पर लटके लाल ढालू ही ढालू!
शिकारी राजा को बिलों की पहचान थी. एक कालीन की तह खुलते ही हैरानी से पूछा, ‘अरे, यह लोमड़ी के बिल की तरह क्या है? भीतर लोमड़ी तो छुपी हुई नहीं है?’ कबीर मुस्कराते बोला, ‘आपने पहचान तो खूब की, वास्तव में यह लोमड़ी का बिल ही है.’ राजकुमारी शहद-घुले सुर में बोली, ‘पर लोमड़ी के बिल में तुम्हें ऐसी क्या खूबसूरती नजर आयी?’
कबीर के मन-लायक सवाल था. उत्साह से जवाब दिया, ‘कुदरत की हर वस्तु एक दूसरी से बढ़कर है. न कोई उन्नीस और न कोई बीस.’ राजकुमारी के रूप को यह बात काफी बुरी लगी. भद्दा सो भद्दा, सुन्दर सो सुन्दर. दोनों सरीखे कैसे हो सकते हैं? बोली, ‘फिर खूबसूरत व बदसूरत का मतलब क्या? खूबसूरत को कौन पूछेगा?’
कबीर धीरज से कहने लगा, ‘खूबसूरत और बदसूरत का फर्क तो फकत इनसान की समझ और नजर का विकार है. आपको शायद विश्वास नहीं होगा कि एक दफा जंगल से गुजरते समय मेरी नजर लोमड़ी के बिल पर पड़ी. उस वक्त मुझे वो चांद से भी ज्यादा खूबसूरत लगा. अगले दिन करघे पर बैठा तो आप ही लोमड़ी का बिल बन गया. हू-ब-हू उस बिल के उनमान.’
राजा होंठ चबाने के उपरान्त बोला, ‘जंगल वाला बिल तो राम जाने मेरे मन भाता या नहीं, पर तेरी यह कारीगरी तो जैसे मुंह बोलती हो. कहीं विधाता का अंश तो तेरे हाथ नहीं लग गया? आंखों देखी वस्तु बड़ी मुश्किल से हाथों की पकड़ में आती है. देखने में तो कोई नहीं चूकता, पर हाथ सभी के चूकते हैं.’ कबीर गर्दन हिलाते कहने लगा,
‘ऊं-हूं, देखने में चूक होती है, तभी तो हाथ चूकते हैं. किसी वस्तु को देखते समय मेरी आंखें हाथ बन जाती हैं और करघे पर बैठते ही मेरे हाथ आंखें बन जाते हैं.’ राजकुमारी ने पहली मर्तबा इनसान की जबान से इनसान के बोल सुने. यह तो बराबरी के भाव से बेहिचक बात कर रहा है. इसकी नजर में तो कोई छोटा-बड़ा नहीं. राज-दरबार का तो माहौल ही अलग. इनसानों के मुखौटों में वहां सियार, कौवे, पिल्ले, गधे और मेमने इधर-उधर चक्कर लगाते हैं. इनसान की योनि में आकर भी कोई इंसान की मर्यादा नहीं जानता. राजकुमारी होश संभालने के बाद जिस मर्यादा को देखने की खातिर तरस रही थी, वह पहली मर्तबा कबीर के चेहरे पर साफ नजर आयी. उसका हृदय खुशी से हिलोरें लेने लगा.
नासमझी से गर्दन हिलाता बोला, ‘हां, हां, इसमें क्या बुराई है! मेरी मेहर और राज्य के खजाने के होते किसी दूसरे को तेरा माल बेचने की जरूरत ही क्या है! अब तो कोई तीसमारखां भी तेरा माल खरीदने की हेकड़ी दिखाये तो मुझे खबर कर देना, मैं उसे जिन्दा जमीन में गड़वा दूंगा. समझ गया न?’
ठाकुर ने हां-में-हां मिलाते ताना मारा, ‘यह तो जन्म से ही सारी बातें समझा हुआ है, अन्नदाता, फिर क्यूं किसी की बात माने.’ राजा हामी भरते कहने लगा, ‘ऐसे बड़े कारीगर को किसी की बात माननी भी नहीं चाहिए. अगर तुमने भी जबरदस्ती खरीदने की जुर्रत की, तो मुझ-सा बुरा न होगा.’
राजा ने आज के दिन तक इतनी बातें किसी से नहीं की थीं. इसका खयाल आते ही उसने फौरन सवारों को आदेश दिया कि वे दिखती हुई तमाम कारीगरी अपने कब्जे में करें और आगे के माल के लिए पेशगी दें. और कबीर के घर आकर जल्द-से-जल्द मुँहमाँगी कीमत अदा करें. लेन-देन की खातिर कबीर का वक्त जाया किया तो फिर उनका मालिक भगवान ही है. और इस आदेश के साथ ही राजकुमारी के कलेजे में मानो सुरंग फटी हो. उसकी सांस जहां-की-तहां थम गयी. पर कबीर के चेहरे की रंगत रंचमात्र भी नहीं बदली. सवार अलगनी पर लटकते कालीन व कम्बलों को लेने की खातिर आगे बढ़े ही थे कि वो उसी तरह मुस्कराते हुए, बिना हाथ जोड़े और बिना अन्नदाता का लफ्ज जबान पर लाये कहने लगा, ‘मैंने तो पहले ही साफ कह दिया था कि मुनाफे की खातिर जुलाहे का काम नहीं करता. आपका आना बेकार गया, इस खातिर माफी चाहता हूं.’
अब राजा को कबीर की बात का मर्म ठीक से समझ में आया. दिमाग में बवण्डर उठा. नसों का खून उबलने लगा. इस चण्डाल की इतनी हिम्मत! भन्नाते हुए गरजकर पूछा, ‘क्या दूसरों की तरह मेरे लिए भी बेचने की मनाही है?’राजकुमारी के नसीब में यह दिन देखना भी बदा था! कैसी बुरी गांठ उलझी! पाषण-मूर्ति के उनमान कबीर के होंठों पर नजर गड़ाकर इन्तजार करने लगी कि उसके मुंह से अब क्या बोल निकलते हैं? होंठों तक आयी मुस्कराहट को रोकता हुआ कबीर कहने लगा, ‘मैंने तो अपने मन की सच्ची बात दरसा दी, आप जो चाहें मतलब निकालें.’
राजा के गुस्से को मानो पलीता लगा हो. पैर पटकते बोला, ‘मेरे पास मतलब निकालने का समय ही कहां है? नालायक, तेरी मौत तो नहीं आयी?’ ‘मौत तो एक दिन आनी ही है! यह तो किसी का भी खयाल नहीं करती. न रंक का, न राजा का. मरने की बात जानता हूं तभी तो अपनी मेहनत की कीमत नहीं आंकता.’इस दफा ठाकुर ने एक बढ़िया तदबीर सुझाई. अंगुलियां चटकाते कहने लगा, ‘कीमत नहीं आँकना चाहता तो अन्नदाता के चरणों में खुशी-खुशी ये तमाम वस्तुएं भेंट कर दे.’
ठाकुर के इस सुझाव से कबीर के होंठों पर आप ही मुस्कराहट छा गयी. कहने लगा, ‘भेंट देना, न देना तो मेरी मर्जी पर मुनहसर है. फिर राजा को किस बात की कमी, जो उसे भेंट दी जाय.’राजकुमारी ने कबीर के नाम से ऐसी कई अफवाहें सुन रखी थीं और उसे अनजाने ही उन पर काफी कुछ विश्वास हो गया था. उन बातों को रू-ब-रू आजमाने के बहाने ही खुद उसने आगे होकर कबीर के मुकाम तक आने का इरादा किया था. पर अब प्रत्यक्ष अपने कानों से ये बोल सुनकर भी, उसे यह यकीन नहीं हुआ कि कोई इनसान की औलाद राजा के मुँह पर इस तरह बेझिझक अपने अन्तस् का सांच प्रकट कर सकता है! अबोध बालक के सिवाय किसका ऐसा निर्मल हृदय हो सकता है?
बढ़ती उम्र और समझ के साथ सौ में से एक सौ पांच इनसानों को कीचड़ से सनना पड़ता है. तब यह अकेली बानगी कैसे बची रह गयी? राजकुमारी के रोम-रोम में घुसा डर किसी अदीठ जादू के जोर से अदेर, अनन्त फख्र और हर्ष में बदल गया. इनसानों के जमघट में फकत इनसान नाम की कमी है. इस पुतले से मिलकर तो खुद मौत भी अपना भाग्य सराहेगी. ऐसी मौत पर तो लाखों जीवन निछावर. मारने से ज्यादा तो राजा का भी वश नहीं है. फिर मरने का डर न होने पर कैसी जोखिम? कैसी हिचकिचाहट? मरना निश्चित है तब भी तमाम लोग मरने से डरते हैं. और एक यह औघड़ अवधूत जिसे अपनी सच्चाई के सिवाय दूसरा किसी तरह का बोध ही नहीं. सलावे भरती बिजली की चमक की नाईं ऐसा ही कुछ मर्म राजकुमारी के नैनों में कौंधकर ओझल हो गया. पर बाकी सुनने वालों पर मानो वज्रपात हुआ हो. राजमद का असीम अहम् कबीर के उस सरल जवाब को झेल नहीं पाया. इसकी बनिस्बत तो तलवार का वार सहना आसान है. एक दफा तो राजा अपनी सुध-बुध ही भूल गया. पर दूसरे ही क्षण नस-नस में सांप, राक्षस और शेर की विरासत भंवाने लगी. फुफकारते बोला, ‘तू किसी को अपनी कारीगरी बेचता नहीं, किसी को भेंट करता नहीं, फिर यह है किसलिए?’
ठाकुर कोहनी तक हाथ जोड़ते, अटकते सुर में बोला, ‘आपकी हैसियत की क्या सीमा अन्नदाता! ऐसे लाखों-करोड़ों भुक्खड़ मिलकर भी आपका बाल बांका नहीं कर सकते!’राजा कहना तो कुछ और ही चाहता था, पर उसकी बेखयाली में आप ही वह बोल फिसल पड़ा, ‘फिर!’ठाकुर ने राजा के चरणों को छूकर कहा, ‘भयंकर गलती हो गयी अन्नदाता, माफी बख्शाएं.’
राजा को उस वक्त ऐसा लगा गोया ठाकुर के रूप में खुद कबीर उसके चरणों में झुक रहा हो. राजा तो राजा ही होता है. वास्तव में इस भ्रम के बहाने राजा की खीज काफी निथर गयी. ठण्डे सुर में भोले कबीर को लाड़ से समझाते कहने लगा, ‘इस जिद के पीछे धूल फेंक. छोड़ यह पागलपन. मेरे दर्शनों से पहले तकलीफ देखी सो तो देखी, पर अब ऐश कर. मेरे खजाने से तुझे मुंहमांगी कीमत से भी सवाई कीमत मिलेगी. मुझ जैसा दयावन्त उमराव तुझे चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा. बावला कहीं का! राजा तो पिता की ठौर होता है, फिर मुझसे कैसा संकोच?’
