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भूमिरीका-2: अमेरिका में हिंदुओं के कमल पर सवार ट्रंप

एक तूफान है, जिसने अमेरिका को अपनी गिरफ्त में ले रखा है. डॉनल्ड ट्रंप नाम है उनका. इस बार भूमिका इन्हीं की बात कर रही हैं.

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कुलदीप
9 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 7 मई 2016, 11:20 AM IST)
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भूमिरीका की दूसरी किस्त. इस सीरीज के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें.

भूमिका जोशी की येल यूनिवर्सिटी में यानी कि कनेक्टिकट में यानी कि ईस्ट कोस्ट में इन दिनों बर्फ गिर रही है. तूफान आ रहे हैं.
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भूमिका.

एक तूफान और है, जिसने अमेरिका को अपनी गिरफ्त में ले रखा है. डॉनल्ड ट्रंप नाम है उनका. रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से प्रेसिडेंट का चुनाव लड़ना चाहते हैं.
इस बार भूमिका इन्हीं सबकी बात कर रही हैं. और इस बीच उन्हें अपने पहाड़ के अग्निहोत्री जी का पंचांग भी याद आ रहा है.
तो फिर सफर शुरू किया जाए एक बार फिर से.


अक्टूबर से अप्रैल हो गया पर सर्दी के कपड़े अभी तक उतरे नहीं. एड़ी से घुटने तक चढ़े हुए गरम बूट तो जैसे शरीर का अंग ही बन गए हैं. उनके बिना अपने पांव पांव जैसे नहीं लगते. इंडिया से आई मेरी एक दोस्त की तो पहचान ही उसका सर से लेकर पांव तक लिपटा हुआ लंबा काला कोट बन गया है. कोई उसे चलता फिरता स्लीपिंग बैग कहता है तो कोई कूड़े वाली काली थैली यानी ट्रैश बैग. पर जो भी हो, वो यह कहती है कि उस कोट के बिना उसे कॉन्फिडेंस ही नहीं है इस दुनिया और इस मौसम से पंगा लेने का.
जिन लोगों ने मुझसे ज़्यादा समय यहां बिताया है, वह यही कहते रहते हैं कि इस बार तो मौसम बहुत बेहतर है. पिछले बरस तो अप्रैल तक बहुत तेज़ बर्फ़बारी हुई थी. 'ये तो कुछ भी नहीं', ऐसे जैसे कोई वैध अतिश्योक्ति.
मौसम भी बड़ा राजनैतिक हो चला है. समय-समय पर धोखा देता रहता है. और मौसम से जूझते-जूझते इंसान-पहलवान, सब ही, भगवान न सही, भगवान जैसा कुछ औना पौना मान लेते हैं. इस पर बहस भी बड़ी रहती है. अमरीका के आगामी राष्ट्रपति चुनावों के लिए मानो मौसम खुद ही एक कैंडिडेट हो. पर ऐसा दावेदार जिसकी ज़मानत ज़ब्त होने का सबको पूरा विश्वास है. जैसेकि रिपब्लिकन पार्टी के दावेदार ट्रम्प ने तो पहले ही जलवायु परिवर्तन को मिथ्या करार दे डाला. यह कहकर कि यह विज्ञान ही नहीं है. और है तो सिर्फ एक ढकोसला.
