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भूमिरिका: डाडा और उसकी मम्मा से अमरीका में मुलाकात

हर हफ्ते बिला नागा आपको अमेरिका का हाल सुनाने वाली भूमिका जोशी इस बार 'डाडा' से टकराई हैं. ये क्या बला है, खुद पढ़ लीजिए.

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7 मई 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 10:53 AM IST)
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भूमिका जोशी

हर हफ्ते बिला नागा आपको अमेरिका का हाल सुनाने वाली भूमिका जोशी इस बार 'डाडा' से टकराई हैं. अपनी मामी के साथ न्यू हेवेन शहर घूमने निकली थीं. डाडा से मिलना हो गया. ये क्या बला है, खुद पढ़ लीजिए.


कई बार ऐसा होता है कि अपने शहर में भी मेहमानों के बहाने ही घूमना हो पाता है. नहीं तो रोज़मर्रा की मैयत में घड़ी और कदमों के ऊपर नज़र उठ नहीं पाती. आस पास का जायज़ा लेना भी दुर्लभ हो जाता है. पिछले वीकेंड मेरे ठिकाने मेरी मामी पहुंच गईं और उनके बहाने छुट्टी का आलस और काम निपटाने की तैयारी छोड़ एक दिन के लिए अपने शहर में मैं मुसाफिर हो चली. धूप वाला चश्मा लगा के.
न्यू हेवन छोटा शहर है और मामी जी दिल्ली से आईं थी. इसलिए शहर को क़दमों में नापने में उन्हें अलग ही मज़ा आ रहा था. हर मोड़ पर मैं उन्हें कुछ दिखाती और बताती, वो बड़े ध्यान से सुनती और कभी कभार 'पर ये बताओ' टाइप का सवाल भी पूछ लेतीं. जितना मुझे पता था, उतना तो मैं भी कॉन्फिडेंस से बताती. पर आबादी कितनी है, ये बिल्डिंग कितनी पुरानी है, इस से पहले यहां क्या था, इसका नाम ये क्यों पड़ा, इस टाइप के सवालों को मैं राउंड-ऑफ कर जाती, जैसे कि बिल चुकता करते समय दुकानदार करते हैं. चूंकि न्यू हेवन एक यूनिवर्सिटी टाउन है - यानि एक ऐसा शहर जहां यूनिवर्सिटी ही सबसे बड़ी हस्ती है, यूनिवर्सिटी से जुड़े कई देखने दिखाने लायक नमूने हैं. और इन्हीं में से एक है येल यूनिवर्सिटी की आर्ट गैलरी.
'आर्ट' के नाम पर लोग ज़्यादातर दो टाइप की प्रतिक्रियाओं में सिमट जाते हैं. या तो वो जो मुंह बनाकर यह कहते हैं कि ये सब तो मेरी समझ के परे है, या वो जो फट से अपने पसंदीदा आर्टिस्ट, उनकी प्रतिभाओं और कमियों और अपने नज़रिए का व्याख्यान शुरू कर देते हैं. मामी जी ने आर्ट गैलरी देखने के न्यौते पे इनमें से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं की. मैं समझ गई, ये देखने के बाद करेंगी, इसलिए दिखाना ज़रूरी है. खुद की बात करूं तो कॉलेज जाने तक आर्ट गैलरी क्या होती है, इसका कोई अंदाजा ही नहीं था. मक़बूल फिदा हुसैन का नाम भी माधुरी दीक्षित के बहाने सुना था. जितनी बार दिल्ली गए, उतनी बार रिश्तेदारों के घर खाना खाने और शादियों में नए कपड़े पहनने के अलावा कुछ किया ही नहीं. दिल्ली में नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट नाम की भी कोई चीज़ है, खबर ही नहीं थी. जब पहली बार वास्ता हुआ, तो आंखों और दिमाग में कुछ हलचल हुई तो ज़रूर, पर जैसे ही जिज्ञासा को तेज़ करने की कोशिश करी, सुई अनेक विधियों और घरानों की समय सारणी में ही अटक कर रह गई. करते करते बात यहाँ तक पहुंची कि दूसरों को ले जाने की हिम्मत आ ही गई. गोया, अब तो फ्रेंच और डच नाम भी जुबां पर आसानी से बैठ ही जाते हैं.
चूंकि आर्ट गैलरी में देखने के लिए कई प्रदर्शनियां थीं, हमने तय किया कि हम एक चुनेंगे और वही देखेंगे, सब कुछ एक साथ वैसे भी नहीं पचता. मामी जी ने स्वागत कक्ष के पास लगे बोर्ड को पढ़कर चौथे माले पर लगी 'स्पेशल एक्सीभीशन' का चयन किया, और लिफ्ट का बटन दबा हम इंतज़ार में खड़े हो गए. ऊपर पहुंचे तो पता चला कि प्रदर्शनी का विषय है -'डाडा'. हमने एक दूसरे के चेहरे तो नहीं देखे पर यह अंदाजा ज़रूर लग गया था कि डाडा का खाता पहले कभी हमारे दिमाग में नहीं खुला था. ये 'डाडा' क्या बला है?