राजा ने तो इतनी देर में ही उस शीरे के तारों की पहचान कर ली थी. यह तो बानगी ही दूसरी है. हुकूमत के आतंक से वश में आने वाला यह बन्दा नहीं. फिर मुसाहिबों के सामने सिंहासन की पोल खोलने में क्या सार? लाड़ से पुचकारते कहा, ‘बोल, अब तो तेरा मन बदला! तू क्या सच मानेगा कि इतनी खुशामद तो मैंने पुराने राजा की भी नहीं की. तू खुशी-खुशी हाँ करे तो सवारों को तेरी वस्तुओं के हाथ लगाने दूं. तुझ जैसे खरे आदमी पर मुझे भी नाज है. जो इच्छा हो कीमत मांग! तुझे पूरी छूट है.’

प्रकाशन का पता.
किसी के हाथों बख्शी हुई छूट लेने की रात तो कबीर का जन्म ही नहीं हुआ था, भले ही वो देश का मालिक ही क्यूं न हो. अपने मन पर कबीर किसी का अंकुश नहीं मानता था. राजा खीज करे तो वही बात और रीझ करे तो वही बात. समूची बात को सुथराई से संभालने की कोशिश करते बोला, ‘मेरी जरूरतें इतनी कम हैं कि आपकी दी हुई छूट मेरे किसी काम नहीं आ सकती. आपका आना बेकार गया, इस खातिर एक दफा फिर माफी चाहता हूं.' खुद राजा के मुंह से पुचकारकर दुलारने के उपरान्त भी कबीर का वो ही नाशुक्रा हठ सुनकर राजा के एड़ी से चोटी तक आग लग गयी. तब भी राजा को अपने कानों पर विश्वास करने का मन नहीं हुआ. शुबहा मिटाने की खातिर एक मर्तबा फिर पूछा, ‘तो क्या मुंहमांगी कीमत पर भी मुझे अपना माल नहीं देगा?’
कबीर राजकुमारी के चेहरे की ओर देखते कहने लगा, ‘लोभ-लालच के कारण बात बदलना तो मैं जानता ही नहीं. एक दफा पूछो तो वही बात और सौ दफा पूछो तो वही बात.’ इन बोलों के साथ राजकुमारी को ऐसा लगा, गोया गगन में एक सूरज का उजास और जुड़ गया हो. पर राजा की हालत बुरी हो गयी. वास्तव में वो देश का मालिक है कि नहीं? सिंहासन और मुकुट की आन यों ही नहीं रखी जाती. दूसरे ही क्षण राजमद के उफनते गुमान में उसने आदेश दिया कि अलगनी पर लटकते तमाम वस्त्रों के चिथड़े-चिथड़े कर दिये जायें.
राजकुमारी तो अपना आपा ही बिसर गयी. क्या करे और क्या न करे? ऐसा फन्दा तो कभी नहीं फंसा. पर बेहद ताज्जुब की बात कि कबीर ने किसी तरह की कोई रोक-टोक नहीं की. देखते-ही-देखते उसके हाथों उरेही बिजलियों के टुकड़े-टुकड़े हो गये. फूलों की पंखुड़ियां झड़ गयीं. पहाड़ के परखचे उड़ गये. टीले बिखर गये. अपना वश न चलने पर कबीर कर ही क्या सकता था! उसका वश चला तब तो उसने अपने हाथों कुछ-न-कुछ सिरजा ही. उसने अपना काम किया. राजा अपना काम कर रहा है. मन्द-मन्द मुस्कराते वो सवारों के हाथों हुए अपने कलेजे के चिथड़ों का ढेर देखता रहा. कबीर के होंठों की मुस्कराहट मानो राजा का मुंह चिढ़ा रही हो. उफनने के बाद राजमद की क्या हद! कड़कते सुर में आदेश दिया, ‘देख क्या रहे हो, इन चिथड़ों की तरह इस बेशर्म की भी चिन्दी-चिन्दी कर डालो.’
राजा लाड़ से दुलारते कहने लगा, ‘मेरी बावली बेटी, तूने इस बात की खूब फिक्र की! मैं मन का मैला थोड़े ही हूं. मेरी दातारी फकत इस कबीर के सिवाय कौन नहीं जानता! तेरी ऐसी ही मरजी है तो कबीर को मैं अपने गले का नवलखा हार दे दूं! हार तुझसे बढ़कर थोड़े ही है!’और वाकई इतना कहते ही अपने गले का नवलखा हार उतारकर कबीर के सामने करते हुए राजा बोला, ‘इसे अपनी कारीगरी का मोल नहीं, हरजाना ही मान ले. पीढ़ियों का दिवाला मिट जायेगा. बस, अब तो खुश!’
राजा खिल-खिल हंसते बोला, ‘तू तो अकेला ही हजार बावलों की गरज पूरी करता है. तू इस हार के मोतियों के बारे में कुछ जानता भी है? अगर दान के जरिये तू अपनी शोहरत फैलाना चाहता है तो बावलों के सरदार, इस हार के एक-एक मोती से तू हजारों कम्बल खरीद सकता है. फिर गद्दी पर बैठे-बैठे बेहिसाब कम्बल बांटना!’कबीर सिर हिलाते बोला, ‘दान करने के गुमान से मेरा मन तुष्ट नहीं होगा. धन जुड़ने से माया तो बढ़ती है, पर बाकी सब गुण घटते हैं. इनसान में इनसानियत न रहने पर पीछे फकत मल-मूत, खून, हड्डियां और खाल बचती है. तलवार की ताकत के बिना न दौलत बढ़ती है, न सत्ता. तलवार और सिंहासन के आतंक से मौत डरती हो तो बात दूसरी है!’
राजमद की धुन्ध के कारण राजा को कुछ सूझता ही नहीं था. कबीर की जबान से मौत का नाम सुनकर राजा को पहली मर्तबा ध्यान आया कि देर-सवेर मौत तो सबको आनी ही है. पर उसकी बात अलग है. वो देश का मालिक है. आवाज को दबाकर कहने लगा, ‘कबीर, एक बात तो बता! देख सही-सही कहना. मुझे तुझ पर भरोसा है. यह नौकूंटी राज्य का सिंहासन, यह अखूट खजाना, यह विशाल फौज, ये चमचमाती तलवारें और ये हाथी-घोड़े... क्या इस मरी मौत से मेरी रक्षा नहीं कर सकते? क्या नाचीज रिआया की तरह मुझे भी एक दिन मरना होगा?’ मुस्कराहट के उजले सुर में कबीर बोला, ‘यह भी कोई पूछने की बात है?’
एक गहरी आह भरकर राजा बोला, ‘पूछने की बात है, तभी तो पूछ रहा हूं. तेरे सिवाय कोई दूसरा पण्डित-ज्ञानी इसका सही जवाब नहीं दे सकता. तेरी बातें सुनकर मेरे सर के भीतर चींटियां कुलबुलाने लगी हैं. बता, यह क्या माजरा हुआ?’कबीर से किसी ने कोई सवाल पूछा तो उसे अपने वश चलते उसका जवाब देना ही था. कहने लगा, ‘मेरे लाख समझाने पर भी यह आपकी समझ में नहीं आयेगा, क्यूंकि यह सिंहासन, यह मुकुट, यह खजाना, यह फौज और ये चाकर कदम-कदम पर आपकी राह रोकते हैं. आपकी आंखों पर राजमद का जाला छाया हुआ है. इस खातिर न तो आप सत्य का परस कर सकते हैं और न दर्शन. लगता है कि आज जिन्दगी में पहली दफा सत्य के जगमगाते सूरज की झलक देखने के लिए आपके कलेजे में हूक उठी है. यह चींटियों की हलचल शायद उसी की है.’
राम जाने क्यूं राजा के मन में उस वक्त किसी तरह का कोई दुराव नहीं था. सभी के सामने कबूल करते कहने लगा, ‘अपनी हिम्मत का असली कूता तो मुझे आज ही हुआ. तू क्या सच मानेगा कि इतनी बड़ी रियासत का राजा होकर भी मैं मन-ही-मन तुझसे डर गया.’कबीर टिटकारी देते बोला, ‘यह तो बहुत बुरी बात हो गयी. मैं न तो किसी से डरता हूं और न किसी को डराना चाहता हूं. भला, मुझसे डरने की क्या बात है?’ राजा दो-तीन दफा गर्दन को हिलाते बोला, ‘वह तो मैं जानता हूं या मेरा जी जानता है.’
आस-पास खड़े दरबारियों और ठाकुर के आश्चर्य की सीमा न रही कि देश के मालिक होकर, राजा आज यों आंय-बांय क्या बक रहे हैं! कहीं दिमाग तो नहीं फिर गया! राजा के डरने से कहीं राज्य चलता है भला! यह छली कबीर जरूर कोई जादू-टोना जानता है. इससे तो किनारा करना ही बेहतर है. ठाकुर ने दोहरे होकर अर्ज की, ‘अन्नदाता, थाल अरोगने के लिए देर हो रही है. आपके अरोगने के बाद ही बस्ती के लोग बासी मुंह कुल्ला करेंगे.’ठाकुर की आवाज सुनते ही राजा को वापस चेत हुआ. अपने असली खोल में आते ही उसका सुर बदल गया. गगन की ओर ऊपर देखते बोला, ‘सूरज तो सिर पर चढ़ आया और अभी तक तुम्हारी बस्ती का मुंह बासी ही है?’
ठाकुर ने ‘महाराजा की जय हो’ कहने के उपरान्त गर्व से कहा, ‘आपके अरोगने से पहले तो मेरी स्वामीभक्त रिआया गले से थूक तक नीचे नहीं उतारती, रोटी खाना तो बड़ी बात है.’ राजकुमारी ने खुद चलने की जल्दी दरसायी तो राजा झट अपने डेरे की तरफ चल पड़ा. राजा के पीछे सभी चुपचाप रवाना हो गये. पीछे रहा फकत अकेला कबीर और फटे हुए चिथड़े. काम तो आखिर करने से ही निबटेगा. नाहक सोच-विचार में क्या सार! हुकूमत की रंगत ऐसी ही हुआ करती है, कैसे भी अकेले अपरबली की, हुकूमत की ताकत के आगे कोई थाह नहीं लगती. वो चुपचाप गुमसुम सूई-डोरा लेकर अपने काम में जुट गया. उसके पोरों का परस पाने से तो ये चिथड़े भी मुंह बोलने लग जायेंगे.
तत्पश्चात् कबीर को न वक्त का ध्यान रहा, न हवा का और न उजास का. कब दिन ढला और कब सांझ हुई, उसे इसका कोई एहसास ही नहीं था. सूई की नोक में ही उसकी तमाम दुनिया बसी हुई थी. कब सूरज की रोशनी अंधेरे तले दब गयी और कौन दीपक जलाकर उसकी बायीं बाजू सारी रात अविचल बैठी रही. गोया रैनादे अपनी गरज से हथेली में दीपक लिये बैठी हो. और मानो कई युगों ने वापस लौटकर उस रात के झिलमिलाते तारों में शरण ली हो. तड़के सूर्योदय के वक्त दीपक का उजाला अपने-आप में सिमटकर सर हिलाने लगा तब कबीर को चेत हुआ. और दीया बुझाने के साथ ही उसकी आँखों ने जो नजारा देखा तो उसे लगा कि वो कहीं नींद में सपना तो नहीं देख रहा है! आंखें मसलकर फिर देखा, यह तो वास्तव में राजकुमारी हथेली में दीपक लिये सामने बैठी है. समूची दुनिया का सारा आश्चर्य मानो उसके गले से फूट पड़ा, ‘आप!’
