भूमिरीका 3: येल यूनिवर्सिटी में उस दिन हिंदी कूल हो चली थी
अमेरिका में हिंदी डिबेट कंपटीशन जज करने वाली एक इंडियन लड़की की डायरी.
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येल यूनिवर्सिटी में हिंदी डिबेट कंपटीशन.
भूमिका जोशी लखनऊ की रहने वाली हैं और अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी में पीएचडी कर रही हैं. जो समझ वो यहां से लेकर गई हैं, उससे एक अनजान मुल्क को देख-समझ रही हैं. अमेरिका के अनुभवों को वह 'दी लल्लनटॉप' के लिए 'भूमिरीका'
सीरीज में लिख रही हैं. इस सीरीज की यह तीसरी किस्त है जिसमें उन्होंने येल यूनिवर्सिटी में हिंदी डिबेट का किस्सा सुनाया है.
भूमिरीका-1: ईमान आंटी और जवानी वाला हीरो पैगंबर
भूमिरीका-2: अमेरिका में हिंदुओं के कमल पर सवार ट्रंप
'क्या आप अगले हफ्ते होने वाली हिंदी डिबेट प्रतियोगिता जज करेंगी?’
जब देर रात मैंने अपने इनबॉक्स में यह ई-मेल पढ़ा, तो कुछ अटपटा सा लगा. या तो इन्हें और कोई जज नहीं मिल पाया होगा या फिर किसी ने इन्हें गलत हिदायत दे डाली है. मानती हूं कि हिंदी में लिख-पढ़ लेती हूं और थोड़े बहुत गहन विचार पेश करने की जुर्रत भी, पर किसी और की क्षमता माप लेनी की क्षमता को खुद में तो कभी भी नहीं मापा था.
और येल में हिंदी डिबेट थोड़ी और अटपटी लगी, अब यहां अमरीका में भले किसकी को आन पड़ी है हिंदी में डिबेट करने की? खुद के स्कूल के दिन याद आ गए – ‘निर्णायकगण , श्रोतागण और मेरे प्रिय मित्रों!’ – उस औपचारिकता का खौफ तो अभी भी दिल में बैठा हुआ है. ऊपर से हिंदी डिबेट के लिए छंटाई स्कूल के स्मार्ट बच्चों को नॉट-सो-स्मार्ट बच्चों, आज की भाषा में कहें, तो नॉट-कूल बच्चों से अलग करने की एक और प्रक्रिया होती थी, अब पूरी स्कूली शिक्षा के दौरान मर-पीट कर अंग्रेजी सीखी है तो हिंदी में डिबेट कर के भला क्या कर लीजिएगा? इस को तो सी. वी. या एक्स्ट्रा-कर्रिकुलर एक्टिविटी में लिखते हुए भी शर्म आएगी, नाम भी तो बड़े आंचलिक होते हैं, देहाती किस्म के – कहां श्रीमती कमला स्वरुप मेमोरियल हिंदी वाद विवाद प्रतियोगिता और कहां ऑल इंडिया फ्रैंक एंथनी मेमोरियल डिबेट – हिंदी डिबेट तो वैसे भी कभी अखिल भारतीय न हो पाईं. और अब कूल बनने के लिए इतनी मेहनत करने के बाद एक बार फिर नॉट-सो-कूल का दर्जा थोप दिए जाने पर थकान सी महसूस होने लगी. इसलिए येल हिंदी डिबेट सुन कर कान खड़े हो गए, हिंदी डिबेट के सामने कभी इतना अंग्रेज़ियत भरा नाम मैंने नहीं सुना था. बीते साल कुमाऊं विश्वविद्यालय में हिंदी में एक अकादमिक पेपर लिखने और प्रस्तुत करने की कोशिश की थी. उस प्रक्रिया में मेरे ज़ेहन में अंग्रेजी की जकड़-पकड़ ने कुछ ऐसा धावा बोला था कि मेरा आधा समय अपनी अंग्रेजी और बाकी अपनी हिंदी को सुधारने और सटीक करने में ही गुज़र गया था. बहरहाल, ऐसा लगा कि बोलने और सुनने की प्रक्रिया, लिखने और पढ़ने की प्रक्रिया जितनी जटिल तो नहीं होती, तो थोड़ा घमंड से और थोड़ी इज़्ज़त से, जज बनने का न्यौता स्वीकार कर ही लिया.
