सोने का वक्त हो चला है मोहम्मद शाहिद, अलविदा!
पूर्व हॉकी कप्तान मोहम्मद शाहिद की तबीयत ख़राब थी. उन्हें नीचे वाली बर्थ चाहिए थी. मगर नीचे बैठे थे सत्य व्यास.
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फोटो - thelallantop
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बनारस टॉकीज़ इन्होंने तब लिखी नहीं थी. और बेस्ट सेलिंग वाली लिस्ट में अभी इन्होंने घुसपैठ नहीं की थी. तब जब सत्य व्यास को फ़ेसबुक पर फैन मेल ज़रा कम आते थे और जब इंटरव्यू में जाना दुनिया का सबसे ज़रूरी काम था. उस ज़माने में शिवगंगा ट्रेन में किताब लेकर चढ़े सत्य व्यास से मुलाक़ात हुई उनकी जिसे नीली जर्सी में गेंद ड्रिबल करते हुए देखे जाने की आदत थी. इंडियन हॉकी का कप्तान. बेहतरीन प्लेयर. मोहम्मद शाहिद.
सोने का वक्त हो चला है.
ठीक-ठीक याद है. 2006 के अप्रैल का महीना था! प्रमोद महाजन को उनके ही भाई ने गोली मार दी थी. और अगले ही दिन मुझे किसी साक्षात्कार के लिए दिल्ली जाना था. शिवगंगा सबसे बेहतर ट्रेन मानी जाती थी. स्लीपर में टिकट कोई भी उपलब्ध नहीं था. एक उम्र में साक्षात्कार चूंकि सारे ही महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए जाना ही था. पापा को बताया. उन्होने कहा- "थर्ड एसी मे देखिये." थर्ड एसी में टिकट उपलब्ध था. टिकट हुआ. ठीक-ठीक याद है. लोअर बर्थ. व्यक्तिगत रूप से मुझे लोअर बर्थ कभी पसंद नही रहा. किताबें लेकर अपर बर्थ पर चढ़ जाने का मजा ही कुछ और है. खैर, मन मसोस कर मैं ट्रेन मे बैठ गया. याद किया तो पाया कि मैंने उस दिन वैशाली की नगरवधू खरीदी थी.
किताब खोल कर अभी मैं बैठा ही था कि बोगी में थोड़ी हलचल हुई. मैं मन ही मन सोचा कि यह हलचल मेरे आसपास ही न आ जाए. लेकिन जैसा बदा था, वो हलचल मेरे सामने ही आकर अपनी सीट देखने लगी. पठानी कुर्ते में तीन लोग मेरे ठीक सामने आकर अपनी सीट देखने लगे. उनमे से एक ने दूसरे से कहा- "भाईजान यही ऊपर वाली सीट आपकी है. मैं बात करूं?" लेकिन दूसरे व्यक्ति ने, जिसकी यह सीट थी, इशारों से उसे मना कर दिया. बाकी दो लोग दुआ-सलाम के बाद ट्रेन से उतर गए. शिवगंगा ठीक समय पर गंतव्य की ओर चली.
"बच्चे मेरे तबीयत ठीक नहीं है. क्या तुम ऊपर वाली सीट पर चले जाओगे?" फंसी-फंसी सी एक आवाज आई. मैंने देखा तो इल्तिजा उसी व्यक्ति की थी. जी जरूर! कह कर मैं अपना बैग ऊपर वाली बर्थ पर फेंकने ही वाला था कि वही आवाज दुबारा आई- "तुम जानते हो हम कौन हैं?" मैं नहीं जानता था. मगर इतना जरूर जानता था कि इसके जवाब में ना कहना असभ्यता होती. मैं बस मुस्कुरा दिया. "मोहम्मद शाहिद!" एक आश्वस्त ठहराव के साथ वही आवाज फिर आई. मैं फिर भी नहीं पहचान पाया. बस उन्हें बुरा न लगे इसलिए हाथ बढ़ा दिया. उन्हें मेरा हाथ बढ़ाना पता नहीं कैसा लगा. उन्होने फिर कहा- "पूर्व हॉकी कप्तान, हिंदुस्तान. मोहम्मद शाहिद!"
यह आदमी! पठानी कुर्ते में सामान्य कद का, आधा गंजा. यह आदमी मोहम्मद शाहिद कैसे हो सकता है? मेरा मोहम्मद शाहिद तो नीली जर्सी में गेंद लिए इवान लेंडल के पोस्टर के ठीक बगल में मेरे कमरे में चिपका हुआ था. पोस्टर अब न भी हो तो क्या, ज़ेहन में तो है. अत्यंत हतप्रभ होने कि स्थिति में भी मुझे समय चक्र याद आया और भान हुआ कि मैं 20 साल बाद के वक्त में हूं. क्या गलत है अगर एक 26 साल का लड़का 46 साल का अधेड़ हो जाये. नहीं! बिलकुल भी नहीं. मैं अब उनसे हाथ मिलाने की स्थिति मे भी नहीं था. पांव छूना कुछ ज्यादा हो जाता. क्योंकि मैं उनका शागिर्द भी नहीं था. बस उनके सामने बैठ गया. फिर तो जो बातें निकली. मॉस्को ओलंपिक, स्योल, पद्मश्री, क्रिकेट, राजीव मिश्रा, यूपी स्पोर्ट्स कॉलेज, ज़फ़र इकबाल, डीएलडबल्यू, बीएचयू और पता नहीं क्या क्या. बातों-बातों में मैंने भांप लिया कि मोहम्मद शाहिद हॉकी प्लेयर बाद में है, पहले बनारसी हैं. लगभग हर दो वक्तव्य हिन्दी मे देने के बाद वो बनारसी पर आ ही जाते. उन्होने बताया कि कितने ही प्रोमोशन, कितने लोभ, कितने अवसर उन्होने बस इसलिए छोड़ दिये ताकि बनारस न छूटे. इतनी बाते इतनी बातें होने लगी कि बाकी लोगों की नींद मे खलल आने लगी. मैंने लोगों को नजरअंदाज किया. मगर मोहम्मद शाहिद ने नहीं किया. उन्होने कहा कि अब सोने का वक्त हो चला है. मैंने उनकी बात मान ली.
सोने का वक्त हो चला है कप्तान. तुम चलो. हमें अभी वैशाली की नगरवधू में तुम्हारे ऑटोग्राफ ढूंढने हैं. अलविदा.