राजकुमारी ने कोई जवाब नहीं दिया. कबीर के हाथों से रफू किये पहाड़ के आर-पार नजर गड़ाकर एकटक देखती रही. कबीर पछतावे के सुर में माफी मांगता-सा कहने लगा, ‘मुझे न तो आपके आने का कुछ खयाल था और न दीपक के उजाले का.’ इस दफा राजकुमारी के गुलाबी होंठों से आप ही अमृत-वाणी झनकी, ‘मुझे भी कहां ध्यान था कि डेरे कब पहुंची और वापस कब रवाना हुई. आंगन में पांव धरते ही मैं जान गयी कि तुम्हें सूई और डोरे के सिवाय दूसरा कुछ होश नहीं है. आयी तो बहुत सारी बातें करने के लिए थी, पर अब कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है. मौन से बढ़कर दूसरी कोई वाणी नहीं है. बेकार बकवास से क्या फायदा, एक सूई और हो तो मुझे भी दो!’
राजकुमारी सूई चलाते-चलाते बोली, ‘आप जैसे गुरु मिलने पर कौन क्या नहीं सीख सकता? सारी रात आपकी देखादेखी, आंखों को पोर और पोरों को आंखें बनाने का काम सीखती रही. समूची बात बताने पर सत्य की मर्यादा कलंकित होती है.’ राजकुमारी आगे भी कुछ कहना चाहती थी कि सहसा राजा आंगन में खड़ा नजर आया. साथ में ठाकुर और आठ-दस सवार. राजकुमारी से आंखें चार होते ही राजा कहने लगा, ‘मैं जानता था कि तू यहीं मिलेगी!’
राजकुमारी के चेहरे पर लज्जा की झांईं घुल गयी. राजा को इतना धीरज कहां? कबीर के सामने देखते बोला, ‘तू तो मुझे नाचीज कम्बल तक भेंट करने को राजी नहीं हुआ तो तेरी मरजी, पर मैं तुझे ऐसी चीज भेंट करने के लिए आया हूं, जिसका सपना भी तेरे लिए नामुमकिन है. बोल, तू ही बता, ऐसी कौन-सी भेंट हो सकती है?’संकेत बिलकुल स्पष्ट था, फिर भला कबीर क्यूं न समझता! गम्भीर सुर में बोला, ‘मैं न तो किसी की भेंट कबूलता हूं और न किसी को कोई भेंट करता हूं.’
राजा ताली बजाकर खिल-खिल हंसते बोला, ‘यह भेंट वैसी नहीं है. इन्द्र भगवान का भी मन डोल जाये जैसी भेंट. बताऊं, राजकुमारी के हथलेवे में समूचे राज्य का दहेज!’ राजा की यह फूहड़ बात सुनकर कबीर को बेसाख्ता हंसी आ गयी. हंसी थमने पर कहने लगा, ‘ऐसी भेंट का तो सपना ही बुरा. मैं तो शादी-ब्याह के लफड़े में ही नहीं पड़ना चाहता. और इस लफड़े के साथ राज्य का दहेज! क्या मुझे आप इतना अबूझ समझते हैं कि आपके वमन को मैं प्रसाद की तरह ग्रहण करूंगा? अगर सत्ता का सुख ही सबसे बड़ा सुख है तो आप उसे छोड़ते ही क्यूँ? आप खीज करें तो आपकी मरजी, इस भेंट के लिए भी मैं माफी चाहता हूं.’
राजा के रोम-रोम में झुरझुरी दौड़ गयी. राजकुमारी पर हजार घड़े पानी गिर गया. सपने की सुनहरी लंका उसकी आंखों के सामने धू-धू कर जलने लगी. राजा की बेटी होकर कितनी छोटी आशा की खातिर मन डोलाया और उस पर भी पाला पड़ गया. अब तो सौ दफा जिला-जिलाकर इस मक्कार को वापस न मारे तब तक राजा की जलन शांत नहीं होगी. सवारों पर कड़कते बोला, ‘यों नाजिरों की तरह नाखूनों से जमीन क्या कुरेद रहे हो, अब तक तो इस हरामजादे की चटनी कर डालते.’
ऐसे आदेश के बाद सवारों को कैसी देर! एक साथ हवा में नौ तलवारें ऊपर उठीं. शायद फिर राजकुमारी आड़े आ गयीं तो! पर राजकुमारी तो इस मर्तबा टस-से-मस भी नहीं हुई. उसकी आंखें गोया पथरा गयी हों कि अचानक राजकुमारी की जगह राजा सामने आकर जोर से बोला, ‘खबरदार, मैंने आदेश दिया तो क्या हुआ, तुम्हें तो सोचना था? कबीर के चीरा लगने से ही मेरी लाड़ली बेटी कितनी तड़पेगी! अपना काला मुंह करो यहां से. आयन्दा भी ऐसा अण्ट-शण्ट आदेश करूं तो कान मत देना. मेरा दिमाग ठिकाने हो तब न! खोपड़ी में तो मानो साही घुसी हुई हो.’
कहाँ की बिजली और कहां आकर गिरी! कबीर क्या करे और क्या न करे! थोड़ी देर तो कुछ समझ में नहीं आया. वो भी असमंजस में पड़ गया. फिर राजकुमारी के पास जाकर उसके एकदम करीब खड़ा हो गया. अपने हाथों में उसके हाथ लेकर पिघले हुए सुर में कहने लगा, ‘फकत एक रात साथ रहने से एक-दूसरे को ठीक से नहीं जाना जा सकता. शादी, बाल-बच्चे, कुटुम्ब-परिवार, जमीन-जायदाद में मुझे रंचमात्र भी आस्था नहीं है. दूसरे प्राणियों से अलग और ऊँचा समझने की गलतफहमी में इनसान की बेहद बर्बादी हुई है और होती जा रही है. मेरी न कोई जात है, न मेरा कोई धर्म है और न मेरा कोई देश. इनसान के लिए यह कितनी शर्म की बात है कि धर्म और पंथों के बहाने मरे हुए अवतार अभी तक जिन्दा इनसानों पर शासन कर रहे हैं.’
अब राजकुमारी के होंठ खुले. धीमे व मीठे सुर में बोली, ‘इतनी बातें जानते हुए भी जब तुम्हारी आंखों के सामने तुम्हारी कारीगरी की धज्जियां उड़ीं, दो मर्तबा नंगी तलवारें ऊपर उठीं और राजा व ठाकुर की अण्ट-शण्ट दुत्कार सुनी तब तुम्हारे कलेजे में गुस्से की आग क्यूँ नहीं भभकी? तुम मरने-मारने पर उतारू क्यूँ नहीं हुए? इतने लम्बे-चौड़े ज्ञान के बावजूद भी तुम्हारे अन्तस् में जीने का मोह है! मौत का डर है! फिर तुम्हारा क्रोध किस दिन के लिए है?’
कबीर इतमीनान से समझाने लगा, ‘राजकुमारी, एक आदमी के क्रोध से कुछ नहीं हो सकता. वो तो खुदकुशी के समान है. जिस दिन मेरे क्रोध की छूत जन-जन के हृदय में खुदबुदायेगी, उस दिन इनसानों की दुनिया में न तो कोई राजा होगा और न कोई रंक. न कोई ऊँच होगा और न कोई नीच, न साँच होगा और न झूठ. न पाप होगा, न पुण्य. न धर्म होगा, न अधर्म. न कोई अमीर होगा और न कोई गरीब. न कहीं मन्दिर होगा और न कहीं मस्जिद. उस दिन न मजहब बचेगा और न जात. न फौज होगी और न हथियार. किसी इनसान को यह हक नहीं होगा कि अपनी सत्ता के बल पर, तलवार की ताकत से, अपने आदेश के जरिये किसी कारीगरी के टुकड़े-टुकड़े करवा डाले.’
राजा कबीर का हाथ थामकर गिड़गिड़ाते बोला, ‘इसी प्रायश्चित्त की खातिर तो मैं राज्य छोड़ने को तैयार हो गया, तू और क्या चाहता है?’ कबीर मुस्कराता-सा बोला, ‘मेरे चाहने और न चाहने से क्या फर्क पड़ता है!’ राजा सिर हिलाते बोला, ‘यही तो तेरी भूल है. तू एक दफा अपने मन की चाह जाहिर करके तो देख! मेरी बेटी तेरे सिवाय किसी का हाथ थामना ही नहीं चाहती, और तू ऐसा ठूंठ कि उसकी कोई परवाह ही नहीं करता!’
ऐसा ही हुआ था क्रिस्टोफर नोलन की कमाल फिल्म इन्सेप्शन में. जहां आदमी दूसरों के सपनों में घुस अपने मुताबिक सपने रचता है. मगर इन सबके बीच उसे कैसे पता चलता था कि ऐन अभी वो जो कर रहा है. वो सच्ची मुच्ची है या नहीं. टोटम. एक टोटका. एक लट्टू, जो वो अपनी हथेली में या जेब में रखता था. वो उसे छूता था और उसे जिंदा होने का पता चलता था.
विजय दान देथा की कहानियां हमारे वक्त की और आने वाले वक्त की टोटम होंगी. उन्हें यथार्थ का लालच नहीं है. वो बिल्कुल अभी को कैद नहीं करतीं. वे अपनी मर्जी से आगे पीछे जाती हैं. वहां सब कुछ विज्ञान तर्क या धर्म से नहीं बंधा है. जब जिसका मन होता है उड़ जाता है, मर जाता है, जी जाता है. ये तर्क को ठेंगा है. ये बचकाना लग सकता है, मगर बेहद जरूरी है. और एक उम्दा बात ये भी. कि बिज्जी ने ये सब अपनी मादरी जबान में लिखा. दी लल्लनटॉप ऐसे ही लोगों के हौसलों के सहारे पैदा हुआ है. अपनी भाषा, अपनी बोली, अपनी निजता, अपनी माटी का गौरव.

विजयदान देथा. (वाग्देवी)
कल्पना, कल्लोल कल्पना ही इंसान को बचाएगी. नींद में भी, उसके पार भी. विजयदान देथा उर्फ बिज्जी की कहानियां हमारी संजीवनी बूटी हैं. इन्हें पढ़ें. क्योंकि आज (1 सितंबर) बिज्जी का बर्थडे है. तस्वीर देखिए. हमारे आपके बाबा से दिख रहे हैं. खादी की सदरी बने. मोटे लेंस के चश्मे से छांकती दुलारती आंखें. दूध उमड़ आया हो जैसे. इस आशीर्वाद को हम अगले आठ दिन बांचेंगे. बिज्जी का हफ्ता 1 सितंबर से शुरू हो गया है. हफ्ते भर में सात कहानियां और आठवीं कहानी ब्याज में.