भूमिका जोशी
पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि आठ साल से लगातार हो रही है यह प्रतियोगिता, और केवल येल के स्तर पर ही नहीं, अन्य विश्वविद्यालयों से भी भागीदार आते हैं - जैसे कॉर्नेल यूनिवर्सिटी, न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो इत्यादि. कई दर्ज़े भी होते हैं इस प्रतियोगिता में - एक तो वह जिनके लिए हिंदी पूरी तरह से नई भाषा है - यानी जो गैर-भारतीय हैं, दूसरे वह जिनके माता पिता के लिए हिंदी मातृ भाषा रही हो पर जिन्होंने खुद कभी उसका इस्तेमाल फर्स्ट लैंग्वेज के रूप में नहीं किया हो और तीसरे वह जिनके लिए हिंदी उनकी फर्स्ट लैंग्वेज हो, यानी उनकी मातृ भाषा. एक मिला जुला मेला जहां लोग अपने अपने भाषा के ज्ञान के स्तर पर एक दूसरे से मुक़ाबला करेंगे. इन में से कुछ लोग दो साल से हिंदी सीख रहे थे तो कुछ लोग दो महीने से, और सभी का जज़्बा दाद देने के लायक था.
आयोजकों ने कहा कि केवल वाद विवाद प्रतियोगिता नहीं, हिंदी का मेला जैसा होता है ये आयोजन. मेरे हिंदी प्रेमी मन को बड़ा आनंद महसूस हुआ, लगा कि इस बहाने ही सही, यह भी पता लग जाएगा की केवल हिंदी की समझ नहीं पर हिंदी से जो समझ आती है, वो कहां तक पहुंच सकती है? ज़्यादातर प्रतियोगी, ख़ास कर, वह जिनके लिए हिंदी एकदम नयी थी, वह भारत के हिंदी भाषी इलाकों में काम करने की और रहने की इच्छा रखते थे और इसलिए उन्होंने हिंदी सीखना और बोलना ज़रूरी समझा, और मेहनत कर के सब के सामने डिबेट करने की हिम्मत भी. जीतने वाले जीते और अलग अलग लहजों में हिंदी सुनना जितना रोचक लगा, उतना ही मज़ेदार भी - भाषा वाकई भौगोलिक सत्य का अधिकार नहीं होती, साक्षात देखने को मिला, और समझने को भी.
डिबेट के दौरान और बाद में मैं सोचती रही, ऐसा क्या होता है मातृ भाषाओं की समझ में जो सुकून और घमंड के बीच असमंजस से घिरा रहता है? आखिरकार भाषा ही राजनीति का पहला भाव है, और माध्यम भी. तो अमरीका में हिंदी सुनने में न केवल एक जानी -पहचानी बोली सुनने का आभास है परन्तु एक तरह की राजनीति का चुनाव भी. अभिव्यक्ति की राजनीति. कृष्ण बलदेव वैद जैसे किरदारों की राजनीति, जिन्होंने अपना पूरा जीवन और कार्यरत समय अमरीका की विभिन्न यूनिवर्सिटियों में अंग्रेजी पढ़ाते हुए काटा पर लिखा तो केवल हिंदी में. हिंदी साहित्य के सितारों में अक़सर ही उन राष्ट्रवादी और high हिंदी लिखने वालों का नाम याद रह जाता है जिनकी किताबें स्कूलों के कार्यक्रम में सदियों से पढ़ाई जा रहीं हैं, जैसे अंग्रेजी में शेक्सपियर, वैसे हिंदी में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला. नतीजन – न ही अंग्रेजी की अंग्रेज़ियत और न ही हिंदी की हिन्दियत कामयाब होती है – होती है तो एक बिखरी हुयी सी समझ जो औपचारिक अंग्रेजी और संस्कृताइज्ड हिंदी के बीच सिमटी हुई, जहां अभिव्यक्ति की ईमानदारी की जगह बच नहीं पाती.
येल हिंदी डिबेट में अनायास ही कुछ लोगों के वक्तव्य में यह ईमानदारी झलकी, टूटी–फूटी ही सही, घबराई हुयी सी सही. जहां शब्दों का चयन केवल औपचारिकता के लिए नहीं, उस से परे, बात करने के लिए, संवाद करने के लिए हो रहा था, जहां स्पैनिश बोलने वाला और हिंदी सीखने वाला लड़का अंग्रेजी बोलने वाली और हिंदी सीखने वाली लड़की , एक दूसरे को अपना मत हिंदी में समझा रहे थे और सवाल कर रहे थे. और उनके लहजों के बीच अचानक ही हिंदी कूल हो चली थी.
