9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर 1 नवंबर तक का बैनलगाया. तब से लेकर अब तक इस मामले पर खूब शोर-शराबा हो चुका. पटाखा व्यापारियों नेएक याचिका डाल कर कोर्ट से कहा कि व्यापारियों ने पटाखे खरीद लिए हैं इसलिए बैनहटाया जाए. कोर्ट ने इस दलील के बावजूद 'नो मीन्स नो' बोल दिया है पटाखों को.इस तमाम उठापटक का जो सबसे दुखद पहलू उभर कर सामने आया है वो ये कि मामलासांप्रदायिक हो गया. हिंदू धर्म ख़तरे में आ गया. लोगों ने Whatsapp, फेसबुक, ट्विटरपर बवाल काट दिया कि सिर्फ हिंदू त्योहार ही टार्गेट किए जा रहे हैं. यहां तक किजस्टिस ए के सिकरी की बेंच को भी अपनी व्यथा सुनानी पड़ी. कोर्ट ने कहा है, "कुछ लोगइस मामले को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे हम दुखी हैं. यह मामलाधर्म का नहीं है."सिर्फ पटाखे ही प्रदूषण नहीं फैलाते लेकिन सबसे बड़े कारकों में से एक हैं.दुख इस बात का नहीं है कि कोर्ट का एक लॉजिकल फैसला कंट्रोवर्सी की ज़द में आ गयाहै. दुख इस बात का है कि इस फैसले को धर्म पर हमला बतानेवालों में पढ़े-लिखे लोगोंकी संख्या ज़्यादा है. अचानक से इस मुल्क में लोगों के लिए धर्म सर्वोपरि हो गया है.हर चीज़ धर्म के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आ रही है. प्रदूषण जैसी विकराल समस्या सेनिपटने के लिए कोर्ट एक छोटा सा ही सही, लेकिन ज़रूरी कदम उठाता है. पर ख़तरे में आजाती है धार्मिक अस्मिता. कैसे भई? नहीं फूटेंगे पटाखे तो दीवाली खत्म हो जाएगी?क्या दिए जलाना मना हो गया है? मिठाई पर रोक लगा दी गई है? रोशनाई पर, घर की सजावटपर बैन है? छुट्टी कैंसिल कर दी है कोर्ट ने? लक्ष्मी पूजन की मनाही हो गई? भैयादूज नहीं मनेगा इस साल दिल्ली में? दीवाली, बारूद में आग लगाने का नाम कबसे हो गया?ऊपर लिखे तमाम सवालों का जवाब ना में ही है. तो फिर?दीवाली पर दिल्ली शहर में रहने का हौसला नहीं होता अब.हर साल दीवाली पर दिल्ली की हवा भयानक रूप से ज़हरीली हो जाती है. केंद्रीय प्रदूषणनियंत्रण बोर्ड की स्टडी ये कहती है कि दीवाली के अगले कुछ दिनों में प्रदूषण कास्तर ख़तरनाक मात्रा तक पहुंच जाता है. पिछले साल दीवाली के दिन PM10 की मात्रा आमदिनों की अपेक्षा तीन से सात गुना पाई गई. सल्फर डाई ऑक्साइड की मात्रा तीन से आठगुनी और नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड की मात्रा आम दिनों की अपेक्षा दो गुनी पाई गई.कोर्ट ने कहा है कि वो इस साल पटाखों पर बैन लगाकर ये देखना चाहते हैं कि कितनाफर्क पड़ा. क्या दिक्कत है इस प्रयोग से. हमारी बेहतरी के लिए ही तो है ये.इस आर्टिकल में लगी सारी तस्वीरें पिछले साल दीवाली की हैं. गौर से देखिएगा इन्हें.ये हवा, क्या हिंदू, क्या गैर-हिंदू सबके फेफड़ों में जाएगी. फेफड़ों को बचाने कीकवायद में धर्म कहां से आ घुसा?शरीर के लिए सबसे ज़्यादा ख़तरनाक वो तत्व होते हैं, जो सांस के साथ अंदर जाते हैं.हां, इस बहाने कुछ सवाल सामने आए हैं जिन पर वाकई गौर किया जाना चाहिए. जैसे पटाखोंपर बैन सिर्फ दीवाली के आसपास नहीं, सिर्फ दिल्ली में नहीं, हमेशा और हर जगह लगे.इसके अलावा प्रदूषण के और कारकों से भी इसी कड़ाई से निपटा जाए.पटाखों पर बैन, दीवाली पर बैन नहीं है. बहुत सिंपल सी बात है ये. समझने के लिएआलिम-फ़ाज़िल होना भी ज़रूरी नहीं. ऐसे में जब सुशिक्षित जनता भी ये कहती दिखती है कि,"आज तक तो नहीं चलाए पटाखे, लेकिन इस साल चलाऊंगा" तो अफ़सोस होता है. ये कैसी ज़िदहै, जो खुद का नुकसान करवाने पर आमादा करवाती है. धार्मिक अस्मिता का ये कैसातिलिस्म फैला दिया गया है हमारे चारों तरफ, जिसकी रक्षा के नाम पर हमें अपने बच्चोंकी सांसों में ज़हर जाने देने से भी गुरेज़ नहीं है?पटाखें, पैसा और पर्यावरण दोनों को नष्ट करते हैं.ज़हरीली हवा एक गंभीर समस्या है. इसकी रोकथाम के लिए उठाया गया हर छोटा-बड़ा कदमस्वागतयोग्य है. साफ हवा सबकी ज़रूरत है. कोई भी समस्या एक झटके में तो खत्म होने सेरही. बड़े से बड़े सफर की शुरुआत भी एक छोटे से कदम से ही होती है. अब एक ही झपट्टेमें तीनों लोक व्यापने वाला कदम तो विष्णु के वामन अवतार के ही बस की बात थी. जब तकवो धरती पर लौट नहीं आते, सब्र कल्लो यार. कुछ ना हो रहा धर्म को. पटाखों से बचेपैसे से थोड़ी ज़्यादा मिठाई खरीद लेना. हैप्पी दीवाली.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:पटाखे बैन होने पर जिन्हें बकरीद में कटते बकरे याद आते हैं, वो ये पढ़ लेंकहा जा रहा है वडनगर में स्टेशन ही नहीं था, तो मोदी ने चाय कहां बेची, जवाब यहांहैरोज मोबाइल नंबर को आधार से जोड़ने का फोन आता है, तो आप मुसीबत में पड़ सकते हैंवीडियो: किस वजह से आरुषि मर्डर केस में हाईकोर्ट ने तलवार दंपती को छोड़ा?