नेहरू की ये किताब सबको 'जरूर पढ़ने' को कहते थे खामेनेई, कई भाषणों में किया जिक्र
Ayatollah Ali Khamenei भारत के पहले प्रधानमंत्री Jawaharalal Nehru के विचारों और खास तौर पर उनके लेखन से काफी प्रभावित थे. खामनेई नेहरू को एक ‘भरोसेमंद और जानकार’ लेखक मानते थे. उन्होंने नेहरू की किताब 'Glimpses of World History' की कई बार तारीफ की है.
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“आपको जवाहरलाल नेहरू की लिखी किताब 'ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' पढ़नी चाहिए. एक चैप्टर में नेहरू लिखते हैं कि भारत में जिस तरह की इंडस्ट्री और साइंस थी, वह यूरोपियन साइंस से बेहतर थी. खैर, नेहरू भरोसेमंद और जानकार दोनों थे.”
ईरान के मार दिए गए सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई ने कई बार अपने भाषणों और लेखों में भारतीय नेताओं का जिक्र किया है. ईरान का सुप्रीम लीडर बनने से पहले उन्होंने भारत की यात्रा भी की थी. दशकों बाद जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तेहरान पहुंचे थे तब खामेनेई ने अपनी भारत यात्रा को याद किया था. इस दौरान उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद की जमकर तारीफ की थी.
खामेनेई अब दुनिया में नहीं हैं. 1 मार्च 2026 को इजरायली और अमेरिका के संयुक्त हमले में उनके मौत की खबर आई है. भारत के संदर्भ में खामेनेई को याद किया जाए तो वह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विचारों और खासतौर पर उनके लेखन से काफी प्रभावित थे. खामनेई नेहरू को एक ‘भरोसेमंद और जानकार’ लेखक मानते थे. उन्होंने नेहरू की किताब 'ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' (विश्व इतिहास की झलक) की कई बार तारीफ की है.
अपने भाषणों में उन्होंने कहा कि इस किताब को पढ़ने से पहले उन्हें यह पता ही नहीं था कि औपनिवेशिक काल से पहले भारत ने इतनी तरक्की की थी. 2017 में दिए गए एक भाषण में खामेनेई ने कहा था,
“आपको नेहरू की 'ग्लिम्प्सेस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' देखनी चाहिए. इस किताब में वे बताते हैं कि जब अंग्रेज भारत में आए तो भारतीयों के पास इंडस्ट्री थी. उस समय के स्टैंडर्ड के हिसाब से एक एडवांस्ड इंडस्ट्री. भारत में उस समय के एडवांस्ड इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट थे. जब अंग्रेज भारत में आए तो उन्होंने इसे रोक दिया. उन्होंने भारत की घरेलू इंडस्ट्री को रोकने और उसे पीछे धकेलने के लिए ऐसा किया ताकि भारतीयों को अंग्रेजों की इम्पोर्टेड इंडस्ट्री और प्रोडक्ट की ज़रूरत पड़े. यह तरीका दूसरे देशों में भी अपनाया गया. ईरान में भी ऐसा ही हुआ.”
खामनेई नेहरू की दी गई इस व्याख्या से बहुत प्रभावित थे कि कैसे ब्रिटिश शासन ने भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था और सभ्यता को जानबूझकर नष्ट किया ताकि इंग्लैंड तरक्की कर सके. खामनेई ने कहा था,
“नेहरू अपने संस्मरणों में लिखते हैं कि अंग्रेजों के दबदबे से पहले भारत में उस समय के मुकाबले एक एडवांस्ड सभ्यता थी. यहां तक कि एक एडवांस्ड इंडस्ट्री और एडवांस्ड प्रोडक्ट भी थे. लेकिन, अंग्रेज आए. उस बड़े देश के मामले अपने हाथ में ले लिए और उसे पीछे धकेल दिया ताकि वे खुद तरक्की कर सकें. इंग्लैंड जैसे छोटे और दूर के देश ने भारत जैसे बड़े देश के रिसोर्स लूटकर ही सत्ता हासिल की. ”
अयातुल्ला अली खामेनेई का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वह कहते हैं,
“नेहरू की किताब ‘ग्लिम्प्सेस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री’ जरूर पढ़ें. बदकिस्मती से, आप ज़्यादा किताबें नहीं पढ़ते. इसमें उन्होंने भारत में ब्रिटिश आक्रमण की प्रक्रिया और अंग्रेजों द्वारा किए गए कामों के बारे में डिटेल में बताया है.”
