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एग्जाम पास करके सीधे जज बनने पर रोक क्यों लगवाना चाहती है बार काउंसिल?

19 साल पहले जो सिस्टम बदला, उसे बहाल करवाना चाहती है BCI, स्टूडेंट्स तैयार नहीं

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5 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 4 जनवरी 2021, 02:45 AM IST)
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बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अब सीधे एग्जाम के जरिए जज बनने के सिस्टम पर रोक लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर ली है. उनका कहना है कि जज का एग्जाम देने से पहले 3 साल लॉ प्रैक्टिस की बाध्यता होनी चाहिए.
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अब लॉ की डिग्री लेने के बाद सीधे ज्यूडीशियल सर्विस में जाने का रास्ता बंद करने की तैयारी हो रही है. हालांकि इसके लिए भी अपने तर्क दिए जा रहे हैं. यह तैयारी भारत में वकीलों की सबसे बड़ी संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI कर रही है.
BCI ने बाकायदा सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर गुहार लगाने की तैयारी कर ली है. 2 जनवरी को इस बात की जानकारी BCI ने अपनी प्रेस रिलीज के जरिए दी. उनका कहना साफ है कि लोअर ज्यूडीशियरी में लॉ करके सीधे एग्जाम के जरिए जजों को लाना बंद किया जाए. लॉ की डिग्री लेने वाले हर शख्स के लिए कम से कम 3 साल तक कहीं भी वकील के तौर पर प्रैक्टिस करने को जरूरी बनाया जाए. उसके बाद ही उस वकील को जज का एग्जाम देने के काबिल समझा जाए. ऐसा क्यों करना चाहती है BCI? असल में BCI मानती है कि कॉलेज से निकलकर सीधे जज बनने से उनके भीतर वकीलों के प्रति 'विनम्रता' और 'व्यावहारिता' नहीं दिखती, जो एक जज में होनी चाहिए. इसके अलावा BCI मानती है कि
# ज्यादातर वो लोग इस सर्विस में आ रहे हैं, जिनके भीतर इस प्रोफेशन की व्यावहारिक समझ नहीं है. इसकी वजह से केस निपटाने में देरी होती है. असर ये कि लोअर कोर्ट्स में केसेज की संख्या बढ़ती जा रही है.
# सीधे एग्जाम पास करके आए जजों में वकीलों और याचिकाकर्ताओं के प्रति वह भावनाएं नहीं होतीं, जो किसी मैटर को फौरन निपटाने के लिए जरूरी होती हैं.
इस तर्क के जरिए BCI का कहना है कि आंध्र प्रदेश की तरह ही 3 साल की कोर्ट प्रैक्टिस को हर उस शख्स के लिए जरूरी बना दिया जाए, जो जूनियर डिवीजन जज बनने की हसरत रखता हो.
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बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपनी प्रेस रिलीज में दावा किया है कि सीधे चुनकर आए जजों को न्यायिक प्रक्रिया की व्यावहारिक समझ नहीं होती.
अभी कैसे होता है जूनियर जज का एग्जाम? फिलहाल कोई भी लॉ की डिग्री लेने के बाद सीधे पीसीएस-जे यानी प्रॉविंसियल सिविल सर्विसेज ज्यूडीशियल का एग्जाम देकर जूनियर डिवीजन जज बन सकता है. जूनियर डिवीजन जज न्यायपालिका की सबसे निचली सीढ़ी है. इन्हें मुंसिफ मजिस्ट्रेट भी कहा जाता है. यह कम वैल्यू के केसेज सुनते हैं, और इन्हें कम वक्त की सजा देने या कम पेनाल्टी लगाने का ही अधिकार होता है. जैसे-जैसे वह अनुभव पाते हैं, आगे के पदों पर प्रमोट होकर सीनियर डिवीजन जज बनते हैं. सीधे एंट्री के लिए ज्यूडीशियल एग्जाम देने की आयु सीमा 22 साल से 35 साल तक की होती है. सलेक्शन के लिए स्टूडेंट्स को प्री, मेंस और इंटरव्यू पास करने होते हैं.
यह व्यवस्था चूंकि हर राज्य अपने हिसाब से बनाता है, तो इसमें कुछ अंतर भी हो सकता है. कहीं पर उम्र को लेकर या एग्जाम के तरीके में बदलाव मुमकिन है. ऐसा ही एक बदलाव आंध्र प्रदेश ने हाल में किया है. उसने अपने राज्य में ज्यूडीशियल सर्विस में निचले स्तर पर एंट्री के लिए एग्जाम में बैठने की एक और शर्त जोड़ दी है. इसके अनुसार वही आवेदक एग्जाम में बैठ सकता है, जिसने पहले किसी भी कोर्ट में एक वकील के तौर पर 3 साल तक प्रैक्टिस की हो. साल 2002 से पहले यह व्यवस्था पूरे भारत में लागू थी. लेकिन 2002 में यह व्यवस्था बदल दी गई, और लॉ करके सीधे एग्जाम देने की सुविधा दी गई. क्यों बदला था ये सिस्टम? भारत में ज्यूडीशियल सिस्टम में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में एक कमीशन बनाया. इस कमीशन का नाम था द शेट्टी कमीशन. इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ज