हम आपको ये कहानियां पढ़वा पा रहे हैं, इसके लिए दिल से शुक्रिया बीकानेर के वाग्देवी प्रकाशन का. उन्होंने हमें बिज्जी के लिखे ये अक्षर, ये किस्से मुहैया कराए. ये कहानियां लजवन्ती- बिज्जी की प्रेम कथाएं किताब से हैं. किताब की कीमत 80 रुपये है. अब आप हैं और बिज्जी हैं. हवा पर दौड़ने का वक्त हो चला है कॉमरेड. खुद अपने ही फेफड़ों में हवा भर. - सौरभ
दूजौ कबीर
ये भारी-भरकम पोथे, कबिरा जाने जितने थोथे ये धरम-करम के पथ सारे, मल-कीचड़ के ही गलियारे ये तीरथ-बरत के धाम, जिनसे अल्लाह बचाये राम यह भाग-भरम की शोभा, तोबा रे बापू तोबा ये ऊंच-नीच की बातें, अनन्त कजियारी रातें ये राव-रंक के जाले, सरासर झूठे और काले सूरज उगने पर ही मिटती रात, दिशा-दिशा में स्वर्णिम प्रभात.तो वक्त के मुताबिक यह बात बरसों पुरानी है कि हरियाली के बीच और हवा के झूले पर एक गांव बसा हुआ था. जहां धरम-करम के सांचे में ढले नितनेमी इनसानों की बस्ती, पर एक झोंपड़ी टली हुई. उस झोंपड़ी में बसने वाले व्यक्ति का नाम तो कुछ और ही था, पर गांव व इलाके के लोग उसे व्यंग्य और ताने के बहाने कबीर के नाम से ही बतलाते थे. अलाव के चारों ओर बैठकर कभी-कभी उस बस्ती के लोग पुरजोर शब्दों में कहते थे कि किसी औरत की कोख से जन्म न लेकर यह कबीर कुकुरमुत्ते या नाग-छतरी की तरह आप-ही-आप जमीन से उगा होगा. इनसान की औलाद होता तो इनसान-माफिक बातें करता.
सूने आकाश में कोई बदली का टुकड़ा सहसा प्रकट हो जाता है, वैसे ही एक दिन वो कबीर अचीता उस बस्ती में प्रकट हुआ. तभी से जुलाहे का काम तो बहुत उम्दा करता, पर बातें एकदम उलटी, सिरफिरी व बेहूदी करता था. कद-काठी और चेहरा तो फबता और सुन्दर, पर बातें ऊटपटांग. कैसे और कहां से अनमापे की सूझती, सो वो ही जाने. हाथ का पूरा उस्ताद. पर उलटी खोपड़ी का. जैसे घुंघराले व काले बाल, वैसी ही टेढ़ी-मेढ़ी व काली-स्याह बातें.

कालीन, शाल और कम्बलों में बेल-बूंटे, झाड़-झंखाड़ व फल-पत्ते ऐसे बुनता था गोया सचमुच के हों. उसके हाथों बुने कालीन के फूलों पर भंवरे भ्रम से मंडराते थे और कभी पके फूलों के भुलावे में तोते चोंच मारते थे. अगर हाथों की कारीगरी के समान उसमें अक्ल भी होती तो फिर कहना ही क्या! न कबीर की सनक व बेवकूफी की कोई सीमा थी और न बस्ती के लोगों की चिकचिक का कोई छोर. कबीर के हुनर की बातें हवा में घुली हुई थीं. समूची रियासत में उसकी शोहरत थी. एक दफा ऐसा इत्तफाक हुआ कि देश के मालिक राजा ने राजकुमारी के साथ गांव के तालाब-किनारे पड़ाव डाला. एक-सौ-एक घोड़ों का लशकर. घने बरगद की छांव तले पसीने से सराबोर घोड़ों को बहुत देर बाद विश्राम मिला. सुरंगी जाजम बिछी.
भनक पड़ते ही समूचा गांव राजा और राजकुमारी के दर्शन की खातिर हाजिर हुआ. राजा ने खुशी-खुशी जनता को दर्शन दिए. सहसा राजकुमारी के कानों में कबीर के नाम की फुसफुसाहट सुनायी पड़ी. राजकुमारी ने छलकते उत्साह से पूछा, ‘क्या कबीर का गांव यही है?’ लोगों ने जवाब दिया कि गांव तो मालिकों का है, पर कबीर यहीं रहता है. राजकुमारी का उत्साह गले में समाया नहीं. बेहद ललक से फिर पूछा, ‘वाकई?’
बस्ती के लोगों ने गर्दन हिलाकर ‘हां’ की. और ‘हां’ के साथ ही राजकुमारी फौरन दौड़कर राजा के पास पहुंची. खुशी के फूल बरसाती बोली, ‘इत्तफाक की बात कि हमने कबीर के गांव में अचीता पड़ाव डाला. आपकी इजाजत हो तो मैं उसकी कारीगरी देखने के लिए जाऊं.’राजकुमारी के मुंह से यह नादानी की बात सुनकर राजा कुछ देर तक टग-मग उसके चेहरे की ओर देखता रहा. राजा अपनी इकलौती बेटी का बहुत मन रखता था. और बेटी भी मन रखने लायक थी. बरसात के पानी की माफिक पवित्र और अनछुआ उसका अन्तस्. जैसा अकथनीय रूप, वैसा ही अकथनीय स्वभाव. अथाह सागर-सी अक्ल. निर्मल नजर और ताजे दूध-सी मुस्कराहट. राजा के मौन को कुरेदकर फिर पूछा, ‘जाऊं?’
राजा मुस्कराते बोला, ‘तू बेकार क्यूं तकलीफ उठाती है, मैं उसे यहीं बुला लेता हूं.’ इस आश्वासन के उपरान्त राजा ने हाथ जोड़े ठाकुर की ओर मुखातिब होकर पूछा, ‘लगता है, कबीर को मेरे आने की खबर नहीं हुई है. वरना अपनी कारीगरी दिखाने की खातिर वो सबसे पहले आता.’ ठाकुर के मन में पुराना कसैलापन भरा था. अच्छा मौका हाथ लगा. बेझिझक जवाब देते कहने लगा, ‘आपसे क्या अर्ज करूं अन्नदाता, इस कबीर का दिमाग आसमान में चढ़ा है. आपके बुलाने पर भी आ जाये तो गनीमत है.’राजा तो राजा ही होता है. जन-जन का मालिक. सर का मुकुट. किसकी मजाल जो राजा के आदेश को टाल सके! मौत अगर बख्शे तो मौत की मरजी, पर राजा की तो सपने में भी ऐसी मरजी नहीं होती. राजा के गुमान में गोया तकुआ घोंप दिया गया हो. पुतलियों की रंगत बदल गयी. गरजते हुए ठाकुर पर ही बरस पड़ा, ‘ठाकुर, तुम्हारी अक्ल और जबान तो ठिकाने है? किसके सामने क्या बकते हो, कुछ होश भी है? सरकार के आदेश से बेपरवाह नालायक तुम्हारे यहां फल-फूल रहे हैं और तुम ठाकुर कहलाते हो?’
ठाकुर के रोम-रोम में कंपकंपी घुस गयी. घोड़े पर सवार होकर मौत आई, उसमें कसर नहीं. अटकते हुए बमुश्किल बोल पाया, ‘अन्नदाता, मेरी तो औकात ही क्या, यह पागल कबीर तो भगवान की भी नहीं सुनता!’राजकुमारी की खुशी पर पाला पड़ गया. बात सीमा से बाहर निकलती दिखती है. वापस कैसे समेटी जायेगी! राजकुमारी को भी पहली मर्तबा अपनी अक्ल का पैंदा उघड़ता नजर आया. तब भी उसके मन में अक्ल से परे अटूट धीरज था. अब एक पल की भी देरी होने से राजा के गुमान का सांप हरगिज वापस बांबी में नहीं घुसेगा. बीन के बोल सुनकर शायद रीझ जाये. राजा के करीब आकर बोली, ‘आपसे बड़ा कला का पारखी दूसरा कौन है? आपके मुंह से ही तो मैंने सीख की यह बात सुनी कि कलाकारों की आदतें कुछ सनकी होती हैं. उनकी कद्र तो जानने वाला ही जानता है. आप ही तो फरमा रहे थे कि कलाकार विधाता के साक्षात् अवतार होते हैं! लाखों-करोड़ों दिखती आँखों में उनको पहचानने वाली एक दीठ बड़ी मुश्किल से मिलती है. ये बेअक्ल ठाकुर बेचारे दारू व ऐश के अलावा कुछ जानते भी तो नहीं!’
उफनते दूध पर मानो ठण्डे पानी का छींटा लगा हो! राजा मुस्कराने की कोशिश करते कहने लगा, ‘मेरी लाड़ली बेटी, तेरी समझ के आगे हार माननी पड़ती है...!’ राजकुमारी बीच में ही जल्दी से बोली, ‘यह जैसी-तैसी समझ आपकी ही बख्शी हुई है. मेरी तो बिसात ही क्या?’ राजकुमारी के गालों पर हाथ फिराते राजा कहने लगा, ‘तेरी बिसात का वजन मैं जानता हूं. तेरा स्वभाव व अन्तस् तो ऐसा है कि बेटा-बेटी दोनों की कमी पूरी होती है. अगर तू वक्त पर बात नहीं संभालती तो मेरे हाथों कबीर की मौत थी. यह किस तरह का अबूझ है कि राजा के इज्जत-कायदे भी नहीं समझता! चल, तेरे साथ मैं भी चलता हूं. तारीफ सुन-सुनकर कान पक गये. बेचारे कारीगर का वक्त जाया करना ठीक नहीं. जनता तो राजा की औलाद के समान होती है. जब वहां चलना ही है तो देरी करने से क्या फायदा!’
यह बात कहकर राजा आप ही जिस ओर मुंह था, उधर ही चल पड़ा. ठाकुर हाथ जोड़कर लपकते हुए सामने आया और बोला, ‘गरीबनवाज, इधर पधारिए. कबीर की झोपड़ी का यह रास्ता है.’
राजा ने मुड़कर ताज्जुब से पूछा, ‘झोंपड़ी! ऐसे मशहूर कलाकार की झोंपड़ी! अपने भले-बुरे का तुम्हें होश भी है! इन लच्छनों से यह ठिकाना ज्यादा नहीं टिकने का!’ जूड़ी के बुखार के मरीज की तरह ठाकुर थर-थर काँपने लगा. टूटते सुर में बोला, ‘अन्नदाता, आंखों से देखे बगैर इस सिड़ी की करतूतों पर यकीन ही नहीं हो सकता.’ राजकुमारी बात को खत्म करती-सी बोली, ‘पर अब देर ही क्या है? जिसकी करतूत होगी, सामने आ जाएगी.’