डेमोक्रैट पार्टी के प्रमुख दावेदार, बर्नी सैंडर्स और हिलरी क्लिंटन को जलवायु परिवर्तन का सच स्वीकार है. और यह भी स्वीकार है कि इस विषय में कुछ करना चाहिए. जैसे कि रिसाइकिल हो सके ऐसी एनर्जी में इनवेस्टमेंट. सैंडर्स और क्लिंटन के बीच इस विषय पर फर्क भी हैं. पर एक समानता जो उन्हें ट्रम्प से अलग करती है वह है जलवायु परिवर्तन की तथ्यता में विश्वास. पर अचम्भा इस बात का है कि यह बहस का विषय बन ही नहीं पाया है. अगर औसतन अखबारों और खबरों का विश्लेषण करें तो इसको लेकर लोग बहुत चिंतित प्रतीत होते हैं. इतनी कि ऐसा लगता है कि चर्चों को भगवान छोड़ मौसमी परिवर्तन के बारे में आयोजन करना चाहिए. पर यह बदलाव न तो कैलेंडर नाप पा रहे हैं और न ही आगामी चुनाव से आकांक्षाएं.
मैं खुद भी कई कैलेंडरों के बीच गुमी रहती हूं. बचपन से दादी-नानी ने ज़िद कर दो जन्मदिन मनाने शुरू किए. एक तो 'तिथि' वाला (हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से). इसमें ज़बरदस्ती भगवान के सामने हाथ जोड़ कर आशीर्वाद मांगना होता है. दूसरा उससे भी ज़्यादा ज़बरदस्ती का. केक के सामने हाथ में छुरी पकड़ाकर मोमबत्ती फूंक कर विश मांगने वाला. दो कैलेण्डर तक तो ठीक था. पिछले कुछ बरस जब कुमाऊं के पहाड़ों में बिताए तो परचून की दुकान पर बैठे अग्निहोत्री जी ने छुट्टे के साथ-साथ एक पहाड़ी पंचांग भी थमा दिया. कहा कि इसमें सब कुछ है. किस समय कितनी बारिश होगी और किस समय कितनी आंधी, यह भी बता डालेगा. आर-पार दिखने वाले कागज़ पर मोटी और कुछ फैली हुई लाल स्याही वाले उस पंचांग को पढ़ने और समझने में मुझे तो बहुत दिक्कत हुई. पर अग्निहोत्री जी के ललाट पर चमकते हुए विश्वास को मैंने आश्वासन के साथ मेज़पोश के नीचे सलीके से दबा दिया.
कुछ दिन पहले सुबह के वक़्त डिपार्टमेंट की तरफ जा रही थी. बर्फ की बारिश के बीच. अनमनाते हुए. तभी पीले फूलों से वास्ता हुआ. दुनिया के इस हिस्से में बसंत यानी 'स्प्रिंग' का आगमन करार कर दिया गया है. और बसंत में बर्फ का अटपटा लगना अटपटा तो नहीं ही है. कंप्यूटर पर आंखें गड़ा-गड़ा के जैसे कंधे शरीर की सतह से थोड़ा हट के नीचे लटक जाते हैं. कुछ वैसे ही ये फूल भी लटक गए थे. अग्निहोत्री जी के पंचांग की याद आ गई. क्या पता उसमें लिखा हो कि फूल कितना और झुकेंगे? टूट जाने से पहले?
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चैत के फूल.