जस्टिस जगन्नाथ शेट्टी थे. इस कमीशन ने 2002 में न्यायिक सेवा को लेकर कई महत्वपूर्ण रिकमेंडेशन दीं. इनमें ज्यूडीशियरी से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवा शर्तों और वेतन से जुड़ी बातें भी शामिल थीं. इस कमीशन ने कहा कि जूनियर डिवीजन जज को सीधे एग्जाम से चुना जाना चाहिए. इसे सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया. इससे पहले जूनियर डिवीजन जज का एग्जाम देने के लिए किसी कोर्ट में 3 साल तक प्रैक्टिस करने की अनिवार्यता थी. इसे खत्म कर दिया गया. इसके बाद ज्यूडीशियल सर्विस में तेजी से युवाओं का प्रवेश हुआ. एक सीनियर वकील ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि असल में जूनियर लेवल पर यंग जज अक्सर अपने से सीनियर वकीलों को कोर्ट में चैलेंज करते हैं. यह उन्हें अच्छा नहीं लगता. इस मांग के पीछे यह भी एक कारण है. क्या कहते हैं वकील? हमने यूपी बार काउंसिल के उपाध्यक्ष अंकज मिश्रा से बात की. उनका कहना है-
हम बार काउंसिल ऑफ इंडिया की मांग से पूरी तरह से सहमत हैं. पहले भी ऐसी ही व्यवस्था थी. उसे ही बहाल करना चाहिए. कम उम्र में और बिना अनुभव के कोर्ट पहुंचे जूनियर डिवीजन के जज कोर्ट के कामकाज को अच्छे से नहीं समझते. वह सिर्फ एक एग्जाम पास करने को ही अपनी योग्यता मान लेते हैं. कोर्ट में जब कोई वकील के तौर पर काम करता है, तब कानून की व्यावहारिक जरूरतों के साथ ही मुवक्किल की दिक्कतों को भी समझता है. ऐसे में 3 साल की प्रैक्टिस की बाध्यता के सिस्टम को बहाल करना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का कहना है-
मेरी समझ में भारत सरकार को इंडियन ज्यूडीशियल सर्विस की मांग को अब गंभीरता से लेना चाहिए. जब पूरा देश एक ही IPC और CRPC से चल रहा है तो हर राज्य को अपने हिसाब से ज्यूडीशियरी का सिस्टम बनाने की क्या जरूरत है? सरकार को चाहिए कि पूरे देश के लिए ज्यूडीशियल एग्जाम का एक सिस्टम बनाए. इससे सर्विस में आने वाले और वहां काम करने वाले दोनों ही तरह के लोगों को सहूलियत होगी.
Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का कहना है कि सरकार को अब पूरे देश में एक जैसी न्यायिक सेवा के बारे में सोचना चाहिए.
नए जज और लॉ स्टूडेंट्स क्या सोचते हैं? 2002 के बाद सीधे जूनियर डिवीजन जज बने एक जज अलग ही राय रखते हैं. नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने कई गंभीर आरोप भी लगाए. उनका कहना है कि
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI ) की यह मांग सामान्य परिवार के मेधावी छात्रों को इस प्रोफेशन में न आने देने की एक साजिश है. कोई भी मेधावी छात्र 3 साल तक क्यों इन्तज़ार करेगा? ऐसा हुआ तो वह या तो सिविल सर्विसेज की ओर रुख करेगा, या फ़िर मल्टीनेशनल कंपनी को जॉइन करेगा. शेट्टी कमीशन ने गहन अध्ययन और परीक्षण के बाद 3 साल की प्रैक्टिस की बाध्यता को खत्म किया था. BCI ने पिछ्ले 2 दशक में एक भी ऐसा काम नहीं किया है, जिससे लॉ कॉलेज की हालत सुधरती. गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह लॉ कॉलेज खोल दिए गए हैं. यहां तक कि लॉ के पाठ्यक्रम में भी कोई सुधार नहीं किया गया. पूरे साल न्यायालयों में चुनाव और सिर्फ हड़तालों को बढ़ावा देना ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया का मकसद रह गया है. ऊपर से यह एक नया शिगूफा है.
हैदराबाद लॉ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे अंकुश सक्सेना भी इसे निराशावादी कदम मानते हैं, वह कहते हैं-
हमें कोर्स में कोर्ट में बर्ताव, वकीलों के साथ पेश आने के तरीके और नियम-कायदे सब बताए जाते हैं. यह सब समझना हमारे पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा है. यह कहना कि हम व्यावहारिकता को नहीं समझते, पूरी तरह से गलत है. तीन साल में कोर्ट प्रैक्टिस ऐसा कुछ नहीं सिखा सकती, जो हमें काम करने में फर्राटा बना दे. हम क्यों किसी कोर्ट में अपना वक्त खराब करेंगे? किसी अच्छी लॉ फर्म या दूसरी सर्विस की तरफ न चले जाएंगे. यह तो जानबूझकर टैलेंट को धक्का देकर पीछे करने वाली बात है.
बहरहाल, मामला कोर्ट में है. अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि उसने 2002 में जिस बाध्यता को खत्म किया था, वह उसे बरकरार रखेगी या कोई नया सिस्टम बनाएगी.

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