बेटी की अक्ल पर अभिमान करता राजा बोला, ‘हां, अब देर ही क्या है!’पचासेक आदमियों का जत्था राजा के पीछे-पीछे कबीर की झोंपड़ी पर पहुंचा. नये ‘खारिए’ से छायी कच्ची झोंपड़ी. मुरड़-गोबर से लिपी. मांडनों से चित्रित आंगन. देवता खेलें जैसा साफ-सुथरा. बैठकी पर बैठा कबीर करघा चला रहा था. गुलाबी ऊन का ताना तना हुआ था. सुरंगे तानों के बीच सटासट नली चल रही थी. दरवाजे पर लोगों की हलचल सुनी तो उसने पीछे मुड़कर देखा. गांव-मालिक के साथ एक अजनबी प्रौढ़ आदमी. रेशमी अचकन. सोने का मुकुट. बांकी मूंछें. कमर से लटकी सोने के म्यान की तलवार. नजदीक ही एक खूबसूरत लड़की खड़ी थी. न जवानी अंगों में समा रही थी और न रूप. उस रूप के परस से सुरंगी पोशाक की रौनक दिप-दिप कर रही थी. मृगनयनी की बड़ी-बड़ी आँखों से समझदारी की आब साफ झलक रही थी.
अपने होंठों पर पवित्र मुस्कराहट छितराते कबीर झटपट उठ खड़ा हुआ. हैरत भरी निगाहों से लोगों के चेहरे बारी-बारी से देख रहा था कि ठाकुर झुंझलाहट दरसाते कहने लगा, ‘बावले की तरह टग-मग क्या देख रहा है? तेरे अहोभाग्य कि देश के मालिक, तीन लोक के नाथ खुद तेरे घर पधारे हैं, तेरी कारीगरी देखने की खातिर. अब उल्लू की तरह आंखें क्या फाड़ रहा है? कालीन या शाल हो तो नजर कर!’
राजकुमारी ने कारीगरी से पहले नजर भरकर कारीगर को देखा. तांबई रंग. काले भुजंग बाल और काली भुजंग दाढ़ी. सफेद अंगरखी. सफेद ही धोती, घुटनों तक. घुंघराली, घनी रोमावली! बर्फजात धवल बत्तीसी. शीतल मुस्कराहट. अंगों से परे मोहक रूप. राजकुमारी को इनसान के रूप में पहली दफा असली इनसान नजर आया. कबीर एक अबूझ बालक की मानिन्द कहने लगा, ‘आपने तो यहां तक आने की तकलीफ की, पर मैं तो जैसा-तैसा फकत जुलाहे का काम ही जानता हूं. आप कारीगरी मानें तो आपकी मरजी. पर मैं तो इस काम के सिवाय किसी दूसरे काम के लायक नहीं हूं.

सहसा राजकुमारी को भंवरों की भनभनाहट सुनायी दी. एक गुलाब के पौधे पर फूलों के ऊपर भंवरे मंडरा रहे थे. पर यह पौधा तो धरती से अधर होते हुए भी हरा-भरा था. इस माजरे पर यकीन करने के लिए वह दौड़कर पौधे के करीब पहुंची. ऊपर हाथ फेरने पर मालूम हुआ कि यह तो बुनाई का पौधा है! आगे अलगनी पर चार-पांचेक कम्बल व शाल लटक रहे थे. राजा और राजकुमारी ने अपनी सुधबुध बिसराकर खुद उन्हें खोला. तहें खुलते ही एक-एक चित्र की बनावट में उनकी नजरें उलझ गयीं. काली घटा में गोया वाकई बिजली चमचमा रही हो. कहीं आंधी का अन्धड़ तो कहीं बवण्डर की घूमर. कहीं इन्द्रधनुष तो कहीं रेगिस्तान की बलखाती लहरें.
कहीं हरे करील पर लटके लाल ढालू ही ढालू!
शिकारी राजा को बिलों की पहचान थी. एक कालीन की तह खुलते ही हैरानी से पूछा, ‘अरे, यह लोमड़ी के बिल की तरह क्या है? भीतर लोमड़ी तो छुपी हुई नहीं है?’ कबीर मुस्कराते बोला, ‘आपने पहचान तो खूब की, वास्तव में यह लोमड़ी का बिल ही है.’ राजकुमारी शहद-घुले सुर में बोली, ‘पर लोमड़ी के बिल में तुम्हें ऐसी क्या खूबसूरती नजर आयी?’
कबीर के मन-लायक सवाल था. उत्साह से जवाब दिया, ‘कुदरत की हर वस्तु एक दूसरी से बढ़कर है. न कोई उन्नीस और न कोई बीस.’ राजकुमारी के रूप को यह बात काफी बुरी लगी. भद्दा सो भद्दा, सुन्दर सो सुन्दर. दोनों सरीखे कैसे हो सकते हैं? बोली, ‘फिर खूबसूरत व बदसूरत का मतलब क्या? खूबसूरत को कौन पूछेगा?’
कबीर धीरज से कहने लगा, ‘खूबसूरत और बदसूरत का फर्क तो फकत इनसान की समझ और नजर का विकार है. आपको शायद विश्वास नहीं होगा कि एक दफा जंगल से गुजरते समय मेरी नजर लोमड़ी के बिल पर पड़ी. उस वक्त मुझे वो चांद से भी ज्यादा खूबसूरत लगा. अगले दिन करघे पर बैठा तो आप ही लोमड़ी का बिल बन गया. हू-ब-हू उस बिल के उनमान.’
राजा होंठ चबाने के उपरान्त बोला, ‘जंगल वाला बिल तो राम जाने मेरे मन भाता या नहीं, पर तेरी यह कारीगरी तो जैसे मुंह बोलती हो. कहीं विधाता का अंश तो तेरे हाथ नहीं लग गया? आंखों देखी वस्तु बड़ी मुश्किल से हाथों की पकड़ में आती है. देखने में तो कोई नहीं चूकता, पर हाथ सभी के चूकते हैं.’ कबीर गर्दन हिलाते कहने लगा,
‘ऊं-हूं, देखने में चूक होती है, तभी तो हाथ चूकते हैं. किसी वस्तु को देखते समय मेरी आंखें हाथ बन जाती हैं और करघे पर बैठते ही मेरे हाथ आंखें बन जाते हैं.’ राजकुमारी ने पहली मर्तबा इनसान की जबान से इनसान के बोल सुने. यह तो बराबरी के भाव से बेहिचक बात कर रहा है. इसकी नजर में तो कोई छोटा-बड़ा नहीं. राज-दरबार का तो माहौल ही अलग. इनसानों के मुखौटों में वहां सियार, कौवे, पिल्ले, गधे और मेमने इधर-उधर चक्कर लगाते हैं. इनसान की योनि में आकर भी कोई इंसान की मर्यादा नहीं जानता. राजकुमारी होश संभालने के बाद जिस मर्यादा को देखने की खातिर तरस रही थी, वह पहली मर्तबा कबीर के चेहरे पर साफ नजर आयी. उसका हृदय खुशी से हिलोरें लेने लगा.
कबीर के उनमान कलाकार रिआया का किस राजा को गर्व नहीं होगा! उसकी पीठ थपथपाते राजा बोला, ‘धन्य हैं तेरी आंखें, और धन्य हैं तेरी अंगुलियां! लोग-बाग तो डाह से चुगली करते हैं, पर मैं उन चुगलियों पर कान धरूं तो! आज से ही तेरी खातिर राज्य का खजाना आठों पहर खुला है. तेरी कारीगरी की मुंहमांगी कीमत दी जायेगी, मन में किसी तरह का संकोच मत लाना.’कबीर मुस्कराते कहने लगा, ‘इसमें संकोच किस बात का! आपको शायद मालूम नहीं है कि मैं बेचने की खातिर बुनाई का काम नहीं करता. इलाके के सेठ-महाजन लालच दे-देकर हार गये, पर मैंने अपनी कारीगरी को पैसों के बदले नहीं बेचा. जो बात सपने में भी मेरे मन को नहीं जंचती, उसे मानने से क्या फायदा, आप ही फरमायें. राजकुमारी तो सुनते ही इस बात का मर्म समझ गयी, पर राजा एक-एक अक्षर अच्छी तरह सुनकर भी न बात का भाव समझ सका और न जायका. मुकुट और सिंहासन का गुमान ऐसी समझ को अपने पास ही नहीं फटकने देता.
नासमझी से गर्दन हिलाता बोला, ‘हां, हां, इसमें क्या बुराई है! मेरी मेहर और राज्य के खजाने के होते किसी दूसरे को तेरा माल बेचने की जरूरत ही क्या है! अब तो कोई तीसमारखां भी तेरा माल खरीदने की हेकड़ी दिखाये तो मुझे खबर कर देना, मैं उसे जिन्दा जमीन में गड़वा दूंगा. समझ गया न?’
ठाकुर ने हां-में-हां मिलाते ताना मारा, ‘यह तो जन्म से ही सारी बातें समझा हुआ है, अन्नदाता, फिर क्यूं किसी की बात माने.’ राजा हामी भरते कहने लगा, ‘ऐसे बड़े कारीगर को किसी की बात माननी भी नहीं चाहिए. अगर तुमने भी जबरदस्ती खरीदने की जुर्रत की, तो मुझ-सा बुरा न होगा.’
फिर कबीर की ओर मुखातिब होकर राजा ने बात जारी रखी, ‘बोल, इस ठाकुर ने तुझे कभी परेशान तो नहीं किया?’इस सवाल के साथ ही ठाकुर का तो जाने समूचा खून ही निचुड़ गया हो. अचीती मुसीबत आयी ही समझो. कबीर सरल भाव से बोला, ‘किसी के करने से मैं परेशान नहीं होता. अपने मन से परे मैं किसी की बात मानूं तब न? आप बेफिक्र रहें, मुझे कोई परेशान नहीं कर सकता.’ कबीर की बात सुनकर राजा और ठाकुर दोनों निश्चिन्त हुए. ठाकुर के दिल की फड़फड़ाहट बन्द हुई, पर राजकुमारी को आगे का अंजाम साफ नजर आ रहा था. कैसी बुरी सूझी जो यहां आने का हठ किया. पर अब पछताने से क्या हो सकता है? नादान दोस्त भी दुश्मन की गरज पूरी करता है. राजकुमारी की वजह से ही कबीर का बहुत अहित होगा और शायद लाख कोशिश करने पर भी यह टल नहीं सकता. राजकुमारी का अन्तस् भीतर-ही-भीतर ऐंठने लगा. आखिर यह बातचीत किस मुहाने पर पहुंचेगी, उसे पहले ही सब मालूम हो गया और उपाय की कोई गली या गलियारा नजर नहीं आया.
राजा ने आज के दिन तक इतनी बातें किसी से नहीं की थीं. इसका खयाल आते ही उसने फौरन सवारों को आदेश दिया कि वे दिखती हुई तमाम कारीगरी अपने कब्जे में करें और आगे के माल के लिए पेशगी दें. और कबीर के घर आकर जल्द-से-जल्द मुँहमाँगी कीमत अदा करें. लेन-देन की खातिर कबीर का वक्त जाया किया तो फिर उनका मालिक भगवान ही है. और इस आदेश के साथ ही राजकुमारी के कलेजे में मानो सुरंग फटी हो. उसकी सांस जहां-की-तहां थम गयी. पर कबीर के चेहरे की रंगत रंचमात्र भी नहीं बदली. सवार अलगनी पर लटकते कालीन व कम्बलों को लेने की खातिर आगे बढ़े ही थे कि वो उसी तरह मुस्कराते हुए, बिना हाथ जोड़े और बिना अन्नदाता का लफ्ज जबान पर लाये कहने लगा, ‘मैंने तो पहले ही साफ कह दिया था कि मुनाफे की खातिर जुलाहे का काम नहीं करता. आपका आना बेकार गया, इस खातिर माफी चाहता हूं.’
