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राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दूरी बनाकर कांग्रेस को फायदा या नुकसान?

Congress ने Ayodhya Ram Mandir के प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दूरी क्यों बनाई? क्या पार्टी में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के नेताओं में संघर्ष चल रहा है? और अगर ऐसा है तो इस फैसले को किस 'गुट' की जीत मानी जाए?

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ram mandir inauguration invitation declined by congress
कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके शीर्ष नेता राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे. (तस्वीर साभार: इंडिया टुडे)
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रवि सुमन
11 जनवरी 2024 (Updated: 15 जनवरी 2024, 01:20 PM IST)
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आखिरकार इस बात से पर्दा उठ ही गया कि राम मंदिर (Ram Mandir) के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में कांग्रेस के शीर्ष नेता (Congress Leaders) शामिल होंगे या नहीं. समारोह के लिए कांग्रेस के नेताओं को आमंत्रण भेजा गया था. पहले तो पार्टी ने इस पर मौन साधे रखा. फिर 10 जनवरी को पार्टी का बयान आया. कहा गया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (mallikarjun kharge), वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी (Adhir Ranjan Chaudhary) इस समारोह में हिस्सा नहीं लेंगे. 

कांग्रेस ने न्योता ठुकराते वक्त सावधानी बरती. उन्होंने मुख्य रूप से दो बातों का जिक्र किया. पहला कि धर्म लोगों का निजी मामला है. दूसरा कि मंदिर अभी अधूरा है. पार्टी का मानना है कि अधूरे मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कर भाजपा लोकसभा चुनाव को साध रही है. पार्टी ने इस समारोह को भाजपा और RSS का इवेंट बताया है. भविष्य में कांग्रेस के लिए इस निर्णय के क्या फायदे या नुकसान हो सकते हैं?

वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल इस बारे में कहते हैं,

"इस समारोह में हिस्सा नहीं लेने से कांग्रेस को नुकसान ही नुकसान है. फायदा कुछ नहीं है. जिस कार्यक्रम से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी हो, उसमें शामिल नहीं होने का निर्णय नुकसान ही पहुंचाएगा. कांग्रेस का यह कदम जन भावना, धर्म और आस्था के विपरीत है."

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हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि हो सकता है कि कांग्रेस की सोच अपने बचे-खुचे वोटबैंक पर पकड़ बनाने की हो. उन्होंने इस बारे में भी बताया कि पार्टी को ये निर्णय क्यों लेना पड़ा? रावल कहते हैं,

“कांग्रेस पार्टी के भीतर उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत चल रहा है. पार्टी में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के नेताओं के बीच संघर्ष की स्थिति बनी हुई है. सारे महत्वपूर्ण पदों पर दक्षिण के नेता बैठे हुए हैं. इसलिए पार्टी ने इस तरह का फैसला लिया है. जिसका उनको नुकसान झेलना पड़ सकता है.”

उन्होंने सवाल उठाया कि 22 जनवरी को शीर्ष नेतृत्व का वहां नहीं जाना समझ आता है. लेकिन उसके बाद किसी दिन तो दर्शन किया जा सकता था.

कांग्रेस के भीतर उत्तर बनाम दक्षिण!

इंडिया टुडे ने वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का इस बारे में एक ओपिनियन आर्टिकल छापा है. उनका मानना है कि कांग्रेस के कई नेता चाहते थे कि सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी इस समारोह में शामिल हों. ये नेता मुख्य रूप से उत्तरी और पश्चिमी राज्यों से हैं. जबकि दक्षिणी राज्यों के कई नेताओं को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा गया. केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, रमेश चेन्निथला जैसे पार्टी नेताओं ने तर्क दिया कि राम मंदिर के कार्यक्रम में कांग्रेस की उपस्थिति से भाजपा को बढ़ावा मिलेगा.