बर्फ से घिरे और झुके हुए पीले फूलों को देख कर अपने आप ही आंखें आस पास के रंगों को आंकने लगीं. बर्फ की सफेदी अजब ही होती है. गिरते समय जिसे भी छूती है, पेड़, मकान, इंसान. सबको अलौकिक कर देती है. और पिघलते-पिघलते मौलिक भी. और आगामी अमरीकी चुनाव के पूर्व डेमोक्रैट और रिपब्लिकन पार्टियों के बीच बहस न तो अलौकिक है और न ही मौलिक. इस चुनाव को तो वैसे भी डॉनल्ड ट्रम्प की मौखिक अद्वितिया ने घेर के रख लिया है. न केवल अपनी पार्टी यानि रिपब्लिकन के लोग चौकन्ने हैं. बल्कि डेमोक्रैट दावेदार खासकर बर्नी सैंडर्स और हिलरी क्लिंटन लगातार ट्रंप का एजेंडा भांपने और अपना रुख तय करने में लगे हैं. ताकि वह इस बयानवीर से एक कदम आगे रह सकें.
ट्रम्प के अपने खेमे में ज्यादा हलचल नहीं है. बस टैड क्रूज के भरोसे ही एक आखिरी विरोधी मोर्चा कायम किया जा रहा है. रिपब्लिकन पार्टी के बाकी प्रतिनिधियों ने अपनी दावेदारी वापस ले ली है. और पार्टियों की यह लाचारी किस पर कितनी भारी पड़ेगी, इसे भांपने में अभी थोड़ा समय है. फूलों, चुनावों और अलौकिकता के बारे में सोचते सोचते मेरे दिमाग में एक पोस्टर की छवि कौंध पड़ी.
इसमें बहुत कुछ समझाने के लायक है ही नहीं. अमरीकी फ्लैग के रंगों में बने कमल के फूल पर ट्रम्प विराजमान हैं. टाई लगाकर. और उन्हीं रंगों में कमल पर ॐ भी छपा हुआ है. Hindus for Trump नामक इस ग्रुप ने सामूहिक रूप से ट्रम्प को अपना प्रतिनिधि घोषित कर दिया है. जनवरी 2016 में Indian Americans for Trump नामक Political Action Committee (PAC) बनी. यह ट्रम्प के समर्थन में चंदा इकठ्ठा कर रही है. इसके अलावा कमेटी अमेरिकी भारतीयों, ख़ासकर कि स्वयं को हिन्दू मानने वाले लोगों के बीच ज़ोर शोर से प्रचार भी शुरू कर चुकी है. ये पोस्टर भी उन्हीं का है.
ट्रम्प कभी भी ऐसा कुछ भी नहीं कहते जो विवादास्पद न हो. वह मुंह खोलते ही इसलिए हैं ताकि विवाद हो. any press is good press को उन्होंने दिल से लगा कर रख लिया है. ऐसी भतेर बयानबाज़ी के बीच उन्होंने कई बार यह भी कह डाला है कि अमरीका और मैक्सिको के बीच वह एक दीवार खड़ी करा देंगे. ताकि मैक्सिको के लोग अवैध रूप से अंदर बाहर न कर सके. या फिर यह बयान कि औरतों का सुन्दर दिखना उनकी कामयाबी के लिए बहुत ज़रूरी है. ट्रंप उवाच की यह फेहरिस्त काफी लंबी है.
Hindus for Trump को कमल पर विराजमान ट्रम्प पर यकीन है. यकीन कि ट्रंप सिर्फ अमरीका की समस्याओं का समाधान ही नहीं करेंगे. वह भारत की विदेश नीति, खासकर कि अमरीकातरफी नीति को संवार भी सकते हैं. इस कमेंटी में ज़्यादातर डॉक्टर और बिज़नेस करने वाले अमरीकी-भारतीय हैं. इनमें अमरीका की सबसे ज़्यादा शिक्षित, सफल और अमीर जनता भी है. राजनैतिक सर्वे बताते हैं कि भले ही 2014 में ज़्यादातर अमरीकी-भारतीयों ने डेमोक्रैट पार्टी के लिए अपना समर्थन जताया था (47 %) पर ये स्थिति तेज़ी से बदलती दिखाई पड़ती है. पलड़ा रिपब्लिकन्स की तरफ झुक रहा है. उनके पिछले प्रेसिडेंट बुश के शासन काल में इण्डो-अमरीकी न्यूक्लियर डील हुई थी. और अब रिपब्लिकन फ्रंट रनर ट्रम्प हैं, जिनकी बिज़नेसमैन छवि है. उनमें भरोसा जताते हुए, इस ग्रुप का मानना है कि बदलते भारत के लिए, निवेश के लिए और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि के हित के लिए ट्रम्प सफल साबित होंगे.
मुझे लगने लगा है कि शायद कमल पर विराजमान ट्रम्प ने ही अपनी शक्ति से बर्फ में इन फूलों को बचा के रखा हुआ है. और यह वाक देवता ही कुछ अमरीकी-भारतीयों की आवाज़ में गूंजेगा. बर्फ की सफेदी मेरी आंखों के सामने चमकने लगी. मैंने मुड़ के एक और बार उन फूलों को देखा और फिर बढ़ चली.
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