अब राजा को कबीर की बात का मर्म ठीक से समझ में आया. दिमाग में बवण्डर उठा. नसों का खून उबलने लगा. इस चण्डाल की इतनी हिम्मत! भन्नाते हुए गरजकर पूछा, ‘क्या दूसरों की तरह मेरे लिए भी बेचने की मनाही है?’राजकुमारी के नसीब में यह दिन देखना भी बदा था! कैसी बुरी गांठ उलझी! पाषण-मूर्ति के उनमान कबीर के होंठों पर नजर गड़ाकर इन्तजार करने लगी कि उसके मुंह से अब क्या बोल निकलते हैं? होंठों तक आयी मुस्कराहट को रोकता हुआ कबीर कहने लगा, ‘मैंने तो अपने मन की सच्ची बात दरसा दी, आप जो चाहें मतलब निकालें.’
राजा के गुस्से को मानो पलीता लगा हो. पैर पटकते बोला, ‘मेरे पास मतलब निकालने का समय ही कहां है? नालायक, तेरी मौत तो नहीं आयी?’ ‘मौत तो एक दिन आनी ही है! यह तो किसी का भी खयाल नहीं करती. न रंक का, न राजा का. मरने की बात जानता हूं तभी तो अपनी मेहनत की कीमत नहीं आंकता.’इस दफा ठाकुर ने एक बढ़िया तदबीर सुझाई. अंगुलियां चटकाते कहने लगा, ‘कीमत नहीं आँकना चाहता तो अन्नदाता के चरणों में खुशी-खुशी ये तमाम वस्तुएं भेंट कर दे.’
ठाकुर के इस सुझाव से कबीर के होंठों पर आप ही मुस्कराहट छा गयी. कहने लगा, ‘भेंट देना, न देना तो मेरी मर्जी पर मुनहसर है. फिर राजा को किस बात की कमी, जो उसे भेंट दी जाय.’राजकुमारी ने कबीर के नाम से ऐसी कई अफवाहें सुन रखी थीं और उसे अनजाने ही उन पर काफी कुछ विश्वास हो गया था. उन बातों को रू-ब-रू आजमाने के बहाने ही खुद उसने आगे होकर कबीर के मुकाम तक आने का इरादा किया था. पर अब प्रत्यक्ष अपने कानों से ये बोल सुनकर भी, उसे यह यकीन नहीं हुआ कि कोई इनसान की औलाद राजा के मुँह पर इस तरह बेझिझक अपने अन्तस् का सांच प्रकट कर सकता है! अबोध बालक के सिवाय किसका ऐसा निर्मल हृदय हो सकता है?
बढ़ती उम्र और समझ के साथ सौ में से एक सौ पांच इनसानों को कीचड़ से सनना पड़ता है. तब यह अकेली बानगी कैसे बची रह गयी? राजकुमारी के रोम-रोम में घुसा डर किसी अदीठ जादू के जोर से अदेर, अनन्त फख्र और हर्ष में बदल गया. इनसानों के जमघट में फकत इनसान नाम की कमी है. इस पुतले से मिलकर तो खुद मौत भी अपना भाग्य सराहेगी. ऐसी मौत पर तो लाखों जीवन निछावर. मारने से ज्यादा तो राजा का भी वश नहीं है. फिर मरने का डर न होने पर कैसी जोखिम? कैसी हिचकिचाहट? मरना निश्चित है तब भी तमाम लोग मरने से डरते हैं. और एक यह औघड़ अवधूत जिसे अपनी सच्चाई के सिवाय दूसरा किसी तरह का बोध ही नहीं. सलावे भरती बिजली की चमक की नाईं ऐसा ही कुछ मर्म राजकुमारी के नैनों में कौंधकर ओझल हो गया. पर बाकी सुनने वालों पर मानो वज्रपात हुआ हो. राजमद का असीम अहम् कबीर के उस सरल जवाब को झेल नहीं पाया. इसकी बनिस्बत तो तलवार का वार सहना आसान है. एक दफा तो राजा अपनी सुध-बुध ही भूल गया. पर दूसरे ही क्षण नस-नस में सांप, राक्षस और शेर की विरासत भंवाने लगी. फुफकारते बोला, ‘तू किसी को अपनी कारीगरी बेचता नहीं, किसी को भेंट करता नहीं, फिर यह है किसलिए?’
किसी और के छेड़ने या उकसाने से गुस्सा तो कबीर को आता ही नहीं था. वो तो समूचा ही अपने वश में था. उसी धीमे सुर में बोला, ‘जरूरत होते हुए भी जिनमें इन वस्तुओं को खरीदने की क्षमता नहीं है, मेरी कारीगरी उन लोगों के लिए है!’ठाकुर ने आग में घी डालते हुए गरजकर कहा, ‘चण्डाल, तेरी यह मजाल! गुस्सा तो ऐसा आता है कि अन्नदाता के आदेश के बिना ही तेरी खोपड़ी उड़ा दूं. तेरे इन नाचीज चिथड़ों की खातिर तीन लोक के नाथ को दर-दर का भिखारी बनाना चाहता है?’ठाकुर के गुस्से का अदेर कुछ मतलब समझ में नहीं आया तो कबीर कुछ पल असमंजस में खड़ा रहा. राजकुमारी ठाकुर की ओर मुखातिब होकर तेज सुर में बोली, ‘अपने हलक की बात नाहक इसके मुंह में क्यूं ठूंसते हो? इसने ऐसा तो नहीं कहा.’राजकुमारी के रुख से वाकिफ होते ही राजा ठाकुर को झिड़कते कहने लगा, ‘तुम्हें बीच में बकबक करने को किसने कहा? क्या इससे निबटने लायक भी मेरी हैसियत नहीं है?’
ठाकुर कोहनी तक हाथ जोड़ते, अटकते सुर में बोला, ‘आपकी हैसियत की क्या सीमा अन्नदाता! ऐसे लाखों-करोड़ों भुक्खड़ मिलकर भी आपका बाल बांका नहीं कर सकते!’राजा कहना तो कुछ और ही चाहता था, पर उसकी बेखयाली में आप ही वह बोल फिसल पड़ा, ‘फिर!’ठाकुर ने राजा के चरणों को छूकर कहा, ‘भयंकर गलती हो गयी अन्नदाता, माफी बख्शाएं.’
राजा को उस वक्त ऐसा लगा गोया ठाकुर के रूप में खुद कबीर उसके चरणों में झुक रहा हो. राजा तो राजा ही होता है. वास्तव में इस भ्रम के बहाने राजा की खीज काफी निथर गयी. ठण्डे सुर में भोले कबीर को लाड़ से समझाते कहने लगा, ‘इस जिद के पीछे धूल फेंक. छोड़ यह पागलपन. मेरे दर्शनों से पहले तकलीफ देखी सो तो देखी, पर अब ऐश कर. मेरे खजाने से तुझे मुंहमांगी कीमत से भी सवाई कीमत मिलेगी. मुझ जैसा दयावन्त उमराव तुझे चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा. बावला कहीं का! राजा तो पिता की ठौर होता है, फिर मुझसे कैसा संकोच?’
राजा ने तो इतनी देर में ही उस शीरे के तारों की पहचान कर ली थी. यह तो बानगी ही दूसरी है. हुकूमत के आतंक से वश में आने वाला यह बन्दा नहीं. फिर मुसाहिबों के सामने सिंहासन की पोल खोलने में क्या सार? लाड़ से पुचकारते कहा, ‘बोल, अब तो तेरा मन बदला! तू क्या सच मानेगा कि इतनी खुशामद तो मैंने पुराने राजा की भी नहीं की. तू खुशी-खुशी हाँ करे तो सवारों को तेरी वस्तुओं के हाथ लगाने दूं. तुझ जैसे खरे आदमी पर मुझे भी नाज है. जो इच्छा हो कीमत मांग! तुझे पूरी छूट है.’

प्रकाशन का पता.
किसी के हाथों बख्शी हुई छूट लेने की रात तो कबीर का जन्म ही नहीं हुआ था, भले ही वो देश का मालिक ही क्यूं न हो. अपने मन पर कबीर किसी का अंकुश नहीं मानता था. राजा खीज करे तो वही बात और रीझ करे तो वही बात. समूची बात को सुथराई से संभालने की कोशिश करते बोला, ‘मेरी जरूरतें इतनी कम हैं कि आपकी दी हुई छूट मेरे किसी काम नहीं आ सकती. आपका आना बेकार गया, इस खातिर एक दफा फिर माफी चाहता हूं.' खुद राजा के मुंह से पुचकारकर दुलारने के उपरान्त भी कबीर का वो ही नाशुक्रा हठ सुनकर राजा के एड़ी से चोटी तक आग लग गयी. तब भी राजा को अपने कानों पर विश्वास करने का मन नहीं हुआ. शुबहा मिटाने की खातिर एक मर्तबा फिर पूछा, ‘तो क्या मुंहमांगी कीमत पर भी मुझे अपना माल नहीं देगा?’
कबीर राजकुमारी के चेहरे की ओर देखते कहने लगा, ‘लोभ-लालच के कारण बात बदलना तो मैं जानता ही नहीं. एक दफा पूछो तो वही बात और सौ दफा पूछो तो वही बात.’ इन बोलों के साथ राजकुमारी को ऐसा लगा, गोया गगन में एक सूरज का उजास और जुड़ गया हो. पर राजा की हालत बुरी हो गयी. वास्तव में वो देश का मालिक है कि नहीं? सिंहासन और मुकुट की आन यों ही नहीं रखी जाती. दूसरे ही क्षण राजमद के उफनते गुमान में उसने आदेश दिया कि अलगनी पर लटकते तमाम वस्त्रों के चिथड़े-चिथड़े कर दिये जायें.
राजकुमारी तो अपना आपा ही बिसर गयी. क्या करे और क्या न करे? ऐसा फन्दा तो कभी नहीं फंसा. पर बेहद ताज्जुब की बात कि कबीर ने किसी तरह की कोई रोक-टोक नहीं की. देखते-ही-देखते उसके हाथों उरेही बिजलियों के टुकड़े-टुकड़े हो गये. फूलों की पंखुड़ियां झड़ गयीं. पहाड़ के परखचे उड़ गये. टीले बिखर गये. अपना वश न चलने पर कबीर कर ही क्या सकता था! उसका वश चला तब तो उसने अपने हाथों कुछ-न-कुछ सिरजा ही. उसने अपना काम किया. राजा अपना काम कर रहा है. मन्द-मन्द मुस्कराते वो सवारों के हाथों हुए अपने कलेजे के चिथड़ों का ढेर देखता रहा. कबीर के होंठों की मुस्कराहट मानो राजा का मुंह चिढ़ा रही हो. उफनने के बाद राजमद की क्या हद! कड़कते सुर में आदेश दिया, ‘देख क्या रहे हो, इन चिथड़ों की तरह इस बेशर्म की भी चिन्दी-चिन्दी कर डालो.’