जिस प्रेस नोट के जरिए कांग्रेस ने इस समारोह से दूरी बनाने की घोषणा की उसमें लिखा गया है कि भगवान राम को मानने वाले लाखों लोगों का सम्मान करते हुए और सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने ये निर्णय लिया है. नवंबर 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में अपना फैसला हिंदू पक्ष में सुनाया था. तब कांग्रेस ने इस फैसले का स्वागत किया था. ऐसे में क्या कांग्रेस ने अब राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा को वोटबैंक बढ़ाने की थोड़ी और आजादी दे दी है? एक सवाल ये भी है कि क्या कांग्रेस प्रेस नोट में लिखी हुई बातों को लोगों को पूरी तरह से समझाने में सफल हो पाएगी?

क्या भाजपा को फायदा होगा?

इस बारे में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा बताते हैं,

“पार्टी ने जो दो कारण बताए हैं वो कोई ठोस कारण नहीं है. ये बस बचने का बहाना है. भाजपा ने अगर इसे मुद्दा बनाया और अगर वो लोगों में इसे कांग्रेस के दंभ के तौर प्रचारित करने में सफल हो गई तो पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है.”

उन्होंने आगे कहा,

“हो सकता है कि पार्टी ने अपनी विचारधारा से प्रभावित होकर ऐसा निर्णय लिया हो. लेकिन अब सब कुछ निर्भर करता है, इस बात पर कि क्या कांग्रेस लोगों तक इस बारे में सही मैसेज पहुंचा पाती है या नहीं? जो फिलहाल होता हुआ नहीं दिख रहा. ऐसे में भाजपा को एक बड़ा हथियार मिल गया है.”

हालांकि, एक ऐसा संयोग भी बना जो कांग्रेस के पाले में जाते-जाते रह गया. मंदिर के अधूरे होने की बात पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का साथ. सोशल मीडिया पर शंकराचार्य का एक वीडियो वायरल हुआ. जिसमें वो कह रहे हैं कि मंदिर अभी पूरा बना नहीं है और प्रतिष्ठा की जा रही है. कोई ऐसी परिस्थिति नहीं है कि ऐसा अचानक करना पड़े. 

अब श्रृंगेरी मठ ने एक बयान जारी कर इस वीडियो से अपनी दूरी बना ली है. कहा गया है कि शंकराचार्य ने ऐसा कुछ नहीं कहा है. ये गलत प्रचार है.

ऐसे में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा इस मुद्दे को बड़े लेवल पर कांग्रेस के विरोध में भुनाएगी. जिसकी शुरूआत भी हो चुकी है. भाजपा ने INDIA गठबंधन के शीर्ष नेताओं की तस्वीरों वाली एक पोस्टर जारी करके उन्हें सनातन विरोधी बताया है. इस पोस्टर में सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन की भी तस्वीर लगी है.

राम मंदिर के मुद्दे पर कांग्रेस का रूख हमेशा से ऊहापोह से भरा रहा है. 1986 में जब बाबरी मस्जिद का ताला खोला गया तब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े पत्रकार मनोज सी जी की एक रिपोर्ट के अनुसार, तब राजीव गांधी के तत्कालीन सहयोगियों ने बाद में तर्क दिया था कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी. फिर तीन साल बाद उन्होंने ही विश्व हिंदु परिषद को विवादित स्थल पर शिलान्यास करने की अनुमति दी. 1991 में लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के घोषणापत्र में मंदिर का उल्लेख किया गया. कहा गया कि पार्टी बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किए बिना मंदिर के निर्माण के पक्ष में है. फिर एक साल बाद उन्हीं की सरकार में मस्जिद ढह गई. 

इनकार इस बात से भी नहीं किया जा सकता कि भाजपा हिंदुत्व की राजनीति करने में सफल रही है. ऐसे में कांग्रेस इस समारोह से दूरी बनाने का चाहे जो भी कारण बताए लेकिन सारा दारोमदार इस बात पर है कि वो जनता तक अपनी बात पहुंचा पाती है या नहीं.

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