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द डेनिश गर्ल: 4 सर्जरी करवाईं, ताकि मर्दाने बदन से मुक्ति मिले

सिनेमा मॉन्क पार्ट 2: द डेनिश गर्ल और एक्सपेरिमेंटर पर बात करता औघड़ साधु

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29 फ़रवरी 2016 (अपडेटेड: 27 अप्रैल 2026, 04:09 PM IST)
the danish girl review gajendra singh bhati cinema monk series
द डेनिश गर्ल का केंद्रीय पात्र.
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सिनेमा मॉन्क - दी लल्लनटॉप की नई सीरीज. जिसमें एक जवान साधुनुमा आदमी बात कर रहा है. आपसे. फिलहाल हॉलीवुड सिनेमा पर. वह साधु है क्योंकि उसे अपनी नाम पहचान या ऑस्कर के शोर से कोई मतलब नहीं. उसकी बस एक ही हवस है. भक्ति की तरह. फिल्में.

पहली किस्त में उसने बताया कि अवॉर्ड तो बस एक फरेब भर हैं. जिसके चलते हम कई को जानते हैं, तो कई हारकर पीछे छूट जाते हैं. भले ही वह और भी हकदार हों. इसी किस्त में बीस्ट्स ऑफ नो नेशन फिल्म का जिक्र किया गया.

और अब ये दूसरी किस्त. दो फिल्में. द डैनिश गर्ल और एक्सपेरिमेंटर. हर कहीं लियोनार्डो और द रेवेनेंट का हल्ला है. मगर कुछ सलीके के लोग ये कहते हैं कि अगर एक्टिंग भर ही पैमाना होती. कोई कवित्तपूर्ण न्याय करने का दबाव न होता. तो बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड द डैनिश गर्ल के लिए एडी रेडमेइन को मिलता.

बहरहाल. अब ये हैं और आप...


2. Experimenter

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हम सब क्रूर हैं.

 “सभ्य मानव आखिर कैसे विनाशकारी और अमानवीय कृत्यों में हिस्सा ले लेते हैं?  कैसे नरसंहार बेहद व्यवस्थित और कुशल तरीके से अंजाम दिया गया?  और इन हत्याओं के जिम्मेदार लोग अपने आप के साथ जी कैसे पाते हैं?”

- स्टैनली मिलग्रम, अमेरिकी सोशल साइकोलॉजिस्ट जिन पर ये फिल्म आधारित है 

सन् 1933 में ब्राँक्स, न्यू यॉर्क में स्टैनली मिलग्रम का जन्म हुआ. मां हंगरी से थीं, पिता रोमानिया से. दोनों यहूदी थे. अप्रवासी थे. फिल्म में मिलग्रम के किरदार में पीटर सारगार्द नरेट करते हैं, "ये सिर्फ किस्मत की बात थी कि मेरे माता पिता अपने बच्चों के साथ अमेरिका आ पाए और यहां न्यू यॉर्क में अपना परिवार खड़ा कर पाए. वे विनाशकारी शिविरों में नाज़ियों के हाथों क़त्ल भी किए जा सकते थे जैसे कि पूर्वी यूरोप में लाखों दूसरे लोग कर दिए गए. असल में यही बात मेरे Obedience Experiments के पीछे है. इससे जुड़ी जो बातें मुझे सताती थीं, वे ही इसकी वजह बनीं.’ अपने कॉन्सेप्ट के स्तर पर "एक्सपेरिमेंटर’ एक अभूतपूर्व फिल्म है. सोशल साइकोलॉजी के क्षेत्र की इतनी शैक्षणिक विषय-वस्तु को निर्देशक माइकल एलमरेडा ने चुना और जब आप देखते हैं तो पाते हैं कि हमारी रोज़ की जिंदगी और समाज में बार-बार होने वाली त्रासदियों को दूर करने और आत्मावलोकन करने के लिहाज से ये वीडियो कितना महत्वपूर्ण है. 

