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नोट बंदी के दौर में इस तरह का सिस्टम आता है काम में

हिंदुस्तान में जुगाड़ कहते हैं इसको.

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ऋषभ
15 नवंबर 2016 (Updated: 15 नवंबर 2016, 10:58 AM IST)
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को एक धरातल पर खड़ा कर दिया है. सारे के सारे लोग पुराने मतभेद भुलाकर नये मतभेद तलाश रहे हैं बैंकों के बाहर लाइनों में. ये जुझारू मॉडर्न लोग हैं. पैसा निकाल के ही मानेंगे. जो नहीं लग रहे, उन्होंने अपने लिए रास्ता निकाल लिया है. वो रास्ता सीधा वैदिक सभ्यता से आता है. जब कहीं किसी नोट पर गांधीजी की फोटो नहीं लगती थी. मेट्रो के कार्ड नहीं थे. जब काला धन नहीं होता था. मेहनत की कमाई भी नहीं होती थी. मेहनत की रोटी होती थी. क्योंकि धन का प्रचलन नहीं था. बार्टर सिस्टम था. जो मेरे घर है, ले जा. जो तेरे घर है, दे जा. ल्यौ और द्यौ का सिस्टम है ये.
अभी चारों ओर से खबरें आ रही हैं. कि एक किलो मछली के बदले तीन किलो गोभी मिल रही है. इसी तरह आटा और चावल भी मिलने लगेगा. दो दिन पहले नमक भी मिला था बुद्धि के बदले.
तो सदियों पहले कोई धान उगाता, कोई गेहूं. आपस में ही तय कर लेते. किसके बदले कितना क्या देना है. काम भर का हो जाता था. वो तो ये पैसा जब आया, तो टेंशन होने लगी. लगा कि ये जमा कर लेंगे तो बड़ा काम आएगा. छुपा देंगे तो बाद में और ज्यादा महंगा बेचेंगे. बाद में जब मुद्रा छपने लगी तो बार्टर सिस्टम का ही नाम बदल के जुगाड़ कर दिया गया. हम लोग तो कहते ही हैं कि भारत में जुगाड़ टेक्नॉल्जी काम करती है. देश-दुनिया में कुछ बहुत बड़े बार्टर सिस्टम के नमूने हुए हैं. सदुपयोग भी हुआ है, दुरुपयोग भी. आइए देखते हैं क्या-क्या हुआ है-1. बार्टर सिस्टम का सबसे बड़ा उपयोग किया था कृष्ण भगवान ने. सुदामा के तीन मुट्ठी चावल के बदले तीनों ब्रह्मांड दे डाले थे. इस चीज ने बड़ी टेंशन दी थी सबको. वो तो सुदामा की इच्छाएं ज्यादा नहीं थीं तो उन्होंने ली नहीं. सोचिए कि अगर ले लेते तो क्या होता. 2. फिर बार्टर सिस्टम का ही उपयोग कर भगवान विष्णु ने राजा बलि को ठगा था. वामन बनकर गये. कहा कि तीन फलांग मारूंगा. बस उतनी ही जमीन चाहिेए. तीन फलांग के बदले तीनों ब्रह्मांड नाप ले गये. बाद में बलि को एक दे दिया. बलि ने फिर तो कोई इस तरीके का मोल-भाव किया ही नहीं होगा. 3. अगर आपको याद होगा तो सुभाष चंद्र बोस ने नारा लगाया था कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा. ये बड़ा पवित्र बार्टर सिस्टम था. बोस ने किसी की देशभक्ति को पैसों और पोस्ट से नहीं तौला था. बस सीधा-सीधा हिसाब लगाया था. अब सोचिए कि अगर कहते कि मैं तुमको पैसे दूंगा, तो कैसा लगता. तो साहब ये बार्टर सिस्टम मुद्रा की तरह नहीं है. 4. फिर हमने एक गाना सुना था. दिल के बदले सनम दर्द-ए-दिल ले चुके. दे चुके दे चुके तुम्हें दिल ये दिल दे चुके. ये बड़ा ही घाटे वाला सौदा था. दिल के बदले दर्द-ए-दिल. मतलब इसको भी आप पैसों में तो नहीं ही नाप सकते हैं. अगर बार्टर सिस्टम ना होता तो शायद कोई भी आशिक ये काम नहीं कर पाता. तो किसी को ना तो प्यार होता, ना ही किसी का दिल टूटता. कैसी होती ये दुनिया. एकदम मटीरियलस्टिक. सिर्फ पैसा. सही कहते हैं पैसों से हर चीज नहीं खरीद सकते. बार्टर सिस्टम में खरीद सकते हैं. 5. तो बार्टर सिस्टम ही है कालेधन की लड़ाई में सहारा. द्वितीय विश्व-युद्ध में जब सेनायें फील्ड में लड़ रही थीं तब कई देशों में पैसे की कमी हो गई थी. उस वक्त लोग एक-दूसरे से सामान ले-देकर ही काम चला रहे थे. अंडे के बदले दूध मिल जाता. दूध के बदले दारू. पर वो लड़ाई का दौर था. अभी लोगों को ये आइडिया है कि कुछ दिन की बात है तो हम क्यों अपना सामान इधर-उधर करें. तो इसीलिए खुल के बार्टर सिस्टम नहीं ला पाता. नहीं तो लोग कर ही लेते कि आ जा मैं तेरी पीठ खुजा देता हूं. तू मेरी. 6. नेताओं ने तो हमेशा ही बार्टर सिस्टम को जिंदा रखा है. एक नेता सत्ता में आता है तो कहता है कि मैं विपक्ष को जेल में डाल दूंगा. बाद में दूसरा नेता भी यही कहता है. दोनों आरोप-प्रत्यारोप के बार्टर सिस्टम से खुद को जिंदा रखते हैं. 7. अभी बॉर्डर पर भारत-पाकिस्तान के बीच भी यही सिस्टम चल रहा है. कोई हिसाब नहीं है. वो हमारी तरफ के गांव उजाड़ रहे हैं. हम उनकी तरफ के गांव उजाड़ रहे हैं. कोई तुलना नहीं होती कि किसका कितना गया. बस जा रहा है. मन लगा हुआ है. कोई पैसे की बात नहीं. एकदम बार्टर सिस्टम.
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