सीरीज में लिख रही हैं. इस सीरीज की यह तीसरी किस्त है जिसमें उन्होंने येल यूनिवर्सिटी में हिंदी डिबेट का किस्सा सुनाया है.
भूमिरीका-1: ईमान आंटी और जवानी वाला हीरो पैगंबर
भूमिरीका-2: अमेरिका में हिंदुओं के कमल पर सवार ट्रंप
'क्या आप अगले हफ्ते होने वाली हिंदी डिबेट प्रतियोगिता जज करेंगी?’
जब देर रात मैंने अपने इनबॉक्स में यह ई-मेल पढ़ा, तो कुछ अटपटा सा लगा. या तो इन्हें और कोई जज नहीं मिल पाया होगा या फिर किसी ने इन्हें गलत हिदायत दे डाली है. मानती हूं कि हिंदी में लिख-पढ़ लेती हूं और थोड़े बहुत गहन विचार पेश करने की जुर्रत भी, पर किसी और की क्षमता माप लेनी की क्षमता को खुद में तो कभी भी नहीं मापा था.
और येल में हिंदी डिबेट थोड़ी और अटपटी लगी, अब यहां अमरीका में भले किसकी को आन पड़ी है हिंदी में डिबेट करने की? खुद के स्कूल के दिन याद आ गए – ‘निर्णायकगण , श्रोतागण और मेरे प्रिय मित्रों!’ – उस औपचारिकता का खौफ तो अभी भी दिल में बैठा हुआ है. ऊपर से हिंदी डिबेट के लिए छंटाई स्कूल के स्मार्ट बच्चों को नॉट-सो-स्मार्ट बच्चों, आज की भाषा में कहें, तो नॉट-कूल बच्चों से अलग करने की एक और प्रक्रिया होती थी, अब पूरी स्कूली शिक्षा के दौरान मर-पीट कर अंग्रेजी सीखी है तो हिंदी में डिबेट कर के भला क्या कर लीजिएगा? इस को तो सी. वी. या एक्स्ट्रा-कर्रिकुलर एक्टिविटी में लिखते हुए भी शर्म आएगी, नाम भी तो बड़े आंचलिक होते हैं, देहाती किस्म के – कहां श्रीमती कमला स्वरुप मेमोरियल हिंदी वाद विवाद प्रतियोगिता और कहां ऑल इंडिया फ्रैंक एंथनी मेमोरियल डिबेट – हिंदी डिबेट तो वैसे भी कभी अखिल भारतीय न हो पाईं. और अब कूल बनने के लिए इतनी मेहनत करने के बाद एक बार फिर नॉट-सो-कूल का दर्जा थोप दिए जाने पर थकान सी महसूस होने लगी. इसलिए येल हिंदी डिबेट सुन कर कान खड़े हो गए, हिंदी डिबेट के सामने कभी इतना अंग्रेज़ियत भरा नाम मैंने नहीं सुना था. बीते साल कुमाऊं विश्वविद्यालय में हिंदी में एक अकादमिक पेपर लिखने और प्रस्तुत करने की कोशिश की थी. उस प्रक्रिया में मेरे ज़ेहन में अंग्रेजी की जकड़-पकड़ ने कुछ ऐसा धावा बोला था कि मेरा आधा समय अपनी अंग्रेजी और बाकी अपनी हिंदी को सुधारने और सटीक करने में ही गुज़र गया था. बहरहाल, ऐसा लगा कि बोलने और सुनने की प्रक्रिया, लिखने और पढ़ने की प्रक्रिया जितनी जटिल तो नहीं होती, तो थोड़ा घमंड से और थोड़ी इज़्ज़त से, जज बनने का न्यौता स्वीकार कर ही लिया.