हमारे मुल्क की ही लें तो 2016 तक आते-आते मिलग्रम की किताब Obedience to Authority: An Experimental View अत्यधिक प्रासंगिक हो जाती है. येल यूनिवर्सिटी में 1960 के बाद प्रोफेसर रहते हुए मिलग्रम ने इंसानों के आज्ञा पालन व्यवहार पर प्रयोग किए थे. जिस पर ये किताब आधारित है. फिल्म में भी हम देखते हैं कि दो सामान्य लोगों में से एक को teacher और दूसरे को learner बना दिया जाता है. दोनों को अलग-अलग कमरों में बैठा दिया जाता है. अब टीचर को एक सूची में से सवाल और विकल्प सीखने वाले व्यक्ति को माइक्रोफोन से देना है और हर गलत जवाब पर उसे बिजली का झटका देना है. हर गलत सवाल के साथ बिजली का स्तर बढ़ता जाना है जो 450 वॉल्ट तक जाता है. ये देखना इतना हैरान करने वाला होता है कि सिर्फ निर्देश दे दिए जाने के बाद तकरीबन सभी टीचर, लर्नर को 450 वॉट तक के झटके देने को तैयार हो जाते हैं. उनके जेहन में ये होता है कि गलत जवाब पर वो भोगने का अधिकारी है. दूसरे कमरे से लर्नर के कराहने की आवाज आती है तो भी ठिठकने के अलावा टीचर कुछ नहीं करता. वो यंत्रणा देता जाता है. इस प्रयोग से एक तथ्य ये भी निकलता है कि कैसे इतने प्रयोगों में एक भी टीचर ने कभी जाकर नहीं देखा कि दूसरे कमरे में लर्नर की हालत कैसी है. 

ये फिल्म है. निर्देशन, अभिनय, वस्त्र सज्जा, मेकअप, संगीत, एडिटिंग, सेट्स और अनेक अन्य प्रकार के कला विभागों से मिलकर बनती है. इसका जादू ऐसा है कि इतनी एकेडमिक चीज हमें बांध देती है. जबकि फिल्म में पारंपरिक एंटरटेनमेंट वैल्यू कुछ नहीं है. "एक्सपेरिमेंटर’ की अहमियत आज अत्यधिक है. आज समझ सकते हैं कि क्यों ज्यादातर मीडियाकर्मी जो 90 फीसदी से ज्यादा हो सकते हैं जो अपने रोजगार प्रदाताओं के गलत, समाज को खराब करने वाले, सांप्रयादिक, कॉरपोरेट स्वार्थ को आगे बढ़ाने वाले निर्देशों की पालना करते जाते हैं. बेस्ट ऑफ द बेस्ट फोटो लाने, खबर लाने, कोट लाने, रोचक एंगल लाने की आज्ञाएं दी जाती हैं और वे उन्हें पूरी करने के लिए कुछ भी करेंगे. संवेदना और मानवीयता जैसे सबसे ऊंचे मूल्य उन्हें रोक नहीं पाते. 

जैसे मिलग्रम का एक एक्सपेरिमेंट ये भी होता है जिसमें उनके लोग सड़क किनारे और सार्वजनिक जगहों पर खड़े हो जाते हैं और आसमान में एक दिशा में ताकने लगते हैं. लगातार. वहां होता कुछ नहीं है. जैसा एक हिंदी फिल्म ने शक्ति कपूर के पात्र ने किया था. नतीजा ये होता है कि लोग वहां खड़े होने लगते हैं और आसमान के उसी हिस्से में देखने लगते हैं. कई देर तक. समाज में हम सदियों से ऐसा करते आ रहे हैं और इसीलिए भीड़तंत्र में से या हमारी अन्य व्यावहारिक कमियों को दूर नहीं कर पा रहे. किसी ने कहीं भगवान होने का संकेत दे दिया तो हम हाथ जोड़े उसी ओर खड़े हैं. रजत कपूर की "आंखों देखी’ में संजय मिश्रा का पात्र चौराहे पर तख्ती लेकर खड़ा होता है जिस पर लिखा होता है, "सबकुछ यहीं है, आंखें खोलकर देखो.’ लेकिन हम देख वहीं रहे हैं जहां किसी ने बता दिया. हम सामूहिक गुलामी के शिकार हैं और "एक्सपेरिमेंटर’ हमें आजाद करने की कोशिश करती है. 


3. The Danish Girl 

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स्त्रैण.

“पिछली रात मैंने सबसे खूबसूरत सपना देखा.  मैंने सपना देखा कि मैं शिशु हूं. अपनी मां की गोद में.  उन्होंने मेरी और देखा.. और मुझे पुकारा.. लिली.”