राजा के आदेश के साथ ही चार-पांच सवार नंगी तलवारें चमकाते कबीर की ओर लपके ही थे कि राजकुमारी उनके सामने आकर बोली, ‘खबरदार, कबीर को खरोंच भी आयी तो मैं जिन्दा जल मरूंगी!’सवारों के हाथ जहां-के-तहां रुक गये. न राजा के आदेश को टालना उनके वश में था और न राजकुमारी के आदेश को. कठपुतली तो धागों के बल फुदकती और थमती है. सवार नए आदेश की प्रतीक्षा में राजा के सामने देखने लगे. पर राजा के हलक में जैसे कुछ फंस गया हो, कि अचानक उसके कानों में राजकुमारी के तीखे सुर की भनक पड़ी, ‘आप तो कला के ऊंचे पारखी हैं, अच्छी कीमत अदा की!’राजा के कलेजे को मानो अंगारा छू गया हो. कबीर कुछ दाद-फरियाद करता या गिड़गिड़ाता तो शायद राजमद की ऐंठन कुछ ढीली पड़ती. लेकिन उस पर तो कोई बात असर ही नहीं करती. तिस पर राजकुमारी की शिकायत. राजा बमुश्किल अटकते कहने लगा, ‘यह अपनी कारीगरी बेचता नहीं, भेंट करता नहीं, फिर और क्या करता, तू ही बता?’अक्षरों के बहाने राजकुमारी के मुँह से मानो खून टपक रहा हो, इस तरह बोली, ‘मुझसे पूछते तो बताती. पर अब तो पूछने की राह ही नहीं बची. इससे तो मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डालते तो बेहतर था. आज से ही मेरी अक्ल ठिकाने आ गयी. आयन्दा कभी किसी काम के लिए टोकूं तो मेरी जबान दाग देना.’
राजा लाड़ से दुलारते कहने लगा, ‘मेरी बावली बेटी, तूने इस बात की खूब फिक्र की! मैं मन का मैला थोड़े ही हूं. मेरी दातारी फकत इस कबीर के सिवाय कौन नहीं जानता! तेरी ऐसी ही मरजी है तो कबीर को मैं अपने गले का नवलखा हार दे दूं! हार तुझसे बढ़कर थोड़े ही है!’और वाकई इतना कहते ही अपने गले का नवलखा हार उतारकर कबीर के सामने करते हुए राजा बोला, ‘इसे अपनी कारीगरी का मोल नहीं, हरजाना ही मान ले. पीढ़ियों का दिवाला मिट जायेगा. बस, अब तो खुश!’
कबीर ने उस नवलखे हार की ओर देखा तक नहीं. गले की ठौर अब वो हार राजा के हाथ में चमक रहा था. कबीर राजकुमारी की आंखों में नजर गड़ाकर कहने लगा, ‘मैं तो पहले भी खुश था. दूसरे की गलतियों का मैं पछतावा क्यूं करूं? और न ही इस हार से मेरा खमियाजा पूरा होगा.’राजा जल्दी से बोला, ‘एक की ठौर दो हार ले ले, तीन हार ले ले.’कबीर मुस्कराते कहने लगा, ‘किसी कम्बल या शाल का महत्त्व हीरों के बदले बिकने में नहीं, जाड़े से ठिठुरते इनसान की ठण्ड दूर करने में है. आप राजा हैं, मेहनत के पसीने का मोल आप नहीं जानते. आपको क्या मालूम कि मेरी इस कारीगरी में कितनों की मेहनत और कितनों का पसीना मिला हुआ है. जब इन चिन्दी-चिन्दी हुए चिथड़ों को रफू करके वापस उनसे कम्बल बनाऊँ और वह कम्बल किसी ठिठुरते इनसान को गर्मी पहुंचाये, तब कहीं इनका असली मोल चुकेगा और मेरी कारीगरी सार्थक होगी.’
राजा खिल-खिल हंसते बोला, ‘तू तो अकेला ही हजार बावलों की गरज पूरी करता है. तू इस हार के मोतियों के बारे में कुछ जानता भी है? अगर दान के जरिये तू अपनी शोहरत फैलाना चाहता है तो बावलों के सरदार, इस हार के एक-एक मोती से तू हजारों कम्बल खरीद सकता है. फिर गद्दी पर बैठे-बैठे बेहिसाब कम्बल बांटना!’कबीर सिर हिलाते बोला, ‘दान करने के गुमान से मेरा मन तुष्ट नहीं होगा. धन जुड़ने से माया तो बढ़ती है, पर बाकी सब गुण घटते हैं. इनसान में इनसानियत न रहने पर पीछे फकत मल-मूत, खून, हड्डियां और खाल बचती है. तलवार की ताकत के बिना न दौलत बढ़ती है, न सत्ता. तलवार और सिंहासन के आतंक से मौत डरती हो तो बात दूसरी है!’
राजमद की धुन्ध के कारण राजा को कुछ सूझता ही नहीं था. कबीर की जबान से मौत का नाम सुनकर राजा को पहली मर्तबा ध्यान आया कि देर-सवेर मौत तो सबको आनी ही है. पर उसकी बात अलग है. वो देश का मालिक है. आवाज को दबाकर कहने लगा, ‘कबीर, एक बात तो बता! देख सही-सही कहना. मुझे तुझ पर भरोसा है. यह नौकूंटी राज्य का सिंहासन, यह अखूट खजाना, यह विशाल फौज, ये चमचमाती तलवारें और ये हाथी-घोड़े... क्या इस मरी मौत से मेरी रक्षा नहीं कर सकते? क्या नाचीज रिआया की तरह मुझे भी एक दिन मरना होगा?’ मुस्कराहट के उजले सुर में कबीर बोला, ‘यह भी कोई पूछने की बात है?’
एक गहरी आह भरकर राजा बोला, ‘पूछने की बात है, तभी तो पूछ रहा हूं. तेरे सिवाय कोई दूसरा पण्डित-ज्ञानी इसका सही जवाब नहीं दे सकता. तेरी बातें सुनकर मेरे सर के भीतर चींटियां कुलबुलाने लगी हैं. बता, यह क्या माजरा हुआ?’कबीर से किसी ने कोई सवाल पूछा तो उसे अपने वश चलते उसका जवाब देना ही था. कहने लगा, ‘मेरे लाख समझाने पर भी यह आपकी समझ में नहीं आयेगा, क्यूंकि यह सिंहासन, यह मुकुट, यह खजाना, यह फौज और ये चाकर कदम-कदम पर आपकी राह रोकते हैं. आपकी आंखों पर राजमद का जाला छाया हुआ है. इस खातिर न तो आप सत्य का परस कर सकते हैं और न दर्शन. लगता है कि आज जिन्दगी में पहली दफा सत्य के जगमगाते सूरज की झलक देखने के लिए आपके कलेजे में हूक उठी है. यह चींटियों की हलचल शायद उसी की है.’
एक अबूझ बालक के उनमान हामी भरते राजा अधीरता से बोला, ‘हां, उसी की है. बिलकुल उसी की है. पर मेरे मन की बात तूने कैसे जानी?’राजा की आंखों में नजर गड़ाकर कबीर बोला, ‘अभी आपका मन गंदला नहीं हुआ है. मुझे उसके आरपार दिख रहा है.’‘तू कहता है तो दिखता ही होगा, पर मैं तो आज अजीब उलझन में फंस गया हूं. क्या तेरा यह सांच हुकूमत के दबदबे से भी बड़ा है?’आज से पहले किसी ने भी कबीर से ऐसे गूढ़ सवाल नहीं पूछे थे, तब भी उनका जवाब देने में उसे कोई अड़चन नहीं हुई. अदेर बोला, ‘कहां बेचारी हुकूमत की चिनगारी और कहां सांच का तपता सूरज! पर राज्य की तरह इस सांच का कोई राजा नहीं होता! उसमें सभी की एक-सी मिल्कियत है, पर इस मिल्कियत पर हक जतलाने की हिम्मत चाहिए.’
राम जाने क्यूं राजा के मन में उस वक्त किसी तरह का कोई दुराव नहीं था. सभी के सामने कबूल करते कहने लगा, ‘अपनी हिम्मत का असली कूता तो मुझे आज ही हुआ. तू क्या सच मानेगा कि इतनी बड़ी रियासत का राजा होकर भी मैं मन-ही-मन तुझसे डर गया.’कबीर टिटकारी देते बोला, ‘यह तो बहुत बुरी बात हो गयी. मैं न तो किसी से डरता हूं और न किसी को डराना चाहता हूं. भला, मुझसे डरने की क्या बात है?’ राजा दो-तीन दफा गर्दन को हिलाते बोला, ‘वह तो मैं जानता हूं या मेरा जी जानता है.’
आस-पास खड़े दरबारियों और ठाकुर के आश्चर्य की सीमा न रही कि देश के मालिक होकर, राजा आज यों आंय-बांय क्या बक रहे हैं! कहीं दिमाग तो नहीं फिर गया! राजा के डरने से कहीं राज्य चलता है भला! यह छली कबीर जरूर कोई जादू-टोना जानता है. इससे तो किनारा करना ही बेहतर है. ठाकुर ने दोहरे होकर अर्ज की, ‘अन्नदाता, थाल अरोगने के लिए देर हो रही है. आपके अरोगने के बाद ही बस्ती के लोग बासी मुंह कुल्ला करेंगे.’ठाकुर की आवाज सुनते ही राजा को वापस चेत हुआ. अपने असली खोल में आते ही उसका सुर बदल गया. गगन की ओर ऊपर देखते बोला, ‘सूरज तो सिर पर चढ़ आया और अभी तक तुम्हारी बस्ती का मुंह बासी ही है?’
ठाकुर ने ‘महाराजा की जय हो’ कहने के उपरान्त गर्व से कहा, ‘आपके अरोगने से पहले तो मेरी स्वामीभक्त रिआया गले से थूक तक नीचे नहीं उतारती, रोटी खाना तो बड़ी बात है.’ राजकुमारी ने खुद चलने की जल्दी दरसायी तो राजा झट अपने डेरे की तरफ चल पड़ा. राजा के पीछे सभी चुपचाप रवाना हो गये. पीछे रहा फकत अकेला कबीर और फटे हुए चिथड़े. काम तो आखिर करने से ही निबटेगा. नाहक सोच-विचार में क्या सार! हुकूमत की रंगत ऐसी ही हुआ करती है, कैसे भी अकेले अपरबली की, हुकूमत की ताकत के आगे कोई थाह नहीं लगती. वो चुपचाप गुमसुम सूई-डोरा लेकर अपने काम में जुट गया. उसके पोरों का परस पाने से तो ये चिथड़े भी मुंह बोलने लग जायेंगे.