भारत की यात्रासाल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने सत्ता संभाली थी. इस दौरान 2 हजार 500 साल पुरानी राजशाही का अंत हुआ और ईरान एक इस्लामी गणराज्य बना. ईरान सरकार ने दूसरे देशों से रिश्ते मजबूत करने के लिए आउटरीच प्रोग्राम शुरु किए. इसी प्रोग्राम के तहत फरवरी 1981 में अयातुल्लाह अली खामेनेई भारत आए थे.
ईरानी अर्काइव्ज़ के डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि खामेनेई की उम्र तब करीब 41 साल थी. उस वक्त खामेनेई राष्ट्रपति नहीं थे, बल्कि ईरान की रिवोल्यूशनरी काउंसिल के एक प्रमुख सदस्य थे. अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की थी. पुराने रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि खामेनेई पहले बेंगलुरु और फिर अलीपुर शहर गए. अलीपुर कर्नाटक की राजधानी से करीब 75 किलोमीटर दूर है. अलीपुर अपनी खास पहचान के लिए जाना जाता है, जहां ज्यादातर शिया मुस्लिम आबादी है और ईरान के साथ इसके पुराने धार्मिक और एजुकेशनल रिश्ते हैं.
खामेनेई की ऑफिशियल वेबसाइट पर छपी तस्वीरों में 1981 में बेंगलुरु और अलीपुर में भीड़ उनका स्वागत करती दिख रही है. कैप्शन में साफ-साफ बताया गया है कि उस दौरे के दौरान भारतीय लोग खामेनेई का स्वागत कर रहे थे. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने 1981 से 1982 के बीच ईरानी सरकार के साथ मिलकर बनाए गए एक हॉस्पिटल का उद्घाटन करने के लिए गांव का दौरा किया था.
15 मिनट में दुश्मनी का सफाया!
1980-81 में खामेनेई ने कश्मीर का भी दौरा किया था, जहां कथित तौर पर खामेनेई ने श्रीनगर में लोगों को संबोधित किया था. कश्मीरी एक्टिविस्ट कल्बी हुसैन रिजवी के मुताबिक, यह दौरा घाटी में सांप्रदायिक तनाव के समय हुआ था. रिजवी लिखते हैं कि खामेनेई एक सुन्नी मस्जिद में शुक्रवार की नमाज में शामिल हुए. कश्मीर के ‘मीरवाइज’ मौलवी फारूक के सामने खड़े होकर नमाज पढ़ी और 15 मिनट का भाषण दिया. रजवी अपने संस्मरण में लिखते हैं,
“उस दिन तक शिया और सुन्नियों के बीच बहुत झगड़े थे. अगर कोई शिया ‘सुन्नी मस्जिद’ में जाता था तो वे मस्जिद को साफ करते थे. ये कहकर कि कोई बे-दीन घुस आया है और इस तरह मस्जिद नापाक हो गई है. लेकिन खामेनेई के भाषण के बाद शियाओं के लिए सुन्नी मस्जिदों में नमाज पढ़ना आम बात हो गई और वे बिना किसी डर के सुन्नी समाज के नेताओं के सामने नमाज पढ़ते थे. सुन्नी भी शिया मस्जिदों में नमाज़ पढ़ते थे. यह एकता अयातुल्ला खामेनेई के उस 15 मिनट के भाषण का नतीजा थी.”
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तीन दशक बाद अगस्त 2012 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के तेहरान दौरे के दौरान खामेनेई ने खुद अपनी भारत यात्रा का ज़िक्र किया था. उन्होंने इस दौरान भारत की धार्मिक विविधता की भी तारीफ की. रिकॉर्ड्स के मुताबिक,
“खामेनेई ने भारतीय इतिहास के बारे में अपनी राय रखी. उन्होंने गांधीजी के संघर्ष के लिए तारीफ़ की और अपने इस विश्वास को याद किया कि नेहरू असल में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक थे. उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि धार्मिक विविधता जरूरी है और इससे भारत की राष्ट्रीय एकता को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए. सांप्रदायिक झगड़ों से बचना चाहिए और सभी समूहों के बीच मेलजोल की जरूरत है.”
1989 में ईरान का सबसे बड़ा पद संभालने के बाद से खामेनेई ने भारत का कोई औपचारिक दौरा नहीं किया. इसके बाद भारतीय नेताओं के साथ उनकी मुलाकातें तेहरान में या इंटरनेशनल्स समिट के दौरान ही हुईं.
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