- आइना वेनर/लिली, मृत्यु से पहले उनके आखिरी लफ्ज़ 

डेनमार्क के मशहूर पेंटर आइना वेनर 1882 में पैदा तो पुरुष के शरीर में हुए लेकिन आत्मा एक कोमल, दयालु स्त्री की थी. अपने दूसरे और सच्चे स्वरूप में आना उनके लिए जीवन का सबसे बड़ा सपना था. वे बाद में लिली बन गए. वे ज्ञात रूप से दुनिया के पहले पुरुष हैं जो सेक्स चेंज सर्जरी से गुजरे हैं. चौथा ऑपरेशन गर्भाशय लगाने और योनि निर्माण का था. मृत्यु का पूरा खतरा था लेकिन वे जीना चाहते थे तो सिर्फ लिली बनकर या कतई नहीं. वे बाद में नहीं बच पाए. इस अद्भुत, भावों की लहर भरी कहानी का निर्देशन बेहद संवेदनशील टॉम हूपर ने किया है. उससे पहले "द किंग्स स्पीच’ में उन्होंने अपना ये पक्ष दिखाया था. फिर विक्टर ह्यूगो की अनुपम और क्लासिक फ्रेंच कृति "ल मिजराब्ल’ (Les Misérables, 1862) पर उन्होंने 2012 में फीचर फिल्म बनाई. इसके केंद्रीय पात्र भी हाशिये पर ठहरे लोग हैं. उन्होंने "द डेनिश गर्ल’ जैसी कम कमर्शियल गुणवत्ता वाली कहानी चुनी और इसे 2015 की शीर्ष फिल्म भी माना जा सकता है. अपने सामाजिक मूल्यों और सिनेमाई शास्त्र के कारण. 

एडी रेडमेइन ने लिली की भूमिका जितनी भावप्रवणता के साथ की है, वे निर्विवाद रूप से इस बार के ऑस्कर में भी बेस्ट एक्टर का पुरस्कार पाने के अधिकारी हैं. लिली के स्वरूप में एडी अवाक करते जाते हैं. इतना आला दर्जे का अभिनय. शब्दों से उनके भावों को बांध पाना संभव नहीं है. मानव अधिकारों के क्षेत्र में लिली की कहानी ऐतिहासिक शुरुआत थी.  LGBT अधिकारों को बिना पूर्वाग्रहों के हम लिली की बहादुर कोशिश के 90 साल बाद इतने आधुनिक दौर में भी नहीं देख पा रहे, मान पा रहे, स्वीकार पा रहे. कितनी बड़ी विडंबना है. हम पुरुष के शरीर में कैद स्त्री को रोग मानते हैं. लिली के वक्त भी यही हुआ. फिल्म में एडी द्वारा निभाया पात्र चिकित्सकीय मदद लेने जाता है और 99 फीसदी उसे पागल करार देते हैं. सबसे पहला तो उन्हें बिजली के झटके देता है ताकि ये भीतर उग आई "बुराई’ चली जाए. 

लिली और उन जैसे लाखों-करोड़ों साथी मानव उस प्रेम का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके आगे दुनिया में उनके लिए कुछ महत्वपूर्ण नहीं. हम पैसा, शरीर, कई समीकरण देखकर चलते हैं. उन्हें ये सब नहीं चाहिए. फिल्म में लिली को देखें. वो हर दुख में, अवसाद में, मरणासन्न स्थितियों में एक दिव्य मुस्कान चेहरे पर रखती हैं. इतनी करुणा, गर्वीले स्ट्रेट मानव सात जन्मों में भी न पा सकें. इतनी करुणा और दया भरी हस्ती को समाज ने जहरीली प्रतिक्रियाएं ही दीं. आइना की पत्नी और पेंटर गेर्डा वेनर की भूमिका में एलिसिया विकान्डर बेहद अच्छी हैं. उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का ऑस्कर मिलेगा. "स्टीव जॉब्स’ में केट विंस्लेट के किरदार के मुकाबले एलिसिया का पात्र ज्यादा जटिल और चुनौतीपूर्ण रहा है. 

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वीडियो: फिल्म रिव्यू- एनिमल

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