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प्रदर्शनियों की सफलता शायद इसी बात से नापी जा सकती है कि वो कितनी देर तक आपकी उत्सुकता बनाये रख सकती हैं और आपका ध्यान टिकाये रख सकती हैं? कमरा बहुत बड़ा तो नहीं लग रहा था, ऊपर से 'डाडा' जैसा नॉन-सीरियस नाम सुनकर ख्याल तो बन ही चुका था - ये भी भला कोई देखने लायक चीज़ होगी क्या? जैसे किसी तुतलाते हुए बच्चे के मुंह से निकला शब्द! कदम झिझकते हुए आगे बढ़े, मामी जी अब तक दूसरी तरफ जा चुकी थीं, सोचा एक्सपेरिमेंट कर के देख ही लेते हैं, और मन में इलू -इलू की धुन पे 'डाडा -डाडा ' बजने लगा. आधा चक्कर काटा भर ही था की नज़र इस चित्र पर आ कर टिक गई -
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एक पांव हवा में टिकाता हुआ और एक हाथ की उंगलियों को नाक पर नचाता हुआ यह चित्र बड़ा मज़ेदार लगा. दुनिया को ठेंगा दिखाते हुए, अलमस्त चाल में रास्ता नापते हुए. ध्यान से देखने पर पता चला कि बियैट्रिस वुड का बनाया हुआ है. चेहरे पर मुस्कान खिल पड़ी, बियैट्रिस वुड का नाम तो जाना पहचाना था. उनकी जीवनी - 'आई शॉक माईसेल्फ' के कुछ अंश मैंने कुछ समय पहले पढ़े थे और उनके जीवन के अनुभव और स्मृतियां काफी रोमांचक थे. अपने जीवन के आखिरी सालों में बियैट्रिस कैलिफोर्निया में ओजई नामक जगह पर जा बसी थीं, चूंकि जे. कृष्णामूर्ति जिनको वह अपनी प्रेरणा का स्त्रोत और गुरु मानती थीं, वह भी ओजई में रहते थे. यह बात अलग है कि बियैट्रिस के जीवन के आखिरी साल भी बहुत लम्बे थे. उनकी मौत 1998 में 105 साल की उम्र में हुई. प्रदर्शनी में लगा चित्र 1917 में बना था. 1917 से लेकर 1998 तक बियैट्रिस ने कला से अपना लगाव बनाए रखा - चाहे वह अदाकारी रही हो, चित्रकला या फिर पॉटरी , उनकी आभा और रूचि के कई आयाम थे.
बियैट्रिस वुड का डाडा कला आंदोलन से संपर्क 1900 के पहले दो दशकों में हुआ, जब स्विट्ज़रलैंड और जर्मनी से घूम कर डाडा की हवा न्यूयॉर्क पहुंची जहां वह तब एक अदाकारा थीं. वह काफी संभ्रांत घर से थीं और पैरिस में अदाकारी सीखने के बाद न्यू यॉर्क में अपनी किस्मत आज़मा रहीं थीं. डाडा कला का दर्शन उन्हें भा गया और वह उस समय की उस धारा से जुड़ चली जिसने आगे जाकर कई कला आंदोलनों को प्रभावित किया. मेरे दिमाग में डाडा का मुद्दा धीरे धीरे सुलझने लगा - प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंततराष्ट्रीय स्तर पर हिंसा और मशीनी प्रभुत्व से तंग आकर ज़्यूरिख़ में कुछ कलाकारों ने तय किया कि समकालीन कला के ढोंग से मुक्त होना पड़ेगा.
जहां कला में अद्वितीय ख़ूबसूरती का अनुभव पैदा करने के लिए कलाकार अपने आस-पास की सच्चाई को कृत्रिमता से ढंक रहे थे. वहीं डाडा कलाकारों ने स्वयं को रोज़मर्रा के अनुभव और मामूली चीज़ों के लिया प्रेरणाबद्ध किया. चाहे वह अखबार हो या कुल्हाड़ी, टेलीफोन हो या फिर बल्ब. कला को ऐसी ऊर्जा से भरने का वादा जिसकी भव्यता उसके परे होने में नहीं, उसकी मामूलियत में हो.
नाक पर अंगूठा टिकाये हुए, दुनिया को ठेंगा दिखाता हुआ वह चित्र अचानक ही और भी सटीक हो गया - अपने दौर के स्वनियुक्त नुमाइंदों से जैसे कह रहा हो - भाड़ में जाओ!
डाडा की ज्वाला सबसे पहले जर्मनी में पनपी. युद्ध के बाद देश की थकान केवल लड़ाई की ही नहीं, दिल और दिमाग की भी थी. डाडा कलाकारों नें इस सामजिक शिथिलता पर निशाना साधा, जो नैसर्गिक अनुभवों की पीड़ा और झल्लाहट को दबा-दबा कर, उसे अनदेखा कर के, बस टिके रहना चाह रहा था. बियैट्रिस का व्यक्तित्व भी डाडा कला की धारणा जैसा अभिव्यक्ति की ईमानदारी से सुदृढ़ था.
बियैट्रिस वुड
बियैट्रिस वुड

डाडा का आगमन जब न्यू यॉर्क हुआ तो वह इसका एक अटूट अंग बन गईं , और बनी रहीं. प्रदर्शनी में मैं और मामी करीबन घंटा भर टिके रहे, कुछ समझ में आने लगा था - ये कि समझने के लिए कभी कभार समझ को ही अनदेखा करना पड़ता है, और 'आर्ट' भी किसी ऐसी ही समझ का हव्वा है, जो न समझने से ज़्यादा समझने में आती है. बियैट्रिस को 'डाडा की मामा' यानी मां कहते हैं. और उनका पूरा जीवन डाडा सरीखा दुनिया को ठेंगा दिखाकर मज़े में निपट गया.


पढ़िए भूमिरिका की बाकी किस्तें:
1. ईमान आंटी और जवानी वाला हीरो पैगंबर
2. अमेरिका में हिंदुओं के कमल पर सवार ट्रंप
3. येल यूनिवर्सिटी में उस दिन हिंदी कूल हो चली थी
4. अमेरिका के केजरीवाल से LIVE मिलिए

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