भूमिका जोशी
पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि आठ साल से लगातार हो रही है यह प्रतियोगिता, और केवल येल के स्तर पर ही नहीं, अन्य विश्वविद्यालयों से भी भागीदार आते हैं - जैसे कॉर्नेल यूनिवर्सिटी, न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो इत्यादि. कई दर्ज़े भी होते हैं इस प्रतियोगिता में - एक तो वह जिनके लिए हिंदी पूरी तरह से नई भाषा है - यानी जो गैर-भारतीय हैं, दूसरे वह जिनके माता पिता के लिए हिंदी मातृ भाषा रही हो पर जिन्होंने खुद कभी उसका इस्तेमाल फर्स्ट लैंग्वेज के रूप में नहीं किया हो और तीसरे वह जिनके लिए हिंदी उनकी फर्स्ट लैंग्वेज हो, यानी उनकी मातृ भाषा. एक मिला जुला मेला जहां लोग अपने अपने भाषा के ज्ञान के स्तर पर एक दूसरे से मुक़ाबला करेंगे. इन में से कुछ लोग दो साल से हिंदी सीख रहे थे तो कुछ लोग दो महीने से, और सभी का जज़्बा दाद देने के लायक था.
आयोजकों ने कहा कि केवल वाद विवाद प्रतियोगिता नहीं, हिंदी का मेला जैसा होता है ये आयोजन. मेरे हिंदी प्रेमी मन को बड़ा आनंद महसूस हुआ, लगा कि इस बहाने ही सही, यह भी पता लग जाएगा की केवल हिंदी की समझ नहीं पर हिंदी से जो समझ आती है, वो कहां तक पहुंच सकती है? ज़्यादातर प्रतियोगी, ख़ास कर, वह जिनके लिए हिंदी एकदम नयी थी, वह भारत के हिंदी भाषी इलाकों में काम करने की और रहने की इच्छा रखते थे और इसलिए उन्होंने हिंदी सीखना और बोलना ज़रूरी समझा, और मेहनत कर के सब के सामने डिबेट करने की हिम्मत भी. जीतने वाले जीते और अलग अलग लहजों में हिंदी सुनना जितना रोचक लगा, उतना ही मज़ेदार भी - भाषा वाकई भौगोलिक सत्य का अधिकार नहीं होती, साक्षात देखने को मिला, और समझने को भी.
डिबेट के दौरान और बाद में मैं सोचती रही, ऐसा क्या होता है मातृ भाषाओं की समझ में जो सुकून और घमंड के बीच असमंजस से घिरा रहता है? आखिरकार भाषा ही राजनीति का पहला भाव है, और माध्यम भी. तो अमरीका में हिंदी सुनने में न केवल एक जानी -पहचानी बोली सुनने का आभास है परन्तु एक तरह की राजनीति का चुनाव भी. अभिव्यक्ति की राजनीति. कृष्ण बलदेव वैद जैसे किरदारों की राजनीति, जिन्होंने अपना पूरा जीवन और कार्यरत समय अमरीका की विभिन्न यूनिवर्सिटियों में अंग्रेजी पढ़ाते हुए काटा पर लिखा तो केवल हिंदी में. हिंदी साहित्य के सितारों में अक़सर ही उन राष्ट्रवादी और high हिंदी लिखने वालों का नाम याद रह जाता है जिनकी किताबें स्कूलों के कार्यक्रम में सदियों से पढ़ाई जा रहीं हैं, जैसे अंग्रेजी में शेक्सपियर, वैसे हिंदी में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला. नतीजन – न ही अंग्रेजी की अंग्रेज़ियत और न ही हिंदी की हिन्दियत कामयाब होती है – होती है तो एक बिखरी हुयी सी समझ जो औपचारिक अंग्रेजी और संस्कृताइज्ड हिंदी के बीच सिमटी हुई, जहां अभिव्यक्ति की ईमानदारी की जगह बच नहीं पाती.
येल हिंदी डिबेट में अनायास ही कुछ लोगों के वक्तव्य में यह ईमानदारी झलकी, टूटी–फूटी ही सही, घबराई हुयी सी सही. जहां शब्दों का चयन केवल औपचारिकता के लिए नहीं, उस से परे, बात करने के लिए, संवाद करने के लिए हो रहा था, जहां स्पैनिश बोलने वाला और हिंदी सीखने वाला लड़का अंग्रेजी बोलने वाली और हिंदी सीखने वाली लड़की , एक दूसरे को अपना मत हिंदी में समझा रहे थे और सवाल कर रहे थे. और उनके लहजों के बीच अचानक ही हिंदी कूल हो चली थी.

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