हिजाब विवाद पर अवध ओझा क्यों बोले- "तो स्कूल छोड़ दो"?
हिजाब मामले पर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा चल रहा है.

लल्लनटॉप के गेस्ट इन द न्यूज़रूम की साप्ताहिक बैठकी का मौक़ा था. गेस्ट थे अवध ओझा. बहुत सारे मुद्दों समेत उनसे देश की शिक्षा व्यवस्था के बारे में भी चर्चा हुई. उन्होंने (Ojha Sir) अपने विचार रखे, कि इस देश में किस तरह की शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए और शिक्षकों का कैसा सम्मान मिलना चाहिए. इसी सिलसिले में हमने उनसे एक हालिया बहस के बारे में पूछ लिया.
हिजाब विवाद. इस साल जनवरी में कर्नाटक से शुरू हुआ ये (Hijab Row) विवाद देश के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया. वहां भी लंबी सुनवाई के बावजूद फैसला साफ़ नहीं हो पाया. स्प्लिट-वर्डिक्ट आया. माने 2 जजों की बेंच थी. एक ने कहा, स्कूल में हिजाब पहन सकते हैं. दूसरे ने कहा, नहीं पहनना चाहिए. लेकिन यह बहस कोर्ट से बाहर भी ख़ूब चलती है. अवध ओझा भी इस बहस का हिस्सा रहे हैं. उन्होंने पहले कभी कहा था, "अगर हिजाब और भगवा पहनना है, तो स्कूल छोड़ दो; मदरसों और मठों में जाकर पढ़ो."
हमने उनके इस बयान पर जब उनका पक्ष पूछा, तो उन्होंने विस्तार से बताया,
इस पर एक फॉलो-अप सवाल आया. जो सवाल कोर्ट और सड़किया बहसों में भी ख़ूब आता है, कि क्या आप यही बात सिखों को कहेंगे पगड़ी पहनने के लिए? इस पर सबसे पहले तो अवध ओझा ने भगत सिंह की मिसाल दी, कि उन्होंने अपने बाल और दाढ़ी काट डाले थे. फिर पाकिस्तान की पत्रकार आरजू काज़मी और मौलाना रशीदी की डिबेट का ज़िक्र किया. जहां आरजू मौलाना से पूछती हैं कि हिजाब पहनने के लिखित प्रमाण कहां हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर को इस मसले पर एक विभाजित फैसला दिया था. जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखा कि राज्य के धर्मनिरपेक्ष स्कूलों में धार्मिक प्रतीक वर्जित हैं. जस्टिस गुप्ता का मत था कि 'धर्मनिरपेक्षता' का अर्थ है एकरूपता. वहीं, जस्टिस सुधांशु धूलिया ने अलग राय रखी. कहा कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब विविधता के प्रति सहिष्णुता है. स्कूल में हिजाब पहनना या न पहनना, आखिरकार लड़की के चयन का मसला है.
अब मामले की सुनवाई बड़ी बेंच करेगी.
शिक्षा व्यवस्था पर क्या बोले ओझा सर, जानने के लिए पूरा वीडियो देखिए

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