तत्पश्चात् कबीर को न वक्त का ध्यान रहा, न हवा का और न उजास का. कब दिन ढला और कब सांझ हुई, उसे इसका कोई एहसास ही नहीं था. सूई की नोक में ही उसकी तमाम दुनिया बसी हुई थी. कब सूरज की रोशनी अंधेरे तले दब गयी और कौन दीपक जलाकर उसकी बायीं बाजू सारी रात अविचल बैठी रही. गोया रैनादे अपनी गरज से हथेली में दीपक लिये बैठी हो. और मानो कई युगों ने वापस लौटकर उस रात के झिलमिलाते तारों में शरण ली हो. तड़के सूर्योदय के वक्त दीपक का उजाला अपने-आप में सिमटकर सर हिलाने लगा तब कबीर को चेत हुआ. और दीया बुझाने के साथ ही उसकी आँखों ने जो नजारा देखा तो उसे लगा कि वो कहीं नींद में सपना तो नहीं देख रहा है! आंखें मसलकर फिर देखा, यह तो वास्तव में राजकुमारी हथेली में दीपक लिये सामने बैठी है. समूची दुनिया का सारा आश्चर्य मानो उसके गले से फूट पड़ा, ‘आप!’
राजकुमारी ने कोई जवाब नहीं दिया. कबीर के हाथों से रफू किये पहाड़ के आर-पार नजर गड़ाकर एकटक देखती रही. कबीर पछतावे के सुर में माफी मांगता-सा कहने लगा, ‘मुझे न तो आपके आने का कुछ खयाल था और न दीपक के उजाले का.’ इस दफा राजकुमारी के गुलाबी होंठों से आप ही अमृत-वाणी झनकी, ‘मुझे भी कहां ध्यान था कि डेरे कब पहुंची और वापस कब रवाना हुई. आंगन में पांव धरते ही मैं जान गयी कि तुम्हें सूई और डोरे के सिवाय दूसरा कुछ होश नहीं है. आयी तो बहुत सारी बातें करने के लिए थी, पर अब कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है. मौन से बढ़कर दूसरी कोई वाणी नहीं है. बेकार बकवास से क्या फायदा, एक सूई और हो तो मुझे भी दो!’
‘यह काम इतना आसान नहीं है!’ ‘यह तो काम करने पर ही पता चलेगा.’
सूई देते हुए कबीर को रत्ती-भर भी यकीन नहीं था कि राजकुमारी उससे भी पटु है. फकत लिहाज की वजह से सूई दी, पर पहले टाँके की लकब से वो अच्छी तरह जान गया कि ये हाथ तो जो चाहे कर सकते हैं! कबीर ने हैरानी से पूछा, ‘आपने यह काम कब सीखा?’ ‘सीखा फिर कब, आज ही तो सीखूंगी. इतने बरस सूई का नाम तो जरूर सुना था, पर हाथ में अभी ली है.’ कबीर की खुशी का ओर-छोर नहीं रहा. कहने लगा, ‘बात तो यकीन करने लायक नहीं है, पर आपकी बात को झूठ भी कैसे मानूं.’राजकुमारी सूई चलाते-चलाते बोली, ‘आप जैसे गुरु मिलने पर कौन क्या नहीं सीख सकता? सारी रात आपकी देखादेखी, आंखों को पोर और पोरों को आंखें बनाने का काम सीखती रही. समूची बात बताने पर सत्य की मर्यादा कलंकित होती है.’ राजकुमारी आगे भी कुछ कहना चाहती थी कि सहसा राजा आंगन में खड़ा नजर आया. साथ में ठाकुर और आठ-दस सवार. राजकुमारी से आंखें चार होते ही राजा कहने लगा, ‘मैं जानता था कि तू यहीं मिलेगी!’
राजकुमारी के चेहरे पर लज्जा की झांईं घुल गयी. राजा को इतना धीरज कहां? कबीर के सामने देखते बोला, ‘तू तो मुझे नाचीज कम्बल तक भेंट करने को राजी नहीं हुआ तो तेरी मरजी, पर मैं तुझे ऐसी चीज भेंट करने के लिए आया हूं, जिसका सपना भी तेरे लिए नामुमकिन है. बोल, तू ही बता, ऐसी कौन-सी भेंट हो सकती है?’संकेत बिलकुल स्पष्ट था, फिर भला कबीर क्यूं न समझता! गम्भीर सुर में बोला, ‘मैं न तो किसी की भेंट कबूलता हूं और न किसी को कोई भेंट करता हूं.’
राजा ताली बजाकर खिल-खिल हंसते बोला, ‘यह भेंट वैसी नहीं है. इन्द्र भगवान का भी मन डोल जाये जैसी भेंट. बताऊं, राजकुमारी के हथलेवे में समूचे राज्य का दहेज!’ राजा की यह फूहड़ बात सुनकर कबीर को बेसाख्ता हंसी आ गयी. हंसी थमने पर कहने लगा, ‘ऐसी भेंट का तो सपना ही बुरा. मैं तो शादी-ब्याह के लफड़े में ही नहीं पड़ना चाहता. और इस लफड़े के साथ राज्य का दहेज! क्या मुझे आप इतना अबूझ समझते हैं कि आपके वमन को मैं प्रसाद की तरह ग्रहण करूंगा? अगर सत्ता का सुख ही सबसे बड़ा सुख है तो आप उसे छोड़ते ही क्यूँ? आप खीज करें तो आपकी मरजी, इस भेंट के लिए भी मैं माफी चाहता हूं.’
राजा के रोम-रोम में झुरझुरी दौड़ गयी. राजकुमारी पर हजार घड़े पानी गिर गया. सपने की सुनहरी लंका उसकी आंखों के सामने धू-धू कर जलने लगी. राजा की बेटी होकर कितनी छोटी आशा की खातिर मन डोलाया और उस पर भी पाला पड़ गया. अब तो सौ दफा जिला-जिलाकर इस मक्कार को वापस न मारे तब तक राजा की जलन शांत नहीं होगी. सवारों पर कड़कते बोला, ‘यों नाजिरों की तरह नाखूनों से जमीन क्या कुरेद रहे हो, अब तक तो इस हरामजादे की चटनी कर डालते.’
ऐसे आदेश के बाद सवारों को कैसी देर! एक साथ हवा में नौ तलवारें ऊपर उठीं. शायद फिर राजकुमारी आड़े आ गयीं तो! पर राजकुमारी तो इस मर्तबा टस-से-मस भी नहीं हुई. उसकी आंखें गोया पथरा गयी हों कि अचानक राजकुमारी की जगह राजा सामने आकर जोर से बोला, ‘खबरदार, मैंने आदेश दिया तो क्या हुआ, तुम्हें तो सोचना था? कबीर के चीरा लगने से ही मेरी लाड़ली बेटी कितनी तड़पेगी! अपना काला मुंह करो यहां से. आयन्दा भी ऐसा अण्ट-शण्ट आदेश करूं तो कान मत देना. मेरा दिमाग ठिकाने हो तब न! खोपड़ी में तो मानो साही घुसी हुई हो.’
कहाँ की बिजली और कहां आकर गिरी! कबीर क्या करे और क्या न करे! थोड़ी देर तो कुछ समझ में नहीं आया. वो भी असमंजस में पड़ गया. फिर राजकुमारी के पास जाकर उसके एकदम करीब खड़ा हो गया. अपने हाथों में उसके हाथ लेकर पिघले हुए सुर में कहने लगा, ‘फकत एक रात साथ रहने से एक-दूसरे को ठीक से नहीं जाना जा सकता. शादी, बाल-बच्चे, कुटुम्ब-परिवार, जमीन-जायदाद में मुझे रंचमात्र भी आस्था नहीं है. दूसरे प्राणियों से अलग और ऊँचा समझने की गलतफहमी में इनसान की बेहद बर्बादी हुई है और होती जा रही है. मेरी न कोई जात है, न मेरा कोई धर्म है और न मेरा कोई देश. इनसान के लिए यह कितनी शर्म की बात है कि धर्म और पंथों के बहाने मरे हुए अवतार अभी तक जिन्दा इनसानों पर शासन कर रहे हैं.’
राजा से सब्र नहीं किया गया तो उसने बीच में ही पूछा, ‘सुना है कि तू देवी-देवताओं और ईश्वर को भी नहीं मानता?’इस दफा कबीर व्यंग्य से मुस्कराते बोला, ‘मानता हूं, जरूर मानता हूं. आत्मा, परमात्मा, भाग्य और धर्म से बड़ा जाल इनसान के हाथों न तो रचा गया और न रचा जायेगा. अक्ल की खोपड़ी नवाकर, जिन्दा इनसान पत्थर की मूर्तियों को पूजता है, इससे घिनौनी बात और क्या होगी? इतनी बात बढ़ गयी, इसलिए मुझे पहली दफा, अपने मन की बात समझाने की जरूरत पड़ी.’
अब राजकुमारी के होंठ खुले. धीमे व मीठे सुर में बोली, ‘इतनी बातें जानते हुए भी जब तुम्हारी आंखों के सामने तुम्हारी कारीगरी की धज्जियां उड़ीं, दो मर्तबा नंगी तलवारें ऊपर उठीं और राजा व ठाकुर की अण्ट-शण्ट दुत्कार सुनी तब तुम्हारे कलेजे में गुस्से की आग क्यूँ नहीं भभकी? तुम मरने-मारने पर उतारू क्यूँ नहीं हुए? इतने लम्बे-चौड़े ज्ञान के बावजूद भी तुम्हारे अन्तस् में जीने का मोह है! मौत का डर है! फिर तुम्हारा क्रोध किस दिन के लिए है?’
कबीर इतमीनान से समझाने लगा, ‘राजकुमारी, एक आदमी के क्रोध से कुछ नहीं हो सकता. वो तो खुदकुशी के समान है. जिस दिन मेरे क्रोध की छूत जन-जन के हृदय में खुदबुदायेगी, उस दिन इनसानों की दुनिया में न तो कोई राजा होगा और न कोई रंक. न कोई ऊँच होगा और न कोई नीच, न साँच होगा और न झूठ. न पाप होगा, न पुण्य. न धर्म होगा, न अधर्म. न कोई अमीर होगा और न कोई गरीब. न कहीं मन्दिर होगा और न कहीं मस्जिद. उस दिन न मजहब बचेगा और न जात. न फौज होगी और न हथियार. किसी इनसान को यह हक नहीं होगा कि अपनी सत्ता के बल पर, तलवार की ताकत से, अपने आदेश के जरिये किसी कारीगरी के टुकड़े-टुकड़े करवा डाले.’
राजा कबीर का हाथ थामकर गिड़गिड़ाते बोला, ‘इसी प्रायश्चित्त की खातिर तो मैं राज्य छोड़ने को तैयार हो गया, तू और क्या चाहता है?’ कबीर मुस्कराता-सा बोला, ‘मेरे चाहने और न चाहने से क्या फर्क पड़ता है!’ राजा सिर हिलाते बोला, ‘यही तो तेरी भूल है. तू एक दफा अपने मन की चाह जाहिर करके तो देख! मेरी बेटी तेरे सिवाय किसी का हाथ थामना ही नहीं चाहती, और तू ऐसा ठूंठ कि उसकी कोई परवाह ही नहीं करता!’
‘परवाह क्यूं नहीं करता, हजार दफा परवाह करता हूं. अगर नर-नारी की हैसियत से, जहाँ तक एक-दूसरे का मन चाहे, राजकुमारी मेरा साथ करने को तैयार हो तो मेरी मनाही नहीं है.’

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